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9 चदाकाश गीता

मंगलाचरण

‘प
ु तक का उ1े)य’

मन9ु यजीव शांतपण


ू K तर(के से सच-जठ
ू , 2थल
ु -स[
ू म, गण
ु -
अवगण
ु क@ समझ पाएं वह( ईस प2
ु तक का उदे qय है । यह
उदे qय उनके तं?Gका तंG म हरदम फैला रहे । मानवजम 4मलने
के बाद हमारा फजK 1या है? पण
ू K को समझने के बाद ह( शांत
ाwत होती है । ईqवर क@ कृपा से यह मानवजम म “म{” क@
समझ ाwत कर, नरं तर शांत ाwत कर, चंचल मन शांत हो
वह( चत क@ शांत है । चंता और परे शानीओ से दरू रह।
नराकार ONम म हम 3व4लन हो जाएं, मन क@ शt
ु ता ाwत हो,
जीससे यह जम और नये जम म सख
ु क@ ािwत हो सके।

ओम सवK है । ओम नरं तर है , ओम माया है , ओम सवvपर( है


ओम आमा म नरं तर नवास करता है । ओम के पदकमलो म
सवाKपण
K हो। ओम मन क@ एका|ता से 4सt होत है । यह( बात
का 2वीकार माया म 4लwत हर एक Fयि1त को करना चा&हए।
जीन लोगो न ईस सय का सा$ाकार Iकया है वे अपनी 4स3t
भल
ू जाय, 1यक
ंु @ उनके 2तर पर Xानी-अXानी के बीच का फकK
समाwत हो जाता है । ईस प2
ु तक का तव ईसके श]दो म है ।
10 चदाकाश गीता

ईस प2
ु तक का उदे qय मानवी क@ तपा&दत मायताएं बदलने
का नह(ं हे साथ ह( मानवी के आंतoरक जीवन को बदलने का भी
नह(ं है ।

4सफK ईस प2
ु तक का उदे qय समझने से ह( Fयि1त क@
महानता म ईझाफा नह(ं होगा साथ ह( न समझने से उसक@
महानता म कमी भी नह(ं आयेगी।

Xात या अXात दोनो ि2थतओं म कोई फकK नह(ं है ।


आमचंतन से ईन श]दो पर 3वचार करना चा&हए। ये श]द
नरं तर हमारे मनोआकाश म घम
ु ते रह।

ये श]द Iकसी खास Fयि1त को संबोधत करके नह(ं 4लखे गये


है ।

ओम परONम है , ओम नरं तर सय है , ओम पण


ू K Xान है ।
ओम 3वqवनयंता है । ओम ONमांड संर$क है , ओम
सिृ 9ट3वनाशक है , ओम म सजKनकताK के सज
ृ न 3व4लन हो जाते
है ।
11 चदाकाश गीता

चदाकाश गीता

‘आ मा क3 परम शि5त’

थम भाग

1. 8ानी च त शू:य होते है ईस'लए 8ानी भेदर@हत होते है। वे


तंBार@हत, वDन या नBार@हत होते है । वे आ मानंद मE होते है । सूयF या
चंBमा का फकF उनको होता नह!ं है । उनके 'लए हरदम काश होता है ।
मानवमन एक म'लनतायु5त काच क3 चमनी जैसा है , जीस तरह चमनी
पर दाग होता है तब तक वह पारदशI नह! हो सकती उसी तरह मानवमन
जब तक मन का मैल दरू न हो तब तक शुJ नह! हो सकता। इस'लए
च त शि5त के Lवकास के 'लए यह ज*र! है क3 मन का मैल दरू हो।
पMट!करणः Xानी का मन पण
ू C
K प से शांत होता है । Xानी के भेद
पूणत
K ः 3व4लन हो जाते है । Xानी जागCक, 2वwन और सुषुwत अव2था से
पर रहता है । Xानी लोग आमा से जागCक होते है लेIकन आ&दभौतक
3वqव क@ ओर उदासीन रहते है। वे समाध के परम सुख म म}न होते है ।
सूयK और चंlमा उनके 4लए एकसमान है । ~वैत का भाव उनम पूणत
K ः न9ट
हो जाता है । उनको काश क@ ािwत हौती है । व अपने तं?Gका तंG के
गगन म आमा क@ भFयता का अनंत अनुभव करते है , जैसे क@ शीशे क@
चमनी पर काला दाग लगा हुआ होता है तब वह काश न&हं दे सकती
12 चदाकाश गीता

लेIकन काला दाग नकालकर साफ कर दे ने के बाद पूणC


K प से वह काश
दे ती है । उसी तरह आमा क@ अशु3tयां Vयान के माVयम से दरू हो सकती
है । साफ़ मन ईसके बाद ह( दै वी xयोत फैलाता है ।

2. मानव शर!र मE तीन नाड़ीयां होती है । 1. सूयF या सुष


ु ना, 2. चंB
या ईडा, 3. तारा या Lपंगला. थम नाड़ी का रं ग लाल है , दस
ू र! का भूरा
है , तीसर! का हरा रं ग है ।
पMट!करणः मानव शर(र क@ तीन अत महवपूणK नाड़ीयां अथाKत
तं?Gकाएं है । जीनके नाम सूयK या सुषD
ु ना, चंl या ईडा और 3पंगला अथाKत
तारा है । ईडा र(ढ़ क@ ह‚डी यानी क@ 2पाईनल कोडK म बायीं ओर है ।
3पंगला दायीं ओर र(ढ़ क@ ह‚डी म होती है । सुषD
ु ना र(ढ़ क@ ह‚डी म
मVयभाग क@ जगह म से नीकलती है । सुषD
ु ना का रं ग लाल है । ईडा भूरे
रं ग क@ है और 3पंगला का रं ग हरा है ।

3. ईन तीनो नाड़यो का 'मलन RSयाकाश मE होता है । जैसे जैसे


योगाTयास बढता जाता है वैसे वैसे मितMक मE दस वरवालE वाSय जैसे
क3 हामVनयम, Wम, Xफडल (मुरल!) के जैसे Yबंद ु नाद पैदा होते है । नाद
(Zवन) एक और अभा\य है ।
पMट!करणः तीनो नाƒड़यो का 4मलन 2थान „दय है , जीसे
„दयाकाश कहा जाता है । ईस „दयाकाश म तन का छठा कमल अथाKत
“अX” होता है । ईडा, 3पंगला, सुषD
ु ना का “अX” म 4मलन होता है ।
योगा…यास के दौरान जो नाद सुनाई दे ता है वह ?बंद ु नाद है । ये नाद दस
कार के होते है और यह नाद हामvनयम, †म और मुरल( (Iफडल) के
13 चदाकाश गीता

Vवन जैसा होता है । ईसतरह, दस कार के नाद होन पर भी वह एक


और अभाxय है ।

4. जीस तरह कपरू अि^न क3 \वाला मE Lवल!न हो जाता है उसी


तरह मानवमन (च त) आ मा क3 अि^न मE Lवल!न हो जाना चा@हए।
पMट!करणः जीस तरह कपूर क@ गोल( को माचस क@ तील( से
जलाने पर वायम
ु ंडल म धुएं के Cप म अlqय हो जाती है उसी तरह
योगा…या हरदम चलता रहे तौ शुC म आमा से अलग लगता मन आमा
म 3वल(न होने लगता है । आ/खर म वह आम तेज म एकCप हो जाता
है ।

5. ना`रयल जब अपनी खोल से अलग होता है तब उसे @हलाने पर


नतेज आवाझ आती है उसी तरह मानव शर!र और आ मा को अलग
समझते हुए आ मा एक काशपूंज है , जीसके Sवारा सभी दोषो क3
रोकथाम हो जाती है ।
पMट!करणः नाoरयल जब ताजा होता है तब गभK के साथ मजबूती
से जुडा होता है लेIकन जैसे जैसे नाoरयल सुखने लगता है वैसे वैसे अपनी
खोल से अलग होने लगता है । अलग हो जाने के बाद वह सु2त आवाझ
पैदा करता है और उसी तरह आमा को शर(र से अलग मान तो आमा के
काश का अनुभव होता है । चत बाद म अि}न से शुt हुए सोने जैसा हो
जाता है ।

6. हम कूएं मE से बाdट! से जीस तरह पानी खींचते है उसी तरह


सांस लेनी चा@हए और कूएं मE बाdट! डालते है उसी तरह से सांस नकलनी
चा@हए। जब हम सांस नकालE तब काबFन यानी क3 दLू षत वायु नकलता
14 चदाकाश गीता

है । जब सांस अंदर भरते है तब शुJ ाण (ओझोन) अंदर जाता है , जीसे


ओमकार कह सकते है । ओमकार )वसन मE हो उसे मानस (मन-च त)
कहते है ।
पMट!करणः ाणायाम (qवसन) 3वXान पtत से हौना चा&हए। जब
हम सांस अंदर क@ ओर खींचे तब कूएं म से पानी खींच रहे हो ऐसा
महे सूस होना चा&हए। जब सांस नकाले तब कूए म बाWट( से पानी डाल
रहे है ऐसा अनुभव होना चा&हए। सांस जब नकाल तब तन क@ बहुत सी
अशु3tयां बाहर नकलती है , जब सांस अंदर लेते है तब शुt ाण शर(र म
वेश करता है । शुt ाण शर(र म ना4सका के माVयम से वेश होता है
तब उसके साथ अगर ओमकार का नाद 4मल जाये तो &दFय शि1त पैदा
होती है । ओमकार नाद के साथ ाणायम ह( “सय मनस” है ।

7. मनस जीव है लेXकन उनके थान अलग है । जीवा मा ह!


परमा मा है ।
पMट!करणः मन जब शुt हो तभी वह जीव के साथ एकCप होता
है । मनु9य के शर(र म उनके 2थान अलग होते है । मन का 2थान
जीवामा के नीचे होता है । जीव पूरे शर(र म फैला है । परमामा पूरे ONमांड
म फैला हुआ है ।

8. पi
ु ष और jी को 'शkा दे नी चा@हए। 'शkा का अथF 5या है ?
जीव को उस रहय का पता होना चा@हए क3 वह परमा मा है ।
पMट!करणः पाठशाला और कालेज म द( जाती 4श$ा सEची 4श$ा
नह(ं है । जीस Xान से जीवामा और परमामा का ऐ1य समझ म आये
वह( सEची 4श$ा है । हम लौIकक जीवन का Xान सामाय तौर पर जो
15 चदाकाश गीता

4मलता है उसे ‘अपरा 3व~या’ (नDन 4श$ा) कहते है । आ~यािमक गुC से


ाwत होती 4श$ा को परा3व~या कहा जाता है । पु:ष और 2Gीओं को
परा3व~या का Xान दे ना चा&हए मतलब जीव और 4शव के ऐ1य क@ सह(
4श$ा दे नी चा&हए।

9. परमा मा जीवा मा है , सnची मुि5त थूल मE सूoम को जानने


मE है ।
पMट!करणः 2थूल शर(र के साथ रहे ने से जीवामा भी 2थूल लगता
है । नरतंर योगा…यास से जीवन 2थूल से अलग होता है और उसे सू[म
क@ अनुभूत होती है और वह परमामा के साथ समव का अनुभव है ।
सह( मुि1त 2थुल म सू[म क@ अनुभूत ाwत करने म है । मुि1त ाwत
करने म थम चरण Fयाwत का पूणC
K प से नाश का है । अंधकार म काश
दे खना, असय म सय को दे खना और अXानता म Xान का दशKन वह(ं
मु1त है ।

10. हमे थूल नBा का याग करना चा@हए और सूoम नBा


करनी चा@हए। ाणायम के अTयास से ाDत होती सूoम नBा का आनंद
करना चा@हए।
पMट!करणः नlा दो तरह क@ होती है । आम आदमी जी रहा है वह
थम तरह क@ और 2थूल नlा है । दस
ु र( तरह क@ नlा सू[म नlा है जो
क@ योगीओ क@ नlा है । जीसे योगनlा कहते है । उसे अXात नlा और
Xान नlा भी कहते है । मनु9य को आVयािमक नlा जीसे समाध भी
16 चदाकाश गीता

कहा जाता है , उसका भी आनंद ाwत करना चा&हए। जीवन का अंतम


ल[य वह( है ।

11. जब हम उZवFगामी सांस लेते है तब घड़ी के अंदiनी चrो क3


तरह ाण अंदर गत करता है । ाण जब शर!र मE गत करता है तब शर!र
के अंदiनी Lव)व का होता है ।
पMट!करणः घड़ी के च‡@ क@ तरह जीस तरह अंदर ह( अंदर चलते
है ओर नंगी आंखो से दे ख नह( दे ख सकते उसी तरह ाण क@ शर(र म जो
गत होती है उसका अनुभव ाwत हो सकता है । बाहर( सांस जब अंतर क@
ओर गत करता है तब Fयि1त 3वqवनयंGक क@ शि1त का अनुभव करता
है । साधक को लगता है क@ सारा 3वqव उसके अंदर है । वह साधक शाqवत
सय का अनभ
ु व करता है । जैसे क@ सारा ONमांड उसी म हो।

12. जब हम पानी के घडे मे भरां हुआ पानी मE दे खे तब उसमE


आसमान का तYबंब @दखाई दे ता है । उसी तरह जब अंदर BिMट करE तो
तब अंदiनी चेतना का Lवशाल आसमान @दखाई दे ता है ।
पMट!करणः नंगी आंखो से &दखाई दे ता आसमान 2थूल आसमान है
लेIकन अंतl
K ि9ट करने से &दखाई दे ता आकाश सू[म अथाKत चदाकाश है ।
पानी के घडे म &दखाई दे ता 3वqव अनंत है Iफर भी 2थूल है । मनु9य
का „~य 2थूल होता है Iफर भी अंतl
K ि9ट करने से अनंत ईqवर का अनुभव
ाwत होता है ।

13. सुवणFपाj मE या 'मsी के बरतन मE बनाया गया आहार हो


Xफर भी कु ता कोई भेद Xकये Yबना वह खा लेता है ।
17 चदाकाश गीता

पMट!करणः कुता जब खाता है तब वह आहार सुवणKपाG म बना


है या 4मˆी के बरतन म बना उसका भैद नह(ं करता। वह यह भी नह(
सोचता क@ सुवणKपाG म बनाया गया आहार अEछा है । Xानी के 4लए भी
सुवणK और 4मˆी एकसमान है । उसे ~वैत का भाव न होने से अEछे -बुरे का
भेद होता नह(ं है ।

14. समुB के लवणयु5त पानी मE सूयF का तYबंब पडता है ठuक


वैसा ह! तYबंब पहाडो पर तालाबो मे पडता है । हम यह बात नंगी आखv
से दे खे वह! काफ3 नह!ं है सेXकन उसका अनुभव भी ाDत होना चा@हए।
पMट!करणः सूयK समुl के लवणयु1त पानी और तालाब के 2वEछ
पानी के बीच म कोई भेद नह( करता है । दोनो म सूयK का त?बंब
एकसमान &दखाई दे ता है । उसी तरह Xानी के 4लए गर(ब-अमीर, महान या
तुEछ के बीच कोई फकK नह(ं होता। उसे ~वैत का कोई भाव नह(ं होता।
यह बात अनभ
ु ूत क@ है । Iकसी का कहा सुनने क@ नह(ं है ।

15. पैड़ पर बहुत सारे फुल खीलते है । फुल गीर जाते है लेXकन
पैड़ लंबे अरसे तक नMट नह! होता उसी तरह B)य चीजE फुल क3 तरह है ,
जो अB)य है वह पैड़ जैसा है ।
पMट!करणः फुल पैड़ पर खीलता है लेIकन पैड़ फुल पर नह(
खीलता। पैड पर खीले फुल क@ तरह lqयमान 3वqव अlqय ईqवर म से
पैदा हुआ है । lqयमान 3वqव फुल क@ तरह न9ट होनेवाला है । अlqय ईqवर
न9टाय नह(ं होता, वह पैड जैसा है ।

16. माचस क3 ड"बी मE ती'लयां होती है , लेXकन वह अि^न तभी


पैदा कर सकती है , जब उसे माचस क3 ड"बी के साथ घीसा जाये उसी
18 चदाकाश गीता

तरह च त (मानस) भी ती'ल जैसा है , बLु J माचस क3 ड"बी क3 बाजुएं


है । वहां पर च त (मानस) और बLु J एकदस
ू रे के साथ घीसते है तब
आ मा का काश पैदा होता है , उसका तेज ज:म-म ृ यु के चr मE से
मुXकत जैसा है ।
पMट!करणः ती4ल से काश तभी पैदा होता है जब माचस क@
बाजुओ पर वह घीसी जाती है उसी तरह Xान का अि}न तभी का4शत
होता है । जब मानव (मानस) चत को बु3t के साथ घीसा जाता है ।
मानस माचस क@ ती4ल जैसा है और बु3t माचस क@ बाजुओ क@ तरह है ।
जब मानस और बु3t एकदस
ू रे के साथ घीसते है तब मनु9य म एक सू[म
पoरवतKन होता है । उसे अथाKत मनु9य को आमा के सा$ाकार क@ अनुभूत
हौती है । आमा के सा$ाकार का मूलतः ल[य तो जम-मृ यु के च‡ो म
से मु1त होने का है । आमा का सा$ाकार ह( मनु9यजीवन का उदे qय और
अंतम ल[य है ।

17. मनुMय को मान-अपमान क3 ओर लoय नह!ं दे ना चा@हए।


अपने शर!र के 'लए कम से कम Dयार होना चा@हए। ऐसा मनुMय ह!
सवFशि5तमान को अj तj सवFj दे ख सकेगा।
पMट!करणः मनु9य जब तक खुद को न9टाय समझता है तब तक
मान-अपमान के युt के 4लए समान रहता है लेIकन खुद एक न9टाय
शर(र है वह खयाल उसके मानस म से चला जाता है तब वह मु1त हो
जाता है मतलब मु1तामा बन जाता है । ईस ि2थत म पहMचने के बाद
उसे ईqवर के दशKन सवKG होते है और सवK म होते है । वह सवK है और सवK
वह( है ।
19 चदाकाश गीता

18. सवV तम काश और yzमतेज दोनो एकसमान है ।


पMट!करणः ONमतेज ह( सवvतम काश है , जो एकसाथ का4शत
होते करोडो सूयK से भी तेज2वी है ।

19. लकडी एक मूल त व है , जीसमE से बैठने के 'लए टे बल-कुसI


बनाई जाती है उसी तरह yzम मूल त व है , जीसमE से अग{णत Lव)व का
उदभव होता है ।
पMट!करणः ONम ONमांड का मूल है , जीस तरह टे बल-कुस‰ लकडी
के मूल तव म से बनती है उसी तरह ईqवर सजKन का मूल कारण है वह
मूल तव है , जीसम से सवK का उ~गम होता है और अनगनत 3वqव का
उदभव होता है ।

20. मानस और आ मा लोगो के @हसाब से समान है । yzमांड के


अंतम चरण मE यह बात सह! है लेXकन उसके पहले के चरण मE दोनो क3
सांसे, सोचने और मनोभावो मE फकF है ।
पMट!करणः मन और आमा आम लोगो के समान है , सज
ृ न क@
ारं भ और अंत म यह बात सEची है लेIकन मVय चरण म उसे फकK
&दखाई दे ता है , जीसे माया कहा जाता है । सभी मनु9यM कभी ना कभी
ईqवर तक पहुंचते है । सवाल 4सफK समय का होता है । सज
ृ न के अंत म
सब परONम म 3वल(न हो जाता है ।

21. अि^न, वायु, जल और प|ृ वी सब के 'लए आम है , उसका


उपयोग परू ा जनसमाज करता है। कुएं का पानी कोस से खींचे जाने के बाद
yािzमन, शूB, बnचे, नातजात, उ} के फकF को सोचे Yबना करते है ।
20 चदाकाश गीता

पMट!करणः अि}न, वायु, जल और पŠृ वी का उपयोग सब करते है


उसी तरह ईqवर भी सब के 4लए है । वह 3वqव 3पता है , जीसे जात-पात,
उ‹ के फकK ?बना ाwत कर सकते है । जीस तरह कुएं म से नीकलता कोस
का पानी OािNमन, शूl जात-पात के भेद ?बना उपयोग कर सकते है उसी
तरह ईqवर क@ अनुभूत सब के 4लए एकसमान है ।

22. मानस तल के जैसा है । बLु J तैल क3 च5क3 जैसा है और


अमत
ृ उसमE से नीकलता तैल है।
पMट!करणः मनु9य के मन को बु3t क@ शि1त से नयं?Gत Iकया
जाता है तो एक ईEछाशि1त पैदा होती है , जो मुि1त के अमत
ृ व 2थान
तक ले जाती है । मनु9य तल को जीस तरह च1क@ म पीसता है उसी तरह
मानस को बु3t2व:प च1क@ म पीसने से मुि1त का अमत
ृ नीकलता है ।

23. बLु J राजा है और मन धान है , धान को हरदम राजा के


अधीन रहना चा@हए।
पMट!करणः बु3t का 2थान मनु9य के जीवन म मन से ऊंचा है ।
राजा जीस तरह उसके धान का मा4लक होता है उसी तरह बु3t को
मानवमन का मा4लक बने रहना है और मन बु3t के अधीन रहना चा&हए।
मनु9य अगर मन के &हसाब से चले तो वह अXानी है लेIकन अगर वह
बु3t के अंकुश म रहता है तो वह Xानी है । यह( 3वचार वेदांत का है ।

24. क3सी मागF पर पांच-छः हजार लोग एकसाथ जा रहे है तब


ब^गी चलाना \यादा मिु )कल होता है । ब^गीवाले को ब^गी चलाने मE
सावधानी बरतनी पडती है । साईXकल चलानेवाले को आसपास के पदयाjी
को खयाल रखना पडता है , उसे अपना खयाल रखना ज*र! नह! है ।
21 चदाकाश गीता

पMट!करणः जीस तरह 5-6 हजार लोगो क@ भीड़ म से ब}गी को


आसानी से नीकाल( नह( जा सकती उसी तरह दु यवी जीवन क@ वासना म
अटका मनु9य आसानी से ईqवरािwत के मागK क@ ओर आगे बढ नह(ं
सकता। ऐसे मनु9य को खुद के 4लए xयादा जाग:क रहना चा&हए। उसे
साईIकल चलानेवाले क@ तरह अपना खयाल नह( रखना है बिWक क@सी
ओर का खयाल रखना चा&हए। दु यवी जीवन म रहना और उसम से मु1त
रहना क&ठन है । जो मनु9य ईEछाओ क@ जाल मे फंसा है उसके 4लए यह
जाल म से नीकलना बहुत मुिqकल होता है ।

25. ठं डे पानी मE गले तक डूबे मनुMय को ठं डे पानी से कुछ भी


फकF पडता उसी तरह पण
ू F €यि5त को rोध भाLवत नह!ं करता है ।
पMट!करणः जब मनु9य अनुभूत के उEचतम 2तर पर पहुंचा हो
तब ईqवर उसे अंदर-बाह और हर तरफ &दखाई दे ता है । वह सारे 3वqव म
ईqवर और ईqवर म पूरे जग को दे खता है । ऐसा आदमी दु यवी जीवन क@
नबKलताओ से पर होता है । वह पूण:
K प से शांत होता है , उसक@
चतवृ तयां खतम हो गई है ।

26. एकबार तैल मे तले जाने के बाद बीज अंकु`रत न@ह होता,
द!पक मE तैल खतम हो जाने के बाद हम उसे द!पक न@ह कहते है । जब
आ@दनारायण सूयF तप रहा है तब वायुद!पक \यादातर धूंधला लगता है ।
सूयF दु नया को काश दे ता है । मानस को राजा माने तो बLु J को
धानमंjी कहा जाता है । पैडो पर फुल न खीले तो वE सुंदर न@ह लगते।
बीना कारण कोई प`रणाम न@ह होता। अंधकार मE भी काश उपिथत
रहता है । अ8ान अंधेरा है । 8ान काश है । मनुMय को अपना
22 चदाकाश गीता

आ मनर!kण करना चा@हए। हमने जहां से याjा शुi क3 वहां वाLपस


जाना चा@हए। हमने उधार ल! हुई चीजE वाLपस करनी चा@हए।
पMट!करणः पूणK Xानी को जगत क@ ईEछाएं छूती न&ह है । वह
अपनी ईEछाएं खतम कर दे ता है । ईस4लए ह( तले हुए बीज को जमीं म
लगा दे ने के बाद उसे पानी &दया जाये तो भी अंकुoरत न&ह होता उसी तह
Xानी क@ मत
ृ हुई ईEछाओं Iफर से िजवीत न&ह होती और उसका मन
अचल रहता है । वह िजवीत होने के बावजूद दु यवी जीवन म वा3पस आ
न&ह सकता। द(ये म तैल न हो तो उसे द(या न&ह कहा जाता और
ईEछार&हत मनु9य को मनु9य न&हं कहा जाता। ईEछार&हत मनवाला Xानी
ईqवर म एक:प हो जाता है । सूय
K काश के सामने जैसे गैस का द(या
धूंधला लगता है ठsक वैसे ह( ब3ु t के सामने मन धुंधला लगता है । मनु9य
को बु3t से मन को वश म करना चा&हए। मन बु3t के नयंGण म रहना
चा&हए। बु3t को मन को सह( &दशा &दखानी है और मन है क@ जीसे
उसक@ सलाह अनुसार चलना है । बु3t को धानमंGी क@ भू4मका नभानी
है । मानस राजा है ओर धानमंGी के तौर पर बु3t को उसे सलाह दे नी है ।
?बना फल का पैड़ न:पयोगी है उसी तरह शाqवत सय के Xान ?बना
मनु9य नरथKक है । ईस दु नया म ?बना क@सी वजह से पoरणाम 4मलता
न&ह है । ईqवर भी सज
ृ न क@ वजह है और उसका पoरणाम दु नया है , उसी
तरह गु: भी कारण है और Xान वह पoरणाम है । गु: के ?बना Xान संभव
न&हं। अंधकार म काश क@ उपि2थत होती है । माया के अंधकार म रत
हुआ 3वqव ईqवर का सज
ृ न है । ईस तरह, पूरे 3वqव के सज
ृ न के बारे म
कह तो उसका मूल ईqवर है । सय क@ अनुभूत होनी मतलब अंधकार म
काश का दशKन करना। अXानता अंधकार है और Xान काश है । खुद
23 चदाकाश गीता

को पहचाननेवाला Xानी है । जहां से हमने जम 4लया है उसी जगह म


वा3पस जाना वह(ं हमारा मूल फझK है । हमारा जम 2थान ईqवर है और
ईस मनु9य जम म ईqवर के सांनVय म वा3पस जाना वह हमारा फझK
है । आमा हम ईqवर क@ ओर से 4मला अमूWय तोहफ़ा है , जीसे शुt
ईqवरभाव से वा3पस करना हमारा फझK है ।

27. गi
ु अपने 'शMय को कं@टले मागF से राजमागF क3 ओर ले
जाते है । ऐसे 8ानी गi
ु दो तरह के होते है – एक गi
ु ारं 'भक – मूल
8ाता है , दस
ू रे आनुषांगक है । मानवमन जो क3 ारं 'भक मूल गi
ु है ।
दस
ू रे आनुषांगक है । लेXकन दोनो वतंj है मतलब क3 एक दस
ू रे का गi

न@ह है । आनुषांगक है वह आनुषांगक गi
ु है । कुए मE पानी @दखाए वह
आनुषांगक गi
ु है लेXकन जगत के सभी जीवो के Rदय मE बसे गi
ु ह!
जगSगi
ु है ।
पMट!करणः सदगु: वह( है जो मनु9य को जगत के कं&टले मागK
पर से अVयाम के राजमागK पर ले जाते है । ऐसे सदगु: दो तरह के होते
है , एक ारं 4भक-मूल और दस
ू रे आनुषांगक. मानवमन मूल ग:
ु है जो क@
मनु9य के अEछे -बूरे दोनो के 4लए िजDमेवार है । आनुषांगक गु: या गु:
मनु9य को सह( मागK क@ ओर ले जाता है वह( आनुषांगक ग:
ु है । ईqवर
जो क@ सिृ 9ट का सज
ृ नकताK है वह सभी जीवो म बसता है और वह
जग~गु: है ।

28. लोग गi
ु का शर!र दे खकर कर उ:हE गi
ु भाव से पज
ू ते रहते
है । माला के मोती गनने से या पादक
ु ाओ पहन के घुमने से गi
ु नह! बना
जा सकता। गi
ु yzम8ाननी बातE करE अनेकLवध कार के प थर 'शMयो
24 चदाकाश गीता

को दे तो भी वह सnचा गi
ु न@हं। गi
ु अपने श"दो को कायV से च`रताथF
करE तो ह! वे सnचे गi
ु है । थम अनुभव करे और अनुभूत करने के बाद
दस
ू रे को 8ान दे ना शुi करE ।
पMट!करणः लोग आम तौर पर सोचते है क@ गु: का बाNय दे ह
गु: है । मनु9य अEछs पादक
ु ा पहनकर घूमे या माला के मोती गने तो वह
अEछा गु: न&ह कहा जा सकता। सदगु: बनने के 4लए मनु9य को अपने
आमतव को पहचानना चा&हए। मानवमन के साथ बाNय आवरण को
संबंध न&ह। गु: बनने के 4लए वचन और कमK का ऐ1य आवqयक है
मतलब क@ जो बोले वह( करे और जो करते है वह( बोले। ONमXान क@
बात कर और 4श9यो को अनेक3वध कार के रन द तो वे सदगु: नह(ं है ।
सदगु: वह( है जो उहMने 4सt Iकया हुआ Xान अपने 4श9य को दे और
वह शीखाना तब शु: करे जब उहोने Xान को अनुभव4सt Iकया हो।

29. जीस गi
ु ने अपना दे हभाव मीटा @दया है वह! सnचे गi
ु है
और गi
ु कहलाने लायक है और ऐसे गi
ु से उपर कोई गi
ु न@ह है । ऐसे
गi
ु ई)वर का व*प है और ई)वर ह! ऐसे गi
ु है ।
पMट!करणः दे हभाव को पूण:
K प से 4मटा दे नेवाले ह( गु: बनने के
यो}य है । ऐसे गु: ईqवर के समीप होते हो। अXानी लोग ईqवर और गु:
के बीच म फकK दे खते है । श1कर दध
ू म घूल जाती है या नमक पानी म
पीघल जाता है उसी तरह ऐसे गु: ईqवर म 3वल(न हो जाते है , आस4लए
ऐसे गु: और ईqवर के बीच कोई भेद न&हं रहता।

30. श5कर का वाद जीzवा पर रखने पर ह! ाDत होता है ।


श5कर को जीzवा से अलग रखE तो उसक3 'मठास का अनभ
ु व न@ह होता
25 चदाकाश गीता

है । हजारो साल तक रामकृMण गोLवंद का जाप करने से मु5त 'मलती न@ह


है । जो मनुMय Rदय क3 समझ से जाप करता है तो ह! मुि5त ाDत होती
है ।
पMट!करणः हम क@सी दु यवी चीज का अनभ
ु व करते है तो ह(
उसके 2वाद का पता चलता है । उसके बारे म सुनने से या दे खने से उसके
सEचे 2व:प का Xान 4मलता न&ह है । श1कर का 2वाद उसे िजNवा पर
रखने से ह( आता है उसी तरह ईqवर का नामजाप हजारो साल तक 4सफK
मुंह से करने से मुि1त 4मलती नह(ं है । ईqवर क@ ािwत और मुि1त के
4लए यह जCर( है क@ „दयपूवक
K सEची समझ से ईqवर का नाम2मरण
Iकया जाये।

31. गाय का दध
ू कभी कड़वा न@ह होता है । मनुMय को मुि5त
ाDत करने के 'लए रामे)वरम, बनारस जैसे तीथFधामो पर जाने क3 जiरत
न@ह है । मुि5त के 'लए आव)यकता यह है क3 आंतरमुख से, मन को थोडी
पलो के 'लए िथर Xकया जाएं। प थर क3 तमाओ के दशFन करने से
ई)वर के दशFन होते न@ह है । प थर मE मूतF का दशFन करना 'सफF एक
‚मणा है । सह! 8ान के Yबना मिु 5त संभव न@ह। हमे 'मला हुआ
मनुMयज:म प`रणाम है । ई)वरािDत के 'लए Xफर से यास करना वह
कारण है । हमे कारण और प`रणामक3 शुJ समझ ाDत करनी होगी। हमे
अnछे -बरू े या बरू े या जुƒे क3 समझ ाDत करनी होगी। यह सब समझने के
बाद शांत ाDत करनी चा@हए।
पMट!करणः ईqवरािwत गाय के दध
ू क@ तरह हरदम अमत
ृ तW
ु य
है । वह सतचत आनंद है । गु: हम ईqवर के ािwत के मागK क@ ओर ले
जा सकते है । पथर क@ तमा के आकार व न&ह कर सकते। तीथKयाGा
26 चदाकाश गीता

करने से Xान ाwत न&ह होता लेIकन उसके 4लए गु: क@ ेरणा आवqयक
है । मनु9य के मनCपी मकKट का खेल दरू करना चा&हए। 3ववेकशि1त
बढानी चा&हए। 4मˆी-पथर क@ तमाओ के दशKन ईqवर के दशKन नह(ं है।
मन को नरं तर आंतरमुख रखना चा&हए। पथर क@ तमाओ को ईqवर
समझना वह मन क@ Œमणा है। सह( Xान के ?बना मुि1त संभव नह(ं है ।
हमने मनु9य जम 4लया वह पoरणाम है , वजह है Iफर से ईqवर क@
ािwत। हम कारण पoरणाम क@ समझ मनु9य के जम के उदे qय और
उसके अंत क@ समझ से पानी चा&हए। जीवन का उेश आमा क@ ािwत
से हो सकता है । हमे शुभ-अशुभ-सEचे-जुŽे का 3ववेक पाना होगा। ईन सभी
बातो का Xान पाकर शांत ाwत करनी चा&हए जो क@ जीवन का ल[य है ।

32. घर क3 द!वारो को दरवाजE न हो तो उसे घर नह!ं कहा


जाता। पानी को गरम करने के 'लए अि^न अनवायF है । वायु के Yबना
अि^न \जव'लत न@ह होता, आहार और नींद के Yबना मनुMय थोडे @दन
जी सकता है लेXकन ाणवायु के बगैर थोडे पल जीना भी संभव नह!ं।
पMट!करणः घर के 4लए दरवाजा जCर( है । अि}न गम‰ के 4लए
जCर( है । हवा से आग xजव4लत होती है । जीस तरह मानव के भौतक
शर(र के 4लए आहार और नlा आवqयक है उसी तरह ाण शर(र के 4लए
अनवायK है । ाण के ?बना जीवन संभव नह(ं।

33. जगत का नाश मतलब उसे वायु मE प`रवतFत करना।


राजयोग ऐसे 'सJांत का मल
ू है , जीसमे सभी योनयां एकसमान मानी
जाती है । एका मवाद के 'सJांत का अनुसरण करE तो Lव'भ:न भेदबLु J
'मट जाती है ।
27 चदाकाश गीता

पMट!करणः जगत का नाश हो तो वह वायु म पoरवतKत हो


जाता है अथाKत भूरे आकाश म पoरवतKत हो जाता है । राजयोग से एक
ईqवर का अनुभव होगा ईस4लए 3व4भन क@ भेदबु3t 4मट जायेगी। ऐसा
मानव ईqवर के साथ एकCप हो जाता है । दु नया और उसके आकषKणो से
मु1त हो जाता है । वह बाद म पूणC
K प से एकामवाद का रह2य समझ
जायेगा।

34. अनंत (ई)वर)मE कोई अंतम €यि5त या चीज नह! है । 8ानी


के 'लए कोई अ8ानी नह! है । अ8ानी के 'लए कोई 8ानी नह! है । बnचE
माता पर हाथ उठाएं तो भी माता उनको फEक नह!ं दे ती।
पMट!करणः ईqवर अनंत है और उनक@ अनभ
ु ूत होने के बाद
कोई भी अंतवाल( चीज या Fयि1त न&ह हो स1ता। एकबार ईqवर का
सा$ाकार होता है बाद म दु नया का अि2तव रहता न&ह है । Xानी के
4लए सब समान है अथाKत उसे Iकसी कार का फकK नह( होता। अXानी
मतलब िजसे ईqवर का अनुभव नह( हुआ उसे ह( सब फकK &दखायी दे ते है ।
tैतभाव से मु1त नह( हो सकता। माता के 4लए अEछे -बूरे दोनो बEचे
समान होते है । वह दोनो समान तर(के से चाहती है । िजसे ईqवर का
अनुभव हुआ है उसके 4लए अEछे -बूरे सभी लोग समान है। वह सबको
समानCप से ह( wयार करता है ।

35. मनुMय को गi
ु के शरण मE जाने के बाद उनका याग नह!
करना चा@हए. मनुMय का मन @हलते पानी मE गीरते सूयF के तYबंब क3
तरह @हलना नह! चा@हए।
28 चदाकाश गीता

पMट!करणः एकबार गु: के पास जाने के बाद उनमे चˆान क@


तरह हमार( +tा रखनी आवqयक है और वह सदा रहनी चा&हए। &हलते
पानी म जैसे सूयK का त?बंब भी &हलता है उसी तरह हमारा मन &हलना
न&ह चा&हए। हमारे मन म गु: के त अतूट +tा होनी चा&हए।

36. समुB का पानी अनंत है , तालाब का पानी एक सीमा मE बंध


है । हमारा मन तालाब के पानी जैसा है । हमारा मन अnछे -बरू े क3 वजह है ।
मनुMय अपनी अnछu-बरू ! सोच से अnछा या बरू ा बनता है । ई)वर कभी
मनुMय के साथ अnछा या बरू ा करते न@ह है । ईसक3 वजह यह है क3 बLु J
और 8ान ऐसी दो दै वी शि5तयां मनुMय को 'मल! है । अnछu सोचवाले
मनुMय को छडी से पीटा जाय तो भी उसे कोई नुकसान नह! होता। योग के
Yबना कमF से मिु 5त पाना असंभव है ।
पMट!करणः मनु9य को अपना मन तालाब के पानी क@ तरह
अंकु4शत करना चा&हए। समुl के पानी क@ तरह उसे अंकुशर&हत न करना
चा&हए। िजसने ईqवर का अनभ
ु व Iकया है उसे अEछे -बूरे का भेद नह(ं
होता। कुछ भी अEछा या बूरा सब मनु9य के मन म सिृ जत होता है ।
अEछs सोच सदपु:ष बनाता है और बूर( सोच दज
ु न
K बनाता है । ईqवर वह(
है जो क@ अEछे या बूरे के त पुणC
K प से न9प$ रहते है । वे अEछे -बूरे
क@ वजह न&ह बनते। बु3t और Xान मनु9य को 4मल( दै वी संपत है ।
ईqवरने सभी मानवो को समान:प से दै वी संपत द( है । िजसके पास
सद3वचार क@ पूंजी है वह अजेय है । मनु9य को कमK के बंधनो से मुि1त
पानी हो तो एक ह( रा2ता योग का है ।
29 चदाकाश गीता

37. बाzयाचार से सजकर मल


ू स य को समझे Yबना या तो
अगर समझा जाये तो कमV से मुि5त 'मलती नह! है । €यि5त अंदiनी तौर
पर दं भी हो और बाहर! &ंग
ृ ार से &ंग
ृ ा`रत होता है तो वह सnचा स:यासी
नह! बन सकता। €यि5त जो सोचता है वह! बोलना चा@हए। जो भी बोले
वह उसके कमV मE अ'भ€य5त होना चा@हए। आप जो कहते वो करो और
कहो वह! जो आप €यवहार मE भी अपनाते हो। ऐसा €यि5त 8ानी है । ऐसा
€यि5त परमहं स है । वह योगी है । वह! सnचा सं:यासी है । िजसने ईnछाओ
को जीता है वह! सnचा सं:यासी है । ऐसा ईnछार@हत मनुMय सnचा
आZयाि मक गi
ु बन सकता है ।
पMट!करणः ईqवर का सा$ाकार Iकये ?बना कमK के बंधन छूटते
नह( है । संयासी वह( है जो अंद:नी तौर पर शुt है । संयासी के बाहर(
Fयवहार ाwत करके गलत मागK &दखानेवाले बहूत सारे दं भी ईस दु नया म
है । उह शाqवत सय का Xान नह(ं होता. वे 4सफK दस ू रो को ह( अपने
आप से भी छल करते है । सEचा संयासी अपने श]दो के &हसाब से शुt
होता है । अपनी सोच और कमvम शुt होता है । उसम तीन तरह क@ शुtता
होती है । शा2Gो म उन लोगो को योगी कहा गया है । व ह( परमहं स
कहलाये और व ह( सEचे संयासी है । ऐसा Fयि1त सEचा आVयािमक गु:
होने के यो}य है ।

38. दस
ू रो क3 थाल! मE परोसा गया भोजन नह!ं हमE नह!ं खाना
चा@हए। हमE अपना पाj रखना चा@हए और भोजन करना चा@हए।
पMट!करणः बहूत से लोग ईqवर के बारे म दस ू रो ने जो कहा है
या 4लखा उसी से संतु9ट हो जाते है लेIकन वह पयाKwत नह( है। िजस तरह
30 चदाकाश गीता

मनु9य का अपनी $ुधा तwृ त करने के 4लए खाना चा&हए उसी तरह ईqवर
के सा$ाकार करने के 4लए 2वयं यास करना चा&हए।

39. ई)वरने सब लोगो को शि5त द! है । क3सी को \यादा और


क3सी को कम द!या है ऐसा नह!ं है । ई)वरने सभी लोगो को नMपk रहकर
शि5तयां द! है । सोचना, सन
ु ना, सूंघना, दे खना और पशF क3 शि5त सभी
को समानiप से द! है ।
पMट!करणः ईqवरने सभी लोगो को शि1त द( है । क@सी को
xयादा और क@सी को कम द(या है ऐसा नह(ं है । ईqवरने सभी लोगो को
न9प$ रहकर शि1तयां द( है । सोचना, सुनना, सूंघना, दे खना और 2पशK
क@ शि1त सभी को समान:प से द( है ।

40. जहां पर नाक है वहां पर आंख नह! है । चलने के 'लए पांव


चा@हए ह!। हाथ से जो कायF होते है वह @दमाग से नह!ं होते।
पMट!करणः नाक, नाक क@ जगह पर है । आंख क@ जगह पर
नह(ं है मतलब नाक आंख का काम नह( कर सकती है । चलने के 4लए पग
का होना अनवायK है । हाथ का कायK हाथ ह( कर सकता है मन नह(, उसी
तरह मानस, बु3t, िजवामा, परमामा सब अलग अलग है । एक का कायK
दस
ू रे से नह(ं हो सकता।

41. मनुMय का मन Lवशाल आनंद का महासमुB है । िजसके


अंदर ाण'लंग है , जो क3 मिु 5त का थान है । यह बात अनभ
ु व से समझी
जाती है । Xकताबो मE उसका 8ान ाDत नह! हो सकता। यह चीज
मानवमन (च त)मE गDु त है । क3सी भी प
ु तक अनेक अZयायो से बना हो
ऐसा हो सकता है । उसमे जो 8ान वह अLवभा\य है । प
ु तक अZयायो मE
31 चदाकाश गीता

Lवभािजत है Xक:तु 8ान एक अZयायवाल! प


ु तक है । िज:हE साkा कार
नह!ं हुआ उ:हE 8ान क3 Xकताबो का आधार आव)यक है लेXकन 'सJ पi
ु षो
के 'लए एक अLवभा\य क3 अनुभूत पयाFDत है । मनुMय ज:म के समय
अपने हाथमE Xकताब लेकर ज:म नह! लेता और अंतकाल मE वह प
ु तक
साथ मE रखकर पैदा नह! होता या मरता नह!ं है । ईस दोनो समयकाल मE
उसे प
ु तक का आधार चा@हए।
पMट!करणः मानवमन आनंद क@ अनभ
ु ूत का केl है । योगीओ
का सह2G कमल उनके मि2त9क म होता है और वह( उनके आनंद क@
वजह है । मूलाधार जो क@ कंु ड4लनी शि1त का आधार है वहुी से शु: हो
कर कंु ड4लनी शि1त सह2Gार तक पहुंचती है और आVयाम क@ उEचतम
ि2थत पर पहुंचती है । िजसे ाण4लंग कहा जाता है वह चत (मि2त9क)
म होता है । चत आकाश वह मुि1त का महा2थान है । मुि1त 1या है वह
पु2तक से नह( सीखा जाता। वह अनुभूत का 3वषय है । पु2तक शायद
अVयायो म 3वभाxय हो सकता है लेIकन उसमे जो Xान वह अ3वभाxय
है । Xान एक अVयायवाला पु2तक है । ईqवर का सा$ाकार न हुआ हो ऐसे
लोगो के 4लए पु2तक का आधार आवqयक है । िजसने सा$ाकार Iकया है
वह सवK म एक है और एक म ह( सब कुछ है । जम के समय मनु9य
अपने हाथ म पु2तक (Xान क@) लेकर पैदा नह(ं होता ठsक वैसे ह(
अंतकाल म भी वह अपने साथ पु2तक नह(ं ले जाता है । जम के समय
भी Fयि1त चत (मन) और उसक@ शि1त के साथ पैदा होता है । मनु9य
जीवन के दौरान चतशि1त के 3वकास से ह( आVयाम क@ उEचतम
ि2थत ाwत हो सकती है , िजसे मुि1त कहा जाता है ।
32 चदाकाश गीता

42. मानव ज:म के समय पण


ू F होता है और अंतकाल मE भी पण
ू F
होता है । मZय समय मE सवFj रह! माया क3 वजह से वह अशुJ होता है ।
सवF€यापक ई)वर एक और अLवभा\य है , जो सी'मत है । उसका Lवभाजन
संभव नह!ं है ।
पMट!करणः जम के समय पर अEछे -बूरे का Xान नह(ं होने क@
वजह से बEचा नदvष होता है और ईस4लए वे पूणK है उसी तरह वt

अव2था म भी बEचे जैसी नदvषता मनु9य म आ जाती है , ईस4लए ह(
वt
ृ ाव2था को दस
ू रा बचपन कहा जाता है । ईन दोनो ुवो के बीच मनु9य
अXान या माया म अटका होता है । परमामा सवKFयापक है । वह एक और
अ3वभाxय है । कृत जीसक@ सीमा है वह वै3वVयपूणK और 3वभाxय है ।

43. जहां से पानी बहता है वहां पर क3चड नह! होता। वह जगह


शुJ होती है । अ8ान क3चड है । 8ान और भि5त पानी क3 बहती धारा है ।
पMट!करणः मानवमन को Fयि1त और Xान से शुt Iकया जा
स1ता है । बहता पानी होता है वहां पर जीसतरह क@चड नह( होता उसीतरह
जहां Xान और भि1त क@ धारा मन म बहती है वह शुt होता है । ऐसा
मनु9य भि1त या Xान है और वह पापर&हत और पूणK होता है । भि1त और
Xान का जलवाह जहां पर बहता है वहां अXान से क@चड जमा नह(
होता।

44. क3सी को भी पैसो क3 'भkा दे ना या अ:नदान करना भि5त


नह! है । भि5त अलौXकक ेम का iप है । सभी मनुMयो मE ई)वरदशFन
करना और वह भी Yबना Jैतभाव से वह भि5त है ।
33 चदाकाश गीता

पMट!करणः भि1त बाहर( नह( होती। वह मन का भाव है । भि1त


क@ अ4भFयि1त श]दो म नह(ं हो सकती। वह अनुभूत का 3वषय है ।
भि1त को बाNय कमv का साथ oरqता नह( होता। थोडे पैसो का दान करना
या अन का दान करना वह भि1त नह( है । वह “चेoरट(” दान है । भि1त
अनहद ेम है । ईqवर दशKन सवK मनु9यो म करना और ईqवर म सवK का
दशKन करना वह( भि1त है ।

45. सांसो को नयंYjत (ाणायम) Xकये Yबना मनुMय योगी नह!


बन सकता। वह संत या सं:यासी भी नह! कहा जाता। Yबना पतवार नौका
या जहाज चलाया नह! जा सकता।
पMट!करणः िजस तरह पतवार नौका को आसानी से चलाने के
4लए आवqयक है उसीतरह सांसो का नयंGण मन के अंकुश के 4लए
आवqयक है । सांसो के नयंGण के ?बना मानवी अपना नयंGण नह( कर
सकता। ऐसा मनु9य योगी के संयासी नह( कहलाता।

46. स\जन के 'लए हरकोई स\जन है । वह हरतरफ अnछा


दे खता है । मनुMय अपनी करनी से अnछा बनता है ।
पMट!करणः मनु9य लाल रं ग के ऐनक पहने तो उसे दु नया लाल
&दखती है । दज
ू न
K हर बात म खराब या बूरा दे खते है । अEछा-बूरा तो
Fयि1त का अपना कमK होता है । हम अEछे बनने के यास करगे तो अEछे
बनगे। Fयि1त खुद को जैसा बनाना चाहता है वैसा बना सकता है ।

47. हमे ग:ने का रस पीकर ग:ने का कूड़ा फEक दे ते है उसीतरह


शर!र आ मा का घर है , जब वह वJ
ृ हो जाता है तब हम नया बनाते है ।
34 चदाकाश गीता

पMट!करणः Xान गने के रस जैसा मीठा है । अXान गने


केकूडे जैसा होता है । Xान सत चत आनंद है । हम िजस तरह गने का
कूड़ा फक दे ते है उसी तरह अXान फक दे ना चा&हए। हम िजस तरह गने
का रस पीते है उसी तरह Xान ाwत करना चा&हए। मकान िजस तरह
पुराना होता है तो मनु9य उसका याग करता है या Iफर उसका पन
ु K नमाKण
करता है , उसी तरह शर(र वt
ृ होता है तब उसका याग करके आमा नया
शर(र ाwत करता है ।

48. मानवशर!र पंछu के घvसले क3 तरह है । आ मा मानव शर!र


मE रहता पंछu नह! है । घvसला नMट हो सकता है लेXकन घvसले मE रहता
पंछu यानी आ मा नMट नह!ं होता मानव नाडीयां एवं म\जातंतु भी 'मsी
के बने है । मनुMय क3 नाडीयv मE बहता खून, वीयF और मांस न)वर है और
उनका म ृ यु से नाश होता है । एक @दन भी नान न होने से बदबू आने
लगती है । न)वर होने क3 वजह से मानवशर!र का Lव)वास Xकया नह! जा
सकता।
पMट!करणः आमा मानवशर(र 2व:प घMसले म रहे ता पंछs है ।
िजस तरह घास-पंखो का बना घMसला न9ट हो जाता है उसी तरह
मानवशर(र भी न9ट हो जाता है । मानवशर(र 2वCप घMसला न9ट हो
सकता है लेIकन आमा2व:प पंछs न9ट नह( होता। मानवशर(र म रहता
र1त और वीयK महाशि1तयां है लेIकन सब न9ट हो जाता है । एक &दन
शर(र बाहर से 2नान न कर तो वह बदबूदार बनता है । मानवशर(र न9ट हो
ऐसा है ईस4लए उसका सा$ाकार करना ह( हमारा फझK है ।
35 चदाकाश गीता

49. मानवमन Lवचारो का सज


ृ न करता है । थूल Lवचारो को
नयंYjत करने के बाद सूoम Lवचारो मE म^न रहE उस िथत को
नLवFकdप समाध कहा जाता है या Lवचारशू:य िथत कहा जाता है । हम
तोते (पंछuओ) को बोलना सीखाते है तब उसे Lपंजरे मE बंध करके ररखते है
और पांव बांध दे ते है । हमे उसी तरह बLु J के बंधनो मE मन को बांधना है ।
मनुMय को अपने आ मLवकास के 'लए 8ान ाDत करना है ।
पMट!करणः मानवमन नये नये 3वचारो का रचयता है Iकतु
याह मानवमन सू[म 3वचारो म म}न रह और 2थूल 3वचारो का याग करे
तो उसे समाध ि2थत कहा जाता है । िजस तरह पंछs को हम 3पंजरे म
बंध रखते है उसी तरह मनु9य को उसक@ बु3t से मन को नयं?Gत करना
चा&हए। बु3t को हम आमसा$ाकार का अ…यास करवाना चा&हए। हम
पंछs को बोलना सीखाते है तब उसे 3पंजरे म बंध रखते है ।
आमसा$ाकार के 4लए मनु9य को अपना Xान बढाना चा&हए।

50. ना'सका को हाथ से पकडकर और नेjो को ऊZवFगामी करके


एवं सांस को घड़ी क3 िंग क3 तरह पकड के रखना. सरकस मE होते
खेल, 'सनेमा के खेल “समाध” नह!ं कहलाते।
पMट!करणः समाध अथाKत दै वी चेतना क@ जागCकता, िजसमे
मनु9य ईqवर को सा$ात दे ख सकता है । समाध मतलब सांस को रोकना
नह(, आंखे उपर उठाना भी नह( है , समाध मतलब 4सफK ना4सका को हाथ
से दबाना सांस को रोकना. सा$ाकार मतलब सरकस का खेल नह( है या
4सनेमा का खेल नह( है । समाध अथाKत ईqवर के साथ एकवभाव से
जुडना। जहां जगत के tैतभाव न9ट हो जाते है । जगत के सभी जीवो म
36 चदाकाश गीता

ईqवर को दे खना और ईqवर म जगत के जीवो को दे खना वह( समाध क@


सह( ि2थत है ।

51. दु नया मे समता का 8ान होना उ तम है । मनुMय परछाई


के पीछे दोडता है और उसके पीछे द!वाने बनते है । जगत के लोगो मE से
ई)वर के 'लए द!वानगी @दखानेवाले बहूत कम ह! होते है । ई)वर के त
सnची द!वानगी लाख मE एक या दो होती है । दसू रे लोग चीजो के पीछे
भागते है । “मुझे यह चा@हए”, “मुझे वह चा@हए” यह उससे अलग है । यह
उससे \यादा अnछा है । ईसतरह चीजो के 'लए पागलपन चलता रहता है ।
एक से \यादा लoयो के पीछे भागना वह पागलपन या उ:म तता है । मन
क3 चंचलता, पागलपन है । महानता भी एक तरह से पागलपन ह! हौ तो
दस
ू र! ओर ई)वर क3 हक3कत समझना अ:य कार क3 उ:म तता है ।
ज:म-म ृ यु के चr से मु5त होना एकतरह क3 उ:म तता है , जो दै वीवiप
क3 है । िजसने स य का साkा कार नह! Xकया है और चीजv के पीछे भागते
है वे पागल है । हरएक €यि5त को एक या दस
ू र! तरह का पागलपन
(उ:म तता) होती है । हजारो लोगो के पास घर (मकान) होता है , @हरे -
झवेरात होते है , सुवणF और संपत होते है । मनुMय पैदा होता है तब ईन
चीजो को साथ मE रखता नह! है और अंतकाल मE साथ मE नह!ं ले जाता।
पMट!करणः समव यानी ईqवर क@ उपि2थत को सवK म दे खना
वह दु नया क@ उकृ9ट बात है। बहुत से लोग सांसाoरक जीवन क@ चीजो
के पीछे पागल बनकर दोडते है , लेIकन बहुत कम लोग “सू[म” यानी
“आमा क@ वा2त3व1ता” के पीछे दोडते है । मनु9य सांसाoरक जीवन क@
$णबंगरु चीजो के पीछे दोडते है लेIकन दै वी चीजो के पीछे शायद ह(
दोडते है । लाखो लोगो म एक-दो लोगो म ईqवर के त द(वानगी हौती हौ।
37 चदाकाश गीता

बहुत से लोग 2थूल चीजो के पीछे भागते है । ऐसे लोग एक पल म बहुत


सार( चीजो के पीछे भागते है । मानवमन मरकट क@ तरह है। “मुझे यह
चा&हए।”, “मुझे वह चा&हए”, यह चीज उससे अलग है , वो चीज ईससे
अEछs है । ईसतरह ऐसी सांसाoरक जीवन क@ बाते ह( उनक@ बातो का
3वषय होता है । दु नया के वै3वVय म ईqवर क@ ए1ता वे दे ख नह( सकते।
अलग अलग ल[यो के 4लए एक पागलपन है । दु नया म बडेपन के 4लए
दोडना वह भी पागलपन है लेIकन सह( द(वानगी (पागलपन) तो अपनी
हIककतो को पहचानने म ह( है । जो लोग शाqवत सयो को समझ नह(
सकते वह 2थूल चीजो के पीछे पागल होते है । मुि1त अथाKत बंधनो म से
मुि1त और वह( दै वी पागलपन है । हर एक Fयि1त को एक या दस
ू र( तरह
का पागलपन होता है । हIककत यह है क@ सांसाoरक जीवन म – मकानो,
झवेरात, अलंकार हम दस
ू र( दु नया म साथ नह( ले जा सकते। हम पैदा
होते है तब ईन चीजो को साथ लाते नह(ं है और अंतकाल म ये सब साथ
म ले नह(ं जाते। यह 2थूल 3वqव छोडते है तब एक आमा ह( हम साथ
लेकर जाते है , जो क@ शाqवत है । ईस जगत म आमा का सा$ाकार हो
और परम सुख क@ ािwत हो।

52. मानव का शर!र रहे या नMय हो जाये लेXकन हर एक चीज


का एक ह! कताF (करनेवाला) है । मनुMय पैदा होता है तब सांस लेता है
और सांस बंध हो तब दु नया छोडता है , संपत और XकतI ईस दु नया मE
ह! रहते है लेXकन ई)वर के जगत मE सब समान है । Jैत ईस गजत मE है ।
ई)वर क जगत मE भेदभाव (Jैतभाव) नह!ं है । अवधूत जगत का महान पण
ू F
पi
ू ष है । योगी और सं:यासीओ को कुछ योग'सLJ का अपेkा होती है ।
अवधूत को क3सी भी चीज क3 ईnछा नह! होती।
38 चदाकाश गीता

पMट!करणः आमा शर(र नह(ं है । शर(र आमा का 3पंजरा है ।


आमा जीवन के दौरान उपि2थत रहता है और अंतकाल म 3वल(न होता है
लेIकन शर(र नह(ं। ईqवर जगत का कताK है । वह समयातीत, 2थानातीत
और कारणो से पर है । जम के समय मनु9य सांस साथ म बांधता है और
अंतकाल म सांस वा3पस ले जाता है ! ाण ह( मनु9य के 4लए सवK2व है ।
जर-जमीं, संपत और क@तK जागतक है । मृ यु के बाद क@ दु नया म सब
समान ह( है । कुछ tैतभाव नह( है । उस 3वqव म गर(ब-अमीर, महान-शूl
का भेद नह(ं होता। मानवो म +े9ठ वह है जीसने दु यवी जीवन के सब
राग (पेशन) याग &दये हौ। उस महामानव को अवधूत कहा जाता है । योगी
और संयासीओ को 4स3t क@ अपे$ा रहती है लेIकन अवधूत को ईसम से
कुछ नह( चा&हए और क@सी 4स3t क@ ईEछा भी नह( होती.

53. जब सत और च त एक हो तब आनंद क3 अनुभू त होती है ।


यह आनंद ह! परमानंद है । सत-च त-आनंद अनभ
ु व मितMक मE होता है ।
मनुMय के @दमाग मE yzम नाडी है । yzमानंद yzमनाडी मE है । yzमानंद
वह! परमानंद। जीव को इस परमसुख का आनंद 'शव (परमा मा) साथ मE
हो तब करता हौ। ईस परमसुख को 'शवानंद कहते है । परमानंद क3
अनुभूत मितMक मE होती है । यह िथत शा)वत आनंद क3 होती है । यह
िथत जीवनमुि5त क3 है ।
पMट!करणः जब अि2तव के Xान के साथ मतलब सत का चत
के साथ 4मलन होता है मतलब तब जीव का 4शव के साथ एकव (4मलन)
होता है तभी आनंद क@ अनुभू त होती है । ईस परमसुख जो क@ आमा के
परमामा के साथ 4मलन से उपन होता है वह परमानंद है । परमानंद क@
अनुभूत ONमनाडी म होती है। ONमनाडी अथाKत सुषD
ु ना नाडी जो क@
39 चदाकाश गीता

मनु9य के &दमाग म है । ईसे ONमानंद भी कहते है और परमानंद कहते है


दोनो म कुछ फकK नह( है । जीव जो आनंद का अनुभव करता है । वह
4शवानंद है वह परमामा के साथ एकाम1ता से उपन होता है । यह
ि2थत जीवनमुि1त क@ है । जममृ यु के च‡ म से मनु9य मु1त हो जाता
है । ईस शाqवत आनंद क@ ि2थत है । ईqवर परमसुख है और परमसुख वह
ईqवर है ।

54. 8ानी वह है क3 जीसने सांसा`रक आनंद का याग Xकया है


और योगाTयास से ई)वर का साkा कार Xकया है । आनंद जो सुनते है
उसमE नह!ं है । आनंद अनुभूत का Lवषय है । ऐसा €यि5त महा मा कहलाता
है । 'मsी और प थर क3 तमाओ के दशFन करनेवाले महा मा नह!
कहलाते। जीसने साkा कार Xकया है वह! महा मा है ।
पMट!करणः मनु9य को Xानी होने के 4लए सांसाoरक आनंद का
य़ाग करना चा&हए और योगा…यास से ईqवर का सा$ाकार करना चा&हए.
ईqवर के बारे म वचन सुनने से आनंद का अनुभव नह( होता। आतमानंद
का अनुभव खुद यास करके करना चा&हए। वह Fयि1त महान आमा है ,
जीसने आमसुख का अनुभव Iकया है , पथर और 4मˆी क@ तमाओ के
3व3वध तीथK2थआनो म दशKन करने से महामा नह( बना जा सकता।
महामा वह( है जो ईqवर के सा$ाकार से खुद को पहचानता है ।

55. “अवधूत” वह है जीसने ज:म और म ृ यु का जाप Xकया है।


वह शर!र से जागiक नह! होता। अवधूत गण
ु ातीत होता है । उसने ई)वर
क3 सवFj का'शत \योत का अनुभव Xकया होता है । उसे क3सी तरह का
“अzम” नह!ं होता। वह राजयोगी होता है , हठयोगी नह!ं। क3सी गांव या
40 चदाकाश गीता

शहर मE वेश करता है तो जीस जीस के वह दशFन करता है उसे दे खकर


आनं@दत होता है । वह अj-तj घूमता है Xफर भी उसे Jैतभाव नह! होता।
उसे kुधा नह! होती। उसे पयाFDत भोजन 'मले तो आनंद से खाता है । उसे
कुछ भी खाने को न 'मले तो Xकसी से मागता भी नह! है। उसे जहर
दे नेवाले और दध
ू दे नेवाले दोनो समान होते है । उसे मारनेवाले और उसे
Dयार करनेवाले दोनो समान होते है । अवधूत के 'लए yzमांड (चदाकाश)
Lपता, माता और सगे-संबंधी है । वह खुद yzमांड बन जाता है और yzमांड
उसमे समा जाता है ।
पMट!करणः अवधूत वह है जीसने मृ यु ऐर जम का जप Iकया
हुआ है । वह चाहै तब दे ह याग सकता है । अवधूत को दे हभान नह( हौता।
अहं भाव उसमे से सदा के 4लए अlqय हो जाता है । वह गुणातीत मतलब
?Gगुण रजस, तमस और सव से पर हो जाता है । उसने ईqवर क@ सवKG
का4शत xयोत का अनुभव Iकया होता है । उसने ईqवर का सा$ाकार
Iकया है और ईqवर के साथ एकCप हो जाता है । वह राजयोगी है , वह
हठयोगी नह(ं है । राजयोगी होने क@ वजह से वह जीस गांव म या शहर म
जाता है वहां जो भी 4मलता है उसे दे खकर आनं&दत हो जाता है । वह खुद
क@ तरह सभी को सDमान दे ता है । उसे कोई tैतभाव होता नह( है । भूख-
wयास और शर(र क@ अय I‡याओ पर उसका नयंGण होता है । उसे जो
भी 4मलता है वह आनंद से जीतनी माGा म 4मला हो उसी के &हसाब से
|हण करता है लेIकन अगर कुछ भी भोजन न 4मले तो वह क@सी के पास
मांगता नह( है । उसे जहर दे नव
े ाले और दध
ू दे नेवाले म कोई फकK नह(
होता। उसे मारनेवाले और wयार करनेववाले दोनो समान होते है । ONमांड
उसके माता-3पता और 2नेह(संबंधी है । ONमांड अवधूत के 4लए “ईqवर” सवK
41 चदाकाश गीता

है । वह ONमांड बनता है और ONमांड उसमे एक:प हो जाता है। उसने खुद


म उEचतम शि1तओ का 3वकास Iकया होता है , जीससे सम2त Oहमांड
गतशील रहता है । ईस4लए वह ONमांड म एक:प हो जाता है और ONमांड
उसमे समा जाता है । वह ONमांड के साथ एक:प होता है , 1यMक@ वह
तेजोमय शि1त है और कोई 2थूल पदाथK नह( है ।

56. ाणायम करते व5त सांस अंदर लेना उसे परू क कहते है ।
कंु भक मतलब सांस रोकना। रे चक मतलब सांस बाहर नकालना। सांस के
तीन कार नैसगFक होते है । यहां बाहर से कुछ लेना नह!ं है । ईस तरह
सतत अTयास चलता हो तब ाण एक ह! नाडी मE जाता है तब हमे
अंदiनी आनंद क3 अनुभू त होती है । ईस yzमानंद का Lववरण कौन कर
सकता है ? बाहर! दु नया तब भूल! जाती है । हम पराLव)व (yzमांड) मE
ल!न हो जाते है ।
पMट!करणः ाणायम तीन 2तरो से होता है । थम 2तर म जब
हम सांस अंदर लेते है तब उसे “पूरक” कहते है । अंदर ल( हुई सांस रोक@
जाये ततब उसे कंु भक कहते है और रोक@ हुई सांस बाहर नकाल( जाये
तब उसे रे चक कहते है । ईन तीनो सांसो क@ I‡या ाकृतक अथाKत
अंद:नी तर(के से होती है । बाहर( वायु क@ मदद के 4सवा ाण खुद
उVवKगत करता है , जीसे ONमानंद कहते है । ONमानंद 3ववरणातीत है ।
बाहर( 3वqव भूला &दया जाता है । हम परा3वqव म पहुंच जाते है । हम
ONमानंद का अनुभव करते है , 1यMक@ हम ONममय हो जाते है।
42 चदाकाश गीता

57. जीवा मा मतलब अभी का (सांसा`रक) जगत। अभी के


“सांसा`रक” जगत के बाद का Lव)व मतलब जीवा मा का परमा मा के साथ
'मलन।
पMट!करणः मनु9य संसार म हो तब तक वह खुद को परमामा से
अलग समझता है लेIकन जैसे ह( उसे अनुभूत होती क@ वह परमामा के
साथ जूडा हुआ है तब वह सांसाoरक दु नया से पर हो जाता है। उसे मुि1त
कहा जाता है ।

58. जीस तरह छोट! छोट! न@दयां सागर से 'मलती है तब समत


Zयान सागर क3 ओर रहता है उसी तरह हमे सांस क3 अंदर क3 गत पर
लk दे ना चा@हए।
पMट!करणः छोट( छोट( न&दयां जीस तरह सागर क@ ओर गत
करती है तब सागर म एक:प हो जाती है उसी तरह हम सांस को अंदर
क@ ओर खींचे तब मन आमा के साथ एक:प हो जाता है । ईसे ईqवर का
सा$ाकार कहा जाता है ।

59. जो नरा आंखो से दे ख सकते है वह अdपजीवी है और नMट


होने यो^य है । मानवमन जब “Yबद”ु और “नाद” मE एकाकार हो जाता है
तब नLवFकdप समाध 'सJ होती है । हमारा Zयान 'सफF आनंद के त
रहता हौ। दो आंखो क3 ‚मरो (भक
ृ ु ट!) पर Zयान के:B!त करके ाण
yzमरं ‡ मE दा{खल होता है । यह! परम \योत के @द€य चkुओ से दशFन
होते है । यह मुि5त क3 िथत है । यह शा)वत आनंद क3 िथत है । ईस
जगह पर ह! “मानस” का िथर रहना पडता है । वेदो क3 उ पत जहां से
43 चदाकाश गीता

हुई वह शा)वत शि5त यह! है । यह! सवFमां परमा मा के दशFन होते है और


वह! जीवा मा का सnचा थान है ।
पMट!करणः &दखाई दे ता 3वqव अWपजीवी है । वह नाशवंत है । ईqवर
एक और अ3tतय है जो क@ नाशवंत नह( है । Fयि1त योगा…यास म जैसे
जैसे आगे बढता वैसे वैसे उसे जीसको “नाद” कहा जाता है वह सुनाई दे ता
है । “नाद” कुल दस तरह के होते है , जीसे “दस नाद” कहते है। उसी तरह
आंतरxयोत को ?बद ु कहा जाता है , जीसे &दFय lि9ट से दे खा जाता है ।
जब यह आ3वभाKव शर(र म होता है तब मन को ?बद ु और नाद पर
केl(त करना चा&हए. ईस ि2थत पर जब मनु9य पहुंचता है तब मन
अपना अलग अि2तव खो दे ता है और परमामा के साथ एक हो जाता है ।
ईस ि2थत के न3वKकWप समाध कहते है । न3वKकWप समाध म ईqवर
सवK म और सवK ईqवर:प लगतै है । आVयाम क@ यह उEचतम दशा है।
न3वKकWप समाध क@ ि2थत म हमारा Vयान ईqवर के परमसुख (आनंद)
पर होता है । सांसाoरक जीवन के आनंद क@ ईEछार&हत ि2थत म सभी
आनंद खुद हमे 4मलते है । न3वKकWप समाध तभी 4सt होती है जब
कंु डल(नी मूलाधार मे से ONमरं  म पहुंच जाती है । ईस ि2थत मे जाने के
4लए आंखो के मVय म रहे 2थान जीसे ŒूमVया कहा जाता है और वह
?Gकोणीय होता है , उस पर Vयान केl(त करके ाण का वेश ONमरं  म
होना चा&हए। यह( &दFय च$ु से परम xयोत का काश &दखाई दे ता है ।
यह मुि1त क@ ि2थत है । यह परम आनंद है । यह( वो 2थान है जहां
“मानस” का वास होना चा&हए। यह(ं ईqवर का वास है । जहां से वेदो क@
उपित होती है । जब मुि1त क@ ि2थत पर पहुंचते है तभी हम परमामा
के दशKन सवK म करते है । चदाकाश ह( जीवामा का सह( 2थान है ।
44 चदाकाश गीता

जीवामा 4शव के साथ एक:प हो जाता है और चदाकाश या „दयाकाश मे


मो$ क@ ि2थत ाwत करता है।

60. जीव का सह! थान वiपह!न और अLवभा\य है । ई)वर


चल और अचल सkी चीजो मे मोजूद है । वह एक है और अLJतय है ।
ई)वर वेदो का उ पि त थान है । वह शर!र के अधMठाता है । वह
जीवनमुि5त के दे व है । मनुMय को मनुMय बनने के 'लए ई)वर का चंतन
करना चा@हए।
पMट!करणः जीव का मूल 2थान 2व:प3व&हन और अ3वभाxय है ।
ईqवर 2थुल-जंगम सभी चीजो मे शा4मल है । वह एक और अ3tतय है ।
वेदो का उदगम2थान ईqवर है । वह शर(र का अध9ठाता है । वह
जीवनमुि1त के दे व है । वह Xानदायी है और सवKशि1तमान है। मनु9य को
मनु9य बनने के 4लए ईqवर का चंतन करना चा&हए।

61. जो €यि5त हXककतो पर चंतन/मनन करता रहता है वह


सं:यासी है और वह योगी है । बाहर! Lव)व मE जातपात/काले-गोरे का फकF
होता है । आंत`रक जगत मे सभी लोगो मE कोई फकF नह! है । जो फकF है
वह म ृ यु के बाद मे नह! है । रागJैष से भरा €यि5त वह है जीसमE ईMयाF
और घमंड होता है । धमF के बारे मE €यथF LवचारLवमशF करते है 1 'सलाई का
मतलब 'सफF धागा और वj को टांके लगाना नह!ं है लेXकन वj और
धागे के साथ से वj तैयार करना वह है । ईसी तरह मानस और बLु J का
'मलन करना है । अब jी-पi
ु ष के फकF क3 बात करते है । ऐसी jी वह है
जो बाहर! दु नया मE €याDत रहता है और सह! पi
ु ष वह! है जो अंदiनी
जगत मE ल!न हो जाता है । जीसक3 बLु J िथर है वह मदF है , जीसक3 बLु J
45 चदाकाश गीता

चंचल है वह jी है । jी-पi


ु ष का भेद 'सफF बाहर! है । अंदiनी जगत मE
ऐसा कोई फकF रहता नह!ं है । मानस और बLु J जब आ मा मE एक*प होते
है तब jी भी आZयाि मक तौर पर पi
ु ष बन जाती है ।
पMट!करणः सEचा संयासी वह है जो ईqवर क@ हIककत के बारे
म चंतन करता रहता है । ऐसी Fयि1त ह( सह( मायने म योगी है ।
जातपात का फकK 4सफK बाहर( कायv म ह( &दखते है । अंद:नी जगत के
सभी भेद 4मट जाते है । शूl वह है , िजसे ई9याK और मान होता है । धमK
के बारे मे अथK3व&हन चचाK करता है । दस
ू रो क@ नंदा म सदा म}न रहता
है । जातपात का फकK मौत के बाद रहता नह(ं है । जातपात का फकK यह
सांसाoरक जीवन मे होता है । शूl वह है जीसम जंगल( वृ तयां होती है ।
ऐसा जंगल(पन क@ वृ त रखनेवाला मनु9य ईस जगत म शूl है । मैला
उठानेवाला हIककत म ईस जगत म शूl नह( है । 1यMक@ वह अपना
सफाईकाम न9ठा से करता है । 4सलाई मतलब कपडा और धागे के टांके
लगाना ह( नह( होता। 4सलाई अथाKत मानस और बु3t का आमा के साथ
होना वह है । 2Gी-पु:ष का फकK बाहर( शर(र म नह(ं होता 2Gी-पु:ष का
फकK है वह मनु9य के अंद:नी गुणो म होना चा&हए। 2Gी का 2व:प वह है
जो बाहर( 3वqव म एक:प हो जाय। सEचा पु:ष वह है जो अंद:नी जगत
म एकCप हो जाय। सEचा मदK वह है जीसक@ बु3t ि2थर है , जीसक@ बु3t
चंचल है वह 2Gी है । आमा के महाराxय म ऐसा कोई फकK नहह( होता
जब मानस और बु3t आमा म एक:प होते है तब जो भौतक तौर पर तो
2Gी है पर आVयािमक तौर पर मनु9य है ।

62. मानवशर!र एक गफ
ु ा जैसा है । ईस गफ
ु ा मE आ मा का वास
है । शर!र क3 गफ
ु ा मE रहनेवाले आ मा को मोk क3 'सLJ ाDत करनी
46 चदाकाश गीता

चा@हए। मानवशर!र अनेक भागो मE बटा है लेXकन आ मा के सूoम तर


पर सब अLवभा\य है ।  णव है । णव शर!र मE €याDत है ।  दे ह और
व*पLवह!न दशा का नाम है ।
पMट!करणः शर(र आमा को बसने के 4लए बनी गुफा है । मानव
शर(र म रहते आमा को मो$ के 2तर पर पहुंचना है । आमा शर(र म हो
तभी मो$ ाwत करना चा&हए। बाहर( शर(र के क“ &ह2से होते है लेIकन
सू[म 2तर पर सब एक ह( होता है । जब जीवामा क@ अनभ
ु ूत होती है
तब tैतभाव न9ट होता है । ONमांड म ईqवर सवKशि1तमान रहता है और
सम| ONमांड ईqवर:प हो जाता है ।  णव है । णव है वह सम| शर(र
म Fयाwत है । ॐ उस 2व:प क@ अने शर(र के अलावा क@ दशा है ।  जब
नि9‡य हो तब पूणK हो ता है ।  क@ शि1त जब जागत
ृ होती है तब कहा
जाता है ।

63. भि5त शुi मE वाथFiप होती है , लेXकन धीरे धीरे उसमे वाथF
का त व कम होता रहता है । जब मनुMय पण
ू F व 'सJ करते है तब सम‰
yzमांड के अधपत उनके गi
ु बन जाते है ।
पMट!करणः Fयि1त श: के 2तर म 2वाथKमय होता है । मो$मागK
के ारं भ म आVयािमक 4स3tओ ाwत करने क@ महवाकां$ा होती है
लेIकन साधना म जैसे जैसे गत होती है वैसे वैसे 4सtइ ािwत क@
ईEछा कम हो जाती है और भि1त नः2वाथK होने लगती है । मनु9य जैसे
जैसे मो$ािwत क@ 4स3t ाwत करता है वैसे वैसे ईqवर उसे उसके कमK मे
&दखने लगता है । ससम| 3वqवना अधपत उसके गु: का 2थान लेता है ।
47 चदाकाश गीता

64. हठयोग मE वाथFभाव होता है । हठयोगी हरदम अपना कdयाण


ईnछता है । उसे 'सLJ क3 ईnछा होती है । हठयोग क3 'सLJ से सय
ू Vदय
को रोक सकते है । वह चाहे तो सुवणF का पहाड़ बना सकता है । “अहं
yzमािम” कहना पयाFDत नह!ं। हे ई)वर! आप ह! सब कुछ हो और सवF
आप ह! हो। सnचा योगी वह है क3 जो सम‰ yzमांड को योगी समझते है ।
सम‰ सिृ Mट को उसे अपने समतुdय समझनी चा@हए।
पMट!करणः हठयोग म 2वाथKभाव होता है लेIकन राजयोग पूण:
K प
से नः2वाथK होता है । हठयोगी अपनी 4स3tयM के ~वारा क@तK क@ ईEछा
रखता है । वह योग 4स3tयM से सूयvदय का रोक सकता है । हठयोग क@
4स3t से 4म&ˆ को सुवणK म पoरवतKत करके सुवणK का पहाड बनाना चाहते
है । लेIकन राजयोगी उससे अलग होता है । राजयोगी को Iकसी शि1तयM क@
ईEछा नह( होती। वह संपूण:
K प से ईqवर को सम3पKत हो जाता है । “म{
ONम हुं” उतना कहने से “ONम” का 2तर ाwत नह( होता। ईस तरह के
भाव से अपनी शि1तयो के 4लए अहोभाव पैदा होता है । जो मनु9य (योगी)
म गवK का अथाKत अहं कार भाव आता है । सEचा योगी ऐसे मनु9य को
ईqवर क@ सवvपoरता 2वीकार कर सारे 3वqव म उसक@ और उसम सारे
3वqव क@ अनुभूत करनी चा&हए। यह( सEचे योगी का भाव है ।

65. मनुMय वन मE जाता है और गफ


ु ा मE रहता है तो उस मE और
गफ
ु ा मE रहते ाणी मE कोई फकF नह! है । उसके बजाय मागF पर अंतर
@दखाते प थर अnछे है जीससे हमे दरू ! अंदाझ माईल मE लगाने मE मदद
'मलती है । गफ
ु ा मE रहते मनुMय पण
ू i
F प से नकमे है । सnचे Lवचार से
बहुत ह! सोचसमझकर धीरे धीरे जगत का याग करना चा@हए। मनुMय
अगर भोजन ‰हण करता है तो वह अपने लाभ के 'लए खाता है । जगत
48 चदाकाश गीता

को उससे कोई लाभ नह! है । हमे हरदम 8ान के काश मE रहना चा@हए।
अंधकारवाले मागF पर रोशनी हो तो हमे डर नह!ं लगता। अ8ान के
अंधकार मE जीता मनुMय हरदम डर मE जीता है ।
पMट!करणः जंगल म जाकर गुफा म बैठकर साधना कर रहे लोग
गुफा म रहनेवाले पशु समान है । उनका जगत म कोई उपयोग नह(ं है ।
मन से जगत का याग करने म ह( सEचा याग है । ऐसे लोगो से दरू (
&दखानेवाले पथर xयादा अEछे है 1यMक@ कम से कम उसक@ मदद से
क@तनी दरू ( हमने तय क@ वह पता लग जाता है । 3वचारशील मनु9य को
धीरे धीरे जगत का याग करना चा&हए। उसको जनक 3वदे ह( क@ तरह
जगत म रहता है Iफर भी जगत का याग करना चा&हए। िजस तरह
मनु9य अपनी $ुधातिृ wत से खुद के 4लए लाभ और आनंद ाwत कर
सकता है उसी तरह खुद ईqवर साधना करने से ह( मो$ 4स3t ाwत हो
सकती है । अXान अंधकार है और Xान काश है । Xानी का Xान उनका
श2G है , ईस4लए कं&टले पथ पर चलते व1त उसे डरने क@ जर:रत नह(ं।
अगर मनु9य के अंधकारभरे पथ पर Xान क@ रोशनी छाई हो तो उसे डर
नह( लगता।

66. अगर €यि5त फलािDत क3 ईnछा से हजारो साल तप)चयाF तो


भी कुछ काम का नह! है लेXकन एक घ@टका (24 'मनट) के 'लए भी फल
क3 ईnछा के Yबना तप करे तो उसे सवF मE ई)वर और ई)वर मE सवF क3
अनुभूत होती है ।
पMट!करणः फलािwत क@ ईEछा के ?बना हजारो साल Iकये गये
तप का कोई मूWय नह( लेIकन एक पल के 4लए भी न9कामभावना से
ईqवरािwत के 4लए तप करनेवाले को सवK म ईqवर और ईqवर म सवK क@
49 चदाकाश गीता

अनुभूत होती है । हमारे शा2Gो म न9काम कमKयोग का Xान &दया गया


है । जब Fयि1त अपनी ईEछाओ को मार दे ता है वह ईEछार&हत दशा ह(
“मुि1त” है ।

67. हठयोग Jैतभाव को पैदा करता है । राजयोग उ तम है । मनुMय


को खुद “कताF” है ऐसा Lवचार नह! करना चा@हए। सार! घटनाएं ई)वर क3
महाशि5त से होता है । सागर के पानी से पैदा होता नमक जब पानी मE
'मलता है तब वह उसके साथ एकiप हो जाता है उसी तरह ह! माया है
जो परमा मा मE से पैदा होती है और परमा मा मE Lवल!न होती है ।
पMट!करणः हठयोगी म tैतभाव न9ट नह(ं होता लेIकन राजयोग
क@ ि2थत म tैत अतीत क@ बात बन जाती है । योग के सभी 2व:पो म
राजयोग +े9ठ है । मनु9य को कताKभाव का याग करना चा&हए। कताKभाव
क@ वजह से उसम अहं कार आता है । उसको ऐसा सोचना चा&हए क@ जगत
म जो भी कुछ बन रहा है वह ईqवर क@ करनी है । सागर के जल म से
पैदा होता नमक Iफर से पानी म गीरता है तो वह उसमे एक:प हो जाता
है उसी तरह माया का उदभव परमामा से होता है और योग क@ 4स3t के
आखर( 2तर म माया ईqवर म 3वल(न होती है । माया का उदभव जहां से
हु वह(ं पर वह वा3पस जाती है ।

68. वेदांत मतलब ाण। ाण मE सम‰iप से Lवल!न होना मतलब


ह! वेदांत। वेदांत अLवभा\य है । उसका नाश नह! होता। जीzवा से वेदो का
8ान वह वेदांत नह! है । वेदो का 8ान गले मE होना चा@हए। ईस रहय तो
समझनेवाले yािzमन है । वेद एकाkर! yzम है , वह ेरणाjोत है । वेदांत
50 चदाकाश गीता

वiपर@हत और अप`रवतFनीय है , अLवभा\य है । वेद से रोशनी पैदा होती


है । योग मE जीसको धारणा रहा जाता है वह! सnचा वेद8ान है ।
पMट!करणः वेदांत अथाKत ाण। ाण मे 3वल(न हो जाना उसे ह(
वेदांत कहा जाता है । वेदांत एक, अ3tतय अ3वनाशी और अ3वभाxय है ।
वेदXान जीNवा से नह( होता, वह गले से करना होता है ईस4लए हम
गहराई तक ाण के शर(र म उतारकर वेदो का गान करना चा&हए। ईस
रह2य को जाननेवाले सEचे OािNमन है । ‘वेद‘ एका$र ‘’ है । ओमकार क@
4स3t से ह( वेद का उदे qय और पराका9टा 4सt होती है । वेद का ल[य
मतलब एमकार 4सt होने से तृ तय नेG से हम दै वी xयोत का अनुभव
करगे। योग म जीसे धारणा कहा जाता है वह वेदगान है । वेदगान मतलब
ह( ाणायम।

69. जीस तरह से साईXकल के टायर को हवा से बर @दया जाता है


उसी तरह हमे नाडीयv को वेदांत अTयास से ाDत हुई उnचतम िथत से
भर दे नी चा@हए। ाण के yzमरं ‡ तक ले जाना चा@हए। जो क3 मितMक
मE सबसे ऊंचा Yबंद ु है । नाडीयv को धीरे धीरे शJ
ु करनी चा@हए। बLु J और
मानस को परमा मा के साथ एकाकार कर दे ना चा@हए। बLु J और मानस
परमा मा के साथ एकाकार हो जाये तब उसके साथ ल!लामय हो जाना
चा@हए। योगी को उnचथान पर पहुंच कर नीचे उपर BिMट घुमाते रहना
चा@हए। बLु J का 8ान उपर है । बLु J को 8ान के साथ एकाकार हो जाना
चा@हए। शा)वत आनंद के अमत
ृ जल का पान करते रहना चा@हए। हमे योग
का शा)वत आनंद पानेवाले को पहचानना चा@हए। आनंद का मूल रहय
समझना चा@हए। हXककत मE कंु ड'लनी जागत
ृ होनी चा@हए। हमे जैसे बnचे
को पालने मE जुलाते है उसी तरह हमारा Zयान द!माग मE के:B!त करके
51 चदाकाश गीता

वहां 5या 5या हो रहा है उसका अनुभव करना चा@हए। मितMक मE


परमानंद (&ेMठ-उnचतम) आनंद दसानंद (शा)वत आनंद) होता है । 'शव'लंग
भी मनोसिृ Mट मE है और वह एक ह! है ।
पMट!करणः जीस तरह साइIकल के टायर म हवा भरते है उसी तरह
नाडीयM को वेदांत के अ…यास tारा ाwत उEचतम ि2थत से भर दे नी
चा&हए। ाण को ONमरं  मे ले जाना चा&हए। ONमरं  मि2त9क म ि2थत
उEचतम ?बंद ु है । जहां आमा के साथ उसका 4मलन होता है । नाडीयM को
धीरे धीरे शुt होना चा&हए। बु3t और मानस को परमामा के साथ
एकाकार हो जाना चा&हए और ईqवर के साथ एकाकार रहना चा&हए। उसके
साथ ल(न (म2त) हो जाना चा&हए। मनु9य के 4लए 4स3t का उEचतम
2थान है । हमारे मानस को जनक 3वदे ह( क@ तरह सा$ीभाव से दे खने क@
आदत डालनी चा&हए। हमे उपर क@ मंिजल पर बैठा Fयि1त आसपास एवं
नीचे क@ चीजो को जीस तरह सा$ीभाव से दे खता है उसतरह दे खना
चा&हए। हमारे मन को जगत का याग करना है । मानस बु3t के वश म
रहना चा&हए। मनु9य के मन म बु3t का 2थान मन के उपर है। बु3t और
Xान एक हो जाने चा&हए और एक:प हुए बु3t और Xान को परONम म
एक:प हो जाना चा&हए। बु3t और Xान परमामा मे 4मल जाते है बाद म
हमे शाqवत आनंद के अमत
ृ का पान करना चा&हए। हमे आनंद के मूल
रह2य का Xान ाwत करना चा&हए। हमे आनंद के उEचतम 2तर पर पहुंचे
साधको का अनभु व करना चा&हए। कंु ड4लनी सह( अथK म जागत
ृ करनी
चा&हए और उसक@ गत सह2Gार अथाKत योगी िजसको सह2G पतीवाला
कमल कहते है उस ओर उसके मन को गतमान करना चा&हए। जीस तरह
हम बEचे को पालने म झुलाते है तब हरदम हम उस पर Vयान दे ते है
52 चदाकाश गीता

उसी तरह हमे मनोसिृ 9ट म 1या हो रहा है उस पर Vयान दे ना चा&हए।


परमानंद और सदानंद दोनो मनु9य क@ मनोसिृ 9ट म है । 4शव4लंग भी
मनोसिृ 9ट म है , जो एक ह( है । ईस ि2थत को मो$ क@ ि2थत कहते है ।

70. तील! को माचस क3 ड"बी क3 बाजु पर घसने से अि^न कट


होती है और उस अि^न से हररोझ खाना बनता है । अगर 8ान ाDत करने
के 'लए यो^य €यि5त हो तो उसे हररोझ आ म8ान ािDत के 'लए
उ सा@हत करना चा@हए।
पMट!करणः जीस तरह तील( को माचस क@ बाजु पर घसकर अि}न
xजव4लत Iक जाती है उसी तरह नरं तर योगा…यास और ाणायाम से
कंु ड4लनी जागत
ृ करने का यास करना चा&हए। मानस और ब3ु t अंकुश म
रखकर सू[म 3ववेक का 3वकास करना चा&हए। मानस तल( जैसा है । ब3ु t
माचस क@ ƒड]बी जैसा है । Xान का अि}न मानस क@ माचस क@ बाजु पर
घसने से xजव4लत होगी। जब मुि1त क@ ािwत हो तब अपने पास वह
4समीत न रखकर अय को दान करना चा&हए। Xानािwत के 4लए यो}य
Fयि1त हो तो ह( उसे Xान दे ना चा&हए। जीसके पास सू[म 3ववेकबु3t हो
उसे ह( Xान दे ना चा&हए।

71. जीसे भूख न हो उसे \यादा खाना दे ने से उसे बदहझमी होती है ,


जीसका पेट खाल! न हो उसे भख
ू नह!ं होती। जीसके पास पहनने के 'लए
वj \यादा हो उसे ठं ड \यादा लगती है ।
पMट!करणः जीस तरह भूख न हो उसे xयादा /खलाने से बदहझमी
होती है उसी तरह ?बना िजXासा के Fयि1त को आVयािमक Xान दे ने से
53 चदाकाश गीता

उसे आVयािमक बदहझमी होती है । जीस तरह जीनके पेट भरे हुए हो उसे
भूख नह( लगती उसी तरह सांसाoरक आनंदो मे म}न मनु9य को
आVयािमक Xान क@ ईEछा नह( होती, उसी तरह xयादा से xयादा व2G
पहननेवाले को ठं ड के समय ठं ड xयादा लगती है उसी तरह ईिlयो के
आनंद म xयादा से xयादा Fय2त रहनेवाले को ईिlयां xयादा परे शान
करती है । ई्िlय पर संयम उस क@ ओर दल
ु $
K दे कर आ सकता है ।
आVयािमक Xान 4सफK यो}य Fयि1त को ह( दे ना चा&हए।

72. मनुMय को काशी जाना हो तो रे लवे से जाना चा@हए। मनुMय को


रे लवे से 'शवानंदपरु ! पहुंचना चा@हए। €यि5त को शांतधाम पहुंचना चा@हए
और सफर yzमानंद परु ! मE खतम करना चा@हए।
पMट!करणः कंु ड4लनी को Nदयाकाश (चदाकाश) क@ ओर अंद:नी तौर
पर गत करनी चा&हए। यह याGा मनु9य को मुि1त ाwत करने के 4लए
अवqय करनी चा&हए। जो काशी, Oहमानंदपुर(-4शवानंदपुर( सभी मनोसिृ 9ट
म है वह चदाकाश है और मि2त9क म है । हर एक Fयि1त को काशी
जाना है । 4शवानंदपुर( पहुंचना है और ONमानंदपुर( :कना है । यह सब
मतलब चदाकाश या चेतना का आकाश है । चदाकाश के साथ एक हो
जाने के बाद हमे उEचतम आनंद क@ अनुभूत करनी है ।

73. मनुMय को अपना 8ान ाDत करना चा@हए। िजसने च त (मन)


पर Lवजय ाDत Xकया है वह! मानव है । वह संयमी है वह! योगी है और
वह सब मE एक आ मा को दे खता है । सूयF क3 रोशनी मE से अंधकार से भरे
कमरे मE आते है तब 5या @दखता है ? सूयF क3 ओर नरं तर पांच 'मनट
54 चदाकाश गीता

दे खने के बाद अंधकार से भरे कमरे मE आते है तो कुछ @दखे नह!ं वह


वाभाLवक है । €यि5त को अंदiनी BिMट से दे खना चा@हए।
पMट!करणः मनु9य को खुद को पहचानना चा&हए. आमा क@ अनुबूत
ल[य है । वह( सEचा मनु9य है , जीसने मन को जीता है । वह( सEचा
संयमी है और वह( योगी है । सEचा योगी सब म आमा का दशKन करता
है । ईqवर के संपूणK सज
ृ न म 4सफK ई2वर का दशKन करना चा&हए। सूयK क@
रोशनी म घूमने के बाद अंधकार से भरे कमरे म वेश करते है तब 1या
&दखता है ? कुछ नह(ं। यह एकदम 2वाभा3वक है । &दखता 3वqव न3वKकWप
समाध क@ उEचतम दशा क@ ईEछा रखनेवाले के 4लए एकदम सूना हो
जाना चा&हए। यह ि2थत शूयता क@ ि2थत है । मनु9य क@ सह( lि9ट
आंतरlि9ट है । ईस ि2थत दै वी च$ु से &दखने को 4मलती है । यह( मनु9य
का जीनवल[य है ।

74. प5का केला वाद मE बहूत मधुर होता है । वह! फल जब कnचा


होता है तब तूरा लगता है । एक ह! पैड़ पर पैदा होने के बावजूद वाद मE
फकF समय क3 वजह से आता है । ना`रयल को जमीन मE रखने से शी‹ ह!
उसका पौधा उगता नह!ं है । सवFथम वह अंकु`रत होता है बाद मE वह पौधा
बनता है और अंत मE ना`रयल का पैड बनता है । कोमल ना`रयल तुरंत पैड
पर से ले सकते है लेXकन प5का ना`रयल आसानी से नह! ले सकते। उसी
तरह हमारे मन पर लोग हमारे बारे मE कैसी बी बातE करE और कहE उसके
पर कोई भाव नह! होना चा@हए। मन हमारे अंकुश मE रहना चा@हए। यह!
बात मनुMय को अपने जीवन मE 'सJ करनी होती है । शायद मानवजीवन
का यह! उ1ेश होना चा@हए। मनुMय को अपने सर क3 Xकं मत पर भी यह!
लoय ाDत करना है । यह! लoय क3 'सLJ के 'लए मन से ह! उसे
55 चदाकाश गीता

नयंYjत करना होगा। यह चाबक


ु , हाथ या दस
ू र! कोई चीज से नह! हो
सकता। हमे मनुMय को Yबना रसी के बांधना 'शखाना है । यह! बात
मनुMय को अपने जीवनकाल मE 'सJ करनी है ।
पMट!करणः प1का केला 2वाद म बहूत मीठा होता है लेIकन वह(
फल जब कEचा हो तब 2वाद म तूरा लगता है । दोनो एक ह( पैड पर
उगते है उसके बावजूद दोनो के बीच समय का अंतर होने क@ वजह से
फकK मालूम पडता है । उसी तरह सिृ 9ट का नाश होता है तब आVयाम क@
उEच दशा म पहुंचे लोग ईqवर के साथ एकाकार हो जाते है उसी तरह
सिृ 9ट के सज
ृ न के व1त भी व एकसमान थे। फकK 4सफK अभी है । सभी
लोग एक या दस
ू रे समय म जWद( या दे र( से ईqवर के ाwत करते है ।
फकK 4सफK समय का है । एक मनु9य दस
ू रे मनु9य से xयादा ऊंचा या
अEछा नह( है । सभी एक तरह के ह( है । नाoरयल को जमीन म लगाया
जाये तब वह तकाल नाoरयल नह( बनता। थम मन क@ चंचलता का
नाश करना है , बाद म मन को ईqवर के त केl(त करना है और
अEछs-बूर( वृ तयM का नाश कर के पूणK व मतलब मो$ के 2तर तक
पहुंचता है । कोमल नाoरयल आसानी से पैड से तोडा जा सकता है लेIकन
प1का नाoरयल आसानी से नह( तोडा जा सकता उसी तरह हमारे मन को
प1के नाoरयल क@ तरह आमा म जोड के रखना है । हमारे मन को लोग
1या कहते है या 1या कहगे उससे भा3वत नह( होना चा&हए। मन (चत)
हमारे अंकुश म हो तो आमा से एक कदम भी वह दरू नह(ं होना चा&हए।
मनु9य को अपने जीवन म यह( 4सt करना है । जीवन का यह एक ल[य
है । अपने सर क@ Iकं मत पर भी यह 4सt करना चा&हए। गु: को (हमे) जो
हार करने है वह बाहर( अथाKत मो$ या क@सी चीज से नह(ं लेIकन “अंदर
56 चदाकाश गीता

के मनु9य” को मन से मारने के 4लए है । हमे मनु9य को ?बना र2सी से


बांधना 4सखाना है । हमे अपने चत म बसी दै वी शि1तयो से मनु9य को
आक3षKत करना है , जीससे वह र2सी से भी मजबूत तर(के से हाथ-पग-मन
से बाँधनेवाला है । यह( जीवन का ल$ और मानवजीवन का ईत+ी (अंत)
है ।

75. मनुMय का मन पाप का उदगमथान है । वह अnछे -बरू ! सभी


वजहो का मल
ू है । मानवमन ह! ईन सभी चीजो क3 वजह है । मन न हो
तो वाणी नह! होती, मन न हो तो कुछ आयेगा नह! और कुछ जा नह!
सकेगा। Yबना मन कोई चीज ाDत नह! होती। Xकसी €यि5त को Œि^लश
बोलना आता है लेXकन 'लखना नह!ं होता तो हम वह ई्ंि^लश पण
ू i
F प से
जानता है ऐसा नह! कह सकते। उसे 'लखना और पढना आता हो तो ह!
Œि^लश मE पास होता है ।
पMट!करणः मानवमन बंधनो क@ वजह है । मनु9य का मन मुि1त
क@ वजह है । मानवमन अEछे -बूरे गुण-अवगुणो, पाप-पु—य सभी क@ वजह
है । मनु9य क@ वाणी भी मन से पैदा होती है ईस4लए मन का नाश होता है
तो मनु9य बोलने क@ शि1त खो दे ता है । मनु9य का मन ह( आवागमन क@
वजह है । मन न हो तो कुछ भी 4सt नह(ं होता। मन पूरे घटनाच‡ क@
वजह है । सिृ 9ट चतशि1त के ONम म से होता सज
ृ न है । सिृ 9ट का
मतलब ह( मन का राग है । “ि}लश पूर( जानने के 4लए 4लखना-पढना
दोनो ह( आता हो वह ज:र( है । अगर पढना आता है लेIकन 4लखना न
आता हो तो उस Fयि1त को “ि}लश क@ परू ( जानकार( है ऐसा नह( कह
सकते। उसी तरह ईqवर का Xानामत
ृ का Xान ईqवर को जाने ?बना आधा
57 चदाकाश गीता

माना जायेगा। ईqवर को पूणK :प से पहचानने के 4लए मतलब सा$ाकार


के 4लए ईqवर के Xानामत
ृ का पूणK अनुभव करना चा&हए। यह( पूणK व है ।

76. पांच साल के बnचे को भी पता है क3 ई)वर है लेXकन उसे यह


मालूम नह!ं क3 ई)वर कहां है । सूयF के दशFन जगत मE सब करते है लेXकन
लाख मE एक या दो लोग सूयF के सामने दे खने क3 @हंमत @दखाते है । ईस
जगत मE तीन चौथाई लोग पशु जैसे काम आनंद मE ल!न होते है । जो लोग
मZय िथत पर पहुंचे है ऐसे एक चौथाई से भी ककम है । सतकमV क3
संŽया ईस जगत मE बहूत ह! कम है । दMु कमV क3 संŽया बहूत \यादा है ।
पMट!करणः हमे ईqवर के अि2तव का Xान हो उतना ह( पयाKwत
नह(ं है । हमे उनका सा$ाकार करना चा&हए और उसके परम सुख का
अनुभव करना चा&हए। पांच साल के बEचे को ईqवर का अि2तव मालूम है
लेIकन उसे यह पता नह( है क@ वह कहां है और उसे कैसे ाwत Iकया जा
सकता है । ईqवर मनु9य के चदाकाश (हाटK wलेस) म है । वह नः2वाथK
भि1त से ह( ाwत हो सकता है। सूयK के दशKन लाखो लोग करते है लेIकन
लाखो लोगो म एक या दो लोग सूयK के सामने दे ख सकते है। ईस जगत
के तीन चौथाई लोग पशु समान कामानंद म ल(न है । बाक@ के एक चौथाई
लोग न9ठावान भ1त नह(ं है । जगत म सतकमv क@ सं˜या बहूत ह( कम
है , लेIकन द9ु कमv क@ सं˜या xयादा है ।

77. “वामी” वह है जीसने च त को सत मE लगाया है । “उपाध”


मतलब शांत का पैड । हमे ईस शांत के पैड के नीचे आ&य लेना चा@हए।
58 चदाकाश गीता

पMट!करणः सEचे 2वामीने चत को सत के साथ जोडा है , जीसने


जीव को शील के साथ जोडा है , वह( मानस के साथ बु3t को जोडता है ,
वह( सEचा “2वामी” है जीसका tैतभाव न9ट हुआ है और उसने “ऐ1य”
4सt Iकया है । “उपाध” मतलब शांत का पैड। Fयि1त को 2वामी के
संयासी बनने के 4लए ईस शांत के पैड के नीचे आ+य लेना चा&हए।
2वामी या संयासी को सवvतम शांत ाwत करनी चा&हए।

78. जो लोग हर दम yzम के साथ रहते है वे yzमचार! है । शB



भी ईस अथF से yzमचार! बन सकता है । 'सफF दं ड ाDत करने से या हाथ
मE भगवS गीता पकडने से वामी नह! बना जा सकता। जो भी 'मले उसके
साथ ई)वर क3 चचाF करने से या लाल रं ग के वj पहनने से वामी नह!
बना जा सकता।
पMट!करणः ONम के साथ सदै व जूडा रहे वह ONमचार( है । ईस
तरह से शूl भी ONमचार( बन सकता है । मनु9य शूl हो तो भी शाqवत
तौर पर पूणO
K Nम मे जूडा हो तो वह सEचा OािNमन ह( कहा जाता है ।
सEचा “2वामी” वह है जीसने शाqवत सय का सा$ाकार Iकया है । हाथ
म ONमचार( का दं ड रखने से या भगव~ गीता का पु2तक रखने से Fयि1त
संयासी नह( बनता। जो भी 4मले उसके साथ ईqवर क@ चचाK करने से या
लाल रं ग के व2G पहनने से संयासी नह( बना जा सकता। बाहर( अलंकार
मनु9य को 2वामी नह(ं बनाते। सEचा संयासी बनने के 4लए आंतरशु3t
पूण:
K प से जCर( है ।

79. अि^न मE गमF हो कर पीघला हुआ सुवणF कांतमय हो जाता


है । उसी तरह आ मशुLJ से शुJ होने के 'लए ईnछाओ का नाश करना और
59 चदाकाश गीता

rोध को अंकु'शत करना ज*र! है । मनुMय का मन कभी िथर नह! होता


आ मनर!kण से मनुMय को अंदiनी गत करनी है ।
पMट!करणः िजस तरह अि}न से गमK हुआ और 3पघला हुआ सुवणK
अदभूत कांत से का4शत होता है उसी तरह मानवमन क@ अशु3tयां दरू
होने से मनु9य का मन आमतेज से का4शत होने लगता है । जब
आमशु3t का 2तर 4सt होता है तब बाहर( 3वqव Fयि1त के आंतर3वqव
म &दखता है । अ/खल ONमांड उसम और वह अ/खल ONमांड म Fयाwत
&दखेगा। Fयि1त को अपने कˆर दqु मनो ‡ोध, ईEछा, ई9याK, वासना और
धनलालसा आ&द का याग करना चा&हए। ईस ि2थत म ह( वह ईqवर के
दशKन कर सकेगा। मनु9य को आमनर($ण से अंद:नी गत करनी है ।
मनु9य का मन कदा3प ि2थर होता नह(ं है । मन क@ चंचलता आमा के
साथ मन (चत) को एकाकार करने से न9ट होती है ।

80.  शांत का तंभ है ।  शांत का वiप है । कार को


वंदन।  क3 अनुभूत चाहे कैसा भी जंगल! मनुMय हो उसक3 जंग'लयत
पांच 'मनट मE शांत हो जाती है और वह स\जन बन जाता है । बादल होते
है तब तक सूयF क3 XकरनE @दखती नह!ं है । जैसे ह! बादल हटते है तब सूयF
के दशFन होते है ।  क3 शि5त से मनुMय क3 बरू ाई दरू होने लगती है और
आ मा के दशFन संभव होते है ।
पMट!करणः मनु9य म द9ु टता-जंग4लयत उसके सEचे 2व:प को
छोड दे ता है । वासनाओ क@ वजह से खुद सह( म 1या है वह पहचान नह(
सकता। सूयK क@ Iकरन बादलो क@ वजह से &दखती नह( है। उसी तरह
वासना के बादलो क@ वजह से मनु9य अपनी सह( पहचान ाwत नह( कर
60 चदाकाश गीता

सकता। वासना के बादल हट जाते है क@ तुरंत आमा का भFय काश


बाहर आता है ।  शांत का 2तंभ है ।  शांत का 2व:प है ।  को
नम2कार !

81. आहार Xकतना लेना उसका कोई नयम नह!ं है । ऐसा भी नह!
कहा जाता क3 आहार नह! लेना चा@हए। यो^य आहार वह! नयम है ।
आहार आधा एक चौथाई पानी और नींद के 'लए \यादा चाहत नह! रखनी
चा@हए।
पMट!करणः ईqवर का सा$ाकार चाहते अ…यासीओ के 4लए
योगा…यास के ारं भ म आहार के 4लए कोई नयम नह( है । उनको भूखा
रहना ऐसा नह( है । उनको आहार मयाKदा के साथ लेना है । यो}य आहार
वह( नयम है । अपने आVयािमक अ…यास को चोट न पहुंचे ईस4लए पेट
आधा भरना चा&हए। आधा पानी से भरना चा&हए। अगर संभव हो तो एक
ह( शतK पूर( करनी है क@ नींद क@ चाहत xयादा नह( रखनी चा&हए।

82. अि^न मE कुछ भी डाला जाये तो वह भम हो जाता है । अि^न


अnछे -बरू े का फकF नह! करती। जो लोग कमF करते है वे कुछ भी खा
सकते है । जीन लोगो को कमF 5या है उसका 8ान नह! है उनको 5या
करना है उसका 8ान नह! होता। ऐसा €यि5त बदहझमी से परे शान होता
है । जीनका पाचन ठuक है वह कुछ भी खाता है उसका पाचन हो जाता है ।
नींद आव)यक है लेXकन वह संय'मत माjा मE होनी चा@हए। पेट भर कर
न खाएं और आहार मE नय'मत रहE ।
पMट!करणः कमK वह है जो Iकसी भी तरह के 2वाथK के ?बना Iकया
जाता है । हमे सEचा करम 1या है वह मालूम हो तो कुछ भी Iकतना भी
61 चदाकाश गीता

खाते है तो उसका पाचन हो जाता है । िजस तरह अि}न अEछे -बूरे का फकK
जाने ?बना सब 2वाहा करती है ठsक वैसे ह( सEचा कमK 1या है वह हम
जानते हो तो हम जो भी खा सकते है और पचा सकते है । हमारे बाहर(
कमK पर कोई नयंGण नह( होता, लेIकन जब ‘कमK’ 1या है वह हम सह(
तर(के से समझ नह( सकते तब हमारे 4लए सEचा और जूŽा, अEछे -बूरे का
3ववेक नह( रहता। एसी ि2थत म हमे हमारे बाहर( कमK के 4लए सतकK
रहना है । अगर पाचन अEछा होगा तो मनु9य कुछ भी कर सकता है ।
बाNय कमK अंद:नी कमK को भा3वत नह( करे गा। हमे यो}य नींद और
आहार नय4मत तौर पर लेने है।

83. गले और कान के सुवणF अलंकार या अंगल ु ! पर पहनी हुई


अंगठ
ू u हो यह सब शर!र पर हो तब वे लूट जाये ऐसे भय क3 वजह होती
है । धन भी डर क3 वजह होता है । मनुMय के तन पर एक भी सुवणF
अलंकार न हो तो उसे डर लगने क3 कोई वजह नह! होती।
पMट!करणः गले म सुवणK क@ चेईन, कान म बा4ल या अंगु4ल पर
सुवणK क@ अंगूठs हो तो वे लूट जाने का डर रहता है । उसी तरह मनु9य को
भौतक ईEछाएं मन म जागत
ृ हो तब मौत का भय रहता है । Fयि1त जब
ईEछार&हत दशा म होता है तब उसे कोई डर रखने क@ ज:रत नह( है । अहं
भय क@ वजह है । जब तक हम म अ4भमान होता है तब तक हम
भयमु1त नह( हो सकते।

84. डर मनुMय के मन का सज
ृ न है । आ मBिMट के 'लए कोई भय
नह! होता। भय उन लोगो को लगता है , जीनके पास अंदiनी BिMट नह! है ।
अंध €यि5त के 'लए गाडी कैसी है उसका Lववरण दे ना संभव नह! है , उसी
62 चदाकाश गीता

तरह जीस €यि5त के गi


ु नह! होते उसका जगत मE कोई थान नह!
होता।
पMट!करणः डर Œमणा क@ वजह है । हम माया से पर होते है तब
शाqवत सय 1या है वह समझ सकते है । तभी हमे क@सी कार का डर
नह( होता। डर मानवमन का सज
ृ न है । हम जब दै वी lि9ट से दे खते है तब
ईqवर सवKG &दखाई दे ते है । आंतरlि9ट जीसक@ जागत
ृ है उसके 4लए डर
का अि2तव नह( होता। अंध Fयि1त जीस तरह गाडी का 3ववरण नह( दे
सकता उसी तरह ?बना गु: के Fयि1त का जगत म 2थान नह(ं है । ?बना
गु: के Xान नह( 4मलता। ईस4लए स~गु: के चरनकमलM म दं डवत
करना रह( ईqवर के सा$ाकार के 4लए बहुत ह( आवqयक है ।

85. ाण आ मा का आहार है । आहारतिृ Dत मतलब ाणततिृ Dत।


हम पैसो को कुछ सोचे Yबना पेट! मE डालते है तो उसका सं‰ह होता है
लेXकन उसमे से थोडे थोडे खचF करते है तो पैसे कम होने लगते है । जीवन
संपत है और बLु J एक पेट! क3 तरह है । जीस तरह पेट! को कुछ नह!
चा@हए उसी तरह बLु J को कुछ नह! चा@हए। मनुMय जो खुद को पहचान
सके ततो उसे Xकसी चीज क3 जiरत नह! रहती। हमे योगसाधना का
अTयास करते रहना चा@हए। हम ाण के yzमरं ‡ अथाFत सुष
ु ना नाडी के
अंतभीग ततक ले जाएं और वहां ाण और 'शव का 'मलन हो तो हमे
Xकसी चीज क3 आव)य5ता नह! रहे गी। मानस का अधःपतन होता रोककर
उसे ‘मZय’ का राजमागF बताना वह! आहार (ाण) कहा जाता है।
पMट!करणः आहारतिृ wत मतलब ाणतिृ wत। आहार मतलब ाण।
योगी ाण से भरा होता है । जीस तरह हम धन का सं|ह लकडी क@ पेट(
म कर तो वह सं|ह(त रहता है लेIकन हम उसमे से थोडा थोडा खचK करते
63 चदाकाश गीता

है तो वह घटता जाता है । उसी तरह ाणशि1त का यो}य उपयोग नह(


होता तो उसका Fयय होता रहता है । हो4शयार Fयि1त जीस तरह पेट( म
धन का सं|ह करता है वैसे ह( हमे ाणशि1त का xयादा से xयादा यो}य
उपयोग कर के उसे बचाए रखनी चा&हए। धनसं|ह क@ पेट( को कोई 2वाथK
नह( होता उसी तरह हम ाण के ONमरं  क@ ओर ले जायगे और साधना
से दे व का 4शव के साथ 4मलन हो जाये तो पेट( क@ तरह हमे Iकसी ट(ज
क@ ज:रत नह( रहे गी। पूणK याग क@ भावना हमारे अंदर 2वयं पैदा होती
है । आहार मतलब मानस को नीचे 2तर पर जाते रोकना और आVयाम का
राजमागK जो क@ मVयम मागK है उस पर ले जाना। भौतक बातो म से मन
को वा3पस लाकर आमसा$ाकार के मागK पर ले जाना उसे ह( आहार
कहते है ।

86. राम नाम का जप वह! सnचा आनंद है । वह आ मानंद है । वह


शा)वत काश है । Lवि तय काश है । कंु ड'लनी भ€यता का काश है । चS
(मन) के अधMठाता दे व राम है । राम अथाFत आ मा। पांच ईि:Bया,
कमि:Bयां और पांच 8ानेि:Bयां ऐसे कुल दसो ईि:Bयv के अधMठाता राम
है । रावण मतलब हम मE बसी असS वृ तयां। सीता मतलब हमारा च त,
लoमण मतलब Lवचार अंकुश। कृMण मतलब आंतरमंथन। यह आंतरमंथन
मतलब शा)वत आ मकाश।
पMट!करणः राम नाम का न9ठा से जप करने से हमारे अंदर सEचे
आनंद का आ3वभाKव होता है ईस4लए राम के नाम को सय कहा जाता है ।
वह( सEचा आनंद-शाqवत आमा आनंद-शाqवत अंतरामानंद-कंु ड4लनी
जाग:कता क@ भFयता का आनंद है । मन के मतलब चत के अध9ठाता
दे व राम है , जो उनका नयंGण करते है । राम ONमांड के महादे व है । रावण
64 चदाकाश गीता

मतलब अपने अंदर बसी असदवृ तयां। जीस तरह रामने रावण का नाश
Iकया उसी तरह हमे हमारे अंदर बसी अस~वृ तयM का नाश करना है ।
सीता मतलब हमारा चत। जीस तरह सीताने राम के साथ 3ववाह Iकया
था उसी तरह हमारे चत को हमारे अंतरामा (राम) के साथ 3ववाह करना
होगा। सीता जीस तरह पूण:
K प से राममय हो गये थे उसी तरह चत को
भी आमा म ल(न होना होगा। ल[मण मतलब 3वचारो का अंकुश। ल[मण
जीस तरह परछा“ क@ तरह राम के साथ चलते थे उसी तरह हमारा
3वचारनयंGण आमा के साथ जूडा रहना चा&हए। कृ9ण मतलब अपने आप
ु ूत मतलब कृ9ण। आमा क@ अनुभूत से
को पहचानना। (आमा) क@ अनभ
शाqवत आमकाश कट होता है ।

87. सभी मानव है लेXकन मानव से \यादा अnछu योन कोई भी


नह! है । सभी ाणीओ मE मानवी &ेMठ ाणी है । मनुMयो मE वे &ेMठ है , जो
क3 ‘सूoम’ का हरदम चंतन करते रहते है ।
पMट!करणः मनु9य ईqवर के सज
ृ नो म उकृ9ट सज
ृ न है ।
मानवजम से अEछा अय कोई जम नह( है । ाणीओ म मानव +े9ठ है ।
मनु9यो म वे +े9ठ है जो क@ हरदम ‘सू[म’ (आमा) का चंतन करते है ।
आमा का सा$ाकार करनेवाले ह( मनु9यो म पु:षोतम है ।

88. “एकादशी” मतलब एक ह! दे व क3 भि5त। ऐसे मनुMय के 'लए


हर एक @दन एकादशी है । ऐसे मानव “मानव” कहे जाते है । जो ऐसी
एकादशी करते है । मनुMय को थुल चीजो का \यादा चंतन नह!ं करना
चा@हए। उसे “सूoम” के Zयान मE \यादातर समय €यतीत करना चा@हए।
65 चदाकाश गीता

पMट!करणः एकादशी मतलब आम राय के मुता?बक अनशन करना


है लेIकन सह( मायने म एकादशी मतलब अनशन नह(ं लेIकन ‘एक भि1त’
है । मनु9य को मानव बनने के 4लए हर एक &दन को एकादशी मानकर हर
&दन सू[म आमा का नरं तर चंतन करना चा&हए और सांसाoरक नाशवंत
चीजो का चंतन कम करना चा&हए। मनु9य को आमा के सा$ाकार के
4लए ईसी कार का अ4भगम रखना चा&हए।

89. मनुMय Xकसी के मत ृ दे ह को जलता हुआ दे खे तब ईnछार@हत


दशा मE आ जाता है । यह िथत kणजीवी है । यह! शर!र का रहय है ।
गi
ु ने जो 'सखाई है वह ईnछार@हत दशा का याग नह! करना चा@हए। गi

ने जो 'सखाई है वह ईnछार@हत दशा क3 िथत मE से बंधनमुि5त क3
िथत मE पहुंचा जा सकता है । यह ईnछार@हत दशा ह! &ेMठ है । गiु
आनुषांगक है । गi
ु 'मलना आनुषांगक है । 'शMय को आ ममागF पर जाने
के 'लए े`रत करना वह भी तृ तय (गौण) है । अTयास से खुद के 'लए
अनुभव ाDत करना और ईnछार@हत दशा मE पहुंचना वह! मानवजीवन का
लoय है । जब मनुMय खुद अTयास करे और खुद को अTयास से 'मला
8ान दस
ू रो को दे तब उसे ‘योगानंद ईnछार@हत’ दशा कहते है । यह
अLवनाशी और अLवभा\य िथत है । शांत का वk
ृ है । यह शांत का वk

जो हमारे च त मE है उस पर चडना और उसमे समां जाना वह! अLवनाशी
ईnछार@हत दशा है । rोधी और वासना के मूल का नाश करना वह
अLवनाशी ईnछार@हत दशा है । संसार मE रहकर संसार के आनंद कम से
कम भोगना और अंत मE उनका याग करना वह दस
ू र! ईnछार@हत दशा है ।
ईnछार@हत होना वह ईसी मनुMयजीवन मE बंधन से मुि5त क3 दशा है ।
66 चदाकाश गीता

पMट!करणः ईस जगत म अनेक3वध ईEछार&हत दशाएं होती है ।


मनु9य जब मतृ शर(र को जलता हुआ दे खता है तब उसे $/णक ईEछार&हत
दशा जीसे 2मशान वैरा}य कहते है वह पैदा होता है । ईस कार का वैरा}य
कुछ काम का नह( होता। गु:ने Xान से जो ईEछार&हत दशा द( है उसका
याग नह( करना चा&हए। ईस ईEछार&हत दशा से मनु9य बंधन म से
मुि1त ाwत करता है । पूणK ईEछार&हत दशा के ?बना ईqवर का सा$ाकार
संभव नह( है । (आमा “2व”) क@ अनुभूत के 4लए ईEछार&हत होना सबसे
पहले आवqयक है । दस
ू रा गु: का होना ज:र( है । तीसरा गु: के साथ से
ईqवर मागK म ेoरत होना वह है । लंबे अ…यास के बाद 2वयास से
ईEछार&हत दशा क@ 4स3t ह( मनु9य जीवन का ल[य है । आमा क@ शोध
के 4लए ईEछार&हत होना सबसे xयादा जCर( है । Fयि1त खुद ईEछार&हत
दशा ाwत करने के बाद दस
ू रो को भी अपना Xान दे उसे योगानंद-
ईEछार&हत दशा कहा जाता है । जब Fयि1त ईEछार&हत दशा म पहुंचता है
तब उसने अ3वनाशी और अ3वभाxय दशा 4सt क@ है ऐसा कहा जाता है ।
यह शांत का व$
ृ है । हमे शांतव$
ृ पर चड जाना है और उसमे ल(न हो
जाना है । ईस व$
ृ पर चडने के बाद हमे शाqवत ईEछार&हत दशा को ाwत
करते है । वासना और ‡ोध क@ जड काट कर हमे ईEछार&हत दशा ाwत
कर सकते है । संसार म रहकर संसार के आनंद कम से कम भोगकर और
अंत म उसका याग करके हम अWपगुणोवाल( ईEछार&हत दशा 4सt कर
सकते है । सEची ईEछार&हत दशा तो ईस जीवन म ह( बंधनमुि1त ाwत
करना वह( है ।

90. Yबना आ म&Jा का मनुMय ईnछार@हत दशा ाDत नह! कर


सकता। उसी तरह मन को जीतनेवाले को ह! वासना नह! होती। उसी तरह
67 चदाकाश गीता

जीसे आ म&Jा न हो उनको कोई फल ाDत नह! होता। हम *.


5000/6000 खचF करके ह!रा खर!दते है वह एक ‚मणा है । हमे ह!रा
खर!दने क3 ईnछा ह! न हो तो उसका मूdय हमे 'मsी से \यादा नह!
लगेगा।
पMट!करणः आम+tा एक ऐसा बीज है , िजसम से आम3वकास
का व$
ृ पैदा होता है । +tा3व&हन Fयि1त ईEछार&हत दशा 4सt नह( कर
सकता। उसी तरह मन को जीतनेवाले Fयि1त म वासनाएं नह( होती। मन
ह( वासना क@ वजह है । ?बना +tा के Fयि1त को कोई फल ाwत नह(
होता। मनु9य के चत क@ Œमणा है क@ C. 5000/6000 खचK कर के ह(रा
खर(दने जाता है लेIकन मनु9य को चतवृ त से ह(रा खर(दने क@ ईEछा न
हो तो ह(रे का मूWय 4मˆी से xयादा नह( है । उसी तरह ईqवरािwत क@
अपे$ा हो तो ईqवर के परम सुख का कोई मूWय भी रहता नह( है और
उसको ाwत करने के 4लए चंता भी नह( रहती।

91. पांच त व नह!ं है लेXकन चार त व है । प|ृ वी, जल, अि^न


और वायु। आकाश त व नह! है , वह एक और अLवभा\य है । प|ृ वी को
Lवभाजीत Xकया गया है । वायु जल उपर है । आकाश वायु उपर है । सागर
सीमा है । प|ृ वी शया है । आसमान आवास (घर) है । वायु उपर है । प ृ ्वी
नीचे है । प|ृ वी र5त रं गी (लाल) है । वायु सफेद है । प|ृ वी चार त वो क3
बनी है लेXकन गोल नह! है । प|ृ वी Yjभुजाकार है । चंB नाडी और सूयF नाडी
के Yबच सुष
ु ना (तारा) नाडी है । प|ृ वी हमारे चहे रे जैसी है ।
पMट!करणः तवो पांच नह(ं है – पŠृ वी, जल, अि}न और वायु।
आसमान तव नह( है , वह एक और अ3वभाxय है । पŠृ वी 3वभाजीत है ।
वायु जल उपर है । आसमान वायु उपर है । सागर पŠ
ृ वी क@ सीमा है । पŠृ वी
68 चदाकाश गीता

शšया है । आसमान घर (आवास) है । वायु उपर है , पŠृ वी नीचे है । पŠृ वी


लाल रं ग क@ है । वायु फेद रं ग का है । चार तवो क@ बनी पŠृ वी गोल नह(
है । वह ?Gभूजाकार है । अि}नच‡ म पŠृ वीि}न ?Gभुजाकार है । उसे ŒुमVया
कहा जाता है । ईडा और पींगला के ?बच क@ नाडी सुषD
ु ना है । सुषD
ु ना एक
और अ3वभाxय है । वह एक ONम क@ बैठक है ।

92. वायु अLवनाशी है । वह एक और अLवभा\य है । वह सावFYjक


है । जब द!ये के उपर रखा शीशे के गोले को खुdला Xकया जाता है तो
रोशनी फैलती है । हमे 'मsी (प|ृ वी) लेते है तब अगर सोचे क3 वह
“चीनी” है तो चीनी कdपना ह! है । हाथ मE तो 'मsी ह! है अथाFत उसका
वiप बदलता नह!। उसी तरह मनुMय योगी बनता है तो या तो 8ानी
बने तो शर!र का वभाव बदलता नह! है । मानस yzम के साथ एक हो
जाता है लेXकन शर!र नह!। 8ानीओ भी तन क3 मयाFदाओ के अधन है
लेXकन उनके मानस संय'मत Xकये होते है ईस'लए वे तन क3 िथत से
वाXकफ नह! होते। नीBाधीन €यि5त को काला नाग काटे तो उसे मालूम
नह! होता और उसका भाव भी उस पर पडता नह! है । Œि^लश या कोई
भी भाषा मE 'लखा गया पj 5-6 म@हने के बnचे को @दया जैये तो वह
फEक दे ता है । उसे उसमे 'लखी बातो से कोई नबत नह! है । 5/6 म@हने
का बnचा ह!रा और प थर का फकF नह! समझता। ऐसे बnचो को तन
का 8ान नह! होता। वे 'सफF आ मा के Lवचारो मE खोये होते है । बnचो
को Jैत का कोई खयाल या Lवचार नह! आता। जब उनके द!माग का
Lवकास होता है तब उनके ाण सुष
ु ना नाडी मE होते है ।
पMट!करणः वायु सावK?Gक है , वह अ3वनाशी है । वह एक और
अ3वभाxय है । वह सवK म है । जब फानुस के शीशे को ढक &दया जाये तब
69 चदाकाश गीता

कोई रोशनी 4मलती नह( है लेIकन फानुस के शीशे को खुWला Iकया जाता
है तो उसक@ xयोत xयादा का4शत होती है । मन (चत) वासनाओ क@
अशु3t से घरा हुआ है , चत (मन) क@ अशु3tओ दरू क@ जाये तो मन
(चत) क@ रोशनी उxजवल होती है । हम हाथ म 4मˆी लेते है और मन से
उसे चीनी माने तो वह 4सफK कWपना ह( है लेIकन 4मˆी का 2व:प बदलता
नह( है । उसी तरह आमा के साथ एक:प हुए जीव क@ शार(oरक मयाKदाएं
कायम रहती है । तन का अधूरापन कायम रहता है और उसका आमा
पूण:
K प से शुt होता है । 4मˆी, 4मˆी रहती है और शर(र, शर(र रहता है ।
ईस4लए ह( Xानीलोग शर(र क@ मयाKदाओ के अधीन रहते है । सोये हुए
मनु9य को नाग काटता है तो नाग का काटना उसे मालूम नह( होता उसी
तरह Xानी को उनके शर(र और उसक@ अपूणत
K ा का भाव नह( होता।
“ि}लश या Iकसी भी भाषा म 4लखा गया पG पांच-छः म&हने के बEचे को
&दया जाये तो उसे पG म 4लखी बातो से कोई न2बत नह( है । उसी तरह
Xानी भी सांसाoरक बातो पर ल$ नह( दे ते। Xानी के 4लए पथर और ह(रे
के बीच कोई फकK नह( होता। उनम tैतभाव पूण:
K प से न9ट हो जाता है ।
बEचो क@ तरह उनम शर(र का Xान नह( होता। Xानीओ के ाण सुषD
ु ना
म रहता है और वे परONम का शाqवत आनंद ाwत करते है ।

93. बnचा उ} बढने के साथ जैसे जैसे सभी चीजो का 8ान ाDत
करता रहता है वैसे वैसे पहले के 8ान का मूdय रहता नह!। मनुMय सवF8
हो ईस'लए बnचे जैसा हो जाना चा@हए। सnचा 8ानी 6 म@हने के बnचे
जैसा होता है । जीस तरह छोटे बnचे को कुदरती हाजतो के बारे 8ान नह!
होता। उसे दो तरह क3 कुदरती हाजतो मE कोई फकF नह! लगता। 8ानी भी
छोटे बnचे जैसा है , उसे चाहत या नारजगी नह! होती। उनके 'लए झहर या
70 चदाकाश गीता

अमत
ृ दोनो ह! समान होते है । वे दोनो मE से कुछ भी 'मले उसक3 परवा
नह! करते। 8ानीओ को अ:न-वj या क3सी भी चीज क3 ईnछा नह!
होती। वे आ मा मE म^न बन जाते है ।
पMट!करणः मनु9य को आमशु3t के सवvEच 4शखर पर पहुंचना है
तो उसे Xान-अXान सब भूल जाना चा&हए। उसे छः म&हने के बEचे जैसा
बन जाना चा&हए। िजस तरह छः म&हने का बEचा जगत के बारे म जानता
नह( है । अXान और नः2पहृ ( भाव छोटे बEचे क@ ाकृतक अव2था है
उसके 4लए कोई यास नह( करना पडता। सEचा Xानी छः म&हने के बEचे
जैसा है ष जीस तरह छोटा बEचा अपनी दो कार क@ ाकृतक हाजतो के
?बच का फकK नह( समझता उसी तरह Xानी को अEछे -बूरे के ?बच का फकK
मालूम नह( पडता। भोजन और झहर दोनो उसके 4लए समान है । Xानी को
झहर दे ने का यास करनेवाले को यह सय समझ लेना चा&हए। Xानी
जगत के tैतभाव और रागtैष से पर होता है । Xानी को अEछा भोजन या
जगत क@ चीजो क@ ईEछा नह( होती। वह हरदम आमा क@ म2ती म होता
है और परONम म एकाकार रहकर परम सुख का आनंद ले रहा होता है ।

94. हमारा द!माग ना`रयल के फल क3 माXफक हौता है । ना`रयल


मE जीस तरह पानी और गभF (मावा) होता है उसी तरह हमारे द!माग मE
चदाकाश है । Rदयाकाश का कूआं है । हमे Rदयाकाश के कूएं का जल पीना
है । धरती पर कूआं गाढना और उसका पानी पीना उसका कोई मतलब नह!
है ।
71 चदाकाश गीता

पMट!करणः हमारे मि2त9क क@ तुलना नाoरयल से क@ जा सकती


है । नाoरयल म जीस तरह पानी और गभK होता है उसी तरह हमारा द(माग
भी वैसा ह( है । द(माग चदाकाश के बैठक है वह „दयाकाश का कूआं है ।
मन म सह2G पतीयMवाला XानCपी कमल है । सुषD
ु ना-ONमरं  हमारे
मि2त9क म है जब कंु ड4लनी जागत
ृ होती है और वह सह2Gार तक पहुंचती
है तब हमे परमामा के परम सुख का अनभ ु व ाwत होता है । हमारा
द(माग चदाकाश क@ बैठक है । उसक@ तुलना „दयाकाश के साथ भी क@
जाती है । हमे चदाकाशCपी कूएं म से आमा के आनंद का अमत
ृ पीना
चा&हए। पŠृ वी म कूआं गाढकर उसका पानी पीने का कोई मतलब नह(ं।

95. हमारे हाथ मE जो चीज है वह हम अ:य थान पर ढूंढे तो वह


हमे नह!ं 'मलेगी। हमे उपर क3 मं{झल पर बैठकर द!या जलाएं, दरवाजा
बंध करे तो उससे नीचे खडे €यि5त को द!पक क3 रोशनी नह! @दखाई
दे गी। नाटक-बायोकोप सब हमारे च त मE दे खा जा सकता है । हमे एक
ह! थान पर बैठकर ईन सभी का नर!kण करना चा@हए। हर तरफ घूमने
क3 आव)यकता नह!ं है । मBास शहर वहां पर जाकर भी दे ख सकते है और
चदाकाश मE भी दे ख सकते है लेXकन हरबार एक ह! थान से सब दे खE
वह बहुत ह! आनंदद है । हमे द!माग के अंदर दे खने के 'लए को'शश
करनी चा@हए। हम िजसे Rदय कहते है वह नीचे मतलब सीने मE नह!
लेXकन गले के उपर के थान मE है । हर खाना पकाते है तब चूdहे क3
\योत उपर क3 ओर जाती है उसी तरह हमारा Rदय भी उपर है । ईस Rदय
मE रोशनी है , अंधकार नह!ं है । मनुMय का 'सर तन से अलग हो गया हो
तब 'सफF तन दे खने से मनुMय क3 पहचान नह! हो सकती। मनुMय का
Rदय आंख से दे खता है । आंख मतलब आंत`रक चkु। जीसे Rदयाकाश
72 चदाकाश गीता

ककहा जाता है । वह चहे रा है और वह Yjभूजाकार है । मनुMय को उसका


चहे रा दे खकर पहचान सकते है । मनुMय को अपना रहय समझना चा@हए।
मनुMय को खुद क3 पहचान करनी चा@हए।
पMट!करणः ईqवर के सा$ाकार के 4लए हमे आमनर($ण करना
चा&हए। हम उह अय 2थान पर नह( ढूंढ सकते। हाथ म जो चीज है वह
अय 2थान पर ढूंढे तो वह नह( 4मलेगी वैसे ह( „दयाकाश म बसे ईqवर
के हमे „दयाकाश म ह( ढूंढना पडता है । वह कह(ं ओर नह( 4मलेगा। हम
उपर क@ मं/झल पर बैठकर द(पक जलाएं और /खड़क@यां बंध करे दे ते है
तो नीचे खडे Fयि1त को रोशनी &दखाई नह( दे ती। उसी तरह Xान जो क@
हजारो सूयK से भी xयादा का4शत है वह वासना और सांसाoरक बातो से
घेरा जाता है । फल2व:प हमे ईqवर के दशKन नह( होते। हमे आम3ववेक से
यह वासना और सांसाoरक जीवन क@ लालचो के बादल ?बखेर दे ने चा&हए
और तभी हम ईqवर का दशKन कर पायगे। दरवाजा खोलने से द(पक क@
रोशनी नीचे खडे Fयि1त को &दखाई दे ती है उसी तरह हमे अपने मन को
शुt करना चा&हए। जीससे ईqवर के दशKन हो सके। हमारे चत म ह(
नाटक, बायो2कोप &दखाई दे ता है । उसके 4लए बाहर जाने क@ कतई ज:रत
नह(ं है । कंु ड4लनी को मूलाधार से जागत
ृ करके सह2Gार-द(माग म बसे
हजारो पतीयMवाले कमल क@ ओर ले जाना है । ऐसा करने से खुद म ऐसी
उEचतम शि1तयां 3वक4सत होती है , जीससे ONमांड चल रहा है । ऐसे
Fयि1त को ससब कुछ अपने „दयाकाश म ह( &दखाई दे ता है और वह(ं पर
वह सब दे ख सकता है , उसे कह(ं भटकने क@ ज:रत नह(ं। मlास शहर,
वहां पर गये ?बना अपने चदाकाश म दे ख सकते है । हम खाना पकाते है
तो चूWहे क@ xयोत उपर क@ ओर जाती है उसीतरह „दय सह( म सीने म
73 चदाकाश गीता

नह( लेIकन गले के उपर है । वह अि}न xयोत जैसा है , जो क@ द(माग म


है । उसे चदाकाश कहा जाता है । यह चदाकाश क@ रोशनी Xान क@ रोशनी
है । उस के अंदर माया का अंधकार नह( रहता। मनु9य का 4सरEछे द हुआ
हो तो 4सफK तन से उसक@ पहचान नह( हो सकती। उसका मुख दे खना
जCर( है । उसे दे खने के 4लए „दय के च$ुओं क@ आवqयकता होती है ।
दे खने क@ शि1त है । वह „दय से आंखो को 4मलती है । आंखे „दय के
तनध क@ तरह काम करती है । आंतoरक च$ुओ से दे खना मनु9य को
4सखना चा&हए। „दयाकाश जीसे मुख (चहे रा) कहा जाता है वह ?Gभूजाकार
है , उसे ŒमVया कहा जाता है। ŒूमVया आXाच‡ म है । जो ईडा और
पींगला नाडीयM के ?बच म है । ŒुमVया मतलब „दयाकाश। जब कंु ड4लनी
जागत
ृ हो और (?Gभुजाकार) Œम
ु Vया म से पसार हो तब मनु9य को परम
सुख का आनंद 4मलता है और तभी उसे सत-चत-आनंद 1या है वह
समझ म आता है । मनु9य को अपना रह2य सा$ाकार से जानना वह
उसका प3वG फझK है । मनु9य को मानव बनने के 4लए अपनेआप को
पहचानना चा&हए।

96. मुि5त €यि5त क3 भि5त के वiप के @हसाब से होती होती


है । €यि5त जीतनी \यादा को'शश करे उतना ह! उसे अnछा फल 'मलता
है । अगर यास कम होता है तो प`रणाम भी कम 'मलता है ।
पMट!करणः मुि1त हमार( भि1त का पoरणाम है , जो उसके 2व:प
अनुसार होता है । ईqवर पुण:
K प से तट2थ है । वह क@सी का प$ नह( लेता
और क@सी का तर2कार भी नह( करता। उसके 4लए सभी लोग समान है ।
वह जगत के tैतभाव से पर है । हम जैसे बोते है वैसा पाते है । मो$ के
4लए हम क&ठन यास कर तो अवqय ह( लाभ ाwत होगा, जो लाभ हमारे
74 चदाकाश गीता

यासो के अनुसार हौता है । अगर हम हमार( को4शश कम रहती है तो


पoरणाम भी कम 4मलता है ।

97. हम न:हE बnचे होते है तब हम हमारे मा-बाप को पहचानते


नह!ं है । हमार! उ} जैसे बढती है वैसे हम हमारे मा-बाप को पहचानते है ।
मुगाF जब दाने चुनता है तब अपने पांव से दाने अपनी ओर खींचता है उसी
तरह मनुMय क3 बLु J का Lवकास होता जाता है वैसे वैसे वह वाथI बन
जाता है । हररोझ मनुMय पैदा होता है और मरता है लेXकन अपनी
वाथFवृ त का याग नह! कर सकता। वाथFवृ त तभी नMट होती है जब
Lवभा\य (जगत क3) चीजE अLवभा\य मE एकाकार हो जाये। चावल मE से
“आंबडा”, “हलवा” ऐसे अनेक €यंजन बनते है लेXकन उसे “चावल” कहा नह!
जाता।
पMट!करणः हमार( 3ववेकबु3t का 3वकास न हुआ हो तब ईqवर
1या है वह हम समझ नह( पाते। छोटे बEचे छोटे होते है तब अपने मा-
बाप को पहचानते नह( है । जैसे जैसे बु3t का 3वकास होता है वैसे वैसे
ईqवर क@ पहचान होने लगती है । मुगाK दाने चुगता है तब अपने पांव से
ससब अपनी ओर खींचता है वैसे बु3t का 3वकास होता जाता है वैसे वैसे
मानवी 2वाथ‰ होने लगता है । मनु9य हररोझ पैदा होता और मरते मनु9यो
को दे खता है लेIकन अपनी 2वाथKवृ त का याग कर नह( सकता। मौत
अपने सामने हररोझ घूरती है Iफर भी वह खुद को अमर मानता है । यह
2वाथKववृ त जब 3वभाxय का अ3वभाxय म 4मलन होता है तब अlqय
होती है और जीव तब 4शव के साथ एक बन जाता है । मनु9य, सांसाoरक
वृ तयM म खोया हुआ होता है लेIकन जब वह दै वीवृ तयM म खो जाता तब
एकदम अलग तरह का हो जाता है । चावल म से अनेक3वध Fयंजन जैसे
75 चदाकाश गीता

क@ “आंबडा”, “हलवा” बनाये जाते है । हम उसे चावल नह( कहते है । ईसी


तरह ईqवर म एकाकार हो जानेवाले मनु9य को वह( शर(र होने के बावजूद
बदल( हुई वृ तयM क@ वजह से उसे अवधूत कहा जाता है । बाद म वह
मनु9य नह( रहता।

98. पानी के Yबना घडा कुछ भी काम का नह!। भि5त वह पानी है


और बLु J घडा है । सूoम भि5त के Yबना मनुMय मनुMय नह! है । मनुMय
रसी पे न ृ य करता हहै तब वह शि5त क3 वजह से नह! लेXकन वह तो
एक युि5त होती है । उसे कलाबाज कहा जाता है । (कलाबाज) यिु 5तबाज का
मागF नीचे क3 ओर होता है लेXकन शि5त मZयमागF का अनुसरण करता है ।
युि5तयां शर!र क3 होती है । शि5त आि मक होती है । युि5तयां सि5त के
आगे शि5तLव@हन हो जाती है ।
पMट!करणः ?बना भि1तवाला मनु9य पानी ?बना घडे जैसा है , जीसका
कोई उपयोग नह( है । wयासे मनु9य को जल से बरे घडे का उपयोग होता है
उसी तरह ?बना भि1त का मनु9य जगत को कुछ खास उपयोगी नह( होता।
बु3t घडा है और भि1त उसके 4लए पानी है । बु3t वह शि1त के 3वकास
का साधन है , जीसे सू[म बि1त नह( होती वह मनु9य कहने लायक नह(
है । जब मनु9य र2सी पे नृ य करता है तब वह शि1त (शील) का कृय
नह( है लेIकन कलाबाझ क@ बाहर( वृ त है । (कलाबाझ) नट का नृ य
नDन कार क@ वृ त है । शि1त का मागK मVयमागK है । नट का नृ य
नाशवंत है लेIकन शि1त अ3वनाशी है । नट का नृ य शर(र क@ वृ त है
लेIकन शि1त आमा क@ होती है । शि1त क@ अि}न के सामने नट का
नृ य कौशल शि1तह(न हो जाता है । ऐसी युि1तयM क@ कला आमा क@
शि1त से बहुत नीचे होती है ।
76 चदाकाश गीता

99. जगत मE काजू के 'सवा सभी फलv के बीज भू'म मE होते है ।


काजू के बीज वk
ृ पर होते है। हमारा मन काजू के बीज जैसा होता है ,
िजसे संसार से पर रहना है । हमे अपने 'लए स5कर रखकर दस
ू रो को
'मsी नह! दे नी है । जो राजमागF पर चलता हो उस €यि5त को अ:य लोगो
को जंगल मE भटकने नह! दे ना है । मनुMय का यह पLवj फझF है क3 मागF
भूलनेवाले सभी को राजमागF पर लाये। यह तुरंत ह! करना है । भLवMय का
हम Lव)वास नह! कर सकते।
पMट!करणः जगत के अधकतम सभी फलो के बीज भू4म म होते है
लेIकन काजू का फल नय ह( बाहर होता है । हम संसार म रहे लेIकन
संसार से पर रहना है । हमे संसार म रहना है लेIकन उसका बंधन हमे नह(
होना चा&हए। हमने जो ाwत Iकया है वह Xान दस
ू रो को दे ना चा&हए।
हम अपने 4लए स1कर और दस
ू रो के 4लए 4मˆी नह( रख सकते। हम खुद
राजमागK पर चले और दस
ू रो को जंगल क@ भूलभूलैया म भटकने दे ऐसे
नह( हो सकता। हम जीस तरह आमा के राजमागK पर चल कर परमसुख
ाwत करते है उसी तरह अय को भी वह( आनंद का लाभ 4मले उसके
4लए मदद करना हमारा फजK है । यह फजK हमे तुरंत ह( नभाना है 1यMक@
कोई मनु9य अपने भ3व9य के 4लए निqचंत नह( हो सकता।

100. जब रे लगाडी छोडती है तब नजद!क के टे शन पर वायरलेस


(तार) से सूचत Xकया जाता है और घंट! बजाई जाती है । ईस कार के
घंटनाद को Yबंदन
ु ाद कहा जाता है । हमे कुएं मE प थर फEकते है तब जो
आवाझ होती है वह Yबंदन
ु ाद है । ऐसी ह! आवाझ हमारे मतक मE होती है ।
पMट!करणः जब ›ेन नज&दक के 2टे शन से आती है तब उसक@
सुचना वायरलेस से &द जाती है और घंटनाद Iकया जाता है । कूएं म फका
77 चदाकाश गीता

हुआ पथर पानी म पहुंचते है वह नाद ?बंदन


ु ाद है उसी तरह ाणायम से
योगा…यास करनेवाले Fयि1त को अनेक तरह क@ आवाझ सन ु ाई दे ती है ,
यह आवाझ हमार( आंतoरक Fयव2था क@ शु3t का माण है । उसका कोई
और महव नह( है ।

101. जब बnचा थम कkा मE उतीणF हो जाता है तब दस


ू र! कkा मE
जाने के बाद थम कkा क3 प
ु तकE उसे कुछ काम के नह! है । जब मनुMय
गहर! नींद मE होता है तब उसे 'सतारे , चंB या सय
ू F कुछ @दखाई नह! दे ता।
उस व5त उसका द!माग शू:य दशा मE होता है । नींद एक सूoम िथत है ।
वह थुल िथत नह! है । गहर! नींद मE हम शर!र क3 ओर सचेत नह! रह
सकते। हम 'सफF आ मा के 'लए सचेत होते है । हमे तभी गहर! नींद आती
है जब ाण िथरता से शर!र मE होता है । जब अ'भमान पण
ू i
F प से नMट
हो जाता है तब सब तYबंब जैसा लगता है । मन क3 ‚मणा वह नरं तर-
थायी नह! है । वह 'शव नह! है ।
पMट!करणः थम क$ा म उतीणK हुए छाG को दस
ू र( क$ा म उन
पु2तक काम क@ नह( होती उसी तरह आVयािमक बातM म पूणK व 4सt
करनेवाले को भौतक बातो मे Iफर से वा3पस जाने क@ ज:रत नह( होती।
नींद सोये Fयि1त कको 4सतारे , चंl और सूयK &दखते नह(ं है। उस व1त
उसे Iकसी बात का Xान नह( होता। मन शूय दशा म रहता है । नींद
सू[म ि2थत है । नींद 2थुल ि2थत नह( है । गहर( नींद म हमे आमा क@
सभानता होती है । ाण जब ि2थर दशा म होते है तब हमे गहर( नींद
आती है । Xानी को जगत म जीवन शाqवत नींद जैसा लगता है । वह शर(र
से सभान नह( होता। अ4भमान पण
ू रK :प से न9ट हो जाने के बाद सब
त?बंब जैसा लगता है , वह वा2त3व1ता नह( है । ईqवर एक ह( सय है ।
78 चदाकाश गीता

दस
ू र( सभी चीज न9ट हो सकती है । मन क@ Œमणा क@ वह शर(र है और
यह क@ आमा 2थायी नह(ं है। यह $णजीवी है । मन क@ ईन Œमणाएं
“4शव” नह(ं है । 4शव अ3वनाशी है और अ3tतय है ।

102. Lवध नातक €यि5त को महाLवSयालय (यु नव'सFट!) क3 ओर


से खास तरह के अंगगवj @दे ये जाते है , जीसके चार मुख होते है । जो क3
दो हाथ के 'लए होते है और दो पांवो के 'लए होते है । उसी तरह सत और
चत एक हो जाता है तब हमे आनंद 'मलता है वह yzमानंद, परमानंद ,
सत-च त-आनंद (सिnचदानंद) और योगानंद होता है । जब हम सांसा`रक
जीवन के आनंद का याग करते है तब दै वी (आि मक) आनंद 'मलता है ।
जीव का स य समझते है तब हमE आनंद ाDत होता है ।
पMट!करणः 3वध 2नातक Fयि1त को युनव4सKट( क@ ओर से खास
तरह का अंगव2G 4मलता है , जीससे 4सर से पांव तक तन ढं क जाता है ,
उसे चार बाजु होती है । दो हाथ के 4लए और दो पांव के 4लए। युनव4सKट(
क@ ओर से 4मला अंगव2G उसक@ 3वशेष पहचान बनता है । उसी तरह सत-
चत दोनो साथ 4मलते है , जीव और 4शव साथ 4मले, मन-बु3t साथ 4मले
तब हम आनंद क@ ािwत होती है । आनंद अथाKत ONमानंद, परमानंद, +ी
सिEचदानंद, +ी योगानंद। जो सुख हमे 4मलता है वह मन-बु3t, जीव-4शव,
सू[म-2थुल के एकामपन का होता है । भौतक आनंद का याग करगे तभी
हम दै वी आनंद ाwत हो सकता है ये दोनो एकदस
ू रे के 3वरोधी है । व &दन
और रात क@ तरह है । जब हम जीव के सय का अनुभव करते है तब
आनंद का अनुभव करते है । वह आनंद शाqवत आनंद होता है ।
79 चदाकाश गीता

103. गi
ु के Yबना 8ान संभव नह! है और गi
ु के Yबना स य क3
अनुभूत नह! होती। ईस जगत मE Yबना कारण प`रणाम नह! होता। जब
जगत मE अंधकार काश क3 तरह @दखता है तब उसे 8ान कहा जाता है ।
काश वह 8ान है । दं भी बनकर क3तF के पीछो मत भागो।
पMट!करणः सवvतम शाqवत सय क@ अनुभूत के 4लए गु:
अनवायK है । गु: के ?बना सह( Xान ाwत नह( हो सकता। पु2तको से
Xान ाwत नह( होता। सय एक सकारामक सय जो क@ प2
ु तक के Xान
से भी उपर है । सय का Xान 4सफK सEचे गु: दे सकते है । ईस जगत म
?बना वजह पoरणाम संभव नह(। आVयािमक गु:हुआसे &दया
Fयावहाoरक Xान ह( 4श9य को आमा क@ पहचान कराता है। सय 1या
है ? अंधकार म काश के दशKन, अXानता म Xान के दशKन, tैत म एक
का दशKन वह सय है । असय म सय का आ3œभाव तब होता हौ जब
tैत का भाव न9ट होता है । अंधकार वह अXानता है और काश वह Xान
है ।हमे कोमल फुल के पीछे छूपे हुए काले नाग क@ तरह नह( बनना है ।
हमे कमK, वचन और 3वचार से शुt होना है ।

104. कहे उतना ह! जीतना कर रहे हौ और जो करो वह! कहो।


पMट!करणः आप जीतने हो उससे xयादा महान &दखने क@ को4शश न
कर। अंद:नी और बाहर( तौर पर शुt रहे । आपके वचन और कमv म फकK
पैदा न कर। दोनो को एक ह( रखो। कह वह( जो कर रहे हौ और कर वह(
जो आप कह रहे हो।
80 चदाकाश गीता

105. म ृ यु से पहले जंगल का राता छोडकर राजमागF पर चले। जब


म ृ युशया पर हो तब नकF क3 यातनाओ क3 अनभ
ु ूत होती है । ाण का
अवरोध वात-Lप त-कफ से होता है ।
पMट!करणः सांसाoरक द(वन के आनंद म डूबे मत रहो। जगत आपको
सEचा सुख नह( दे सकता। सांसाoरक जीवन का जंगल मागK याग कर
आमा के राजमागK पर चल। मृ युशšया पर नकK क@ यातनाओं का अनुभव
होगा। ाण को शर(रतव के वात-3पत और कफ से अवरोध पैदा होगा।
अभी के अभी योग का अ…यास कर। जीससे शर(र ये शर(रतव के अवरोधो
वात, 3पत और कफ से मु1त हो जाये। योगा…यास से शर(र शुt हो
जायेगा तो अथाKत वात-3पत-कफ से मु1त होगा तो खास वेदना के ?बना
अंतकाल आयेगा। योग से शर(र का अंद:नी मागK साफ रहता है।

106. आई.सी.एस. (भारतीय नाग`रक सेवा) मE उतीणF होनेवाले


€यि5त क3 सेवा के 'लए अनेक लोग उपिथत होते है लेXकन दै वी मागF
पर चलनेवाले €यि5त से कोई पछ
ू ता नह!ं है । मुि5त का आनंद अवणFनीय
है और वह 5या है वह कोई नह! समझा सकता। सिृ Mट के ारं भ से 'शव
के Sवारा 'सखाया गया धमF 'सफF एक ह! है ।
पMट!करणः लोग जगत के आनंदो म म2त रहते है और अमीरो एवं
शि1तवान लोगो के पास से कुछ ना कुछ लाब ाwत करने क@ को4शश
करते है । ईस4लए उनक@ सेवा करते है । उनके आिमक सुख क@ परवा नह(
होती। परमतव क@ ओर ले जानेवाले रा2ते पर जाने के 4लए कोई ईस
जगत म पछ
ू ता भी नह( है । जगत के भौतक आनंद म म}न और म2त
Fयि1तओं को आVयािमक बातM के 4लए पx
ू यभाव हौता है लेIकन मिु 1त
के परमसुख का आनंद ाwत कर चुका- Fयि1त उसका 3ववरण नह( कर
81 चदाकाश गीता

सकता या उसका 2वाद कैसा है वह नह( कह सकता। वह वणKनातीत है


उसके जैसा कोई आनंद जगत म नह( है । वह सवvतम है । 4शव ने
4सखाया हुआ धमK सिृ 9ट के ारं भ से एक और एक ह( है ।

107. 'शव (ई)वर) के Sवारा द!या गया संघषF, दःु ख आ@द सह! मE
दःु ख नह! है वह हमारे मन क3 ‚मणा है । जब हम प|ृ वी पर आयE तब भी
हमे कुछ समया हुई थी। अंतकाल मE भी होती है । मनुMय माता के गभF
से बाहर आता है तब आंसु आते है ।
पMट!करणः ईqवर हमे मुिqकल और दःु ख दे ते है , जीसक@ वजह से
हमे जगत के आनंद 4मŠया है वह समझ म आता है । ईqवर क@ ओर से
द( जाती मुिqकल और दःु ख हIककत म दःु ख नह(ं है । हमे उससे काIफ
लाभ होता है । 1यMक@ हमार( मान4सक #$तजो का 3वकास होता है । ईन
मुिqकल और दःु खो क@ वजह से ईqवर के त हमार( +tा बढती है । हमे
अनुभव होता है क@ हम हमारा भा}य बनाने म Iकतने असमथK है । ईqवर
क@ ओर से &द जाती मुिqकल और दःु ख हमे नुकसान करते है ऐसा
समझना एक Œमणा है । जम के व1त हमे मुिqकल हुई थी, अंतकाल म
भी मुिqकल होती है । माता के गभK से तब भी आंखे पीडा क@ वजह से
आंसुओ से भर जाती है । यह ाकृतक ‡म जम-मृ यु के साथ जुडा है जो
सूचत करता है क@ जगत म दःु ख के 4सवा कुछ नह( है । ईस जगत म जो
भी सुख &दखाई दे ता है वह चीनी से आवoरत कडवी गोल( क@ तरह है ,
जीसका अंद:नी 2वाद कडवा ह( होता है । ईस4लए मनु9य का परम प3वG
फजK है क@ अपने ह(त म ह( ईqवर के परम सुख का अनुभव कर जो क@
शाqवत है ।
82 चदाकाश गीता

108. सवF 'शव है । :याय और अ:याय दोनो 'शव है । हे मन!


अ:याय का याग कर के :याय मे एकाकार हो जा!
पMट!करणः ईस जगत 4शवमय है । 4शव सवKG है उसके ?बना जगत
संभव नह(। याय और अयाय दोनो का उदभव उसम से होता है ।
हो4शयार Fयि1त जीस तरह राजमागK पर चलता है और कंट(ले मागK का
याग करता है उसी तरह हो4शयार मनु9य याय का राजमागK चन
ु ता है
और अयाय के कं&टले मागK का याग करता है ।

109. “ओमकार” एक और अLJतय है । ओमकार सजFन और LवसजFन


दोनो क3 वजह है । ओमकार “मानस” को नMट करता है । ओमककार हमारे
अंदर बसा हुआ आ मा है । ओमकार अLवभा\य है । Lवबा\य चीज कभी
अLवभा\य बन नह! सकती। 'शवने आ@दकाल से एक ह! धमF 'सखाया है ।
कमरे का दरवाजा बंद करके अंदर बैठे तो बाहर का कुछ @दखाई नह! दे ता
लेXकन कमरा बंध हो तभी जीव का 'शव के साथ वाताFलाप शुi होता है ।
कमरे के दरवाजे खुdले हो तो जीव 'शव से अलग हो जाता है ।
पMट!करणः उEचतम 4स3t के 2तर पर पहुंचा Fयि1त ओमकार के
तेज से का4शत होता है उसके 4लए सब ओमकारमय होता है । ऐसा
Fयि1त के 4लए ओमकार सजKन और 3वसजKन क@ वजह होता है । ओमकार
एक और अ3tतय है । ओमकार चतवृ त का नरोध करता है । ओमकार
वा2तव म मनु9य का आमा है । आ&दकाल से 4शव ने एक रह( धमK
4सखाया है । धमK दो नह( है । सभी धमK का मूल सारांश एक है । कमरे का
दरवाजा बंध करके बैठे तो बाहर( 3वqव का कुछ नह( &दखता। ईिlयो के
दरवाजा खुWले हौ तो जीव 4शव से अलग हो जाता है । ऐसी ि2थत म
आमा के साथ Fयि1त का सहवास संभव नह( होता 1यMक@ हमारा Vयान
83 चदाकाश गीता

सांसाoरक जीवन क@ चीजो म बट जाता है । जब हमारा Vयान आमा म


केिlत हो जाता है तब आमा के दशKन होता है । ईसे 4सt करने के 4लए
हमार( सभी ईिlयM को आमा से जोडनी चा&हए, सांसाoरक जीवन क@
$ुWलक चीजो म नह(।

110. ओमकार अLवभा\य है । ओमकार सज


ृ न है । ओमकार माया है ।
ओमकार Xrया, च त, चेतना, च त क3 चेतना है । च त है वह ईnछा क3
वजह है ।
पMट!करणः Xानी को ओमकार के एकव और अ3tतयता का संपुणK
Xान होता है । “ओमकार” को वह माया, I‡या, मानस, चेतना, Xा के
काश के :प म पहचानता है । उसके &हसाब से सब है । ईEछा क@ मूल
वजह है । चतवृ त का नरोध होता है तो ईEछाएं न9ट होती है । ईस4लए
चत को आमा म एकाकार कर दे ना चा&हए। ईEछार&हत दशा तभी 4सt
हो सकती है ।

111. “सत” एक और अLवभा\य है । वह एक सूoम है , जो क3


अLवनाशी है । च त चंचल है ।
पMट!करणः सय अ3वभाxय है । सत सू[म है , जो अ3वनाशी है । मन
चंचल है । वह ि2थर नह( है । मनु9य का मन एक Vयान हो जाता है तब
दै वी अनुभूत होती है । चत को एक Vयान करने के 4लए योगी अ3वरत
यास करते है । उनके जीवन जंगलो और गुफा म Fयतीत करते है ।

112. जब सत का च त के साथ 'मलन होता है तब आनंद पैदा


होता है । यह आनंद सतचतानंद है और न यानंद है , वह परमानंद है ।
84 चदाकाश गीता

जीव का परमा मा के साथ 'मलन अथाFत आनंद, योगानंद, परमानंद,


सतचतानंद और yzमानंद है ।
पMट!करणः आनंद, सतचदानंद, +ी नयानंद, +ी परमानंद क@ 4स3t
तब होती है जब सत और चत का 4मलन होता है , जीव परमामा के
साथ 4मल जाता है । आनंद, योगानंद, सत चत का 4मलन होता है , जीव
परमामा के साथ 4मल जाता है । आनंद, योगानंद, सत चत आनंद,
Oहमानंद वह कुछ नह( लेIकन जीव का परमामा के साथ 4मलन है ।

113. हमे वह ई)वर के दशFन करने है , जो चदाकाश मE है । हां, हमे


अव)य दशFन करना है । हमे कृMण जो क3 न यानंद-परमसुख के दशFन
करना है । प थर क3 तमाओ को ई)वर समझना वह एक ‚मणा है । 'शव
जो मौत क3 पीडा दे तो वह पीडा नह! है । दःु ख मनुMय के मन क3 ‚मणा
है । हम च त मE बसे ई)वर का तुत गान करE । हमे परyहम जो क3
शा)वत आनंद का रहय है उसका अनुबव करना है । उसे Rदयाकाश मE ढूंढे
और उसे आंतरचkुओ से दे खे। अधोगामी मागV का याग करके मह वपण
ू F
मZयमागF पर आयE। अधोगामी मागF पर वे चलते है जो अपने बाहर! शर!र
को सजाते है लेXकन वे ई)वर के रहयो क नह! समझ सकते।
पMट!करणः ईqवर हमारे अंदर है लेIकन बाहर( जगत म नह(ं है । हमे
चदाकाश मे बसे परमामा के दशKन करने है । कृ9ण शाqवत आनंद के दे व
है । उसके दशKन करने है । कृ9ण ओर कुछ नह( लेIकन हमारा आमा है ।
हमे आमसुख क@ अनुभूत करनी होगी। पथर क@ तमाओं को ईqवर
मानना Œम है । 4शव क@ ओर से &दया जाता मौत का दःु ख हIककत म
दःु ख नह( है । 4शव कुछ भी उदे श के बना कुछ भी नह( करते। जब हमे
आमसुख क@ अनुभू त होती है तब हमे उसके आगे सांसाoरक जीवन के
85 चदाकाश गीता

आनंद Œम लगते है । पूरे 3वqव जो क@ दःु खो से भरा है वह Œम लगता है ।


ईqवर सय है उसके 4सवा सब असय है । हमे हमारे अंदर बसे ईqवर क@
अनुभूत करनी है और हमारे „दय म उनक@ 2तुत करनी है । हमारे चत
म उनक@ 2तुत करनी है । हमे परONम जो क@ शाqवत आनंद का 2Gोत है
उसका रह2य समझना है । हमे उह „दयाकाश म ढूंढना है । हमे उह
आंतरlि9ट से दे खना है , बाहर( lि9ट से नह(ं। जो लोग सू[म बु3t रखते है
उसे ह( उनके दशKन होते है । हमार( 2थुल ईिlयां उनका दशKन नह( कर
सकती। आमा के परमसुख का आमा क@ अनुभूत से आनंद पाना है ।
शर(र और उसको बाहर से सजाने म म}न रहते लोग ईqवर के रह2यो को
समझ नह( सकते और अधोगामी मागK पर चलते है ईस4लए पूरे जीवन म
मो$ ाwत नह( कर सकते।

114. ईस जगत मE कोई च तभंग (पागल – मन पर अंकुशLव@हन)


नह! है ।
पMट!करणः हो4शयार और पागल या मूखK मनु9य म कुछ फकK नह(
है । शु: म सब समझदार होते है । अभी के जो भेद है वे $/णक है । एक
&दन या दस
ू रे &दन अथाKत आज या कल सब लोग मुि1त के राजमागK पर
जायगे और जगत का घना (जंगल() मागK छोड दगे।

115. थुल आनंद का याग करE और सूoम आनंद को ाDत करE ।


भौतक नींद का याग करE और सूoम नींद का अनुभव करE । यह सूoम
नींद सूoम िथत से अनुभूत मE ह! 'मलती है । मन क3 ‚मणाओ को
जलाकर राख कर @दजीये।
86 चदाकाश गीता

पMट!करणः हमे ईqवर के परमसुख का आनंद लेना चा&हए और


जगत के नाशवंत आनंद का याग करना चा&हए। हमे भौतक नींद का
याग करके आंतoरक समाध (सू[म नींद) का आनंद लेना चा&हए। शाqवत
नlा का सदै व आनंद लेना चा&हए। समाध का परमसुख सू[म ि2थत म
ह( 4मलता है । हमे मन क@ Œमणाओं का जलाकर राख कर दे नी चा&हए।
मन Œमणार&हत और शंका से पर होना चा&हए।

116. जीसने य8ोपवीत धारण क3 थी। अथाFत उपनयन संकार Xकये


है वह yाzमण है । हमारे अंदर “उपध” 5या है उसका 8ान ाDत करना
चा@हए। ईnछार@हत होना मतलब आ मा का नीर!kण करना। ईnछार@हत
BिMट से जगत को दे खना। भेद, बLु J का याग करना। “म‘” “तुम” के
Lवचारो को जला दो। नःशंकiप से उसे जला दो।
पMट!करणः जीसने उपनयन सं2कार |हण Iकया है वह सEचा
OाNमण है । सवK म ईqवर के दशKन करना उसे ह( उपनयन कहा जाता है ।
हमने एक lढ मायता खडी करनी है क@ ईqवर सय है और दस
ू रा सब
कुछ असय है । ईEछार&हत होकर हमे चत म आमा क@ शोध करनी
चा&हए तो हम उसे ढूंढ (अनुभव कर) सके। हम ईEछार&हत lि9ट से दे खना
चा&हए। सांसाoरक जीवन क@ बातM म Vयान Fयतीत नह( कर दे ना चा&हए।
भेद lि9ट का याग करना चा&हए। tैतभाव से उपर उठना है । म{ और तुम
के भेद जलाकर सवvतम क@ 4स3t 4मलती है तभी हम ईqवर के साथ
एकाकार हो सकते है ।

117. आ@दकाल से शुi मE 'सफF एक 'शव Sवारा चा`रत एक ह! धमF


था। शुi मE पi
ु ष और jीयv के बीच कोई भैद नह! था। यह भेद 'सफF
87 चदाकाश गीता

थुल iप मE था। सूoम तरे सब एक ह! था। सूoम को कोई गण


ु नह!ं
होते है । सूoम और शा)वत आनंद 'मलता है । सुनना और दे खना एक
मान'सक ‚मणा है । B)य Lव)व नाशवंत है ।
पMट!करणः शु: म 4शव ~वारा 2था3पत और चाoरत एक ह( धमK
था। समय समय पर उसम से बहुत कुछ नकला। शु: म पु:ष और 2Gी
जैसे कोई भेद नह(ं थे। यह भेद 2थुल 2व:प थे। कृत एक 2Gी का
2व:प है और पु:ष वह आ&द अंत3व&हन पु:षोतम भगवान है । सू[म के
कोई गुण नह( होते। वह जात या 4लंग से पर है । पु:ष (आदमी) अपने
अंद:नी गुणो क@ वजह से 2Gी हो सकता है और 2Gी अंद:नी गुणो क@
वजह से पु:ष के जैसी हो सकती है । शर(र से दोनो क@ जात तय नह( हो
सकती। दोनो के बीच का अंद:नी 2वभाव बहुत ह( महवपूणK है । सू[म
4सफK शाqवत आनंद का 3वचार करता है । सुनना और दे खना वह मान4सक
Œमणा है । हमे दे खे और सुने वह $णजीवी है , जो अlqय है वह अ3वनाशी
है ।

118. ह`र वह महादे व नह!ं है । 'शव महादे व है । जीसे “ह`र” कहते है


वह ‚मणा है । हमे परछाŒ से ‚'मत नह! होना है । माया वह ‚मणा है ।
सूoम और थुल के बीच का भेद खडा करना वह ‚मणा ह! है । थूल और
सूoम और थूल से खडी होती ‚मणा एकसमान है । थूल चीजो के Sवारा
खडी होती ‚मणा बहुआयामी होती है । यह चीज उस चीज से अलग है
ऐसा कहना ह! ‚मणा है । यह ‚मणा मानवमन खडी करती है। RSयाकाश
मE BिMट डालE तो शा)वत आनंद क3 ‚मणा होगी। शा)वत आ मा के
RSयाकाश मे दे खे। अव)य दे खE और कहE क3 5या अनुभव होता है । 'सफF
कानो कान सुनी बातE जीसे लोकभाषा मE “अफवा” कहते है वह वातLव5ता
88 चदाकाश गीता

नह!ं है । अफवा या कानो कान सुनी हुई चीजE आनंद नह!ं है । नरं तर
अनुभव से जो अनभ ु ूत होती है वह! शा)वत आनंद है ।
पMट!करणः जीसे हoर कहा जाता है वह Œमणा है । हoर मतलब
माया। माया वह दे व नह(ं है । हमे माया के अधन नह( होना है । 4शव ह(
महादे व है । 4शव मतलब एक अ3वभाxय, अ3tतय, सावK?Gक, वह( ईqवर
है । Xानी श]दो के भेद भूल जाते है । वे अपनी म2ती और ईEछा के
अनुसार श]दो का अथKघटन करते है । यहां “हoर” श]द का अथK माया है ।
हम माया क@ Œमणाओ से बु3tŒ9ट नह( होना है । जो परछाई है वह माया
है । Œमणाओ से बु3tŒ9ट नह( होना है । जो परछाई है वह माया है । Œमणा
जो क@ 2थूल और सू[म से खडी होती है वह एकसमान है । दोनो के बीच
यह फकK यह है क@ 2थूल चीजो क@ Œमणा अ3वनाशी के 4लए है । 2थूल
चीजो क@ Œमणा नाशवंत के 4लए है । सू[म चीजो क@ Œमणा बहुआयामी
बहु&दशावाल( होती है । हमारा Vयान सांसाoरक बातो म अटका हो तब
बीखरा होता है लेIकन जब वह आमा पर केl(त होता है तब एककेl(
हो जाती है । यह चीज उस चीज से अलग है ऐसा कहना वह( Œमणा है ।
यह Œमणा क@ वजह से दो चीजे होने का अहे सास होता है अयथा सब
कुछ एक ह( है । Œमणा उपि2थत होने क@ वजह मन है । मन का नाश
Iकया जाये अथाKत मन म पैदा होती ईEछाओ को न9ट कर &दया जाये तो
Œमणा अतीत के 3वषय बन जाती है । हे मनु9य (भूतकाल) चदाकाश म
दे खो और यह दे ख क@ शाqवत आनंद 1या है । आंतरlि9ट से दे खो और
शाqवत आनंद को ाwत कर। बताएं क@ 1या अनभ
ु व होता है । 4सफK दस
ू रो
के मुंह से कह(-सुनी बातो से चचाK न कर। कानोकान कह( बात हIककत
89 चदाकाश गीता

नह(ं है । अफवा परमसुख परमानंद नह(ं है । अनुभूत, बारबार होती अनुभूत


वह( हIककत है । अयथा ओर कुछ नह(ं।

119. अपनेआप का अनुभव करE । अ:य को दे खE और अपनेआप को


दे खो उसे अलग मानो तो वह ‚मणा है । अ:य €यि5त के साथ खुद क3
पहचान करE और आप के अंदर जो Lवशेषता है उसका अनभ
ु व करE । आप
दोनो क3 अलग पहचान क3 चचाF न करE लेXकन उस कार से काम भी
करE । आप बाहर! BिMट से दे खते है उसका कोई उपयोग नह!ं है । मौत के
व5त अलग होने क3 भावना पीडा क3 वजह बन सकती है ।
आप अपनेआप क@ अनभ
ू ूत कर और tैतभाव का नाश करो। जब
आप दस
ू रो को और अपनेआप को अलग माने तब Œमणा उपन होती है ।
दस
ू रो के साथ आपक@ तुलना करो। आपक@ Œमणाएं न9ट हो जायेगी।
आमा को पहचान के आप म बसी 3वशेषताओं को पहचानीए। आप आपक@
खास पहचान क@ चचाK कर वह पयाKwत नह( है । आपको उसके अनुसार कायK
करना है । 4सफK मौ/खक याघात दे ना पयाKwत नह( है । अ…यास जCर( है ।
बाहर( च$ुओ से दे खना कुछ काम का नह( हे । ईqवर 4सफK आंतoरक
च$ुओ से &दखाई दे ते है ।

120. मौत के व5त ऊZवF सांस अथाFत उपर क3 ओर BिMट मौत के


समय करनी वह है । ऊZवF सांस अLवभा\य है । यह परमसुख है । यह सूoम
है , शा)वत है । ऊZवF सांस मE गाय के जैसी आवाझ नह! होती। हे 'शव,
आप कृपा करE और हमE तालबJ होकर ाणायम करने का बल दान करE ।
च त मE Zयान करना चा@हए। शा)वत सुख के सागर पर चंतन करना
चा@हए। ईडा मE चंतन करE , Lपंगला मE चंतन करE , सुष
ु ना मE चंतन करE ।
90 चदाकाश गीता

कंु ड'लनी जागृ त का आनंद ाDत करE । ऊठE , तील! माचस क3 पेट! मE है ।
ईस तील! मE काश है । तल! को घसे और अि^न को \\व'लत करE ।
अ8ान अंधकार है , 8ान काश है । कंु डल!नी शा)वत सुख है । वह अव)य
शा)वत सुख है । शा)वत सुख Rदय मE है । अनंत काश अथाFत कंु ड'लनी।
कंु ड'लनी yzमा का काश है । सूय
F काश सूoम काश है । सुष
ु ना मतलब
सूयF नाडी। ईडा मतलब चंB नाडी। Lपंगला तारा ('सतारा) नाडी है । तत
ृ ीय
आंख का बैठना 8ान के 'लए है । ईस नाडी मE 8ान है । ईस नाडी मE
सुषिु Dत-8ान नBा है । ईस नBा मE जागृ त नह! होती। ईस नBा का आनंद
ाDत करE । यह सांस स य मE िथर होता है । वह चदाकाश है । अंदiनी
आकाश मE शा)वत सुख का 'मनार (तंभ) है । यह तंभ वह शांत क3
बैठक है । अपना नBा मE सभान नBा का सुख ाDत करE । यह पशु नBा
नह! है , यह मनुMय क3 नBा है । ईस नBा का आनंद ाDत कर’, जो
मनुMय जीवन का Zयेय और उसका अंत है । @द€य चkु क3 आZयाि मक
नBा का लु“त उठायE, बोलते, बैठते और वह भी क3सी ईnछा के Yबना
LवचारLव@हन दशा मE ईस @द€य नBा का आनंद ाDत करE । सांस, नBा
दोनो पर Zयान के:B!त करE । आंतर और बाहर! सांस से ाकृतक जप करE ।
मन से – च त से सूoम भि5त करE , अव)य करे । बंधन मुि5त 'सJ करE ।
नरं तर भि5त-अवरोधLव@हन भि5त, नरं तर उपर और नीचे सांस ले। उपर
क3 ओर सांस लेना वह परू क है । सांस को रोकना-नरोध मतलब कंु भक।
जीसमE होता ई)वरदशFन ह! सवसवाF है । भेदबLु J मतलब मै और तुम का
भेद अंतकाल मE पीडाकारक होगा। ईस चीज क3 अनुभूत करने के 'लए
आपको थोडा वाथI होना पडेगा। यह वाथI भाव अथाFत भेदबLु J, लोभबLु J
अंतकाल मE पीडा क3 वजह बनती है । यह लोभवृ त क3 वजह से मौत के
91 चदाकाश गीता

व5त जगत छोडने मE आप @हचXकचायEगे। कंु भक अथाFत सह! बैठना। सांस


बाहर नकालना मतलब रे चक। सांस अंदर ले तब जैसे कूएं मE से पानी
खींच रहे है ऐसी अनुभू त होनी चा@हए। च त (मन) मE yzमरं ‡ तक सांस
{खंचे। ऐसे गहर! सांसो से 8ानाि^न के \जव'लत करE । नाडीयv को शJ

करE । तीन दोषो वात, Lप त और कफ को जला दो। LववेकबLु J एक योग
नBा है । जो वै)वानर अि^न है । जो अ:नपाचन का कायF करता है । यह
Lववेक वह सूय
F काश है । ई)वर सूoम शि5त के *प मE yzमांड मE फैला
हुआ है । सज
ृ न मनुMय द!माग क3 आशंकाओ मE से पैदा होता है । सज
ृ न वह
च तचोर क3 वजह है । जब ऊZवF सांस ऊZवF BिMट क3 िथत ाDत होती
है तब सिृ Mट का अित व मीट जाता है ।
पMट!करणः मौत के समय Fयि1त म शार(oरक शि1त $ीण हो जाती
है तब ाण ऊVवK सांस लेता है। ईसे अं|ेजी म सेम साईटे डनेस कहते है ।
जीस तरह मनु9य के 4लए दे हयाग के व1त ONमरं  म सांस खींचना
जCर( है उसी तरह मुि1त के 4लए ऊVवK सांस आवqयक है । ईस4लए ऊVवK
सांस क@ ऊVवK lि9ट के साथ तुलना होती है । ऊVवK lि9ट अ3वभाxय है
और शाqवत सुख क@ जडे है । जब हम ऊVवK सांस लेते है तब क@सी कार
का गाय क@ आवाझ जैसी आवाझ नह( होता। हे 4शव आप क@ अनय कृपा
से नरं तर योगा…यास का बल दान कर। आपक@ कृपा से हम मुि1त
ाwतो हो। हम चत म Vयान करते रह। हम चत म परमानंद का Vयान
करते रहना है । हमे ईडा, 3पंगला और सुषD
ु ना म Vयान करते रहना है ।
आपक@ कृपा से ईस4लए चत म Vयान करके सफलता ाwत कर सक।
नाडी जागरण से कंु ड4लनी 4सt कर। कंु ड4लनी क@ अंद:नी शि1त का
जागरण होता है । कंु ड4लनी सह2Gार म वेश करे । तील( पेट( म है । तील(
92 चदाकाश गीता

नकालकर पेटे के साथ घसे। बु3t माचस बो1स है । 3ववेक तील( है ।


3ववेक को बु3t के साथ घसने से Xानकाश पैदा होते है । अXान वह
अंधकार है । Xान काश है । कंु ड4लनी शाqवत शि1त है । कंु ड4लनी परमसुख
है । शाqवतसुख है । मनु9य के „दय म है । अनंत काश मतलब कंु ड4लनी।
कंु ड4लनी ONमकाश है । कंु ड4लनी का काश सूयK के काश जैसा है ।
मानवशर(र म सुषD
ु ना नाडी सूयK नाडी है । चंl नाडी मतलब ईडा नाडी और
तारा नाडी, 3पंगला नाडी है । ŒमूVया म तत
ृ ीय आंख है । यहां Xान के बैठक
है । यह तत
ृ ीय आंख म Xान नlा है , जीसे च$ुयम कहा जाता है । यह
नlा म क@सी कार क@ जागृ त चेतना नह( होती। यह नlा का आनंद
ाwत कर। ाण और अपान को सम करके सू[म नlा का आनंद ाwत
करे । शाqवत सुख मतलब समाध का आनंद ाwत कर। सांस जहां अटकती
है वहां सय का 2थान है । चदाकाश म सय का 2थान है और वह
शाqवत सुख का 4मनार (2तंभ) है । वह( शाqवत शांत 2तंभ है । शाqवत
शांत और शाqवत सुख चदाकाश म एकाकार होने से है । शाqवत सुख क@
अनुभूत वह मनु9य के जीवन का ल[य है । हम समाध क@ सू[म नlा
का अनुभव कर। 2थूल नlा का याग करके सू[म नlा का अनुभव कर।
यह नlा पशु नlा नह( है वह मानव नlा है । वह नlा मानवजीवन का
ल$ और अंत भी है । हम &दFयच$ु क@ नlा, जीसे उपनयन कहा जाता है
वह लेनी है । ऊठते, बैठते 3वचार3व&हन, ईEछा3व&हन दशा म यह सू[म
नlा का आनंद ाwत करते रह। समाध नlा का आनंद ाwत करने के
4लए हमारा Vयान सांसो पर केl(त करना है । हम जप करते है उसी तरह
तालबt तर(के से हमार( सांसे अंदर-बाहर करते रहना है और सांसो क@
गत पर नरं तर Vयान रखना है । हमार( भि1त वह मन क@ भि1त होनी
93 चदाकाश गीता

चा&हए। नरं तर भि1त से हमे बंधनमुि1त ाwत करनी है । हमे ाणायाम


नरं तर करते रहना है । अंदर सांस लेना उसे कंु भक कहा जाता है । सांस
बाहर नकालना उसे रे चक कहते है । कंु भक से हमारे अंदर बसी सपK जैसी
शि1त, जीसे कंु ड4लनी शि1त कहा जाता है वह जागत
ृ होती है । कंु ड4लनी
यह सू[म नlा से जागत
ृ होती है और चत म रहे सह2Gार क@ ओर गत
करती है । हमार( सांस लेने क@ I‡या कुएं म से पानी खींचने क@ तरह होनी
चा&हए। ईस कार क@ qवसन I‡या हमारे अंदर Xान का उदय करे गी। ईस
तरह क@ qवसनI‡या से हमार( नाडीयां शुt होगी। हमारे जीवरस के तीन
तव – वात, 3पत और कफ क@ शु3t होगी और नयंGण होगा। Xान क@
शि1त पैदा होने से 3ववेकबु3t 3वक4सत होती है । यह Xानशि1त एक
योगा…यास का पoरणाम है । यह Xानाि}न वह हमारे शर(र म आहार का
पाचन करता वैqवानर अि}न है । 3ववेकबु3t सूयK के काश जैसी होनी
चा&हए। ऐसे 3ववेक से सम| ONमांड म ईqवर क@ उपि2थत का सू[म
शि1त 2व:प से अनुभव कर सकते है । मन क@ Œमणाओ क@ वजह से हम
ONमांड को अपने से अलग समझते है । मन क@ शंकाए-Œमणाएं न हो तो
हम ONमांड-ईqवर के साथ एकाकार हो जाये। सिृ 9ट का सज
ृ न मानलमन
क@ माया क@ वजह है । जब हम सांस क@ ऊVवK गत ाwत कर तब सिृ 9ट
हमसे अलग है ऐसी अनुभूत चल( जाती है तब सिृ 9ट और ईqवर एक हो
जाता है और याग एकाकार रहता है , जीसे कोई पयाKय, दस
ू रा सम आकार
नह( होता।

121. सूoम िथत चल और अचल दोनो रातो के 'लए सामा:य है।


फकF 'सफF कृत का है । फकF 'सफF ‚मणा है फकF 'सफF शर!र का है ।
शर!र नाशवंत है । कृत kणजीवी है । जब सूoम क3 अनुभूत थूल मE हो
94 चदाकाश गीता

उस िथत को मोk कहते है । मुि5त चदाकाश मE है । मुि5त अLवभा\य


है । चदाकाश मE ह! 'शव'लंग है । यह सहअित व है । उसे ाणो का
राजकंु वर कहा जाता है । ऊZवFगामी सांस को योग मE ाण कहा जाता है ।
ाण एक है । ाण सवF मE एक है । ाण अित व है । यह 8ान ाणायाम
और योगाTयास नि)चत करता है । उसे होता है । ईnछा के बंधनो से बंधे
हुए को ईस बात का 8ान नह! है । ईnछा के बंधनो ईस'लए ह! छोड दो
और मोk 'सJ करो। एक त व-परमा मा क3 'सLJ ाDत करE । आंतरचkु
से परमा मा के दशFन करो। ऐसा मनुMय अनुभव करता है क3 उसमE ई)वर
है और ई)वर मE वह है । जगत मE अटका मन िथर नह! होता। चदाकाश
मE रहते 'शव एक और चरं तन है । 'शव ओमकार है , ओमकार णव है ।
अलग अलग वiप के साथ एकाकार हो जाये उसे णव कहा जाता है ।
ओमकार थूल शर!र क3 अन:यता है ।
पMट!करणः चल और अचल दोनो चीजो के 4लए सू[म ि2थत
एकसमान है । दोनो के बीच 4सफK कृत का फकK है । चल और अचल चीजो
के बीच का फकK शर(र का है , नाशवंत है । यह फकK 4सफK $णजीवी है । जब
आमा का सा$ाकार होता जाता है तब सब एकसमान लगता है । शर(र
जो नाशवंत है उसका फकK $णजीवी है । मो$ वह है जो सू[म क@ 2थूल म
अनुभूत करना वह है । जब अंधकार म काश के दशKन होते है , असय म
सय के दशKन हो, नाशवंत म अ3वनाशी के दशKन Iकये जाये तब मो$
4सt होता है । मो$ अ3वभाxय है । चदाकाश म जीव का 4शव के साथ
4मलन होता है तब मो$ 4मलता है । जीसे 4शव4लंग कहा जाता है वह
चदाकाश म है । यह 2वअि2तव है । ाणो का राजकंु वर कहा जाता है ।
ऊVवKगामी सांस है । शर(र म सब से xयादा महवपूणK शि1त ाण है । ाण
95 चदाकाश गीता

एक है । वह सवK म है । ाण एक अि2तव है । जीस लोगोने


आमसा$ाकार Iकया है उह ह( ईस बात का Xान होता है। जगत क@
ईEछाओ म मशगूल Fयि1तओ को यह अनुभव नह(ं होता। ईEछाओ के
आवरण क@ वजह से वे आमसा$ाकार नह( कर सकते। ईस4लए ह(
आमसा$ाकार 4सt करने के 4लए ईEछाओ के बंधनो से मु1त हो जाना
चा&हए और शाqवत सय 4सt करना चा&हए। हमे एक ह( तव 4सt
करना है वह है परमामा। आंतरच$ु से परमामा का दशKन करना चा&हए।
ईqवर सू[मबु3t जीसक@ जागत
ृ है उसे ह( &दखते है । ईqवर सा$ाकार 4सt
करनेवाले Fयि1त ईqवर को उसम और ईqवर म अपनेआप को दे खते है ।
वह एक ऐसी शि1त का 3वकास करता है । क@ जो ONमांड को नयं?Gत
करता है । ईस4लए ह( उसे अनभ
ु व होता है क@ ONमांड उसम है और वह
ONमांड म है । मन जगत म और ईEछाओं म अटका हो तो वह ि2थर नह(
होता। ऐसा मन मरकट जैसा होता है । मन को ि2थर करने के 4लए
4शवमय कर दे ना चा&हए। 4शव जो क@ चदाकाश म रहता है वह एक और
चरं तन है । 4शव ओमकार है । जब हम सवvतम को 4सt करते है । हम
अनुभव करते है क@ ओमकार सिृ 9ट का ारं भ और अंत बनता है । ईस4लए
ह( ओमकार को 4शव कहते है । ओमकार जब 3व3वध 2व:प म होता है तब
णव कहा जाता है । ओमकार मतलब शर(र क@ अभानता का अनुभव।
ओमकार क@सी चीज के साथ बंधा हुआ नह( है । वह सवK जगत का सा$ी
है ।

122. “ओमकार” जगत मE &ेMठ है । ओमकार एक सूयF के उदगम के


समान जैसा है । ओमकार जगत का साkी है । ओमकार जगत के सभी
त वो मE डरावना है । ओमकार अि^न है । यह yzमांड क3 अि^न जैसी अि^न
96 चदाकाश गीता

नह!ं। यह अि^न आंत`रक और बाहर! दोनो तरह €याDत है । यह अि^न के


मZय मE प|ृ वी है । प|ृ वी नीचे है , वायु उपर है । वायु yzमांड मे €याDत है ।
yzमांड वायु है । थम वायु और बाद मE अि^न। थम Lववेक और बाद मE
नाद। नादर@हत दशा वायु वiप मE होती है । नादर@हत दशा शा)वत आनंद
है । वह अित व-8ान-सुख है । (आ मा) को नादर@हत दशा मE म^न कर
दे ना चा@हए। B)य Lव)व आ मा मE है । जब सत और च त 'मलते है तब
आनंद क3 अनभ
ु ूत होती है । यह आनंद वह Lववेक-आनंद, चैत:य-आनंद,
&ी yzमानंद, योग8ान-काल8ान। यह Yjकाल 8ान Rदयाकाश मE है । मुि5त
Rदयाकाश मE है । न य-आनंद मुि5त Rदयाकाश मE है ।
पMट!करणः ओमकार जगत म +े9ठ है । ओमकार सिृ 9ट का मूल
रह2य है । ओमकार सूयK के उदगम जैसा है । ओमकार जगत का सा$ी है ।
ओमकार वह सवvतम शि1त है , जो संपूणK नवृ त क@ क$ा पर 4मलता
है । ओमकार कोई भी चीज का कताK नह( है और कारक भी नह( है ।
ओमकार अि}न 2व:प म सारे ONमांड म Fयाwत है । अि}न2व:प ओमकार
भयावह है । ईस जगत म ओमकार के अि}न 2व:प से xयादा भयानक
2व:प कोई और नह( है । अि}न अंद:नी और बाहर क@ ओर दोनो ओर है ।
पŠृ वी दोनो के बीच म है । पŠृ वी नीचे है , वायु उपर है । वायु ONमांड म
Fयाwत है । थम वायु बाद म अि}न। ?बना वायु हम दु नया मे एक पल
भी जी नह( सकते। अि}न वायु के बाद महव रखता है । उसी तरह 3ववेक
वह हमारे 4लए ारं 4भक :प से महवपूणK है । 3ववेक के बाद नाद आता है ।
ईस 3ववेक से ह( हम सू[म का अनुभव करते है । नादर&हत दशा ह( वायु
का 2व:प है । नादर&हत दशा वह शाqवत सुख है । यह Xान-अि2तव-सुख
है । आVयाम के उEचतम 2तर पर परम सय क@ अनुभूत हो तब ईन
97 चदाकाश गीता

तीनो चीजो का अनभ


ु व होता है । आमा को नादर&हत दशा म ल(न कर दो
मतलब आमा को उEचतम ONम म ल(न करो। यह शि1त जो क@ lqय
3वqव को नयं?Gत करती है । वह( आमा है । ईस4लए lqय 3वqव आमा म
है । सत चत के साथ 4मलता है तब आनंद क@ अनुभूत होती है । ईस
आनंद को ह( 3ववेक-आनंद, चैतय-आनंद, +ी ONमानंद, परमानंद, +ी
नय-आनंद और सत-चत आनंद कहते है । आनंद क@ अनुभूत ह(
मानवव है । मानवजीवन का ल[य और अंत वह( परमसुख क@ अनुभूत
है । यह ONमXान है । यह योगXान है , जीसे कालXान कहते है । काल
मतलब भूत, वतKमान और भ3व9य का Xान। यह ?Gकाल Xान „~याकाश
म है । ?Gकाल Xान क@ बैठक „दयाकाश म है । वह „दयाकाश जो क@ शर(र
म नीचे नह(ं लेIकन चत म है । यह( „दय म मुि1त है । नयानंद
मुि1त „दयाकाश म है । हम मुि1त तभी 4सt कर सकते है जब मन म
बसे चदाकाश के साथ एक होने से मुि1त 4मल सके।

123. भि5त अथाFत “ेम”। लोगो को अ:नदान दे ना भि5त नह!ं है ।


वह मन क3 ‚मणा है । वह शर!र संबंधी बात है । आहार और पीना सूoम
होना चा@हए। शांत वह जल है । योग-आनंद मतलब शांत के जल पर
बैठना। ओ च त! सांसा`रक जीवन के आनंदो का याग कर के और
शा)वत आनंद का सुख ले। सांसा`रक आनंद का याग और शा)वत आनंद
क3 अनुभूत। ओ च त! Rदय मE बसो। सह! आनंद Rदयाकाश है । आनंद,
जीसे मुि5त कहा जाता है उसका आनंद लो! उसी मE मत रहो।
आंतरजगत मE वेश करो और बाहर! जगत का याग करो। हे च त!
तत
ृ ीय दै वी आंखे खोलो! दस
ू र! कोई चीज का Lवचार न करE । जगत को
ऊZवFगामी BिMट से साkीभाव से दे खो।
98 चदाकाश गीता

पMट!करणः भि1त मतलब 2वाथKह(न ईqवर ेम। अय को अनदान


या खुद खाना वह भि1त नह( है । वह मन क@ Œमणा है । भि1त अंद:नी
हो लेIकन बाहर( नह( होनी चा&हए। आहार शर(र संबंधी बात है । 2थुल
आहार का याग करके सू[म आहार-पीना शु: करना चा&हए। सू[म आहार
और पीने से आंतरभि1त का 3वकास होता है । अगर शांत क@ तुलना जल
के साथ हो तो शांत के जल पर बैठना मतलब योगानंद। योगानंद ऐसा
परमसुख है , जो परमशांत का पoरणाम है । हे चत! ईस4लए तुम
सांसाoरक आनंद का याग करके शाqवत आनंद ाwत करो। शाqवत आनंद
म एकाकार हो जाओ। हे मन! „दयाकाश म आमा को ढूढो। „दयाकाश म
बसे उस आनंद को ाwत करे , जीसे मुि1त कहा जाता है । सह( आनंद „दय
म है । 2थुल का याग करके स[
ू म का आनंद ल। तत
ृ ीय दै वी च$ु खोलकर
Xानच$ु से दे खो। अय सांसाoरक चीजM का 3वचार न करके ऊVवK lि9ट से
सा$ीभाव से जगत को दे खो।

124. “जप” अंगल


ु ! पर गनकर Xकया जाये, उसे जप नह! कह
सकते। जप जीzवा से भी नह! होते। “'शव” मन से 'सJ न हो। हाथ से
कमF न हो, कमF पांव से भी नह!ं होते। हे च त! कमF अव)य करो लेXकन
माया-बंधनर@हत होकर। ईnछार@हत होकर जगत को दे खो!
पMट!करणः अंगुल( पर गने जाये उसे जप नह( कहते। िजNवा से हो
वह भी जप नह( है । जप मन से न9ठा से आंतरभाव से Iकये जाये तो ह(
सह( है । सह( Vयान सEचे जप है । जप को बाहर( I‡याओ के साथ संबंध
नह( है । वह पण
ू :
K प से अंद:नी चीज है । 4शव 2थूल चत से नह(ं 4मलते।
“4शव” सू[म 3ववेक से 4सt Iकया जा सकता है । कमK हाथ या पांव से नह(ं
99 चदाकाश गीता

होते। कमK सा$ीभाव से हो तो ह( उसे कमK कहा जाता है । जगत क@ बातो


म माया मत रखो।

125. मन क3 नन वृ तयां Lवचारह!न होती है । ऐसी Lवचारह!न दशा


शूBता है । दस
ू रो क3 नंदा करना, मजाक उडाना, दं भ, अ'भमान, ईMयाF सभी
शूB गण
ु है । जीसे काल! वचा होती है , जीसके वj काले हो वह शूB नह!
है । मनुMय पघडी पहने, हाथ मE घडी पहनता है वह शूB है । अगर वो दस
ू रो
को समानता से दे खे नह!ं, धनवान शूB नह! लेXकन वाथF और भेद से भरा
मानवी शूB है । वह मनुMय मानव नह!ं है , िजसने वेदांत के स यो का
अनुभव नह! Xकया है । जीवन के दौरान मुि5त मतलब ऐसा वेदांत जो क3
'श”kत अ)व जैसा हो! जंगल! हाथी जैसा वेदांत मिु 5त नह! बdक3 ‚मणा
है ।
पMट!करणः 3वचारह(नता मानवमन क@ शूlता है । 3वचारह(नता वह
हमार( शूlता है । हमे उसका याग करना चा&हए। दस
ू रो क@ मजाक उडाना,
दं भ, अ4भमान, ई9याK ये सब मन के शूl गुण है । काल( चमडीवाला, काले
व2Gवाला लेIकन „दय से शुt मनु9य शूl नह( है । पघडी पहननेवाला या
सोने क@ घडी हाथ म पहननेवाला मनु9य अय म समानता न दे ख तो वह
शूl है । हमार( शूlता शर(र क@ बाNय ि2थत के उपर नभKर नह( है लेIकन
„दय क@ शुtता पर है । बाहर( आवरणो का मानवी क@ अंद:नी ि2थत से
कोई लेनादे ना नह( है । िजसे वेदांत का सय नह( समझना है वह मनु9य
नह( है । मनु9य को मानव बनने के 4लए खुद 1या है वह समझना चा&हए।
उसे आमसा$ाकार करना चा&हए। मनु9य के जीवन काल के दौरान सEची
मुि1त ऐसा वेदांत है क@ वह 4श#$त अqव जैसा हो। जंगल( पागल हाथी
100 चदाकाश गीता

जैसा वेदांत नह(ं लेIकन Œमणा है । मुि1त अगर 4सt होती है तो मनु9य
(चत) को 4श#$त अqव जैसा बनाता है ।

126. वाथI द!माग चंचल होता है । सूoम Lववेक क3 वजह से


िथरता आती है । सिृ Mट मतलब शांत। सिृ Mट मतलब साkीभाव। सिृ Mट
मतलब सूoम Lववेक। सूoम Lववेक से तंदरु ती दे नेवाला संतोष ाDत होता
है । सूoम Lववेक मतलब मुि5त का बीज। जादLु वSया-हाथ क3 करामात क3
शि5त से उपर नह!ं है । हाथ क3 करामात-शि5त के उपर नभFर है । हाथ क3
करामात मन क3 ‚मणा है । शि5त आ मा से आती है । सूoम Lववेक वह
सह! बLु J है । शि5त वह सह! अथF मE सूoम Lववेक है ।
पMट!करणः 2वाथ‰ द(माग ि2थर नह(ं होता। वह चंचल है । सू[म
3ववेक ि2थर होता है । सिृ 9ट मतलब शांत और सा$ीभाव। हमे शांत 1या
है उसक@ अनभ
ु ूत होनी चा&हए। हमे सा$ीभाव कैसे रहना वह सीखना
चा&हए। सा$ीभाव से रहना मतलब जगत के बंधनो से अलग रहना। सू[म
3ववेक हमे संतोष दे ता है , जीससे हमारा 2वा2Šय अEछा रहता है । सू[म
3ववेक है वह मुि1त का बीज है । मुि1त ाwत करने के 4लए सू[म 3ववेक
जCर( है । युि1त-हाथ क@ करामात शि1त से पर नह(ं है । युि1त-हाथ क@
करामात मन क@ Œमणा है । शि1त आमा से 4मलती है । बु3t मतलब
सू[म 3ववेक। शि1त मतलब सयाथK म सू[म 3ववेक।

127. थूल आंखो से हम दे खते है वह थूल बLु J है । बाहर! जगत मE


जो @दखता है वह थूल 8ा है । आंतरदशFन मE ‘ह`र’ (माया) नह!ं है । जो
101 चदाकाश गीता

B)य है वह 'शव नह!ं है । चदाकाश मE जो @दखता है वह ई)वर नह!ं है ।


'शव मE माया है , लेXकन माया मE 'शव नह!ं है ।
पMट!करणः 2थूल आंखो से हम दे खते है वह ि2थर बु3t है और वह
बाNयजगत म &दखती है । हमे आंतरमन म जो दे खते है वह माया नह(ं है ।
जो &दखता है वह 4शव नह(ं है । 4शव वह है जो एक और अlqय है । हमारे
आंतरमन म जो दे खते है वह 2थूल ONमांड नह( है । सू[म ONम है । माया
का जम2थान चत है । माया म 4शव नह(ं है , लेIकन 4शव म माया है
वैसे ह( माया म 4शव नह(ं ।

128. सूoम बLु J अथाFत 8ान। आंतरZयान जो है वह एकके:B! होता


है । थूल बLु J है वह ऐसे अ)व जैसी है िजसको लगाम से नयंYjत नह!
कर सकते। अ:य से ाDत हुई बLु J थायी नह! होती। वह माया भी नह!ं
है । और 'शव भी नह! है । गi
ु से जो 'मलता है वह! सnचा 8ान है और
वह सूoम Lववेक है । वह कदाLप थूल नह! होता वह मानवी मानव नह! है
जो खुदने ाDत Xकया हुआ 8ान अ:य को नह!ं दे ता।
पMट!करणः सू[म बु3t ह( सEची ब3ु t है या Xान है । अंद:नी Vयान
या मन क@ एक केl( ि2थत है । 2थूल बु3t ि2थर नह(। 2थूल बु3t
अपनी चंचलता क@ वजह से सांसाoरक जीवन के आनंद म यहां वहां दोडती
रहती है , वह एक ऐसे अqव जेसी है िजसे लगाम से नयं?Gत नह( कर
सकते। अय से ाwत बु3t 2थायी नह( होती। वह $णजीवी है । यह बु3t
माया नह( है । वह 4शव नह(ं है । 4शव और माया अ3वनाशी है। सू[म बु3t
ग:
ु से ाwत होती है । यह ब3ु t कभी 2थूल नह( होती। ग:
ु अपने 4श9य
को ऐसा Xान दे ता है क@ उसे ईqवर सा$ाकार हो। 2थूल ब3ु t पाशवी
होती है । वह पशुओ के 4लए यो}य होती है , मानवी के 4लए नह(। वह
102 चदाकाश गीता

मानवी मानव नह(ं है , जो खुद को 4मला हुआ वा3पस न द। ईqवरने हम


आमा &दया है तो हमारा फझK है क@ वह हम उसे वा3पस कर। अभी संभव
हो क@ हम परONम के साथ एकाकार हो जाये। मनु9य को मानव बनने के
4लए परOहम के साथ एकाकार हो जाना है ।

129. िजस मानव को अपने जीवन का लoय पता नह! वह पशु


समान है । यह लoय मतलब ईnछार@हत दशा। ईस हXककत से अ8ान
€यि5त मनुMय नह! है । मनुMय ई)वर क3 सिृ Mट का सरताज और &ेMठ
सजFन है । मनुMय को मैढक जैसा बनना है जो पानी क3 सतह पर बारबार
उपर नीचे होता रहे । मनुMय क3 तुलना मैढक के साथ नह! हो सकती। हमे
मनुMय जीवन बारबार नह! 'मलेगा। हमे जो मनुMयजीवन 'मला है उसमे
लoय 'सLJ के 'लए यास करने चा@हए। भोजन तभी 'मलता है जब
पकाया जाता है । Lववेक अि^न है । बLु J वह बरतन है और मुि5त जीवन
का लoय है ।
पMट!करणः जीस मानवी को अपना जीवन ल[य पता नह( वह पशु
समान है । जीवन का ल[य मतलब ईEछार&हत दशा। इस हIककत से
अXान Fयि1त मनु9य नह( है । मुि1त ईEछार&हत दशा के ?बना 4सt नह(
होती। मनु9य ईqवर क@ सिृ 9ट का +े9ठ सजKन है । उसे म{ढक क@ तरह पानी
क@ सतह पर उपर-नीचे नह( होना है । हमे &दFयता के नमKल जल म तरते
रहना है । +े9ठ मनु9यजीवन क@ कभी म{ढक के साथ तुलना नह( क@ जा
सकती। हमे जो मनु9यजीवन 4मला है उसम ईqवर का सा$ाकार का ल[य
4सt करना हमारा फझK है , जीस तरह पकाने के बाद ह( भोजन तैयार होता
है उसी तरह मुि1त भी न9ठापव
ू क
K के यासो के ?बना 4सt नह( होती।
3ववेक क@ अि}न के साथ तुलना हो सकती है । ब3ु t क@ बरतन के साथ।
103 चदाकाश गीता

ईन दोनो के ?बना आहार नह( बना सकते। मुि1त क@ 4स3t के 4लए 3ववेक
और बु3t महवपूणK आवqय1ताएं है । मुि1त तैयार हुआ भोजन है ।

130. च त आ मा का बसेरा है । मिु 5त शा)वत बसेरा है । ‘ओमकार’


मतलब मुि5त। यह बसेरा वiपह!न और अप`रवतFनीय है । वह अLवभा\य
है । भLवMय सुखमय नह! है । वतFमान सुखमय है । आनेवाला कल या बाद के
@दन है ह! नह!। घडी क3 सूईयो मे @दखता समय सह! मE समय नह! है ।
‘वतFमान’ ह! सह! समय है । अLवभा\य समय जीसे Lववेक से अनुभव Xकया
जा सकता है वह! सnचा समय है । जीवनलk को भूलकर €यतीत होता
समय नरथFक है ।
पMट!करणः ओमकार एक बसेरा है । जो शाqवत बसेरा है । ओमकार
2व:पह(न है । ओमकार अ3वभाxय है । हमे ओमकार क@ 4स3t वरा से
करनी चा&हए। भा3व निqचत नह(ं है । आज का &दन ह( सुनहरा है ।
आनेवाला कल – परसो का कोई भरोसा नह( है । घडी क@ सूईयो से &दखता
समय सह( समय नह(ं है । हमे मुि1त के यासो के 4लए समय Fयतीत
नह( करना चा&हए। मानवजीवन $णजीवी है और समय 4सफK वतKमान म
ह( है । जीवन के ल[य को 4सt करने के 4लए Fयतीत हुआ समय ह( सह(
म उपयोग म आता है ।

131. मुि5त का थान गोकुलनंदन, गोवधFन गोकुल मE है । तीसरा नेj


गोकुल है । आंतरचkु गोकुल है । वह मथुरा और वह! वंद
ृ ावन।
पMट!करणः चदाकाश मतलब गोकुल नंदन, गोवधKन या हम म बसा
‘गोकुल’। चेतना का आकाश के साथ एक होने से हम ONम का सा$ाकार
104 चदाकाश गीता

कर सकते है । तीसरा नेG मतलब गोकुल। मनु9य का तीसरा नेG मतलब


Xानच$ु जो मनुqय के चदाकाश मतलब गोकुल म होता है । Xानच$ु
मतलब मनु9य म बसा वंद
ृ ावन, गोकुल, गोवधKन। ईन सभी 2थान +ी
कृ9ण ल(ला के है । मनुष ् अपने Xानच$ु के साथ ऐ1य का अनुभव करने
से +ीकृ9ण ल(लाओं का अनुभव अय तीथK2थानो क@ मुलाकात Iकये बगैर
अपने चदाकाश म अनुभव कर सकता है ।

132. च त मE सवF€यापक ई)वर के दशFन करE ! उनका ल यदशFन


च त मE करE । ऐसा करके शा)वत सुख का आनंद भोगे। सार! सिृ Mट के
चदाकाश मE दे खे।
पMट!करणः ONमांड म सवKFयापी ईqवर मनु9य के „दय म है । उसे
„दयाकाश म ढूंढे। उसका सह( अथK म दशKन „दयाकाश म Iकजीये। उसका
सा$ाकार करने से शाqवत सुख का आनंद 4मलेगा। ईqवर सवvतम सुख
है और वह( सवvतम सुख है । आपके चदाकाश म ONमांड को नयं?Gत
करनेवाल( उस शि1त का 3वकास Iकजीये और एकाकार हहो जाता है ।
ईस4लए ह( सारे सिृ 9ट-ONमांड आप म है और आपके चदाकाश-„दयाकाश
म है ।

133. “ओमकार” का साkा कार मतलब चदाकाश मE से जगत क3


ईnछाओ का नाश। ओमकार का साkा कार मतलब मन का नाश। जब
मान-अपमान मनुMय के 'लए एकसमान हो जाते है तब आनंद क3 अनुभूत
करते है । शा)वत आनंद का अनुभव ाDत करता है , जो क3 सnचा आनंद
है । उसके बाद जो अनुभव ाDत होता है उसका 'सफF आनंद रहता है और
'सफF आनंद रहता है ।
105 चदाकाश गीता

पMट!करणः जब “ओमकार” का सा$ाकार होता है तब सम| बाNय


3वqव (आभास) परछाई जैसा है । बाNय 3वqव उसका महव खो दे ता है तब
एक ह( सय बाक@ रहता है वह है सवvतम ONम। जब “ओमकार” का
सा$ाकार होता है तब मनु9य का मन ओमकार म 3वल(न हो जाता है
और वह ओमकारमय हो जाता है । वह अपना 2वतंG अि2तव खो दे ता है ।
मानवी तब शाqवत आनंद, अनंत आनंद का अनुभव ाwत करता है और
वह तभी संभव होता है जब Fयि1त क@ मान-अपमान क@ संवेदनाएं न9ट
हो जाती है । परमसुख क@ अनभ
ु ूत तभी हो सकती है क@ जब अEछs-बूर(
संवेदनाएं न9ट हो जाती है । tैत का भाव Fयि1त म संपूणK न9ट हो जाना
चा&हए। जब मन का tैतभाव पूण:
K प से न9ट हो जाये तब शुt आनंद क@
अनुभूत होती है ।

134. 'शव काशी से आते है । Rदयाकाश मतलब काशी। मन अथाFत


काशी। सब काशी ह! है । शा)वत आ मा काशी है । काशी च त मE है । दस
नाद शा)वत है । सूoम काशी मतलब नLवFकdप काशी। ह`रSवार मतलब
शर!र के नौ Sवार। वह! Rदयाकाश है । वह! शा)वत शांत का थान है ।
य8 मतलब याग और अमूdय 8ान मतलब य8।
पMट!करणः काशी &हदओ
ु का प3वG 2थान है । जहां सवvतम ईqवर
क@ उपि2थत है । काशी मतलब „याकाश (चदाकाश) आमा मतलब
मनु9य म बसे 4शव। काशी ह( मानवी का द(माग है । काशी मतलब शाqवत
आमा। काशी च~त म है । काशी बाNय नह(ं है लेIकन आंतoरक है । वह
मानवी म बसा Xान है । दस नाद – जो मनु9य आVयािमक 4स3tओ क@
ओर आगे बढ तभी सन
ु ाई दे ता है वह शाqवत है । न3वKकWप समाध
मतलब ह( मानवी म बसी ‘काशी’ ईEछार&हत दशा मतलब न3वKकWप और
106 चदाकाश गीता

वह( काशी। “हoर~वार” &हदओ


ु का दस
ू रा प3वG 2थान है । वह दस
ू रा नह(
लेIकन शर(र के नौ ~वार है । ईन नौ ~वारो का यो}य उपयोग हो तो
मानवी अपनी आमा को अEछs तरह पहचान सकता है । „दयाकाश-मतलब
मानवी म रहा शांत का 2थान। जब मनु9य „दयाकाश के साथ एकाकार
हो जाता है तब वह सवvतम शांत का अनुभव कर सकते है। यX 1या
है ? यX अथाKत अमत
ृ Xान। Xान के सा$ाकार से xयादा कोई याग नह(ं
है मतलब ईqवर के सा$ाकार से xयादा बडा कोई यX नह( है ।

135. ‘युि5त’ हाथ क3 कमाल पांव पर चलने जैसी कला है । शि5त


RSयाकाश मE वेश होता है । सं:यास मतलब रे लवे क3 सफर। पांवो से
चलता पदयाjी मागF भल
ू ा है । (मानस चंचल है ) शर!र रे लवे क3 पटर! है ।
ईस रे लवे मE सफर करनेवाला याjी मतलब मानस (मन)। िजस तरह याjी
के Yबना े न आगे न बढE उसी तरह मानस के Yबना भी शर!र क3 सफर
आगे नह! बढती। @टकट नह! @द जायेगी। लोग ई5कƒे नह!ं होगे। उसके
बाद थम &ेणी, LJतय &ेणी नह! होगी। मानस शांत क3 &ेणी है । रथ
का सारथ बLु J है । ईि:जन अथाFत च त (8ानतंतु)। नाडयां और
र5तन'लकाओं मे जो है वह वायु है ।
पMट!करणः हाथ क@ कमाल और जाद3ू व~या से आमसा$ाकार नह(
होता। शि1त से आमसा$ाकार होता है । हाथ क@ कमाल या जाद3ू व~या
मतलब पांव से चलने जैसा है । ईस4लए 3व~या से आमा का सा$ाकार
धीमी गत से होगा। शि1त वह महान ताकत है , जीसका जम2थान
आमा है । जो आमा म वेश करता है । सय2त मतलब रे लवे याGा जैसा
है । िजस तरह रे ल याGा एकसमान पटर( पर होती और ईस4लए याGी
जWद( से गंतFय2थान पर पहुंचता है उसी तरह संय2त का मागK ाwत
107 चदाकाश गीता

करनेवाले मुि1त ल[य जWद( से ाwत कर स1ते है । संय2त अथाKत संसार


का संपूणK और 2वEछ तर(के से याग करना। संसार के याग से मुि1त
बहुत ह( कम समय म ाwत हो स1ती है । जो संसार क@ 3व~याओ म
कुशल होता है वह आमा का सा$ाकार कर सकता है लेIकन धीमी गत
से 1यMक@ संसार म रहने से और चंचल मन के सतत सहवास से उनके
यास ?बखर जाते है । ईस4लए ह( हमारा मन को नयं?Gत करके एककेl(
करने का फझK है । शर(र और शर(र के 3व3वध भागो क@ तुलना _े न के साथ
क@ जाती है । शर(र क@ तुलना रे लवे क@ पटर( के साथ क@ गई है । मानस
मतलब याGी। याGी न हो तो _े न चलाना संभव नह(ं है । &टकट नह( &द
जायेगी। लोक ईकŽे नह( होगे। मानस (द(माग) न हो तो मनु9य कुछ काम
नह( कर सकता। उसके बाद थम +ेणी, 3tतय +ेणी, तृ तय वगK कुछ भी
नह( होता। मानस न हो तो संसार क@ अEछs-बूर( बातो म कुछ फकK नह(
होता। सब एक ह( होता है , जीसका कोई पयाKय न हो। मानस शांत क@
+ेणी है । मानस को सवvतम शांत 4सt करनी है । बु3t रथ का सारथ है
और वह जीस तरह रथ को &दशा बतलाता है उसी तरह मानस को &दशा
&दखानी है अथात बु3t अथाKत मानस (मन) को अंकुश म रखना है । िजस
तरह _े न म ईिजन होता है , _े न म 2‡ू होता है और भांप क@ शि1त
ईिजन को चलाती है उसी तरह मानवशर(र म भी ब3ु t, नाƒडयां,
र1तन4लकाएं और ाण होते है। मि2त9क मानवमन म रहनेवाले _े न के
ईिजन जैसा है । र1तन4लकाएं और नाƒड तंG 2‡ू और भांप जो क@ _े न
को चलाते है । वह ाण है । ाण मनु9य के अि2तव को &टकाकर रखते है ।

136. म ृ यु के समय जो हमE बचाते हे वह 'शव है । वह माया नह!


है । शि5त 'शव मE है । माया ह`र मE है । शर!र 'मsी का बना है । शर!र क3
108 चदाकाश गीता

ईि:Bयां हरदम बाzयाचार को दे खती है । 'शवा आंत`रक है । वह yzमररं ‡


है । दस
ू रो से @दया जाता 8ान वह सह! 8ान नह!ं है । अनभ
ु व से ाDत
होनेवाला 8ान वह! सnचा 8ान है ।
पMट!करणः मृ यु के समय मनु9य को 4शव बचाते है , माया नह(ं।
4शव ONमांड के महादे व है । जो अंतकाल म मुि1त दे ते है । 4शव म शि1त
है । 4शव शि1त का 2Gोत है । सब शि1त उनम से पैदा होनी चा&हए।। माया
$णजीवी है । शर(र नाशवंत है । काया 4मˆी क@ बनी है । दे ह क@ ईिlया
हरदम बाNयाचार म ररहती है । दे ह क@ ईिlया जगत के भोग-उपभोग म
रहती है । 4शव क@ अनुभूत सू[म जगत म हो सकती है । 2थूल lि9ट से वे
&दखते नह( है । आमा का 4मलन 4शव के साथ तब होता है क@ जब
कंु ड4लनी Oहरं  म पहुंचता है । ईस4लए 4शव और ONमरं  एकसमान है ।
अय के ~वारा &दया जाता Xान सह( Xान नह(। वह $णजीवी है । हमने
अनुभव से ाwत Iकया हुआ Xान ह( सEचा Xान है ।

137. अगर आप पण
ू त
F ः शांत ाDत क3 हो तो अj तj घूमने क3
जiरत नह! है । काशी, रामे)वर, गोकणF और दस
ू रे तीथFथानो पर जाने क3
आव)य5ता नह! है । यह सब चदाकाश (द!माग) मE @दखता है। आना और
जाना सब मन क3 ‚मणा है । जब मन क3 शांत 'सJ होती है तब सब
एक मE ह! @दखता है । एक मE ह! सब @दखता है । यह ईnछार@हत दशा है ।
हाथ मE रह! चीज हाथ मE दे खनी चा@हए। आप वह अ:यj कह!ं नह! दे ख
सकते उसी तरह सब अपने Lवचारो से अनुभव ाDत करके करना चा@हए।
पMट!करणः अगर पण ू तK ः शांत 4सt हुई हो तो यहां वहां भटकने क@
आवqय1ता नह( है । दस
ू रे दशKन क@ आवqयकता नह(ं है । मानवमन क@
चंचलता क@ वजह से मनु9य को तीथKधामो म यहां वहां भटकने का मन
109 चदाकाश गीता

होता है । अगर पूणत


K ः शांत 4सt हुई होगी तो मन पूण:
K प से शांत होगा।
उसके बाद काशी, रामेqवर, गोकणK या अय तीथK2थानो पर जाने क@
आवqय1ता नह( है । मनु9य का आना और जान चत क@ एक Œमणा है ।
चत उसके बाद एक म ह( सब दे खेगा। बंधन से मुि1त सभी म आमा
को दे खना और उसी तरह आमा म सब के दशKन करना वह है । ईस
ि2थत पर पहुंचने के बाद मनु9य पूण:
K प से ईEछार&हत हो जायेगा। हाथ
म रह( चीज हाथ म ह( होनी चा&हए, अय 2थान पर नह(। ठsक उसी
तरह ईqवर के दशKन „दय म ह( करने चा&हए। हर एक चीज 2वयं3वचार
करने के बाद उसका अनुभव लेना चा&हए। हमे ईqवर के परमसुख का
अनुभव 2वयासो से करने चा&हए।

138. सह! सूयVदय आ मसभानता के आकाश मE दे खना है । यह


सूयVदय ह! सnचा है । सारे yzमांड के दशFन अपने Rदयाकाश मE करने है ।
जीस तरह छोटे 'मsी के बरतन मE रखे पानी मE सय
ू F के दशFन हो सकते है
उसी तरह सारे yzमांड के दशFन अपने चदाकाश मE करना है। िजस तरह
बैलगाडी मE सफर करते है तब सारा Lव)व चल रहा हो ऐसा लगता है उसी
तरह yzमांड के दशFन अपनेआप मE Xकये जा सकते है ।
पMट!करणः कंु ड4लनी जाग:कता से पैदा होती सवvतम xयोत ह(
सEचा सूयvदय है । वह मनु9य अपने चदाकाश म दे ख सकता है । यह
सूयvदय सवvतम और अतुWय है । सूयvदय का अनुबव चदाकाश म हो
सकता है । 4मˆी के छोटे बरतन म भरे पानी म सूयाK के िजस तरह दशKन
होते है उसी तरह अपने „दयाकाश म सारे ONमांड के दशKन मनु9य कर
सकता है । ईसके 4लए कंु ड4लनी जागत
ृ होनी चा&हए और उसक@ गत
सह2Gार क@ ओर होनी चा&हए। तब मनु9य को अनुभव होता है क@ वह
110 चदाकाश गीता

ONम के साथ है और सिृ 9ट के साथ है । यह ि2थत जब ाwत होती है तब


मनु9य सारे ONमांड के दशKन अपने चदाकाश म कर सकता है। जीस तरह
बैलगाडी म सफर करते है तब वा2तव म हम गत कर रहे होते है लेIकन
गलत से हमे सारा 3वqव मानो घूम रहा है ऐसा अनभ
ु व करते है । ईस
तरह सारे बाहर( 3वqव के दशKन अपने चदाकाश म ककर सकते है और
ईस4लए वह ONमांड को नयं?Gत करनेवाल( महाशि1त का 3वकास करना
चा&हए। सारे ONमांड क@ शि1त तब हमारे अंदर होगी।

139. भूखे लोगो को ह! पता होता है क3 भूख 5या होती है उसी तरह
आ मा को ह! सवF जगत का पता होता है । जैसे े न टे शन छोडती हे तब
नज@दक के टे शन पर सुचना द! जाती है उसी तरह कूएं मE प थर फEकने
से आवाझ आती है उसी तरह जब ाण नाडयv मE घूमता है तब दस तरह
के नाद सन
ु ाई दे ते है ।
पMट!करणः मानवी क@ आमा अनंत ईqवर का &ह2सा है । वह
सवKXात है । जैसे भूखे लोगो को ह( मालूम होता है क@ भूख 1या है उसी
तरह सब Xान आमा को होता है । _े न 2टे शन से नीकलती है तब
नज&दक के 2टे शन पर तार भेजा जाता है । जैसे कूएं म पथर फका जाये
तो पानी म गरने से आवाझ हाती है उसी तरह ाण नाƒडयM म घम
ू ता है
तब नाƒडयां शुt होती है और दस तरह के नाद उपन होते है । यह बात
बताती है क@ मनु9य क@ अंद:नी शर(र Fयव2था अEछs तरह चल रह( है
और वह ईस बात को भी सूचत करता है क@ कंु ड4लनी चदाकाश म से
सह2Gार क@ ओर गत कर रह( है , जो क@ उसका सह( 2थान है।
111 चदाकाश गीता

140. बंध मुंहवाले बरतन मE पानी उबाला जाये तो परू ! गरमी बरतन
मE केि:Bत होती है । पंप मE से पानी बाहर आता है तब ओमकार का नाद
होता है । हमे जंगल के रातv को छोडकर राजमागF लेना चा@हए। जो शि5त
अधोमागI होती हो उसे ऊZवFमागI करनी चा@हए। मन को मन का थान
समझना चा@हए।
पMट!करणः हमे हमार( कंु ड4लनी को जागत
ृ करके शर(र म ह( उसक@
शि1त को केl(त करनी चा&हए। हमार( शि1तयां सांसाoरक उेशो म
Fयतीत नह( होनी चा&हए। हमे ईिlय के ~वार बंध कर दे ने चा&हए,
जीससे हमार( शि1त Fयतीत न हो। हमे हमार( शि1तयां ऊबलते पानी के
बंध मुंहवाले बरतन म िजस तरह केl(त होती है उसी तरह करनी चा&हए।
ऐसे जब 4सt होगी तब ओमकार के 4सवां कुछ नह( &दखेगा। पानी के पंप
म से पानी नीकलता है तब ओमकारना नाद क@ अनुभूत होती है।
ओमकार हमारे 4लए सवK2व बन जायेगा। सांसाoरक जीवन के जंगल( मागv
का याग करके हमे &दFय जीवन का राजमागK 2वीकार करना चा&हए।
शर(र क@ शि1तयां क@ िजनका मागK अधोगामी हो रहा हो तो उसे
ऊVवKगामी करना चा&हए। मन को उसक@ चदाकाश म रह( ि2थत का Xान
हो तो उसे सातयपण
ू K और संतु9ट रहना चा&हए।

141. Yबना पान क3 जगह मE जैसे नौका तैर नह! सकती उसी तरह
ाण क3 गत न हो तो र5तसंचार नह! होता। र5तसंचार iके तो शर!र मE
गरमी पैदा नह! होती। शर!र मE गरमी पैदा न हो तो आहार का पाचन नह!
होता उसी तरह Yबना अि^न के े न चल नह! स5ती।
पMट!करणः नौका को तैरने के 4लए पतवार क@ जCरत होती है ।
रे लवे-_े न को चलाने के 4लए आग क@ ज:रत होती है उसी तरह शार(oरक
112 चदाकाश गीता

गत3वधयM के 4लए ाण अनवायK है । मानवशर(र म ाण नह( हMगे तो


र1तसंचार :क जायेगा। अगर शर(र म गम‰ पैदा होना बंध हो जाये तो
आहार का पाचन नह(ं होता। ईस4लए ाण शर(र म न रहे तो शर(र के
सभी कायK :क जाते है ।

142. िजस तरह कूएं मE से पानी {खंचने के 'लए रसी अनवायF है


उसी तरह शर!र मE सांस चलती है वह रसी का काम करती है । लय मE
शर!र मE सांस अंदर लेना वह कूएं मE से पानी {खंचने जैसा है ।
पMट!करणः ाणायम हमारे शर(र म सांसो को लय म रखता है । हमे
सांस और खांसी लय म करनी चा&हए। यह I‡या कूएं म से पानी /खंचने
के 4लए घडा उतारने और बाहर नकालने जैसी है । ाण शर(र के 4लए
र2सी समान है और हमे कंु ड4लनी क@ महाशि1त को जागत
ृ उसी से कर
सकते है ।

143. िजस तरह लकडी मE से उसी पाट बनाने के 'लए उसे उपर-नीचे
काटना पडता है उसी तरह सांस को शर!र मE उपर-नीचे ले जाना चा@हए।
उसे बLु J मE ले जाना चा@हए और हरदम उसे उपर क3 ओर ले जाना
चा@हए। प थर को पहाडी के 'शखर क3 ओर फEकने के 'लए काफ3 यास
करने पडते है लेXकन उपर से नीचे क3 ओर प थर फEकने के 'लए यास
नह! करना पडता। उसी तरह 'शखर पर चढ़ना मुि)कल है लेXकन उतरना
आसान है । ाण के 'लए शर!र छोडना क@ठन है । चीज लेनी आसान है
लेXकन वह वाLपस करना क@ठन है । जो मनुMय अपने 8ान वाLपस नह!
करते वह मानव कहने लायक नह! है । वE गण
ु v के अभाववाले पशु है ।
113 चदाकाश गीता

पMट!करणः हमे सांस लयबt तर(के से लेनी चा&हए। जीस तरह


लकडी का पाट को हम उपर-नीचे काटते है , लयबt तर(के से होनेवाल(
सांस क@ I‡या को ाणायम कहते है । ाण को ब3ु t क@ ओर ले जाना
चा&हए और उसक@ गत हरदम ऊVवK होनी चा&हए। पथर को 4शखर क@
ओर फकने के 4लए xयादा महे नत लगती है लेIकन उपर से नीचे पथर
फकना आसान है । मनु9य के 4लए ईिlयां अंकु4शत करना xयादा क&ठन
है और परONम के दशKन मुिqकल है लेIकन अनय4मत जीवन और ईिlयM
को नररं कुश रखने से ईqवर के दशKन दल
ु भ
K हो जाते है । ाण को मनु9य
का शर(र छोडने म मुिqकल होती है । ाण को शर(र का याग करने म
अकWपनीय मुिqकल उठानी पडती है । क@सी भी चीज |हण करना आसान
है लेIकन उसे वा3पस करना क&ठन है । हमे ईqवर से आमा 4मल( है
लेIकन हम उसे शर(र क@ उपि2थत म वा3पस करना है और उसके 4लए
परONम का सा$ाकार करना और उनके साथ एकाकार हो जाना है ।
मनु9यजीवन का ल[य आमा क@ 4स3t है । जो लोग खुद को 4मला हुआ
अपने जीवनकाल म वा3पस नह( करते उह मानव नह( कहा जा सकता।
मनु9य को मानव कहलाने के 4लए आमसा$ाकार करना चा&हए। ऐसा
करने से ह( ईqवर के पास से जो 4मला है वह ईqवर को वा3पस Iकया जा
सकता है । जो लोग खुद को पहचानते नह( है वे पशुओ से अEछे नह( है ।
114 चदाकाश गीता

144. मनुMय क3 अंतकाल क3 पीडाओं का Lववरण करना संभव नह!


है । 8ान क3 'सLJ सूoम चंतन से होती है । ईस'लए सांसो क3 Xrया
अंकु'शत करनी चा@हए। च त को नाद मE ल!न कर दे ना चा@हए।
पMट!करणः मनु9य क@ अंतकाल क@ पीडाओं का 3ववरण संभव नह(
है । Xान सू[म चंतन से 4सt होता है । हमे ाणायम के अ…यास से सांसो
क@ I‡या को अंकु4शत करना पडता है । ऐसा करने से हमारा नाडीतंG शt

हो जायेगा और हमे दस नाद 2वर सुनाई दगे। जब नाद सुनाई दे ता है तब
मन को नाद पर केl(त करना चा&हए। जैसे जैसे मन का Vयान नाद पर
बढता जाता है वैसे वैसे मन नादमय होने लगता है और नाद म एक हो
जाता है ।

145. िजसके च त पर चंता का बोझ हो उसका Zयान “बोझ” पर ह!


रहता है । वह राजा क3 भू'मका करनेवाले कलाकार का Zयान जैसे मुगट क3
ओर ह! रहता है उसके जैसा है। 8ानीओ का Zयान 'सफF बLु J पर के:B!त
होता है ।
पMट!करणः Xानीओ का Vयान शाqवत तर(के से बु3t पर ह( होता है ।
मनु9य चंता म होता है तब उसका Vयान हरदम चंता म होता है । नाटक
म राजा क@ भू4मका करनेवाले का Vयान उसने पहने हुए मुगट क@ ओर ह(
रहता है । Xानीओ का Vयान हरदम बु3t क@ ओर रहता है और वे
परमONम के 3वचारो म म}न रहते है और उसके 3वचारो म म}न रहते है
और उसके साथ ह( एकव का अनुभव करते है ।
115 चदाकाश गीता

146. मन (च त) बLु J से हलक3 कkा का है । बLु J का थान राजा


जैसा है । मन का थान धानमंjी जैसा है । धानमंjी को राजा के पास
उ:हE 'मलने बारबार जाना पडता है वैसे मन शर!र का राजा है ।
पMट!करणः मन का 2थान बु3t से हलक@ क$ा का है । बु3t को
राजाके समान माने तो मन का 2थान धानमंGी का है । बु3t का कायK मन
को मागKदशKन दे ने का है , िजससे मन ONम के साथ एकCप हो सके। बु3t
के कायK2व:प क@ वजह से बु3t क@ तुलना राजा के साथ क@ गई है । राजा
का काम आदे श दे ने का है और धानमंGी का काम उसका आदर करना है
उसी तरह बु3t के आदे शो का ग4भKत तौर पर मन से पालन होना चा&हए।
जीस तरह धानमंGी को राजकाज के 4लए राजा का परामशK लेने महल म
बारबार जाना पडता है उसी तरह मन को भी बु3t के अधीन रहना चा&हए
और साथ म मन के आदे शो का पालन करने का फझK शर(र का है ।

147. मZयाzन के सूयF के समk गेस का द!या घूंधला लगता है । गेस


के द!ये क3 रोशनी अंधकार मE ह! उपयोग मE आती है । भूखा आदमी
जातपात के भेद नह! दे खता उसी तरह गहर! नींद मE सोया हुए €यि5त को
भूख नहह! लगती। मन उपिथत नह! होता है । मनुMय को ईसतरह
योगनBा लेनी चा@हए। ऐसे लोग ह! 8ानी है ।
पMट!करणः गेस के द(ये क@ रोशनी मVयाNन के सूयK के तेज के
सामने धूंधल( है उसी तरह ईqवर के परमसुख के सम$ सांसाoरक जीवन
के आनंद का कोई मूWय नह(। हम अXानी होते है तब सांसाoरक जीवन के
आनंद का आकषKण हम होता है । जो Fयि1त दै वी Xान क@ खोज म
नीकला है वह जातपात नह( दे खते। परम सय को ाwत करने के 4लए
116 चदाकाश गीता

&हंमत से दु नया 1या कहे गी उसक@ चंता Iकये ?बना यास करता रहता
है । गहर( नंद म सोये मनु9य को भूख क@ अनुभूत नह( होती 1यMक@
उसका मन सुषwु त होता है । योगनlा से मनु9य को ईqवर का सा$ाकार
करके उस म एकाकार होकर जीना चा&हए। ईसे योगनlा कहते है ।
योगनlा 1या है यह समझनेवाले ह( Xानी होते है ।

148. अलग अलग दस लोगो को दे खोगे तो मालम


ू होगा क3 उनक3
भि5त का वiप एकसमान नह! है । दस लोग याjा संघ बनाकर नीकलEगे
और उनमE से एक €यि5त अगर आराम करना चाहे तो अ:य लोगो को भी
आराम करना पडेगा। उसी तरह एक 8ान भि5तवाल! €यि5त को दे खकर
अ:य लोग उनका अनस
ु रण करके भ5त बनते है ।
पMट!करणः भि1त सभी लोगो म एक 2व:प क@ नह( होती। मनु9य
मनु9य म फकK होता है । भि1त तीन तरह क@ है – सािवक, राजसी और
तामसी। दस याGीओ के संघ म से एक भ1त को दे खकर दस
ू रे लोग उनका
अनुसरण करके भ1त बनते है । भि1त का सं‡मण दस
ू रे सं‡मण क@ तरह
अय लोगो को भी होता है ।

149. हाथ मE रहे पMु प क3 खु)बु का अनुभव नह! हो सकता। दरू रहे
पMु पो क3 मीठu खु)बु आती है । बnचे जीनके मन का Lवकास नह! हुआ वे
सांसा`रक जीवन क3 चीजो मE फकF नह! समझते। उनका Lवकास होता है
तभी जगत क3 चीजो का फकF उ:हE मालूम होता है । छः म@हने के बnचे को
सांसा`रक जीवन का 8ान नह! होता। उnच कkा के योगीओ ईस तरह के
होते है । जीस तरह छः म@हने के बnचे को ह!रे और कांच क3 गोल! के बीच
117 चदाकाश गीता

का फकF मालूम नह! पडता। उसी तरह सnचे 8ानी को 'मsी और पैसो के
Yबच कोई फकF नह! लगता। वे ईnछार@हत होते है और आ मा के दशFन
सवFj करते है । आ मा मE सवF का और सवF मE आ मा के दशFन करते है ।
उनक3 BिMट अंदiनी होती है। आंतरBिMट अथाFत सूoम Lववेक। सूoम
Lववेक मतलब 'शवशि5त। 'शवशि5त परyzम का वiप है ? परyzम 5या
है , वह आ मा क3 शि5त है । यह एक का रहय है ।
पMट!करणः अंतर हो तो आनंद रहता है । मनु9य क@तना भी महान
हो अगर वो नज&दक रहता है तो हम उसक@ महानता को दरIकनार करते
है । फुल जब हाथ म होता है तब उसक@ खुqबु हमे ाwत नह( होती लेIकन
दरु जो फुल है उसक@ खुqबु मीठs लगती है । हम दरु रहकर मनु9य क@
महानता का अनुभव कर सकते है । सEचे Xानी बEचे जैसे है उह कोई भेद
क@ अनभ
ु ूत नह( होती। छोटे बEचे को जैसे ह(रे और कांच क@ गोल(ओ म
कोई फकK नह( लगता उसी तरह योगी-Xानीओ के 4लए भी ह(रा या कांच
क@ गोल( एकसमान होती है । सEचा Xानी ईEछार&हत होता है । उसे कोई
भेद &दखाई नह( दे ता वह एक आमा सवKG दे खता है और एक आमा का
दशKन सवK म करता है । सू[म 3ववेकबु3t क@ वजह से उसक@ lि9ट
आंतoरक होती है । जो 2थूल आंखो से नह( &दखाई दे ती। 4शवशि1त मतलब
परONम क@ पराशि1त है । आमा के सा$ाकार से 4शवशि1त का दशKन
संभव होता है । परONम मतलब मानवी का शाqवत आमा है । आमा एक
वा2त3व1ता है । जगत क@ दस
ू र( चीज अवा2त3वक आभासी है ।

150. मनुMय मE बसा ाण वािव5ता है । वह मानवी मानव है । जो


सह! तर!के से सोचता है । यह स य Lवचार मानवजीवन का लoय है । सब
योगाTयास से ाDत करना संभव है । अTयास से ह! 8ान है ।
118 चदाकाश गीता

पMट!करणः ईqवर क@ ारं 4भक शि1त ाण मनु9य म होती है ।


जो 3वqव क@ हIककत है । बाक@ सब नाशवंत है और ईस4लए वा2त3वक
नह( है । मनु9य को मानवी बनने के 4लए ईqवर जो सय है उसका चंतन
करना चा&हए। ईqवरचंतन ह( सEचा चंतन है । ऐसा सEचा चंतन
मानवजीवन का ल[य है । हरदम अ…यास से कुछ भी 4सt हो सकता है ।
हरदम अ…यास से ईqवर और उनके रह2य हम समझ सकते है । अ…यास
से Xान 4मलता है और अ…यास से ह( मनु9य पूणK बनता है ।

151. अ:न के बीज पेट! मE रखकर बंध कर दE तो उसमे से ओर


दाने नह! बनEगे लेXकन वह! बीज भू'म मE रखकर उगाया जैये तो हजारो
दाने उगते है । एक \योत मE से हजारो \योतयां पैदा होती है । एक पैड
हजारो फुल {खलाते है । फूल क3 गत अधोगामी है । पैड क3 गत ऊZवFगामी
है ।
पMट!करणः Xानी को चा&हए क@ वो अपना Xान अपने तक ह(
सी4मत न रख। उसे खुद को ाwत हुआ Xान दसू रो को दे ना चा&हए और
अय के ~वारा उसका सदपु योग हौ। जीस तरह बीज पेट( म बंध करके
रखने से उसम कोई बीज अंकुoरत नह( होता लेIकन वह( बीज अगर भू4म
म डालकर उगाया जाये तो और यो}य:प से उसको पनपने &दया जाये तो
एक ह( बीज म से हजारो बीज पैदा हौगे उसी तरह Xान अय को दे ने से
उसे हजार गन
ु ा बढा सकते है । एक xयोत म से हजारो xयोत कट कर
सकते है । एक सEचा Xानी हजारो Xानी अपनी तरह पैदा कर सकता है ।
एक पैड़ हजारM फुल पैदा कर सकता है लेIकन फुल न9ट हो जाते है और
पैड जी3वत रहता है । पैड जीसे मानव Fयव2था म ऊVवKगामी 2तर कहा
जाता है 1यMक@ उसका नाश नह( होता। आमा के सा$ाकार क@ ि2थत
119 चदाकाश गीता

शाqवत है , जो समयातीत है , कारणातीत और अवकाशातीत है । आमा एक


वा2त3व1ता है ।

152. हम सोने का 'स5का भ'ू म मE लगा दे Xफर भी कभी अंकु`रता


नह! होता।
पMट!करणः मनु9य म रहनेवाल( ईEछाएं पूण:
K प से न9ट हो जाये
और ईqवर का सा$ाकार करने के बाद उसम Iफर से ईEछाएं उपन नह(
होगी। एक बार ईqवर का सा$ाकार होने के बाद Iफर से सांसाoरक
आकां$ाएं उसम अंकुoरत नह(ं होगी, जीस तरह सुवणK का 4स1का भू4म म
लगाया जाये तो वह अंकुoरत नह( होगा उसी तरह आVयािमक दशाओं म
पूणK व ाwत करने के बाद मनु9य Iफर से भौतकता म उतर नह( सकता।

153. जीवनह!न वतु आवाझLव@हन होती है । वह थूल होती है ।


चेतनायु5त चीज श"दyzमयु5त होती है । yzमांड कुछ नह!ं बdक3 चेतना
है । मनुMय को घर बनाने से पहले उसक3 बु नयाद बनानी पडती है और
बाद मE द!वारE बनानी चा@हए उसी तरह प`रणाम Yबना कारण नह! हो
सकता।
पMट!करणः जीवन3व&हन चीज नादर&हत होती है । वह 2थूल चीज
होती है । जी3वत चीज म श]दONम है । जी3वत चीज आवाझ पैदा कर
सकती है । ONमांड ओर कुछ नह( लेIकन चेतना है । जीसे हम सू[म चेतना
(समाध) के 2तर पहुंचते है तब ONमांड म चेतना का दशKन करते है । हम
घर बनाते है तो सवKथम उसक@ बुनयाद बनाते है और बाद म द(वार
बनाते है । बुनयाद बनाना वह एक वजह है और मकान बनाना वह
पoरणाम है । आVयािम1ता म हम पहले शु:आत करने के 4लए गु: के
120 चदाकाश गीता

पास जाना पडेगा। ईसे ारं भ कहा जाता है और उसका पoरणाम ईqवर का
सा$ाकार है । गु: के चरणो म बैठना वह कारण है और उनका भाव
आमा का सा$ाकार है । ईस जगत म ?बना कारण पoरणाम संभव नह(ं
है ।

154. जो लोग शर!र से अंध है उ:हE आकारो का 8ान नह! होता।


ऐसे लोगो के 'लए रोशनी कोई मायने नह! रखती। जीन लोगोने मन क3
गंदगी नMट क3 है , जीन लोगोने ईnछाएं नMट क3 है ऐसे लोग वDन के
अधीन नह! होते।
पMट!करणः शर(र से अंध Fयि1तओ को आकारो का Xान नह(
होता। ऐसे लोगो के 4लए रोशनी कोई मायने नह( रखती उसी तरह
सांसाoरक जीवन म म}न लोगो को ईqवर का Xान नह( होता। ऐसे लोगो
के 4लए ईqवर के Xान का मूWय नह( होता। वे Xान के &दFय तेज के 4लए
अंध होते है । ऐसे लोग अपनी अXानता को Xान समजते है । ऐसे लोग
जीहMने मन क@ गंदगी (वृ तयां) न9ट क@ है , वे ईEछार&हत हो जाते है ।
ऐसे लोग 2वwन के अधीन नह( होते। व परONम म शाqवत तौर पर म2त
हो जाते है । वे बाNय वृ तयM के 4लए उदासीन बन जाते है और आिमक
तौर पर पूण:
K प से जागत
ृ हो जाते है ।

155. जो लोग ना'सका से सांस नह! लेते उ:हE क3सी कार क3


ईnछाएं नह! होती। वे अंदiनी तौर पर सांस लेते है । वे अपनी सांस
yzमरं ‡ जो क3 ईडा और पींगला 'मलती है तब के:B!त करते है । उ:हvने
ई)वर क3 अनभूत क3 है । वे सभी चीजो को “आ मा” ते तौर पर ह! दे खते
है । ईसे “वराज” कहते है । वराज जीव का सह! थान है । जीवन का
121 चदाकाश गीता

काश ाणवायु है । ाणवायु वराज क3 सरकार का मुŽय थान है ।


आ मा वराज क3 सरकार क3 अधMठाता है । वराज अथाFत €यि5त क3
खुद क3 शि5त। आस शि5त को पण
ू i
F प से खुद के अंकुश मE रखनी
चा@हए। वराज कोई पहाडी नह! है या सुवणF नह! है । ईnछा और rोध
दोनो के अंकु'शत करना वह! वराज है । मनुMय को खुद जो कहे वह!
करना चा@हए और जो करे वह! कहना चा@हए।
पMट!करणः मनु9य अपनी सांस ना4सका से करे तो अपनी ईEछाओ
को अंकु4शत कर सकता है । जो लोग बाNय qवसन I‡या को नयं?Gत कर
सकते है उह कोई ईEछा नह( होती। ाणायाम मतलब अंद:नी सांस लेने
क@ I‡या। ऐसे लोगो का qवसन पूण:
K प से अंद:नी होता है । ऐसे लोग
अपनी सांसे ONमरं  म केl(त करते है । Oहमरं  मे ईडा और पींगला का
4मलन 2थान है । ऐसा करने से वे ईqवर का सा$ाकार कर सकते है । यह
सब आमा है उसी तरह दे खते है । वे सब म एक को और एक म सब को
दे खते है । यह सEचा 2वराज है। 2वराज जीव का सह( 2थान है और वह
„दयाकाश म है । जीवन क@ रोशनी ाण है । ाण के ?बना शर(र म शि1त
नह( होती। ाणवायु ईस 2वराज क@ राजधानी है । आमा 2वराज क@
सरकार क@ अध9ठाता है । 2वराज अथाKत 2व क@ शि1त को नयं?Gत
करना। 2वराज कोई पहाडी या सुवणK नह( है लेIकन अपने ‡ोध और
ईEछाओं को नयं?Gत रखना वह( है । 2वराज बाNय I‡या नह( है लेIकन
पूणK आमा क@ I‡या है । वासनाओ को मन से नयं?Gत करना वह है ।
करनी और कथनी म समानता हो वह( है ।

156. अगर आप पानी से डरते हौ तो नद! को नांव मE बैठकर पार


नह! करे सकEगे। अगर आप आग से डरते हो तो पानी को गमF नह! कर
122 चदाकाश गीता

सकEगे। मनुMय को कुछ भी ाDत करना हो तो भय का याग करना


चा@हए। कुछ भी 'सLJ ाDत करनी हो तो मनुMय को नीडर बनना चा@हए।
मनुMय का मन वह जो कुछ भी करता है उसक3 वजह है ।
पMट!करणः हमे नद( को तैर जाने म डर नह( लगना चा&हए। उसी
तरह पानी को गमK करने के 4लए आग का डर नह( होना चा&हए। हमे
अगर कोई महा4स3t ाwत करनी हो तो हम नीडर बनना चा&हए।
सफलता के 4लए नीडरता अनवायK पूवश
K तK है । आVयाम के उEच 4शखर
को 4सt करने के 4लए भी हम नीडर नेता बनना चा&हए। ऐसी Fयि1त को
आमा क@ ऐसी शि1त ाwत करनी चा&हए क@ वह सारे ONमांड का सामना
कर सके। मन हम जो कुछ भी करते है उसक@ वजह है । हम मन को
जीतगे तो परमामा म एकाकार हो सकगे।

157. आ}वk
ृ पर सभी फुल एकसाथ पकते नह! है । सबसे पहले
कnचा आम बनता है और साथ मE प5का आम बनता है । प5के आम खा
सकते है । सभी बातो मE शांत रखना हमे 'सखना है ।
पMट!करणः सब लोग एकसाथ मुि1त ाwत नह( कर सकते, जीस
तरह सब आम एक साथे नह( पकते। हर मनु9य का 2वभाव अलग होता
है । जीस तरह आमM म कEचा आम थम उगता है और साथ म अय
आम पकते जाते है उसी तरह Fयि1त के आमच$ु खूलते है तब अपने
दोष &दखने लगते है और सांसाoरक गुण छोडता जाता है । वह मानव भी
प1के आम जैसा हो जाता है । उनके दग
ू ुण
K राख हो जायगे और उसमे
सुवणK रह जायेगा। मनु9य को अपने चदाकाश म सवvतम शांत ाwत
करनी चा&हए। उसे शांत सब म और सवKG दे खनी चा&हए।
123 चदाकाश गीता

158. मनुMय का मितMक आम जैसा है । उसमE मीठा अमत


ृ है ।
अमत
ृ पांचो ई:B!यो का अकF है । यह अमत
ृ व मनुMय मE बसी उnचतम
शि5त है ।
पMट!करणः मनु9य का मि2त9क प1के आम जैसा है । मि2त9क
Xानामत
ृ का 2थान है । मनु9य कंु ड4लनी जागत
ृ करके और उसे चत क@
ओर ले जाता है तब चत म Xानामत
ृ का अनुभव होता है । यह अमत
ृ व
अथाKत कंु ड4लनी शि1त मनु9य क@ पांच ईl(य का अंतःतव है । यह
अमत
ृ व मनु9य म बसी सवvतम शि1त है ।

159. ऐसा घर क3 िजसमE रात के समय द!ये क3 रोशनी नह! है वह


घर सुंदर नह! लगता। घर का वiप जो भी हो लेXकन वह नाशवंत है ।
द!या घर के 'लए जो काम करता है वह! काम “8ान” शर!र के 'लए करता
है । रोशनी कंु ड'लनी क3 है । Xक–ड मE छूपी चीज का कोई मूdय नह! होता।
Xक–ड मE से 'मले @हरे को हम फEक नह! दE गे।
पMट!करणः जीस तरह द(ये क@ रोशनी बगैर घर सुंदर न लगे उसी
तरह Xान क@ रोशनी बना मनु9य अEछा नह(ं लगता। घर क@सी भी कार
का और क@तना भी मजबूत हो लेIकन नाशवंत है । मनु9य का शर(र
क@तना भी सुंदर और मजबूत हो लेIकन नाशवंत है । शर(र शाqवत नह( है ।
द(या जीस घर के 4लए है उसी तरह Xान शर(र के 4लए है । शर(र म जो
काश है वह कंु ड4लनी का होता है । मनु9य म कंु ड4लनी जागत
ृ होनी
चा&हए। यह हIककत है क@ हर मनु9य म &दFय xयोत होती है लेIकन
वह वासना के मल से ढं क जाती है ।जीस तरह Iकžड म छूपी चीज का
कोई मूWय नह( होता उसी तरह सांसाoरक जीवन क@ वासनाओ म अटक@
आमा का कोई मूWय नह( होता। आमा जब वासना मु1त हो जाये तब
124 चदाकाश गीता

वह उसके उEचतम आमा के साथ का4शत होती है और हरकोई उसका


2वीकार करता है । ऐसी आमा क@ वजह से जगत म सवK का कWयाण
होता है । जब हम असय मे रहे सय को जान लेते है , अंधकार म काश
क@ अनूभूत करते है तब हमे उसे छोडगे नह(ं। जब हमे आमा का
सा$ाकार करते है तब हम उसे छोड नह( दे ते है । हमे Iकžड मे से भी
&हरा 4मलेगा तो फक नह( दे ते है ।

160. दMु ट मनुMय कूएं मE गरे तो हमे उसे डूबने नह! दे ना चा@हए।
हम ऐसा नह! मानते क3 मनुMय सदै व खराब ह! होगा। हमे उसक3 बरू ा—यv
को दरू कर के स मागF क3 ओर ले जाना चा@हए।
पMट!करणः कोई बूरा मनु9य कूएं म गरे तो हमे उसे डूबने नह(
दे ना चा&हए। हमे ऐसा मानने क@ ज:रत नह( है क@ बूरा मनु9य कभी
सुधरे गा नह(। कोई भी मनु9य Iकतना भी खराब हो लेIकन हरदम बूरा नह(
रहे गा। कोई बी मनु9य शाqवत तौर पर बूरा नह( होता। आज या कल
उसमे सुधार आयेगा। मानवजीवन का ल[य &दFय जीवन क@ &दशा म
गत करना वह है । हमे बूरे मनु9य को सध
ु ारने के 4लए हरदम यास
करना चा&हए और उसे समागK पर ले जाने का यास करना चा&हए।

161. हमार! आंखो मE अगर पाउडर गरता है तो हमारा Zयान हमार!


आंखो पर ह! रहे गा उसी तरह हमारा Zयान अंदiनी बात पर जाता है तो
वह आंतरBिMट कहा जाता है । अ8ान एक पाउडर रखने का बरतन जैसा है ।
पेट! के मा'लक को पता ह! होता है क3 उसमE 5या है । दस
ू रो को पता नह!
होता। सह! संपत जीवन चेतना है । बLु J एक पेट! है । पेट! मE संपत रखने
के बाद उसे “ताला” लगा द!या जाता है । पेट! को ताला मारना मतलब
125 चदाकाश गीता

मानस को सह! थान मितMक मE @दलाना है । मनुMय का यह पLवj फझF


है क3 उसे 'मला हुआ धन वह दस
ू ोरो को वाLपस करे । यह 'मल! हुई चीझ
है मनुMय क3 आ मा। आपक3 आ मा आप के अंदर बसे ई)वर को वाLपस
करE । अंदiनी तौर पर आप खद
ु के रहयो को समझे। yzमांड आप के
अंदर है और आप yzमांड मE हो। अंदर जो है वह सब मE ररहता “एक”
ई)वर है । वह जो क3 यह! पर है वह “एक” है और वह! अ:यj भी है ।
पMट!करणः अगर कोई पाउडर हमार( आंखो म गरता है तो हमारा
Vयान उसी पर रहता है । उसी तरह हमारा Vयान सांसाoरक जीवन क@
व2तुओ पर फैला हुआ होता है उसे अंदर क@ ओर केl(त Iकया जाये उसे
आंतरदशKन कहते है । अXान वह पाउडर क@ पेट( क@ तरह है । जीसके पास
वह है उसे ह( पता होता है क@ पेट( म 1या है लेIकन दस
ू रो को माललूम
नह( होता। हमारे अंदर कौन है वह हम ह( पता होता है । दस
ू रो को पता
नह( होता। सह( संपत मनु9य म रहनेवाल( जीवन चेतना है । बु3t वह बंध
पेट( है । ईस पेट( को उसके अंदर संपत रखी जाये तभी बंध क@ जाती है ।
ईस पेट( को ताला लगाना मतलब मन को उसका सह( 2थान बताना वह(
है । हमे मन का सह( 2थान मि2त9क म 1या है वह जानना चा&हए और
मन को नयं?Gत करना चा&हए। ईस मन क@ पेट( म ताला मारना वह(
उसका अथK है । मनु9य को मानव बनने के 4लए अय से 4मला हुआ
वा3पस करना वह उसका फझK है । यह चीज मतलब मनु9य को 4मल(
आमा है । हमे ईqवर से 4मल( आमा जीससे 4मला है उसे वा3पस करना
है । यह तभी संभव है अगर हम आम-सा$ाकार कर।

162. तभी हम जहां से आये है वहां वाLपस जा सकते है । हमे हमारे


अित व का रहय ससमझना चा@हए। ऐसा होगा तभी yzमांड हमारे अंदर
126 चदाकाश गीता

रहे गा और हम yzमांड मE हvगे। हमारे और yzमांड के Yबच का फकFक


खतम हो जायेगा और yzमांड को नयंYjत करती शि5त को समझ सकEगे
और शर!र को नयंYjत करनेवाल! शि5त भी वह! है । अंदर रहनेवाला
मानवी जीसके 'लए आ मा सभी मE एकसमान होती है । फकF 'सफF बाहर!
वiपो मE है । वह जहां पर है वह और यहां पर है वह दोनो एकसमान है ।
ई)वर सवFj फैले हुए है । उnचतम काश वह yzमांड \योत है । हे मन!
ईस Jैतभाव को नMट करो और उसके साथ एका म5ता का अनुभव करो।
पMट!करणः उEचतम काश और Oहमांड xयोत दोनो एकसमान है ।
ये दोनो एक ह( चीज के दो अलग नाम है । हे मन! “दस
ू रे पन” को न9ट
करो। tैतभाव को न9ट करो और उसके साथ एकामकता का अनुभव करो।
हे मन! एक सब म, सब म एक को दे खो! ईqवर क@ चेतना का अनुभव
सवKG करो।

163. जब हमारा ज:म हुआ तब सांसो के साथ हम ज:मे थे। जब


हम जगत का याग करE गे तब हम सांसे छोड दE गे। यह 'मsी का शर!र
हमने नह! बनाया है और अंतकाल मE हम उसे साथ मE नह! ले जा सकते।
'शव जो क3 चल और अचल चीजो मE एकसमान है । सभी दस
ू रो मE
एकसमान शि5त होती है । दस
ू रो मE जो ‘सूoम’ शि5त होती है वह
एकसमान होती है । फकF 'सफF उसके सलुक मE होता है । मन क3 ‚मणाएं
थायी नह!ं होती लेXकन kणजीवी होती है । जीन चीजो को दे खा जा
सकता है और सुना जा सकता है वह kणजीवी होती है ।
पMट!करणः ाण मनु9य क@ शि1त है । मनु9य जमा तब ाण के
साथ जमा था और दे ह छोड दे ता तब ाण उसे छोड दे ता है । ाण ह(
हमारा है , शर(र नह(ं। यह शर(र हमने नह( बनाया और अंतकाल म हम
127 चदाकाश गीता

उसे साथ नह( ले जा सकते। ईस4लए हम शर(र छोड दे ते है तब उसे छोड


के जाना पडता है । चल और अचल हर चीज म 4शव ने रखा हुआ ाण
एकसमान है । फकK 4सफK बाहर( 2व:पो का है । बीज म रहा सू[म तव एक
ह( है । मन क@ Œमणाएं 2थायी नह( होती लेIकन $णजीवी होती है । सन
ु ा
जा सके और दे खा जा सके वह सब $णजीवी है । जो अlqय और
आवाझर&हत (नादह(न) है वह( शाqवत सय है ।

164. क3सी मनुMय को हम शूB कहते है तब वह कुछ नह! 'सफF


हमारे मन क3 ‚मणा है । शूB या yािzमन के मुंह मE वj एकसमान होता
है । शूBने उपयोग मE 'लये हुए आसन को yािzमन पशF नह! करता और
उसी आसन पर शूB के साथ बैठता नह! है । कोई एक मनुMय ईस तरह का
बताFव शूBो के साथ करता है । दस
ू रे लोग उसे दे खते है और उसका
अनुकरण करते है ।
पMट!करणः हम क@सी को शूl कहे तो वह ओर कुछ नह( लेIकन मन
क@ Œमणा है । शर(र के कायK शूl और OािNमन के 4लए एकसमान होते है ।
व2G का टुकडा शूl या OािNमन के मुख म ठूंसा जाये तो एकसमान ह(
होता है OािNमन शूl के ~वारा उपयोग मे 4लया गया आसन भी उपयोग म
नह( लेता है या उसके साथ बैठता बी नह( है । यह सब मान4सक Œमणाएं
है । हIककत म अ2पqृ यता 2थूल शर(र क@ नह( लेIकन अंद:नी दग
ु ुण
K ो क@
है । मनु9य OािNमन या शूl उसके अEछे या बूरे गुणो से होता है । एक
मनु9य शूlने उपयोग म 4लये हुए व2G या बरतन को छूता नह( है । दस
ू रा
उसे दे खता है उसका एक अंध क@ तरह अनुकरण करता है । उसे उसक@
सह( वजह का पता भी नह( होता। दु नया म ऐसा सब कुछ आम तौर पर
128 चदाकाश गीता

होता रहता है । कृतने हमे तकKबु3t द( है लेIकन हम उसका सह( उपयोग


नह( करते।

165. जो लोग दस
ू रो को शूB कहते है वे खुद शूB है । केले के पौधे
क3 कलम हो और उसमE से अनेकLवध खाSय पदाथF हम बना सकते है ।
केला एक फल है और उसके टुकडे करके उसे तला जाता है तो उसे केला
नह! कहा जाता। उसे हम ‘वेफर’ कहते है । उसी तरह केले मE से बनी
अनेकLवध साम‰ी के नाम अलग अलग होते है । शुi मE एकसाथ सब केले
होते है लेXकन खाSय साम‰ी बहूत सार! बन स5ते है । मूल वiप एक ह!
है उसी तरह सब जीवो मE ‘ओमकार’ नाद एक ह! है ।
पMट!करणः शूl वे लोग है जो दस
ू रो को शूl कहते है । मनु9य
ईqवर म से पैदा हुआ है और अंतगोवा ईqवर म 3वल(न हो जानेवाला है ।
जात का फकK $णजीवी है । केले क@ शाखा एक हो तो उसम से अनेक3वध
खा~य साम|ी बनेगी। केला एक फल है लेIकन उसके टुकडे करके तला
जाये तो उसे हम केले क@ वेफर कहते है उसी तरह केले के अनेक3वध
Fयंजनो को हम केला नह( कहते उसी तरह मूल 2वCप एक ह( है । एक
अ3वभाxय ईqवर म से वै3वVयपूणK ONमांड का जम होता है । हम दे खते है
क@ वह 3व3वधता दे खनेलायक है । ईस सार( सिृ 9ट म छन ए1ता है ।
ए1ता म 3व3वधता का सा$ाकार करना वह मानवजीवन का ल[य है ।
ओमकार का नाद सभी ाणीओं म एकसमान है । ओमकार एक अ3वभाxय
और शाqवत है । ओमकार सारे 3वqव म Fयाwत है ।

166. एक रे लवे टे शन है , जहां चार रे लवे लाईनE 'मलती है । एक ेन


कोलकता जा रह! है । एक मुंबई जा रह! है । तीसर! मBास जा रह! है और
129 चदाकाश गीता

चौथी एक अ:य थान पर जा रह! है । ये सभी े ने एक टे शन से चलती


है और एक ह! टे शन पर ह! पहुंचती है । माया हमारे अंदर से पैदा होती है
और हमारे अंदर ह! अत होती है । माया वह दध ू मE रहे मŽखन जैसी
होती है । मŽखन दध
ू मE से पैदा होता है और दध
ू मE Lपघल जाता है ।
महान संतो के कथन द!घFकाल तक वतFमान रहते है , उसे सुननेवाला कोई
न हो तो भी चरं तन रहते है ।
पMट!करणः एक रे लवे 2टे शन ऐसा हो क@ जहां चार रे लवे लाईने
4मलती हो उसम से एक कोलकता जाती हो, एक मlास जाती हो और एक
मुंबई जाती हो और चौथी अय 2थान पर जा रह( हो उसी तरह माया क@
शु:आत मनु9य से होती है और अंतकाल म उसी म ह( 3वल(न हो जाती
है । माया के आगमन और नगKमन दोनो म ईqवर क@ उपि2थत है । माया
को आमा म 3वल(न करनी है , जहां से उसका उदभव हुआ था। माया दध

म रहते म˜खन जैसी है । जो दध
ू म से नीकलती है और दध
ू म 3वल(न हो
जाती है ऐसा ह( मनु9य का माया का है । संतो के कथन लंबे समय तक
रहते है । उसे सुननेवाला कोई न हो तो भी वे ONमांड म आंदोलन के
2व:प म रहते है । संतो के कथन कभी नरथKक नह( होते।

167. एक मैदान था वहां याjीओ के 'लए आवास बनाया गया। दो


@दन भी नह! बीते क3 वहां पर 'मट!ंग का आयोजन हुआ। चूने का उपयोग
प थरो को जोडने के 'लए Xकया गया था। सभी द!वारv को चन ू े के सफेद
रं ग से रं गी गई। चूने से जीस @दन द!वारE रं गी गई तभी बैठक रखी गई।
एक मजदरू को 'मट!ंग मE आते लोगो को चेतावनी दे ने के 'लए रखा गया
था। जीसका काम लोगो को पांव और शर!र पर चूना न लगे उसके 'लए
अ‰ीम चेतावनी दे ने का था। 'मट!ंग ख म हुई। लोग घर चले गये लेXकन
130 चदाकाश गीता

मजदरू वह!ं पर रहा। ईस बंगले मE बाद मE भी बहुत सार! 'मट!ंगE हुई


लेXकन मजदरू को कहनेवाला कोई नह! था क3 तुझे 'सफF नि)चत वेतन
पर रखा गया है । अब तेरा समय ख म हुआ है तुं तेरा वेतन लेकर जा
सकता है । 8ानी भी ईस दु नया के लोगो के बीच ऐसा ह! है । ईस दु नया
मE ऐसे कŒ लोग है जो बंगला मE रहते लोगो के जैसे होता है । उ:हE ‘सूoम’
का 8ान नह! होता। उ:हE कमF 5या है उसका भी 8ान नह! होता। ईस'लए
ह! ईस दु नया क3 तुलना बंगले के साथ क3 गई है ।
पMट!करणः Xानीओ क@ ईस दु नया के लोगो म पयाKwत दरकार ल(
नह( जाती। Xानी लोग जगत म रहकर अपना फझK बजाते है। वे अपना
फझK फल क@ आशा Iकये ?बना बजाते है । वे हरदम शाqवत सय बातो को
लोगो के सम$ रखते है लेIकन दु यवी लोग उनके कहने पर ल$ नह(
दे ते। लोगो को कमK 1या है उसका Xान नह(ं है । जगत क@ तुलना बंगले के
साथ क@ जाती है । जगत क@ तुलना बंगले के साथ, लोगो क@ तुलना
4मट(ंग म आये लोगो के साथ क@ जाती है । एक सपाट मैदान म बंगला
बनाया गया है । दो &दन बीते नह( क@ वहां पर 4मट(ंग रखी जाती है । चन
ू े
का उपयोग मकान के पथरो को जोडने के 4लए Iकया गया है । मकान के
सफेद रं ग का चूना लगाया गया। चूना लगाया तब 4मट(ंग रखी गई। एक
मजदरू को लोग 4मट(ंग म आये उह चूने क@ चेतावनी दे ने के 4लए रखा
गया है , जीससे लोगो के पांव और शर(र पर चूने के दाग न पडे। यह
मजदरू मतलब क@ Xानी है , जो लोगो को सांसाoरक जीवन क@ Gुट(ओं क@
ओर चेतावनी दे ने का काम करते है । Xान लोगो को सांसाoरक जीवन क@
बात $णजीवी है ऐसा बताकर चेतावनी दे ते है , जो नाशवंत है वह लोगो
को ईqवर के परमसुख के 4लए Xान दे ते है । 4मट(ंग खम हो और लोग
131 चदाकाश गीता

घर क@ ओर जाते है लेIकन मजदरू वह(ं पर खडा रहा। उस बंगले म अनेक


4मट(ंग हुई लेIकन मजदरू को कहनेवाला कोई नह( होता क@ तु अपना
वेतन लेकर चला जा। तुDहार( सेवा क@ ज:रत नह( है । Iफर भी मजदरू
अपना फझK बजाता रहता है । Xानी भी ईस दु नया के लोगो म मजदरू
जैसा है । ईस दु नया के बहुत सारे ललोग बंगले म रहते लोगो क@ तरह
जैसे होते है । उह सू[म का Xान नह( होता। उह कमK 1या है वह भी
पता नह( है । कमK वह है जो नरपे$भाव से Iकया जाये।

168. उसी तरह हमे सभी बातो क3 समझ ाDत करनी चा@हए। एक
चीज िथर खडी है । दस
ू र! काम करती है । सब एकदस
ू रे का अनुसरण करते
है । वे :याय और अ:याय दोनो से अ8ात होते है । :याय 5या है वह
समझने के बाद अ:याय के सामने झक
ू े गा नह!ं। :यायपण
ू F €यि5त के 'लए
अ:याय करना मुि)कल है । ऐसा मनुMय कभी जूठ नह!ं बोलेगा। भले ह!
उसक3 जीभ तूट जाये। अ:यायी €यि5त को सब चा@हए होता है । :यायपण
ू F
€यि5त को कुछ भी नह! चा@हए। वह कभी क3सी से डरता नह! है ।
अ:यायी €यि5तओ के मन जगत क3 ग ू थी मE फंसे रहते है। हर €यि5त
का फझF है क3 :याय 5या है और अ:याय 5या है ।
पMट!करणः मनु9य को याय और अयाय 1या है उसक@ समझ
होनी चा&हए। यह Xान ?बना का मनु9य दस
ू रे का अनुसरण करे गा। ईस
जगत म बहुत सारे लोग दस
ू रे का अनुसरण करते है । यायपण
ू K Fयि1त को
अयाय करना मुिqकल है तो अयायी Fयि1त को अयाय करना आसान
होता है । सEचा मनु9य कभी जूठ नह( बोलेगा भले उसक@ जीभ के टुकडे
जूठ न बोलने के 4लए हो जाये। अयायी और जूठे लोग हरदम सांसाoरक
जीवन मे म}न रहते है । नजर से &दखता है वह सब उह चा&हए होता है ।
132 चदाकाश गीता

सEचा मनु9य ईEछार&हत होता है । उसे कुछ नह( चा&हए। उसे क@सी का
भय नह( लगता। सारे 3वqव म समा हुआ है । उसे सांसाoरक जीवन क@
कोई खेवना नह( होती। हमारा प3वG फझK है क@ 1या यायपूणK है और
1यां अयायपूणK है है और वह हमारे आमा क@ पहचान करने का है ।

169. नद!यां और नालE सागर मE 'मलते है और सागर मE एकाकार


हो जाते है । उसी तरह kणजीवी चीजे अनंत चीजv मE एकाकार हो जाती है ।
Jैतभाव एक ई)वरभाव मE Lपघल जाता है । एक ई)वरवाद मतलब
एका मवाद। ईस एका मभाव क3 अनुभूत &ेMठ है ।
पMट!करणः अंतवाल( ($णजीवी) चीज अनंतवाल( चीजM म एक हो
जाती है । उसी तरह जैसे क@ नद(यां और नाल समुl म 3वल(न हो जाते है ।
उसी तरह अंतवाला यह जगत अनंत ईqवर म अंत समय पर एकाकार हो
जाते है । tैतभाव है वह एकेqवरवाद म 3वलुwत हो जाता है । सब एक हो
जाता है और एक सवK बन जाता है । एकेqवरवाद मतलब ईqवर क@
अनुभूत सभी म करनी चा&हए। अनुभूत वह +े9ठ चीज है ।

170. एक बार ई)वर के साथ मानवी एकाकार हो जाये बाद मE उसका


पन
ु ज
F :म नह! होता। जो लोग ई)वर मE तBप
ू हो जाते है तो वे जब चाहे
तब दे ह याग कर सकते है । ऐसे लोग ईnछार@हत होते है । ई)वर के साथ
एका मभाव बनाना बहूत ह! सo
ू म बात है । अLवभा\य BिMट क3 अनुभूत
मतलब सभी मE आ मा क3 अनुभूत करना वह है । यह समता मतलब
बहूत मE आ मा क3 अनभ
ु ूत करना वह है । ईसे आंतरदशFन कहा जाता है ।
यह लोक और परलोक जब ईसी जीवन मE एक*प हो जाते है तब
अLवभा\य BिMट 'सJ हो जाती है । ईसे जीवा मा और परमा मा का 'मलन
133 चदाकाश गीता

कहते है । जीव मतलब मनोवृ तयां। परमा मा अथाFत गाढ मौन जो तीन
गण
ु ो से पर होते है । वे खराब और अnछा कुछ समझते नह!ं, गमI-ठं ड से
पर होते है वह गण
ु र@हत है , व*पह!न, शू:य है ।
पMट!करणः मनु9य जममृ यु के च1कर म से जब उसे सब म एक
का अनुभव होता है तब मु1त हो जाता है । जो लोग अचल तौर पर ‘एक’
के भाव म ि2थर हो जाते है तब वे चाहे तब मर सकते है । ऐसे लोग
ईEछार&हत होते है । बहुत म एक क@ अनुभूत बहूत ह( स[ू म चीज है ।
वै3वVय म ए1ता का अनभ ु व करना वह मानवजीवन का ल$ है। एक lि9ट
मतलब सभी म आमा का अनभ
ु व करना वह है । आंतरदशKन मतलब ईqवर
का दशKन सवK बातो म करना वह है । ईसे जीवामा और परमामा का
एकव कहा जाता है । जीवामा और परमामा (ि2पoरट) मूलतः एक ह( है
Iफरभी जीव का अि2तव अलग होता है । खास तौर पर तब जब क@ वह
सांसाoरक वृ तयM म म2त होते है । परमामा गाढ मौन है जो क@ तीन
गुण-सव, रजस, तमस से पर होते है । उह बूरा-अEछा, गम‰-ठं ड क@सी
बात क@ अनभ
ु ूत नह( होती। परमामा सवvपर( है । वह सह( अथK म
ि2थतX है , वह गुणर&हत, 2व:पर&हत शुt 2वव:प है ।

171. सद˜ क3 ठं ड मE शर!र को जीस तरह ढं का जाता है उतनी ह!


\यादा ठं ड लगती है । जो लोग अपने शर!र को सजाते है वे \यादा से
\यादा गवF का अनुभव करते है । हमारे अंदर से अहं को नMट करना
आसान नह! है । च त (Rदय) के अंदiनी भाग मE जीतना भी चूना लगाकर
सफेद करने क3 जiरत है उतनी जiरत बाहर! ओर नह! है । बाzय
वnछता अ:य को @दखाने के 'लए है । अंदर क3 वnछता आ मकdयाण
के 'लए होती है ।
134 चदाकाश गीता

पMट!करणः हमे ईिlयो का जीस तरह लालनपालन करते है उतनी


ह( वे हमे xयादा पीडा दे ती है । ठं ड मे xयादा से xयादा गमK व2G पहनते
है तो ठं ड xयादा लगती है । ईिlयM को अकतरफ मानकर उह न9ट करनी
(नयं?Gत करनी) चा&हए। शर(र के बाहर( आवरण कुछ के काम के नह(ं है ।
हमारे 4लए शर(र के अहं को 4मटाना बहूत ह( क&ठन है । सफेद रं गकाम
शर(र का नह( लेIकन चत क@ द(वारो का करना है । बाहर( शुtता दस
ू रो
को &दखाने के 4लए है लेIकन अंद:नी शुtता 2व-कWयाण के 4लए है ।
अंद:नी शुtता मनु9य के 4लए जCर( है । बाNयाचार नह( लेIकन मन शुt
रखना है । ईसी से ह( ईqवर क@ अनुभूत करना संभव है ।

172. वह सवF मE €याDत है । वह सभी जीवो मE €याDत है । वह सभी


गण
ु ो मE €याDत है । वह ओमकार है । जीसका वiप अLवनाशी शांत है वह
उसके पर &Jा रखनेवालो का परम@हतकार! है । यह! ई)वर उनके भ5तो को
पीडा दे नेवाले को सजा भी दे ता है । वह उनके भ5तो क3 म ृ यु आसान
करता है । हे 'शव, मुझे नकF क3 ओर मत ले जाना लेXकन आपक3 ओर
खींचे। 'शव दाता है ।
पMट!करणः ईqवर सवK Fयापक है । वह सवK जीवो म Fयाwत है । वह
एक गुणर&हत ओमकार है । उसका एकमाG 2व:प अ3वनाशी शआंत है ।
उनके पर +tा रखनेवालो का वह परम&हतकार( है लेIकन उनके भ1तो के
lोह(ओ को वह सजा भी दे ता है । उनके भ1तो क@ मृ यु को सरल और
पीडार&हत करते है । हे 4शव, हम नकK क@ ओर मत ले जाना, हम आपक@
शरण म रखना। आप परमकृपालु दाता हो।
135 चदाकाश गीता

173. मत
ृ क चीज मE गत नह!ं होती, वह आवाजर@हत होती है तो
जीLवत चीजो को आवाझ क3 ‚मणा होती है । उसमE चेतना होती है । सजीव
ाणीओ मE हु'लया और गत होती है । आवाझ से सचेत जीवो को आवाझ
क3 ‚मणा होती है । उनमE yzम काश होता है । ाणीओ क3 सचेतन
अवथा मE काश है । मानवी को :याय और अ:याय क3 अनुभू त होती है ।
नन &ेणी के ाणीओ मE ईस तरह के भेद नह! होते। मनुMय सिृ Mट के
सवF ाणीओं मE &ेMठ है । मनुMय के 'लए ईस जगत मE कुछ भी असंभव
नह! है । मनुMय yzमांड मे है और yzमांड मनुMय मE है । मनुMय ाणीओ मE
&ेMठ ाणी है लेXकन मनुMय का द!माग चंचल है । मनुMय मE आलोक और
परलोक दोनो एकाकार हो जाते है । 'शवलोक द!घFचkु है । 'शवनाडी मतलब
सुष
ु णा नाडी और वह yzमनाडी कह! जाती है । 'शवलोक के दे वता ओर
कुछ नह! लेXकन 'शवशि5त है । माया 'शव मE है । सजFन और Lवनाश 'शव
क3 माया है । yzमा मE सभी छ:न शि5तयां है । आ मा, yzमा, जागृ त
चेतना, तकF, नBा, ध`र, अ8ान सारा बाहर! जगत उसमE समाया है ।
पMट!करणः मनु9य म रहे ाणो क@ वजह से उसमे गत होती है ।
मत
ृ क चीजो म गत नह(ं होती। वह आवाझर&हत है । जी3वत चीजो म
चेतना होती है और वह मानवमन क@ Œमणा है । सचेत ाणीओ क@ परछाई
और गत होती है । उनम 3वचारशि1त होती है । ाणीओ आवाझ से सचेत
होने क@ वजह से उनम आवाझ क@ Œमणा होती है । मनु9य म रह( चेतना
या सचेतन अव2था उनमे रहनेवाला ONमकाश है । मनु9य याय और
अयाय का फकK समझ सकता है । नDन क$ा के ाणीओ के 4लए यह
शि1त नह( होती। सिृ 9ट के सज
ृ नकताK का मनु9य +े9ठ और उतम ाणी
है । उसम न4भK1ता हो तो जगत म कुछ भी 4सt करना उसके 4लए
136 चदाकाश गीता

असंभव नह( है । मनु9य ONमांड म है और ONमांड मनु9य म है । मनु9य


ONमांड को नयं?Gत करती शि1त का 3वकास अपनेआप म कर स1ता है
और उसके साथ एकाकार हो सकता है लेIकन मनु9य का मन चंचल है ।
मन क@ चंचलता का नाश होना चा&हए और मन परONम पर केl(त होना
चा&हए। मनु9य ईस जीवनकाल म ह( अ…यास से मो$ क@ ािwत कर
स1ता है । मो$ मतलब 1या? तो कहा जाता है क@ आलोक और परलोक
दोनो को ईस जम म एक करना मतलब मो$। 4शवलोक मनु9य का
&दFय च$ु या तृ तय आंख है । 4शवनाडी मतलब सुषD
ु ना नाडी या जीसे
ONमनाडी भी कहा जाता है । 4शवशि1त मतलब 4शवलोक के दे वता। माया
4शव म है लेIकन 4शव माया म नह(। माया का उŸव 4शव म हुआ है
लेIकन 4शव का उदभव माया म हुआ नह( है । माया का 2तर 4शव से
नीचा है । सज
ृ न और 3वनाश दोनो माया 4शव के ~वारा पैदा होती है । 4शव
क@ Eछन शि1त ह( सब करती है । जीसका सज
ृ न-3वनाश नह( हो
सकता। परमामा म ह( सब छूपा हूआ है । भाव, आमा, मानस, ONमा,
जागृ त चेतना-तकK, नlा, गाढ नlा और सारा बाहर( 3वqव सब है । परम
ONम के सा$ाकार से मनु9य को सब उसम एकाकार कर दे ना चा&हए।
ईस ि2थत का सा$ाकार हो तब सब शूयवत हो जाता है । सब वह(
रहता है ।

174. स य क3 शोध के 'लए सूoम Lववेक ज*र! है । यह सूoम Lववेक


उपध है । सूoम है वह थूल मE छूपा है । उपध का थान Rदयाकाश है ।
कंु ड'लनी को चदाकाश मE थाLपत Xकया जाये तब सांसे एक हो जाती है ।
यह उnचतम िथत मE yzमांड अपनी आ मा मE @दखाई दे ता है और तब
€यि5त सब उसी मE दे खता है । सभी तरह के प`रवतFन आ मा मE @दखाई
137 चदाकाश गीता

दे ते है । Jैतभाव का अनभ
ु व करना वह नकF के समान है । पण
ू F एक व का
भाव वह मुि5त है । पूणF भि5त वह मुि5त है । पण
ू F शांत, अवरोधर@हत
शांत वह मनुMयजीवन का लoय है । यह योगानंद ह! परमानंद है ।
महासागर सभी नद!यv से बडा होता है । महासागर क3 सीमा नह!ं होती।
महासागर के जल को नापना असंभव है । संसार को याग कर भि5त
करना संभव नह!ं है । हमे संसार मE रहकर मुि5त ाDत करनी है और वह
संसार मE रहकर भि5त करते करते, ईnछा अथाFत संसार! ईnछार@हत दशा
मतलब मुि5त। मुि5त 'मले तो परमानंद 'मलेगा, शा)वत 8ान
(समझदार!) 'मलेगी। शा)वत शांत वह उnचतम सुख है क3 वह
मनुMयजीवन का लk है । जब मन शा)वत सुख मE तैरता हौ तब उसे
मुि5त कहा जाता है । भि5त शा)वत सुख क3 िथत है ।
पMट!करणः ईqवर के सा$ाकार के 4लए सू[म 3ववेक जCर( है ।
सू[म 3ववेक मतलब उपध। सू[म है वह 2थूल म छूपा है । ईqवर सू[म है ,
ईस4लए वह जगत क@ हर 2थूल बातो म समाया है । सू[म 3ववेक का
मूल2थान „दयाकाश (चदाकाश) है , जब कंु ड4लनी को चदाकाश म
मि2त9क तक ले जाया जाता है तब सांसे एक ह( रहती है और उसे
अंद:नी सांस कहते है । यह उEचतम ि2थत तब ONमांड हमारे अंदर रहता
है । हम एक परम शि1त का 3वकास करगे, जीससे ONमांड ट(का रहता है ।
ऐसी ि2थत म हम सब कुछ हमारे अंदर दे ख सकते है । सब तरह के
अलग अलग पoरवतKन हमारे अंदर दे ख सकगे। ऐसी ि2थत म जगत क@
सभी घटनाएं हमारे चत म दे ख सकगे। सिृ 9ट के 3वनाश और सज
ृ न दोनो
को चदाकाश म दे ख सकगे। tैतभाव से बडा नकK कोई नह( है ।
एकामभाव वह मुि1त है । अचलतापूणK भि1त वह मुि1त है । भि1त वह
138 चदाकाश गीता

ईqवरािwत का साधन नह( लेIकन साVय है । सEची भि1त अथाKत नमKल


ेम। मानवजीवन का ल[य शाqवत शांत-अंतरायर&हत शांत है । शाqवत
शांत मतलब योगानंद और वह( है परमानंद। महासागर जगत क@ सभी
नद(यM से बडा है । महासागर क@ सीमाएं नह( होती। महासागर के जल को
नांपना असंभव है । उसी तरह ईqवर मनु9य क@ बु3t से पर है । ईqवर
हमार( समझ से बहूत xयादा महान है । संसार को यागकर भि1त करना
संभव नह( है । संसार म रहकर ह( ये Iकया वह Iकया करके ह( मुि1त
ाwत होती है । संसार क@ नद( म भीगकर ह( नद( के पार जा सकते है ।
संसार क@ नद( को पार करने के 4लए उसके अंदर तैरना ज:र( है । संसार
मतलब ईEछाएं। मुि1त अथाKत ईEछार&हत दशा। मुि1त ाwत होती है तभी
हम शाqवत सुख का आनंद ाwत कर सकते है । शाqवत शांत मतलब
परमसुख। मनु9य का जीवन ल[य है । मानवमन जब शाqवत शांत के
महासागर म तैरता हो तब उसे मुि1त कहा जाता है । भि1त उसी तरह
शाqवत सुख क@ ि2थत है ।

175. ई)वर सुख है । ई)वर मE सुख है । वह समझदार! का अमत


ृ है ।
ईस अमत ृ मE आनंद है । जब हम ईस अमत
ृ तक पहुंचते है तब आनंद क3
अनुभूत होती है ।
पMट!करणः ईqवर सुख है और सुख ह( ईqवर है । यह सुख मतलब
समझदार( का अमत
ृ । वह समझदार( का फल है । यह अमत
ृ मतलब दस
ू रा
कुछ नह(ं लेIकन आनंद है । जब हमे उEचतम Xान क@ ािwत हो तब यह
परमानंद क@ अनभ
ु ूत हमे होती है । यह सुख से xयादा उं चा सख
ु जगत म
ओर कोई नह( है ।
139 चदाकाश गीता

176. मनुMय का जीवन लoय उपनयन मतलब ‘अम ृ मता’ क3 ओर


ले जाना वह है । च त का गफ
ु ा मE रहना वह मानवजीवन का लoय है ।
गफ
ु ा मE रहना मतलब शर!र मE रहना ऐसा अथF होता है ।
पMट!करणः मनु9य (ाण) का Vयान हरदम बाहर( शर(र पर केl(त
होता है लेIकन जब वह Vयान अंद:नी बातM क@ ओर ले जाते है तब
मनु9य सवvतम सुख का आनंद ाwत कर सकता है । ईसे ‘उपनयन’ कहा
जाता है । „दयाकाश म रहना वह मनु9य का ल[य है । गफ
ु ा म रहना
अथाKत शर(र म रहना वह है । मनु9य को सचेतना के आकाश म एक होकर
रहना चा&हए।

177. अLवरत तर!के से मनुMय के जीवा मा मE रहनेवाले परमा मा का


नरं तरiप से Zयान करते रहE । जीसे ‘आकाश’ कहा जाता है वह हमारे
‘च त’ मE है । हम अLवरत भाव से ‘चदाकाश’ पर Zयान के:B!त करE । यह
सह! Zयान है ।
जीवामा ह( परमामा। हमारे जीवामा म बसे परमामा का नरं तर
Vयान करते रहे । ‘आकाश’ जीसे कहते है वह हमारे ‘चत’ म है । हमे
अ3वरत तर(के से ‘चदाकाश’ पर Vयान केl(त करना चा&हए। यह( सEचा
Vयान है ।

178. जो लोग ज:म से ह! बहे रे होते है उ:हE आवाझ का कुछ पता


नह! होता। उन लोगो को कोई ईnछाऐं नह! होती। उनमE सूoम Lववेक होता
है । जो लोग योग नंBा मे होते है उ:हE कभी रात-@दन, सूय-F चंB का फकF
मालूम नह!ं होता। जीन लोगो नE मन को जीता है वे ‘मानव’ है । ननतर
के ाणी उ:हE कहा जाता है जीनका मान'सक Lवकास कम हुआ है । कामी
140 चदाकाश गीता

जीवन पशु का जीवन है । सांसो का ऊZवIकरण मनुMयजीवन का लoय है ।


वह! गायjी है और वह! 'सJ हो तब योग सुख है ।
पMट!करणः Xानी लोग सदै व समाध म रहते है । उह रात-&दन,
सूय-K चंl म फकK मालूम नह( होता। जो मनु9य जम से ह( बहे रे है उह
आवाझ 1या है वह पता नह( होता। उन लोगो को कोई ईEछा नह( होती।
उनम सू[म 3ववेक होता है । Xानीओं को कोई ईEछाएं नह( होती और
tैतभाव न9ट हो जाता है । सब कुछ सू[म 3ववेक क@ वजह से एक हो
जाता है । फकK 4सफK 2थुल 2वCप का होता है । मानव वह है जो अपने मन
को नयंGत करता है । ाणीओ मनु9य से नीचल( क$ा म ईस4लए गना
जाता है क@ 3वकास के नीचले 2तर म होते है । कामी जीवन पशु का
जीवन है । सांसो को ऊVवK &दशा म ले जाया जाता है और तब परमसुख
4सt होगा। परमसुख वह है जीसे ‘योग सुख’ कहा जाता है ।

179. जीसने मन को जीता है वह जगSगi


ु है । जो ईnछाओ के मल

और शाखाओ को नMट करे वह सब का गi
ु है ।
पMट!करणः वह मानवी जगदग:
ु है जीसने अपने मन को जीता है ।
ग:
ु बनने के 4लए मनु9य को अपनी ईEछाएं जला दे नी चा&हए। ईEछा क@
पतल( परत होती है जो क@ जीवामा को परमामा के साथ एक होने से
(पैसा) रोकती है ।

180. सnचा सं:यासी वह है , जीसने अपनी ईnछाएं जला द! हो। वह


जगSगi
ु है । जीन लोगोने अपनी ईnछाओ का दहन Xकया है उनमE yzमांड
है । ‘आकाश’ मतलब सं:यास। वह! काश है और वह! चेतना है । वह! @द€य
141 चदाकाश गीता

काश है । बाहर! और अंदiनी अि^न है । वह! सूoम Lववेक का अि^न है ।


सूoम Lववेक क3 शि5त yzमांड मE है ।
पMट!करणः सEचा संयासी है वह अपनी ईEछाएं जला दे ता है । ऐसा
ह( संयासी जग~गु: कहा जाता है । ऐसे मानवी म ह( ONमांड है । ऐसे
लोग अपनेआप म ऐसी शि1त का 3वकास करते है , जीससे ONमांड को
नयं?Gत कर सके। संयास आकाश क@ तरह शुt हौता है । संयास
दाहर&हत होता है । संयास आकाश क@ तरह ONमFयापी होता है । संयास
एक काश है । संयास मानवी को बाहर( जगत के ग ढे वाले रा2तM पर से
ईqवरसा$ाकार तक सुर#$त तौर पर पहुंचा दे ता है । संयास सचेतन
अव2था है । संयास से हम ऐसी ि2थत म आ सकते है जो हम परम
चेतना तक ले जायेगी। संयास &दFय काश है । वह बाNय और अंद:नी
जगत दोनो के 4लए है । संयास सू[म 3ववेक का अि}न है । सEचे संयास
से ईस जगत म “सब” (अथाKत ईqवर) क@ ािwत होती है । सू[म 3ववेक क@
शि1त ONमांड (परम) म है ।

181. अि^न मल
ू तः अंदiनी चीज है। अि^न सभी मE &ेMठ है । सम‰
सिृ Mट का मूल अि^न है । थम हमे साkा कार करना चा@हए और बाद मE
उसका लाभ अ:य को दे ना चा@हए। हमारा मनुMय के तौर पर उnचतम
फझF है । जब आपको दःु ख क3 अनुभू त होती है तब उस चीज का Žयाल
रखना है क3 दस
ू रो को हमारे जैसा ह! ददF होता है । अगर आप को भूख क3
अनुभूत होती है तो दस
ू रो को भी आपक3 तरह भूख लगती है । हमE यह
सोचना चा@हए क3 हमारा लoय वह दस
ू रो का भी लoय है । जो डो5टर कोई
दवाŒ जानता हो और दस
ू रे को म ृ युपय™त बताता है तो वह मनुMय नह!
कहलायेगा। Lव)व का उnचतम 8ान ई)वर का 8ान है । यह 8ान अ:य को
142 चदाकाश गीता

दे ना चा@हए, जीससे वे समझे क3 भूखेलोगो को अ:न दे ना चा@हए। ई)वर


के बारे मE आपको कोई कभी तब तक नह! पछ
ू े गा जब तक उसके पास
LववेकबLु J न हो।
पMट!करणः अि}न एक अंद:नी बात है । अि}न अथाKत Xान का
अंद:नी अि}न। अि}न 3वqव क@ सबसे महान चीज है । सिृ 9ट क@ जड
अि}न म है । मनु9य का सबसे महवपूणK फझK अपनेआप को
ईqवरसा$ाकार कराना है और उसक@ अनुभूत दस
ू रो को कराना है । जब
हमे भूख क@ अनुभूत होती है तब हम यह ˜याल रखना चा&हए क@ दस
ू रो
को भी भूख लगती है । जब हम ददK क@ अनुभूत होती है तब दस
ू रो को भी
हमार( तरह ददK होता है । हम ये सोचना चा&हए क@ हमारा जो ल[य है वह
दस
ू रे का भी ल[य है । जीस तरह हम खुद का अनुभव करते है उसी तरह
दस
ू रे लोगो को भी हमारे जैसा समान मानना चा&हए। हमे ईqवर के साथ
एकाकार होना है । कोई डो1टर दवा का Xान रखता है और मृ युपयत दस
ू रो
को बताये नह( उसक@ मृ यु के साथ 3वqव के 4मलनेवाला लाभ न9ट हो
जायेगा। उसी तरह हमने ाwत Iकया हुआ Xान हम दस
ू रो को न दे तो
वह भी हमारे साथ ह( न9ट हो जायेगा। अगर हम ईqवरसा$ाकार का
Xान ाwत करते है और दस
ू रो को नह( दगे तो हम मनु9य नह(ं है । ईqवर
का Xान वह +े9ठ Xान है । यह Xान ाwत करने के बाद दस
ू रो को दे ना
चा&हए। जो भूखे है उह अन दे ना चा&हए। उसी तरह (ि2पoरEयुअल)
आVयािमक Xान दस
ू रे Xान3पपासुओ को दे ना चा&हए। ईqवरािwत क@
ईEछा हो उसके 4सवां ई्qवर के 4लए कोई पूछता नह( है । सू[म 3ववेक
रखनेवाला Fयि1त ह( ईqवर का Xान ाwत करने के 4लए यास करता है ।
143 चदाकाश गीता

182. थम आव)य5ता &Jा क3 है । दस


ू र! आव)य5ता भि5त है ।
जीन लोगो को &Jा न हो उनमE भि5त नह! होती। :यायाधीश तवाद! को
भी शांत से सुनते है । &Jा का भी ऐसा ह! है । जब बLु J सूoम Lववेक का
तर ाDत करती है तभी हम Lववेकानंद ाDत कर सकते है । Lववेकानंद
अथाFत परमानंद। वह! सिnचदानंद। जब अित व और च त एक होते है
तब सnचा आनंद पैदा होता है । यह! yzमानंद और 'शवानंद है।
पMट!करणः ईqवरािwत के 4लए थम आवqय1ता +tा क@ है । दस
ू र(
आवqय1ता भि1त है । +tा के ?बना लोगो म भि1त नह( होती। भि1त
+tा का फल है । यायाधीश तवाद( को भी सन
ु ते है । +tा का भी ऐसा
ह( है । जजब बु3t सू[म 3ववेक 4सt करती है तब 3ववेक-आनंद ाwत हो
सकता है । 3ववेक-आनंद वह( परम आनंद और वह( सद, चत, आनंद है।
जब अि2तव और Xान (चत) दोनो एक हो जाते है तब आनंद पैदा होता
है यह( परमानंद और यह( 4शवानंद है ।

183. 'शव हमारे अंदर है और हम 'शव के अंदर है । माया भी हमारे


अंदर है । सिृ Mट के Lवनाश और सज
ृ न दोनो माया मE है । जो लोग तीनो
गण
ु ो मE से मु5त हो गये है वे माया से मु5त हो जाते है । जो लोग अपने
शर!र क3 ‚मणा मE से मु5त हो जाते वे ओर कुछ नह!ं लेXकन मूतFमंत
परमहं स है । मान-अपमान के Lवचारो से मु ्त हो जाना वह आि मक
(अंदiनी) है ।
पMट!करणः जीव ह( 4शव है और 4शव ह( जीव है । माया हमारे अंदर
है । सिृ 9ट का 3वनाश और सज
ृ न माया क@ वजह से होता है । जो लोग तीनो
गण
ु ो से मु1त होते है वे माया से मु1त हो सकते है । जो मनु9य खुद
मानवशर(र है और Œमणा म से मु1त हो गया हो वह ओर कुछ नह(
144 चदाकाश गीता

लेIकन जी3वत परमहं स है । ऐसे लोगो को माया 2पशK नह( करती। वे


परमसुख ाwत करते है । जो लोग मान-अपमान के 3वचारो से मु1त हुए है
वे 2वयं आमा है । आमा को मान-अपमान से फकK नह( पडता। आमा
सवvपर( है ।

184. ईस जगत मE मान-अपमान के त उदासीन हो जाते है ।


उ:हvने लoय 'सJ Xकया है । ये लोग परम शांत ाDत करते है।
पMट!करणः परम शांत वह मानवजीवन का ल[य है । यह परम शांत
वे लोग ह( ाwत कर सकते है , जो मान-अपमान, गम‰-ठं ड, आनंद-दःु ख,
अEछे -बूरे क@ संवेदना से मु1त हो गये हो।

185. अनंत-अLवभा\य मE कोई नाशवंत के Lवभा\य चीज नह! हो


सकती। गi
ु के Yबना 8ान संभव नह! है वे लोग अपने लoय 'सJ नह!
कर सकते।
पMट!करणः ईqवर म माया नह( होती। अ3वभाxय-अनंत म कोई
3वभाxय-नाशवंत चीज नह( हो सकती। जहां काश है वहां अंधकार नह( हो
सकता। दोनो साथ नह( रह सकते। जीन लोगो के गु: नह( है वे ईqवर का
सा$ाकार नह( कर सकते। ग:
ु ईqवरसा$ाकार क@ वजह है । पoरणाम
4श9य के ~वारा ईqवर का सा$ाकार है ।

186. मनुMय क3 भौतक आंख क3 कdपना करE । अंध मानवी के हाथ


मE मोमबती हो तो भी उसके 'लए रोशनी कुछ काम क3 नह! है । जीन
लोगो के पेट भरे हुए है उ:हE \यादा आहार क3 जiरत नह! होती। खाना
तैयार हो तो उसक3 खु)बू से हम पेट नह! बर सकते। तैयार आहार खाते
तभी हमारा पेट भरता है । सुवणF का टुकडा हाथ मE रखने से उसका कोई
145 चदाकाश गीता

उपयोग नह! हो सकता। उसे अि^न मE पीघलाकर उसके अंदर का कचरा दरू
करना चा@हए तभी वह का'शत होता है उसी तरह मन का कचरा ईnछा
और rोध है उसका नाश होना चा@हए।
पMट!करणः अंध मानवी के 4लए रोशनी कुछ काम क@ नह( है भले ह(
वह मोमबती हाथ म रखकर खडा हो उसी तरह Xान और Xानी का ईस
संसार के लोगो के 4लए कोई उपयोग नह( है । भले ह( वह उन लोगो के
साथ रहता हो। जीस तरह लोगो के पेट भरे हो उनको xयादा आहार क@
आवqय1ता नह( होती उसी तरह जो लोग आVयाम के उEचतम 2तर पर
पहुंचे है उनके 4लए अय क@ कोई मदद क@ आवqय1ता नह( होती। वह
आमसंतु9ट रहे गा और परम शांत उसमे होगी। हमार( भूख 4सफK खूqबू
लेने से संतु¡ट नह( होती। भूख क@ तिृ wत के 4लए आहार लेना ज:र( है ा
हमे ईqवर के परम सुख के बारे म Iकताब पढकर या उसके बारे म सुनकर
परम शांत ाwत नह( होगी। हमे अनुभूत करनी पडती है । सुवणK का
टुकडा हाथ म हो तो उसका कुछ उपयोग नह( होता लेIकन उसे पीघालकर
उसम से कचरा दरू Iकया जाता है तभी वह का4शत होता है। ईसी तरह
मन का मैल ‡ोध और ईEछाएं दरू क@ जाये तभी मन शुt होता है । ऐसा
होता है तब आमसा$ाकार होता है ।

187. पkी के 'लए उसका घvसला और आ मा के 'लए मनुMय शर!र


समान है । शर!र आ मा का घर है । यह घर और वह घर यह एक सूoम
Lववेक का Lवषय है । थूल शर!र 'भखार! क3 झšपडी है । yzमांनंद के 'लए
5या कहना? वह वणFनातीत है । हXककत, अनभ
ु वो या शा)वत आ मा है वह
सब मE समान है । माया को 8ान नह! होता। 'शव 8ानी है । माया चंचल
है । माया मानवी को यह या वह चीज के 'लए ‚'मत करती है लेXकन वह
146 चदाकाश गीता

कुछ काम का नह! है । माया को 'शव मE एक कर @दजीये। ह`र-ह`र अथाFत


माया क3 वजह से च त‚म हो कर दौडते रहना वह ‚मणा के 'सवां ओर
कुछ नह!। आप 'शवमय हो जाये और मन क3 ‚मणाओ को मन मE
सी'मत कर @दजीये। आपको शा)वत आनंद 'शवने @दया है । 'शव
मुि5तदाता है । 'शव भि5तदाता है । ह`र अथाFत माया और माया मतलब
मन को जगत मE घूमाते रहना। 'शव सारे Lव)व को खुद मE के:B!त रखते
है । माया मE ल!न रहना मतलब खुद को नीचा करना लेXकन 'शव का
समरण परम सुख का मागF है । मुि5त मतलब ाण को उZवFगामी करना
वह है । माया मतलब Yबना लगाम का अ)व।
पMट!करणः शर(र वह आमा का शाqवत घर नह( है । प$ी के 4लए
जो 2थान घMसले का है वह 2थान आमा के 4लए शर(र का है । मानवशर(र
को आमा के घर के तौर पर मायता और आमा 2वयं के तौर पर जो
समझ है वह सू[म 3ववेक क@ बात है । उसी तरह मानवशर(र यह ‘घर’, वह
‘घर’ ऐसा मानना लेIकन मानवी क@ आमा के तौर पर न माना जाये तो
वह भी उस सू[म भेद (3ववेक) का 3वषय है । 2थूल शर(र 4भखार( का घर
है । ONमानंद का 3ववरण नह( कर सकते, वह वणKनातीत है । हIककत म
शाqवत आमा एक है और वह सब म एकसमान है । हoर अथाKत माया।
4शव जगत के सवKXाता है । माया Xान नह( है । माया क@ वजह से मन
चंचल रहता है और मानवी को यहांवहां घूमाता है । 4शव एककेl( है ।
मानवी माया म ल(न होकर यह चा&हए, वह चा&हए ऐसा कहने का 1या
मतलब? जो मनु9य माया का हरदम चंतन करके ईEछाओ क@ तिृ wत के
4लए यास करता रहता है वह कभी सुखी नह( रहता। ईEछाओ का दहन
करके हoर को हर म एकाकार कर दे नी चा&हए मतलब 4शव म माया के
147 चदाकाश गीता

एकाकार कर दे नी चा&हए। ‘हoर हoर’ कहना मतलब वह माया क@ Œमणा है


लेIकन हर, हर कह और वह भी सू[म 3ववेक से तो परम सुख ाwत होता
है और परम शांत और शाqवत भि1त ाwत होती है । हoर का मतलब 1या
है ? तो माया को चत म रखना वह 4शव मतलब ONमांड को अपनेआप म
एक कर के रखनेवाल( शि1त है । वह ईEछार&हत है । सारा &दन हoर हoर
करना मतलब माया म ल(न रहना जो अपना 2थान नीचा करने जैसा है ।
4शव परम सुख ािwत का मागK है । मुि1त ाण को ऊVवKगामी करने से
ाwत होती है । हoर मतलब माया ?बना लगाम का अqव है । हoर मतलब
माया के 4लए मन को नरं कुश रखना वह है । नरं कुश घूमता मन ?बना
लगाम का अqव जैसा है । हर अथाKत 4शव ािwत आमा का सा$ाकार एक
भि1त से करना वह है ।

188. दो हजार लोगो क3 भीड के बीच घुडसवार! करना वह


कायFkमता का Lवषय है । बLु J उपर और मानस नीचे है । बLु J राजा है ,
मानस धानमंjी है । मन बLु J के अधीन होना चा@हए। थम मतलब मन
वह नाद है और बLु J एक गूंज है । मन ाथ'मक गi
ु है , दस
ू रा गi
ु े`रत
करनेवाला है । दस
ू रा 'शkक है । ाथ'मक गi
ु वह है जो क3 खुद अTयास
करता है । आ मा का साkा कार या अनभ
ु ूत वह ाथ'मक गi
ु है । आप
दस
ू रे गi
ु क3 ईnछा करोगे तो ह! गi
ु होते है । जब क3सी चीज को ाDत
करने क3 या रखने क3 ईnछा हो तब आनुषांगक गi
ु ओ क3 जiरत होती
है । आनुषांगक गi
ु वह है जो क3 तालाब क3 ओर ले जाते है और
ाथ'मक गi
ु वह है जो खुद तालाब मE से पानी पीते है । ाथ'मक गi

आपमE रहनेवाले अ8ान के अंधकार को दरू करते है और काश दे ते है ।
अंधकार मतलब अ8ानता। 8ान अथाFत काश। सूoम Lववेक का मागF
148 चदाकाश गीता

माया एक ओर रखकर बताए वह! सnचा गi


ु है । एक गi
ु 'शव है , जो सारे
yzमांड मे €याDत है । एकदस
ू रे का गi
ु बन नह! सकते अथाFत ‘एक’ वह
आनुषांगक गi
ु है । गi
ु yzमांड का दे व है । वह ओमकार वह! yzमा, वह!
LवMणु और वह! महे )वर है । जो परyzम का मूल है । LवMणु मन क3 वृ तयां
है । 'शव शर!र का शणगार है । yzमे)वरा अथाFत शर!रभाव का याग
करना। जीस तरह ना`रयल क3 खाल को कोपरे से अलग Xकया जाता है
उसी तरह शर!र के भाव को अलग करना ह! उसका सह! अथF है ।
पMट!करणः दो हजार लोगो क@ भीड़ म घुडसवार( करने के 4लए
घुडसवार म कौशWय होना चा&हए। घुडसवार म जीस तरह अqव के उपर
सवार होने का कौशWय होता है । उसी तरह मानवी म परONम के
सा$ाकार के 4लए सतकKता और कौशWय होना आवqयक है । बु3t का
2थान मन से ऊंचा है । मनु9य को अपने मन को बु3t के अधीन रखना
चा&हए। बु3t राजा और मन धानमंGी है । धानमंGी को राजा क@ सुचना
के अनुसार चलना है । हम आवाझ थम सन
ु ते है और बाद म उसक@ गूंज
सुनाई दे ती है । ऐसे हमे दस
ू रे गु:-आनुषांगक गु: क@ ज:रत होती है।
आमा का सा$ाकार वह पoरणाम है । ाथ4मक गु: मनु9य का मानस है।
आनुषांगक गु: जो क@ आपको सा$ाकार के मागK पर ले जानेवाले बाहर(
गु: है । थम ाधाय मन को &दया गया है 1यMक@ आमासा$ाकार के
?बना आमा का सा$ाकार नह( हो सकता ईस4लए उसका मतलब यह होता
है क@ जो Xान द वह बाहर( गु: आनुषांगक गु: है । ाथ4मक गु: वह
आमसा$ाकार के यास-अ…यास है । सा$ाकार ह( ाथ4मक गु: है ।
बाहर( गु: क@ ज:रत तब तक होती है जब तक हमारा मन जगत के
आनंद के पीछे घूमता रहता है । बाहर( गु: तालाब का रा2ता &दखाते है ।
149 चदाकाश गीता

ाथ4मक गु: वह है जो तालाब का पानी पीते है । ाथ4मक गु: हमारे


अंधकार का नाश करते है और काश क@ ओर ले जाते है । अंधकार ह(
अXानता है । काश Xान है । गु: वह( है जो सू[म का रा2ता &दखाते है
और 2थूल चीजो का याग करने के 4लए बताते है । ONमांड के अध9ठाता
ईqवर सब के गु: है । ‘एक’ जो है वह दस
ू रे के गु: नह( है । एक है वह
आनुषांगक या बाहर( गु: है । गु: ONमांड के दे वता है वह ओमकार, वह(
ONम, वह( 3व9ण,ु वह( महे qवर और परम ONम का मूल है । 3व9णु मानवी
क@ चंचल वृ तयां है । 4शव शर(र का अलंकार है । ONमेqवरा मतलब
शर(रभाव को एक ओर रखना और उसके 4लए ईqवर के साथ एकाकार
होना है । Fयि1त को यह अनुभव करना है क@ आमा शर(र से अलग है ।
जीस तरह नाoरयल क@ खाल अंदर के कोपरे से अलग होती है उसी तरह
आमा को शर(र से अलग करना है । ईसे ONमेqवर कहते है वह( ‘सब’ है ।

189. बाzयाकारवाल! सभी चीजे ओमकार है । ओमकार वह


बाzयाकारवाल! चीजो मE बसा दै वी त व है । ओमकार एक सo
ू म Yबंद ु है ।
ओमकार बाहर और अंदर हवा मE फैला हुआ है । 'शवशि5त का Lववरण
करना असंभव है । जीन लोगोने अनुभूत क3 है वे ह! उनका Lववरण दे
सकते है । अनुभव के Yबना 'शवशि5त का Lववरण संभव नह! है । Xकताबो
का 8ान रखनेवाला €यि5त उसका Lववरण नह! दे सकता। आ मा का 8ान
रखनेवाल! €यि5त ह! उसका वणFन कर सकता है ।
पMट!करणः ओमकार ONमांड म सव£सवाK है । आकारवाल( हर चीज
ओमकार है । उसम बसा &दFय तव ओमकार है । ओमकार एक सू[म ?बंद ु
है । जो आंतरच$ु से &दखाई दे ता है और वह &दFय जीवन म जैसे गत
होती है वैसे ह( 2प9ट होने लगता है । ओमकार वायु 2व:प म अंदर और
150 चदाकाश गीता

बाहर दोनो ओर फैला है । 4शवशि1त ईस 3ववरण म आता 2व:प है । जीन


लोगो ने ईqवर के परम सुख को ाwत Iकया है वह( उसका 3ववरण दे
सकता है ओर कोई नह(, वैसे ह( जीन लोगो को ईस बारे म कोई अनुभव
नह( है उनके 4लए तो संभव ह( नह( है । Iकताबो से पाया हुआ Xान
$णजीवी है ।

190. चदाकाश मE अगर सय


ू Vदय दे खे तो उसका Lववरण करना
संभव है । €यि5त को अपने आ मत व मे ईन बातो का अनुभव करना
चा@हए। 8ान बLु J मE होता है । जीन लोगो मE 8ान और बLु J ई5कƒे हो
गये है वे लोग उसका Lववरण कर सकते है लेXकन जो लोग के 8ान और
बLु J अलग है वे लोग ईस बात का Lववरण नह! कर सकते। जीसे सूoम
Lववेक कहा जाता है वह बLु J और 8ान का एक व है । सूयF का तYबंब
पानी मE गरता है तो पानी मE कंपन होता है ठuक ऐसा ह! मन का है । मन
चंचल है और माया से मो@हत है । ‚मणा मानवी को थूल चीजो से होती
है लेXकन पागलपन या द!वानापन सूoम Lववेक से होता है तो वह दै वी
पागलपन है । थूल पागलपन थूल भेद से पैदा होता है । हम खुछ खाते
लेXकन आहार का मागF पेट क3 ओर ह! रहतै है । डाकपेट! मE डाल! जाती
डाक मE जो भी सच
ु नाएं हो लेXकन जीस पेट! मE उसे डाला जाता है वे सब
समान है । 'सफF िजzवा ह! खsी-'मठu चीजो मE फकF कर सकती है लेXकन
मन के 'लए ऐसा कोई फकF नह! है । हम पkी को पींजरे मE पांव बांधकर
कैद कर दे ते है और उसे बोलना सीखाते है उसी तरह बLु J आ मा के साथ
एक हो जाती है तब मानस के पींजरे मE कैद हो जाती है ।
पMट!करणः मनु9य खुद अनुभव न करे तो कंु ड4लनी जागरण के
&दFय काश के उदगम का 3ववरण असंभव है । ईqवर के परम सुख का
151 चदाकाश गीता

3ववरण करना असंभव है । कंु ड4लनी जागरण के सूयvदय का 3ववरण Xान


और बु3t जीनके एक हो गये है वे लोग ह( कर सकते है । आम लोगो के
4लए यह संभव नह( है । सू[म 3ववेक वह Xान और बु3t का एकव है ।
सूयK का पानी म गरता त?बंब जीस तरह अि2थर होता है उसी तरह
माया से संमो&हत मन चंचल होता है । 2थूल चीजो से पागलपन पैदा होता
है । सू[म 3ववेक से भी पागलपन पैदा होता है । जो क@ दै वी पागलपन है ।
हम कुछ भी खाते है लेIकन वह आहार पेट क@ ओर ह( जाता है । पG,
पो2टकाडK, 3व3वध अखबारो क@ सुचनाएं कुछ भी हो लेIकन डाकपेट(
एकसमान ह( रहती है । मानवी का मन भी उसी तरह अEछs-बूर( बातो को
सं|ह(त करता है । मन क@सी कार का भेद नह( होता। मन अEछs-बूर(
सभी चीजो को एकसमान तर(के से सं|ह(त करता है । िजNवा ह( खˆी-4मठs
चीजो का फकK करती है । मानब3ु t म भेद करने क@ शि1त है । जीस तरह
हम प$ी को पींजरे म पांव बांधकर रखते है और बोलना सीखाते है उसी
तरह बु3t आमा के साथ एक हो जाती है और मानस के 3पंजरे म कैद हो
जाती है । आमा का सा$ाकार तब होता है जब मन और बु3t क@ ए1ता
4सt होती है ।

191. मुि5त के दे व 'शव है , 'शव 'लंग है और वह मितMक मE


है । यह 'लंग ओर कुछ नह! लेXकन ओमकार है । काश अत मह पण
ू F है ।
नाडयो के Yबना नाद नह! होता। भि5त क3 तुलना द!ये मE तेल के साथ हो
सकती है । नाडयv क3 तुलना द!ये क3 बाती के साथ क3 जा सकती है ।
सूoम Lववेक वह \योत या काश है । नाडयो क3 तुलना फानुस के साथ
क3 जा सकती है । फानुस मE हवा को जाने के 'लए जो छB है वह yzमरं ‡
है । यह भेद-Lववेक का वiप ह! बLु J है ।
152 चदाकाश गीता

पMट!करणः मुि1त दे नेवाले दे वता 4शव है । 4शव 1या है ? 4शव


चत-मि2त9क म रहनेवाला आम4लंग है । यह 4लंग ओर कुछ नह( लेIकन
ओमकार है । जब आम4लंग का सा$ाकार होता है तब सवKG हम सवK म
ओमकार के दशKन करते है । सवKG काश-अंधकार म काश-असय म
सय- यह सब महवपूणK है । Xानी क@ तुलना फानुस के साथ हो सकती
है । Xानी क@ भि1त फानुस के द(ये म रहनेवाला तैल है । मुख नाƒड –
वह द(पक क@ बाती है । सू[म 3ववेक वह xयोत है जो रोशनी दे ती है ।
छोडी नाƒडयां फानुस का शीशा है । द(माग म रहनेवाल( जगह फानुस म
हवा को जाने के 4लए बने छl है । परमशांत-अपने आसपास Xानी जो
फैलाता है वह फानुस का काश है । Xानी पानुस के काश क@ तरह सवKG
काश फैलाता है । वह सवKG आमा का दशKन करता है । मनु9य म
रहनेवाल( बु3t 2वयं Xान का दशKन है ।

192. जो मनुMय अपने नाक और मुंह को जोर से पकडकर रखE


तो बोल नह! सकता उसी तरह जो €यि5त सांस न लेसके तो आवाझ नह!
नकाल सकता। तालाब का पानी गमI के मौसम आगे बढने से कम होने
लगता उसी तरह सांसे लेने क3 शि5त शर!र मE कम होने लगती है । पानी
घूमता रहतै है तो उसके साथ हवा भी घूमती है । मनुMय आहार के Yबना,
कोफ3 के Yबना पांच @दन तक रह सकता है लेXकन सांस 'लये Yबना पांच
'मनट भी जी नह! सकता।
पMट!करणः नज‰व चीज आवाझ नह( करती, 1यMक@ उसम ाण
नह( होते। अगर हम मंुह और नाक जोर से पकडकर रख तो हम बात नह(
कर सकते। ाणशि1त गम‰ के मौसम म तालाब म पानी कम होता है
उसी तरह कम होने लगती है । पानी घूमता है तो साथ म हवा भी घम
ू ती
153 चदाकाश गीता

है उसी तरह जब तक शर(र म ाण होते है तब तक र1तसंचार होता रहतै


है । ाण शर(र के 4लए अनवायK है । आहार और कोफ@ के ?बना मनु9य
पांच &दन भी चला लेगा लेIकन सांसो के ?बना पांच 4मनट भी रह नह(
सकता। ईस4लए ाण का नयंGण बहुत जCर( है ।

193. जगत क3 सार! शि5तओं मE माया क3 शि5त सब से बल


है । मत
ृ शर!र और प थर बोल नह! सकते उसी तरह अगर वायु अपना काम
न करे तो आग जलती नह! उसी तरह सांसे भी नय'मत न हो तो
पाचनशि5त को नुकसान पहुंचता है । पाचनअि^न ह! यो^यiप से काम न
करे तो फेफडv मE कफ जम जाता है । चरबी शर!र मE बढती जाती है ।
आहार पेट मE Yबना पाचन हुए रह जाता है । पानी के पंप मE अवरोध हो तो
पानी आसानी से नीकलता नह! है । सांसे लेने मE मिु )कल हो तो कफ जम
जाता है । ऐसे ह! ईन सब वजह से सब रोग होते है ।
पMट!करणः जगत क@ सार( शि1तओं म माया क@ शि1त बल
है । माया को न9ट करने के 4लए हरदम यास करना पडता है । मनु9य
शर(र म ाण अत महवपूणK है । ाणह(न मानवी गतह(न पथर या लाश
जैसा होता है । शर(र म ाण का आना-जाना नय4मत नह( होगा तो पाचन
का अि}न न9ट हो जाता है । अगर पाचन अि}न ठsक से काम काम नह(
करे गा तो फैफडM मे जो कफ है वह जम जायेगा। शर(र म चरबी बढती
जाती है , खाया हुआ आहार पेट म पचे ?बना रहता है । जीस तरह पानी के
पंप म कचरा जम जाता है तो पानी आसानी से बाहर नह( आता उसी तरह
सांसे लेने म मुिqकल हो तो बख
ु ार, कफ बढना जैसे रोग होते है । ईस तरह
क@ सांसो क@ अनय4मतता क@ वजह से रोग होते है ।
154 चदाकाश गीता

194. सभी चीजE अपने Rदय मE से आती है । बाहर से कुछ नह!ं


आता। €यि5त वयं बरू ा बनता है और अपने यासो से ह! अnछा होता है
उसी तरह ओमकार-ाणायाम अंदiनी तौर पर होना चा@हए। बाद मE शुJता
आती है । जब बरू ाई अnछे पन मE एकiप हो जाती है तब अnछे पन के
स संग क3 वजह से वह भी अnछे मE प`रवतFत होती है । आपके हाथ मE
जो चीज है उसमE कोई खू)बू भी नह! होती और कोई Xकं मत नह! होती।
दस
ू रो के पास से 'मल! चीज मE गंध भी होती है और उसक3 Xकं मत बी
होती है । न यानंद राजा है , न यानंद योगी है , न यानंद महा मा है ,
न यानंद सवFj वतFमान है-वह ओमकार है । न यानंद-&ी गi
ु है । शुi मE
परम शांत ाDत हो उससे पहले हमारे अंदर जो माया है वह अपनी ताकत
@दखाती है । जब जब आंख बंध क3 जाती है तब तब सपF @दखाई दे ता है ।
शुi मE अTयास के 'लए बैठते है तब पहाड के जैसा बौझ लगता है । ऐसा
लगता है क3 आप प|ृ वी पर से हवा मE उड रहे है , ऐसा अनुभव होता है क3
सागर मE बैठे है । कभी आपके पर गमF पानी डाला गया हो ऐसा लगता है ,
क3सी समय आप मकान मE सबसे ऊंची मं{झल पर बैठे है ऐसा अनुभव
होता है । कभी कभी आप प तो क3 तरह हdके हो गये है ऐसा अनुभव
होता है । कभी आप बोलते नह!, सुनते नह! हो, बातE नह! करते हो ऐसा
लगता है । दस
ू रे समय मE आपक3 सभी संवेदनाएं शुभ हो गई हो ऐसा
लगता है । कभी आसपास के लोग नाटक कलाकारो जैसे लगते है , कभी
चहे रे काले @दखते है । परम शांत का तर 'सJ होने के बाद अLवभा\य
सफेद-)वेत रं ग @दखता है । काश मE अंधकार है , अंधकार मE काश है ।
कभी वह बायोकोप के केल जैसा लगता है या कभी सत, चत, आनंद
जैसा अनभ
ु व होता है । कभी ईस जगत मE हम कहां जा रहे है ऐसा लगता
155 चदाकाश गीता

है । हमारा मूल फझF 5या है वह हम समझ नह! सकते। हमारा प|ृ वी पर


चलना थायी नह! है लेXकन ऊnच @दशा मE ह! जाना थायी है । जो लोग
सीडीओ से उपर पहुंचे है और सबसे ऊंची मं{झल पर पहुंचे है और चारो
ओर नझर घूमाते है । 5या सुनाई दे ता है , 5या @दखता है । सब एक
मायाजाल जैसा लगता है । जीसे भेदना संभव नह! होता लेXकन सवF भेद!
ओमकार सवFभेद! णव है । पkी हवाई जहाज जैसे लगते है। मनुMय पशु
जैसे लगते है । पशु मनुMय जैसे लगते है । कु ते 8ानी जैसे लगते है 5यvक3
कु ते को एकबार {खलाओ तो जीवन के अंत तक वह उसे भल
ू ता नह! है ।
वह उसके मा'लकने एकबार {खलाया हो फ3रभी वफादार रहता है लेXकन
मनुMय मE सूoम Lववेक नह! होता। वो कहां से आया है और उनका फझF
5या है । पण
ू त
F ः समझवाला मानवी )वान जैसा होता है ।
पMट!करणः सब कुछ अपने अंदर से आता है । बाहर से कुछ नह(
आता Fयि1त खुद बूरा होता है और खुद अEछा होता है । Fयि1त के
अंद:नी 2वभाव को अय लोग बदल नह( सकते। हमे ओमकार को ाण
म |हण करना चा&हए। जब ऐसा हो तब अंद:नी शु3t पर भाव पडता है ।
मन अंतरमुख होगा और आमा क@ 4स3t 4मलेगी। जब बूराई अEछे पन म
एकाकार हो जाती है तब बूराई अEछे पन म पoरवतKत हो जाती है उसी
तरह बूरा Fयि1त भी अEछे Fयि1त क@ संगत म अEछा बन जायेगा। उसम
रह( बूराई अEछे म पoरवतKत हो जायेगी। हमारे हाथ म रह( चीज म गंध
या उसक@ कोई Iकं मत नह( होती। अय से 4मल( चीजो म एक कारनी
गंध और Iकं मत होती है । xयादा आमीयता घण
ृ ा क@ वजह बनती है । दोनो
के बीच का अंतर सEचा lि9टकोण पैदा करता है । कोई महान Fयि1त
Iकतना भी महान हो लेIकन हमारे नज&दक हो तब उसक@ महानता समझ
156 चदाकाश गीता

म नह( आती। ऐसा ह( Fयि1त जब हम से दरू हो तब उसक@ महानता हम


समझ सकते है । शायद हो उससे बी xयादा महान समझते है । +ी
नयानंद राजा है , +ी नयानंद योगी महामा है , +ी नयानंद शाqवत
आनंद को ाwत कर सकते है । ऐसे मानव सवK Fयापक णव के साथ
एकाकार हो जाते है । +ी नयानंद +ी गु: है , जो क@ परम सुख ाwत
करते है । शु: म परम शांत 4मलने से पहले माया क@ शि1त का अनुभव
हम होता है । जब हमार( आंख करते है तब 3व3वध तरह के सपK &दखाई
दे ते है । शु: म अ…यास के 4लए बैठते है तब पहाड के जैसा बोझ लगता है
तो कभी आप धरातल छोड दे ते हो ऐसा लगता है । कभी समुl म बैठे है
ऐसा लगता है तो कभी गमK पानी डाला गया हो ऐसा लगता है , कभी
मकान क@ सबसे मं/झल पर बैठे है ऐसा अनुभव होता है । कभी सपK जैसा
हWकापन तो कभी पतो जैसा हWकापन महसूस होता है । कभी हम बात
कर रहे है या आ रहे है या बैठे है वह भी समझ म नह( आता। ऐसे समय
म शर(रभाव पूण:
K प से भूल जाते है तब ऐसी ि2थत म भी आमतेजमय
हो जाते है और शर(रभाव रहता नह( है । कोई समय ऐसा आता है हमार(
सभी संवेदनाएं ि2थर हो गई हो ऐसा लगता है । ऐसे समय पर अहं कार
पूण:
K प से न9ट हो गया हो ऐसा लगता है । कभी शर(र नाoरयल के व$
ृ क@
तरह ि2थर हो जाता है तो दस
ू रे समय म आसपास म रहनेवाले मानव
नाटक के कलाकार है ऐसा लगते है और वे नाटक कर कर रहे है ऐसा
तीत होता है । कभी काले चहे रे &दखते है । ये सब अनेको म रहे थोडे
अनुभव है लेIकन यह ि2थत क@ ारं भ क@ अव2था क@ है लेIकन पूणत
K ः
शांत ाwत होने के बाद अ3वभाxय qवेतव &दखता है । अंधकार म काश
और काश म अंधकार &दखता है । अंधकार मतलब अXानता। काश वह
157 चदाकाश गीता

Xान है । अंधकार म काश दे खे। असय म सय दे खना। ONमांड म ईqवर


का दशKन करना, ईqवर और ONमांड, Xान और काश एक 4स1के क@ दो
बाजुएं है । एकदस
ू रे के पूरक है । सू[म को 2थूल म ढूंढना वह मानवजीवन
का ल[य है । जब मन माया का नाश करता है तब lqय ONमांड
बायो2कोप के कायK‡म-lqय जैसा लगता है । सू[म 3ववेक तब सत, चत,
आनंद का अनुभव करता है । मनु9य के जीवन म बहुतबार ऐसे सवाल पैदा
होते है क@ मनु9य ईस जगत म 1यM आया है , वो कहां जा रहा है । दु यवी
लोग उनका जीवन ल[य भूल जाते है । सांसाoरक जीवन म 4लन रहना वह
2थायी नह( है । आमा का सा$ाकार करना वह( 2थायी है । मुि1त शाqवत
है , अपoरवतKनीय है वह आकारर&हत है । जो लोग ‡मशः सीडीयां चढकर
आVयािम1ता के ऊEच2तर पर पहुंचकर चारो ओर नझर घम ू ाने से 1या
&दखता है , 1या सुनाई दे ता है उसका अनुभव करता है और सारा जगत
एक जाल म हो एसा &दखता है उसी तरह Xानी, जीसने आVयाम के
ऊEच 2तर 4सt Iकये है उह ONमांड दो मुंहवाला या उलझा हुआ लगता
है । ऐसे मानव सांसाoरक जीवन क@ $/णक ि2थत को समझ सकते है ।
ओमकार णव है । ओमकार सवKFयापी है और णव भी सवKFयापी है । प$ी
भी आकाश म हवाई जहाज क@ तरह ऊडते है । मनु9य ईस जगत म पशु
क@ तरह जीता है और सांसाoरक आनंद म म2त Fयि1त अपना जीवन
ल[य भूल जाता है लेIकन ाणी कभी मनु9य क@ तरह बताKव करते है ।
qवान क@ तुलना Xानी के साथ क@ जा सकती है । qवान एकबार भी आहार
दे नेवाले को भूलता नह( है और उसके मा4लक को हरदम वफादार रहता है ।
Xानी भी उनके जीवनकाल के दौरान दस
ू रे लोगोन उनके 4लए जो Iकया हो
वह भूलते नह( है । एकबार भी Iकसीने उह मदद क@ हो वह वे भूलते नह(
158 चदाकाश गीता

है लेIकन सांसाoरक जीवो म स[


ू म 3ववेक नह( होता। वह कहां से आया है
और उसका फझK 1या है वह वे लोग समझते नह( है । वे 4सफK सांसाoरक
जीवन क@ क@तK और 4स3tयM के बारे म सोचते है लेIकन ईस सांसाoरक
जीवन क@ 4स3tयां उनको मृ यु के बाद के जीवन म कुछ काम क@ नह(
होती। वे अपने मृ यु के बाद क@ ि2थत का 3वचार नह( करते। पूणK
समझवाले मानवी को qवान जैसा बनना है ।

195. राजा के समk उपिथत होते है तो हम उसे iबi उसक3


j@ु टयां कहने क3 @हंमत जूटा नह! पाते लेXकन पीठ पीछे हम उसक3 नंदा
करते है उसी तरह लोग 8ानी क3 iबi नंदा करने क3 @हंमत जूटा नह!
पाते। आप सूयF क3 ओर थोडी दे र दे खते रहते हो और बाद मE घर मE
वेश करो तो थोडे समय के 'लए कुछ @दखता नह! है उसी तरह
अंधकारमय थान मE से बाहर आते है तो हम कहां से आये वह बता नह!
सकते।
पMट!करणः Xानी &दFय-महाराxय का राजा है । जीस तरह
सांसाoरक राxय का राजा होता है । सांसाoरक राजा के मुंह पर उसक@ Gु&टयां
बताने क@ &हंमत कोई नह( जूटा पाता लेIकन उसक@ पीठ पीछे नंदा करते
है उसी तरह Xानी को :ब: कोई पागल नह( कहे गा लेIकन पीठ पीछे उसे
पागल कहते है । ऐसे लोग योगी क@ नंदा उनके सामने करने क@ &हंमत
नह( रखते। हम सूयK क@ ओर थोडी दे र दे खते रहते है और बाद म घर म
वेश करते है तो थोडी पलो के 4लए हम कहां से आये वह बता नह(
सकते। ईसी तरह Xानी को 4मलने जा रहे लोग Xानी के सवKशि1तमान
तेज2वी 2व:प के सामने अपना मूळ 2वभाव भूलकर चकाच¥ध हो जाते है ।
वे अपनी याGा तक अपनेआप को भी भूल जाते है ।
159 चदाकाश गीता

196. कोई मानवी नंद मE डर के मारे जग जाता है और खडा हो


जाता है तो इसे हXककत मE 5या हुआ है उसका Lवचार नह! आता। वह
उलझा हुआ रहता है । उसी तरह 8ानी, जो क3 योगनBा मE रहते हे वE
बाहर! Lव)व के बारे मE कुछ जानते नह! है । आपके पास छाता है तो बा`रश
का पानी हमारे 'सर को 'भगा नह! सकता। जो लोग नय'मत तौर पर
आहार लेते है उ:हE भूख लगती है । जो लोग शीतल जल मE डूबे रहते है
उ:हE ठं ड नह! लगती। पण
ू F मानवी कभी rोध से भडकता नह! है । तले हुए
बीज कभी अंकु`रत नह! होते। सोने को अि^न से तपाकर शुJ Xकया हो
उसी तरह मानवी का मन हरदम शुJ रहना चा@हए।
पMट!करणः Xानी जो हरदम योगनlा म रहता है उसे बाहर(
दु नया क@ खबर नह( होती जैसे क@ भय से नlा म से अचानक जग कर
खडे हुए मनु9य को पता नह( होता। Xानी सदै व ईqवर म खोए रहते है
और वे जगत के 4लए न9ाण होते है । अगर हम बाoरश म छाता रखते है
तो बाoरश का पानी हमे 4भगाता नह( है उसी तरह हम &दFयता के रं ग म
रं ग जाये तो माया और दो मुंहवाले जगत का भाव नह( पडता। आमा
का Xान हमे जगत और माया के मार से बचा सकता है । जैसे हररोझ
आहार लेनेवाले मनु9य को भूख लगती है उसी तरह जगत क@ ईEछाओ म
ल(न मानवी म ईEछाएं हरदम रहती है लेIकन ठं डे पानी म डूबे रहते
मानवी को ठं ड नह( लगती। Xानी को शर(र के छः शGू ‡ोध, काम ई9याK
आ&द 2पशK नह( करते। ईस शर(र के दग
ु ुण
K ो का एकबार नाश हो जाता है
बाद म Iफर से वे अंकुoरत नह( होते। मनु9य का मन अि}न से तपकर
शुt हुए सोना जैसा शुt होना चा&हए। मन क@ वृ तयो को संपण
ू K नाश कर
160 चदाकाश गीता

दे ना चा&हए। वृ तयां जब पूण:


K प से अlqय हो जाये तब ईqवर का
सा$ाकार होता है ।

197. भूजंग नाग को वयंभू अंदiनी ाणायाम क3 शि5त होती


है । नाग “नागवर” (मुरल!) का संगीत सुनने मE एका‰ हो जाता है । 8ानी
भी सब को चाहता है , जैसे क3 गाय अपने बछडे को चाहती है । ईसे
‘एकBिMट’ कहते है । Yबना दरवाजे का घर नह! होता। बरतन खाना बनाने
के 'लए अनवायF है । )वान आहार पर जीता भले ह! आहार 'मsी के बरतन
मE हो या सोने के बरतन मE । पkी 'सफF अपनी आज क3 जiरतो का Lवचार
करते है । बंध पेट! मE रखे गये बीज कभी अंकु`रत नह! होते। ऐसे बीज पर
कभी फल नह! आते लेXकन वह! बीज अगर भू'म मE लगाया जाये तो उसमE
फल होते है । हमE अTयास करना चा@हए, अनुभव 'मलना चा@हए। ईस'लए
हम ह! हमारे सुखदःु ख के 'लए जवाबदे ह होते है ।
पMट!करणः भुजंग नाग आंतoरक ाणायाम कर सकता है । उसी
तरह मनु9य को आंतoरक ाणायाम करना चा&हए। भुजंग नाग “नागेqवर”
नाम के संगीतवा~य का संगीत सुनने का बहुत ह( शौIकन होता है उसी
तरह मनु9य को परम शांत के 4लए एक Vयान होना चा&हए। Xानी सब
को बहुत ह( 2नेह करता है । जीस तरह गाय अपने बछडे को चाहती है । वह
सब म एक के दशKन करती है और वह भी कोई भेद ?बना। ईसे ‘एकlि9ट’
कहा जाता है । ?बना दरवाजे का घर संभव नह( है । खाना भी ?बना बरतनो
के नह( बनता उसी तरह ?बना ाण के मानव का अि2तव संभव नह( है ।
ाण अत आवqयक चीज है । प$ी 4सफK आज क@ ज:रतो का 3वचार करते
है । प$ी क@ तरह मनु9य को 4सफK आज का 3वचार करना 4सखना चा&हए।
भ3व9य के 4लए बहुत 3वचार नह( करना चा&हए। यह याग शt
ु 2व:प का
161 चदाकाश गीता

है । पेट( म पडे बीज कभी अंकुoरत नह( होते। भू4म म उगाये गये बीज को
अगर खाद और पानी &दया जाता है तो यो}य:प से 3वक4सत होता है ।
हमारा मानस आमा के त केl(त नह( होगा तो आमसंतोष ाwत नह(
होता। वह पेट( म पके हुए बीज जैसा है । जब मनु9य आमा क@ ओर
Vयान केl(त करता है तब आमा के परमसुख का अनुभव करता है । ईस
के 4लए हमे अ…यास करना चा&हए और अनुभूत करनी चा&हए। हम ह(
हमारे सुख या दःु ख के 4लए जवाबदे ह होते है । ईqवर मनु9य के कायK म
दखल नह( करते। हमारे हरएक कायK के 4लए कोई तI‡या (oरए1शन)
नह( होती। हमारे दःु ख या सुख के 4लए 4सफK हम ह( जवाबदे ह होते है ।
अEछे कमK के पoरणाम अEछे होते है और बूरे कमK के बूरे होते है । जब
मनु9य नवृ त के ऊEचतम 2तर पर हो तब ईqवर क@ परमशि1त का
अनुभव होता है ।

198. द!पक क3 \य़ोत को जलती रखने के 'लए कोई नात या


जात के फकF क3 जiरत नह! होती उसी तरह सूयF जात-पात के फकF Yबना
एकसमान रोशनी दे ता है । सूयF का दशFन सभी को एकसमानiप से होता है ।
अि^न सभी को एकसमान @दखता है । बLु J और 8ान जीन लोगोने अपने
आंतरचkु का Lवकास Xकया है उनके 'लए एक ह! है ।
पMट!करणः ईqवर पूण:
K प से तट2थ है । वे क@सी को लाडwयार
नह( करते और क@सी का तर2कार नह( करते। उनके 4लए सब एकसमान
है । वे जगत3पता है , जगत माता है । जो अपने बEचो के दोषो को माफ
करता है और भूल जाते है । जीस तरह द(पक क@ xयोत को जात-पात के
भेद ?बना जलती रख सकते है , सूयK जात-पात के फकK ?बना एकसमान
रोशनी दे ता है और अि}न सब को एकसमान:प से सब को &दखता है उसी
162 चदाकाश गीता

तरह ईqवर का सा$ाकार सब कर सकते है और वह भी जात-पात के भेद


?बना। सब अपनी अपनी मयाK&दत शि1त के &हसाब से उनका सा$ाकार
करना चाहते है । जीन लोगोने खुद म &दFय च$ु (तृ तय आंख) का 3वकास
Iकया है उनके 4लए Xान और बु3t एकसमान और वह( है । बु3t और Xान
आVयाम के ऊEचतम 2तर को 4सt हो तब एक ह( होते है ।

199. जीन लोगो मE सूoम Lववेक नह! होता वे 'सफF कहने के


'लए मनुMय है । मनुMय ाणी नह! है । थूल शर!रभाव है । सूoम वह आ मा
का Lवचार है । जीवा मा थूल शर!र भाव है । सूoम वह आ मभाव है ।
जीवा मा थूल है । परमा मा सo
ू म है । थूल के Yबना सूoम का साkा कार
नह! हो सकता। बु नयाद के Yबना घर का बांधकाम संभव नह! हो सकता।
Lवचारशि5त (LववेकबLु J) को 'शवशि5त कहा जाता है । यह शि5त जीस
तरह तीœiप से Lवक'सत होती है तब मनुMय (सुपर) महामानव बनता है ।
महामानव सुखी मानव होता है । वह yाzमण है , जो yzमवेता होता है । वेद
अनुसार बताFव अnछे चा`रय को बनाने के 'लए आव)यक है ।
पMट!करणः मनु9य को मानव बनने के 4लए उसम सू[म 3ववेक
होना चा&हए। जीन लोगो म सू[म 3ववेक नह( है वे लोग मानव कहने
लायक नह( है । मनु9य ाणी नह( है । मनु9य और ाणी के बीच फकK यह
है क@ मनु9य मे सू[म 3ववेक है , जबक@ ाणी म वह नह( है । ईस4लए ह(
मनु9य को अपनी ईqवरदत स[
ू म 3ववेकबु3t का xयादा से xयादा उपयोग
करना चा&हए और ईqवरसा$ाकार करना चा&हए। आमा का 3वचार सू[म
है । जीवामा 2थूल है और वह शर(र के साथ संबंधत है । परमामा सू[म
है । Iफरभी 2थूल शर(र के ?बना ईqवर जो सू[म है उसका सा$ाकार संभव
नह( है । घर को बांधने के 4लए बु नयाद क@ ज:रत होती है उसी तरह
163 चदाकाश गीता

मनु9य शर(र ईqवरसा$ाकार का मकान बनाने के 4लए बुनयाद है ।


4शवशि1त मतलब जीवामा और परमामा का 4मलन। जब मनु9य म
4शवशि1त का तीœ 3वकास होता है तब मनु9य महामानव बनता है ।
महामानव सुखी मानव है । वह OाNमण है । जो ONमवेता है । ऐसा मानवी
ईqवर के परमसुख का अनुभव कर सकते है । वेद अनुसार का बताKव मनु9य
के सदचाoर¦य के ऊEचतम 2तर को ाwत करने क@ ि2थत है ।

200. जो ईnछार@हत है वह आचायF है । ईnछार@हत मानवी


सं:यासी होता है । ईस जगत मE वह अवधूत है । अवधूत वह है जो संसार मE
रहकर ईnछाओ का याग करता है । अवधूत ऊnचतम िथत का मानवी
है । अवधूत से ऊंची िथत नह! हो सकती। अवधूत जगत मE सवVपर! है ।
आलोक और परलोक जीनके एक हो गये है वह अवधूत है । सचेतन
अवथा-नया आकाश-वातव का आकाश-बंधनमुि5त-आ मसुख क3 सरकार-
yzमसुख-सnचा सुख-योगसुख-मानव ज:म क3 चरम 'सLJ-मुि5त के दे वता-
शहं शाह को 8ान दे ने क3 शि5त ये सब अवधूत के लkण है ।
पMट!करणः ईEछार&हत Fयि1त आचायK कहने के यो}य है , वह
पूण:
K प से ईEछार&हत होता है । संयासी ईEछार&हत मानव होता है । ईस
जगत म वह अवधूत है , जीसने सभी ईEछाओ का याग Iकया है ।
ईEछार&हत दशा जगत क@ +े9ठ दशा है । अवधूत अतउतम +ेणी का
मानवी है । मनु9य म वह +े9ठ है । अवधूत से ऊंची ि2थत नह( हो सकती।
अवधूत सबसे उपर क@ ि2थत मे होता है । अवधूत के 4लए आलोक और
परलोक दोनो एक हो जाते है । अवधूत जगत म सवvपर( है । सचेतन
अव2था का आकाश-वा2त3वक आकाश-बंधनो म से मिु 1त-आमसुख क@
सरकार-ONमसुख-सतसुख-योगसुख-पापर&हत दशा-मनु9यजम के ल[यो क@
164 चदाकाश गीता

पoरपूणत
K ा- मुि1त के दे वता-3वqव के शहं शाह को 4श$ा दे ने क@ शि1त-ये
सब अवधूत के ल$ण है । अवधूत सवKशि1तमान होता है – वह ईqवर के
साथ एक हो जाता है ।

201. जो ई)वर का चंतन करता है और जो ईnछार@हत है वह


जगत का मोkदाता है-संरkक है । जो ई)वर का चंतन करता है वह मुन
है । वह 'शव है और 'शव वह है । जो सब कुछ @दखता है वह 'शवमय है ।
पMट!करणः जो ईqवर का हरदम चंतन करता है और
ईEछार&हत है वह जगत का मो$दाता-मुि1तदाता-संर$क है । ऐसे मानवी
जगत के मानवीओ को &दFयता के मागK पर ले जाते है , उह माया के
बंधनो म से मु1त करते है । मुन वह है जो ईqवर पर शाqवत तौर पर
चंतन करता होता है । ऐसे मानव 4शव के साथ एक:प हो जाता है वह
4शव:प है और 4शवमय है । उह जो &दखते है वह सब 4शव है । सारे
ONमांड म 4शव शि1त क@ अनुभूत करता है । ऐसे मानव के 4लए पŠृ वी
पर के क@सी 2थूल 4शवर&हत नह( है । 4शव सवKG सवK मे 3व~यमान है ।

202. स य का साkा कार जीस मनुMयने नह! Xकया वह 'भखार!


है । जीसने ‚मणाओ का नरसन (नाश) नह! Xकया वह 'भखार! है । जो
मानवी अधोमागF का याग नह! करता वह 'भखार! है ।
पMट!करणः वह मानवी 4भखार( है जीसने शाqवत सय क@
अनुभूत नह( क@ है । जीसने जगत क@ ईEछाओ के अधोमागK का याग नह(
Iकया वह 4भखार( है । जीसने Œमणाओ का याग नह( Iकया वह 4भखार(
है । 4भखार( अथाKत सांसाoरक, कामी पशु का जीवन जीना वह है । 4भख
165 चदाकाश गीता

मांगता है वह 4भखार( नह( है लेIकन 4भखार( क@ तरह बताKव करनेवाला


4भखार( होता है ।

203. जो लोग मान-अपमान के 'लए दरकार नह! करते वे परमसुख


का आनंद ले सकते है । ऐसा सुख जो क3 yzमानंद जैसा होता है अथाFत
ई)वर के साथ एकाकार हो जाना। हमे हमार! बLु J क3 शि5त को 'सफF
पांच 'मनट के 'लए के:B!त करे तो वह सुख-आनंद ाDत कर सकते है ।
ईस अना@द वजह को जो समझ सकते नह! वे जीवनलoय Yबना के है । जो
लोग स य का साkा कार नह! करते वे ‚मणा क3 मायाजाल मE तत'लयां
जलते द!पक क3 \योत मE गरकर नMट हो जाते है । बारबार द!पक को
दे खते है Xफरभी तत'लयां द!पक क3 \योत मE गरकर नMट हो जाती है ।
पMट!करणः जो लोग मान-अपमान क@ ओर एकदम उदासीन होते
है । वे लोग ह( परमसुख का आनंद ाwत कर सकते है । हमारे मि2त9क म
बु3t क@ शि1तयां 4सफK पांच ह( 4मनट म केl(त करे तो दै वी सुख का
आनंद ाwत कर सकते है । जब बु3t Xान के साथ एकाकार हो जाये तब
हम परमसुख का आनंद ाwत कर सकते है । अनाद( काल क@ ईस वजह
को जो लोग नह( समझ सके वे जीवन के ल[य को ाwत नह( कर सके।
ईqवर अनाद( काल से सिृ 9ट के सज
ृ न क@ वजह है । ईqवर के सा$ाकार के
?बना जीवन ल[य ाwत नह( हो सकता। ईqवर के सा$ाकार वह
जीवनल[य और अंत है । जीन लोगो को आमसा$ाकार नह( हुआ वे
Œमणाओ क@ जाल म फस रहते है और अंततोगवा द(पक क@ xयोत म
तत4लयां गरकर न9ट हो जाती है । ये लोग tैतभाव के जगत म खो जाते
है । तत4लयां बारबार द(पक क@ xयोत को दे खते है Iफरभी उसके आसपास
जाते है और अंत म वह xयोत पर गरकर न9ट हो जाते है उसी तरह
166 चदाकाश गीता

मनु9य सांसाoरक जीवन क@ $णजीवी ि2थत को अपनी आंखो से दे खते है


Iफरभी उसम म}न रहते है । आमा का सा$ाकार Iकये ?बना वे दःु खपूणK
मृ यु ाwत करते है ।

204. जो लोग ाणायाम का अTयास नह! करते वे योग'सLJ ाDत


नह! कर सकते। रसी के Yबना कूएं मE से पानी {खंचना असंभव है । जो
लोग बंधनो से मु5त नह! हुए उ:हE शांत नह! होती। पानी पीये Yबना कोई
जी नह! सकता। जीन लोगोने मन का नाश Xकया है वे ईnछार@हत है । छः
म@हने का बnचा राजयोगी कहा जाता है लेXकन उस बnचे के मन का
Lवकास होता है तब बnचा हठयोगी बन जाता है । ऐसे बnचो का मन चंचल
होता है , 5यvक3 उनक3 Lववेकशि5त कम होती है और ईस'लए वे 'मsी
और स5कर को एकसमान मानते है । फल हरदम पैड क3 टोच पर रहता है
उसी तरह मनुMय मE भी फल उसके मितMक मE होता है । ना`रयल के बीज
को भू'म मE लगाया जाये तो भी उसके फल ना`रयल के पैड क3 टोच पर
ह! ऊगता है । हरएक वk
ृ के 'लए फल उपर ह! होता है ।
पMट!करणः जो लोग ाणायाम के अ…यास नह( करते वे योगी नह(
होते। योग का अथK ह( मनु9य के ाण को नयं?Gत करना वह है । जीस
तरह कूएं म से पानी /खंचने के 4लए र2सी अनवायK है उसी तरह मूलाधार
म से कंु ड4लनी को सह2Gार क@ ओर ले जाने के 4लए ाणायाम जCर( है ।
जो लोग बंधन से मु1त नह( होते उह शांत नह( होती। पानी पीये ?बना
कोई मनु9य जी नह( सकता उसी तरह ाण के ?बना कोई जी नह( सकता।
जब मनु9य का मन अंकु4शत हो जाये तब मनु9य ईEछार&हत हो जाता है ।
मनु9य का मन मनु9य म ई्Eछाएं पैदा करने के 4लए िजDमेवार है । बEचा
छः म&हने का होता है तब तक वह ईEछार&हत होता है । वह खुद को
167 चदाकाश गीता

पहचान नह( सकते ईस4लए राजयोगी है । मनु9य के मन का जैसे जैसे


3वकास होता है वैसे वैसे एक के बाद एक नयी चीजो को 4सखता है ।
ईस4लए वह हठयोगी बनता है । बEचो के मन चंचल होते है। जब उनके
द(माग का 3वकास नह( हुआ हो। Xानी भी बEचे जैसे है । Xानी के 4लए
सोने का या 4म&ˆ का टुकडा दोनो समान है । जीस तरह फल पैड पर ऊगते
है उसी तरह Xान मनु9य क@ सुषD
ु ना नाƒडयM म होता है । Xान हरदम
शर(र म ऊVवKगत करता है , 1यMक@ उसका केl मि2त9क म है । जीस
तरह नाoरयल के पैड पर नाoरयल क@ टोच पर होते है । उसी तरह दस
ू रे
पैडो के फलो का भी होता है । Xान मनु9यशर(र म ऊपर क@ &दशा क@ ओर
जाता है 1यMक@ उसका केl सह2Gार म है ।

205. जीस तरह छाता मनुMय को धारण नह! करती लेXकन मनुMय
छाता धारण करता है उसी तरह मन मनुMय को पकड के रखता है लेXकन
मन क3 वृ तयां ह! नMट हो जाये बाद मE भेद नMट हो जाती है । ऐसे मनुMय
को कोई ईnछा नह! रहती। वह सं:यासी है , वह योगी है । मनुMय जीसके
पास मE मन है वह सब चाहते है लेXकन मनुMय जीसका मन नह! उसका
सब उसीमE है । जीस तरह ट!मर मE सभी तरह का सामान होता है उसी
तरह मनुMयमन के जीसने जीता है उनमE सारा जगत समाया हुआ है ।
पMट!करणः जीस तरह मनु9य छाते को धारण करता है , छाता
मनु9य को धारण नह( करता उसी तरह मनु9य माया को चपके रहता है ,
माया नह(। माया के पास मनु9य को पकडने के 4लए हाथ या पांव नह(ं है ।
मानवी का मन है । माया का 4शकार बनता है लेIकन जैसे ह( मनु9य मन
का नाश करता है वैसे ह( सब भेद न9ट हो जाते है । मन जैसे ह( न9ट
होता है तब मनु9य ईEछार&हत हो जाता है । ईEछार&हत मनु9य ह( संयासी
168 चदाकाश गीता

है । वह( योगी है लेIकन जीस मनु9य के पास मन है उसे सभी चीजो क@


ज:रत होती है लेIकन जीस मनु9य को मन नह( उसे क@सी बात क@
ज:रत नह( होती। ऐसे मनु9य म सारा ONमांड समाया हुआ है । वह परम
शांत ाwत और आमसंतु9ट होता है । जीस तरह 2ट(मर मे सब तरह क@
चीज होती है उसी तरह मन जीतनेवाले मनु9य म सारा ONमांड समाया
हुआ है । ऐसा मनु9य परमशि1त का 3वकास करता है , जो सारे ONमांड को
नयं?Gत करता है ।

206. जब नांव चलती हो तब हमारे आसपास का सबकुछ चलता


हुआ लगता है उसी तरह मनुMय का मन जब अB)य होता है तब हमारे
आसपास का सब चलता हो ऐसा लगता है । हम जो चीजो का अनुभव नBा
मE करते है उसका जाग ृ अवथा मE अनुभव नह! करते। अगर अि^न पर
बरतन पानी के Yबना रखा जाये तो कोई आवाझ नह! पैदा होती। जीस
तरह आवाझ पैदा करने के 'लए बरतन मE पानी डालना ज*र! है उसी तरह
सूoम Lववेक Yबना के मनुMय को कोई लाभ ाDत नह! होता। नंद मE सोए
मनुMय को नाग डसेगा तो मनMु य मरता नह! है । नंद मे सोये मनुMय का
मन शांत है-सुषDु त है लेXकन मन जागत
ृ हो तब सब होता है, जीसे सिृ Mट
कहते है वह हXककत मE मन का लगाव है लेXकन पण
ू F आ मदशFन
करनेवाले को सिृ Mट नह! होती।
पMट!करणः मनु9य का मन जब अlqय होने लगता है अथाKत
ईEछार&हत होने लगता है तब वह जो कुछ दे खता है वह सब घूमता हो
ऐसा लगता है । मनु9य उस ि2थत म एक के दशKन सब म करता है । मन
जब पण
ू :
K प से न9ट हो तब सब एक-अजोड बन जाता है । जब नांव तैरती
है तब नांव के आसपास का सब कुछ घूमता हो ऐसा लगता है लेIकन
169 चदाकाश गीता

हIककत म नांव ह( आगे जाती है उसी तरह मनु9य के मन का पoरवतKत


होता है तब सब बदला हुआ लगता है । नंद म जीसका अनुभव होता है वह
अनुभव जागत ृ अव2था म नह( होता या जागत ृ अव2था म जीसका अनभ ु व
नह( होता वह अनुभव सुषुwताव2था म नह( होता उसी तरह आमा के साथ
एकाकार हुई अव2था म जो अनुभव होता है वह अनुभव मनु9य सांसाoरक
जीवन म Fय2त Fयि1त को नह( होता। ?बना पानी का बरतन अि}न पर
रखा जाये तो आवाझ पैदा नह( होती लेIकन आवाझ पैदा करने के 4लए
बरतन म पानी रखना ज:र( है । जो लोग ?बना सू[म 3ववेक के होते है
उह xयादा लाभ ाwत नह( होता। उह आVयािमक अ…यास से भी कोई
लाभ नह( होता। आमा के सा$ाकार के 4लए सू[म 3ववेक ज:र( है । नंद
म हम सपK डसता है तो हमार( मृ यु नह( होती 1यMक@ हमारा मन शांत
होता है-सुषुwत होता है । मन को न9ट Iकया जाये तो सिृ 9ट जैसा कुछ
नह( रहता। जीसे सिृ 9ट कहा जाता है वह हIककत म मन का लगाव है ।
जब मन आमा म एकाकार हो जाता है तब सब म एक होता है । सिृ 9ट
भी ‘एक’ हो जाती है । आमा सव£सवाK बन जाता है । सब आमा म ह( होता
है ।

207. अTयास के ारं भ मE नये अTयासु (िज8ासु) को नंद कम


करनी चा@हए। आहार का नयंjण करते व5त ठं डे पानी से नह!ं नहाना
चा@हए। @दन मE चार-पांच घंटे मE ठं डे पानी से र5तसंचार नय'मत नह!
रहे गा। नाटक के कलाकारो शi
ु मE नेप|य मE अ'भनय करते है । शुi मE
रहय रखना चा@हए, बाद मE उसक3 जiरत नह! रहती। परू े भरे पानी के
घडे मE पानी डाला जाये तो उसमE से पानी बाहर नीकल जाता है उसी तरह
पण
ू F शांत 'सLJ करनेवाले योगी का अित व सब को मालूम हो जाता है ।
170 चदाकाश गीता

ऐसा €यि5त ईnछार@हत होता है । अशांत पण


ू F व का लkण है। पण
ू F शात
का अथF ई)वर के साथ एका म5ता ाDत करना वह है ।
पMट!करणः अ…यास के ारं भ म नये अ…यासुओ को नंद कम
करनी चा&हए। अ…यास के साथ आहार का नयंGण करते व1त ठं डे पानी
से 2नान नह( करना चा&हए 1यMक@ ठं डे पानी से बारबार नहाने से
र1तसंचार अनय4मत हो जाता है । शु: म नव&द#$त को गुwत तौर पर
अ…यास करना चा&हए। नाटक के कलाकार ारं भ म पqृ ठभू4म म अ4भनय
करते है बाद म ऐसा करने क@ ज:रत नह( रहती। पूण:
K प से भरे घडे म
xयादा पानी डाला जाये तो अतoर1त पानी छलक जायेगा उसी तरह पूणK
शांत के 2तर पर पहुंचने के बाद आसपास के लोगो को उसका Xान हो
जाता है । परम शांत के 2तर पहुंचने के बाद शर(र का महव कम हो
जाता है । परम शांत के 2तर पर कोई ईEछाए रहती नह( है । ईEछार&हत
शांत +े9ठ है । परम शांत मतलब ईqवर का सा$ाकार। ईससे xयादा
शांत जीवन म नह( हो सकती।

208. शांत वह ई)वर का वiप है । ओम और शांत उसके वiप


है । ई)वर आकारर@हत है । वह प`रवतFनर@हत है । वह भेद से पर है । वह
सुख है , वह पण
ू F है । बnचे जैसे पालने मE सोने के 'लए रोते है उसी तरह
हमे आंत`रक मानस का तXकया बना लेना चा@हए। हम कसोट!़ मे उतणF
नह! होते है तो नौकर! ाDत नह! कर सकते। Œि^लश बोलना आता है
लेXकन 'लखना न आये तो Œि^लश का पण
ू F 8ान है ऐसा नह! कह सकते।
पMट!करणः ईqवर परम शांत है । ईqवर ओमकार है । वह 2व:पह(न
है , पoरवतKनह(न है । वह भेद से पर है । ईqवर परम सुख है । बEचे जैसे
पालने म सोने के 4लए रोते है उसी तरह हमे भी अंद:नी नlा के 4लए
171 चदाकाश गीता

मानस के तIकये का आधार ले कर सो जना चा&हए। मन क@ वृ तयो का


नाश करके मनु9य को आमा का सा$ाकार करना चा&हए। मनु9य नौकर(
ाwत करना चाहता उसे 3व3वध तरह क@ कसोट( म उतीणK होना पडता है ।
“ि}लश बोलना आता हो लेIकन 4लखना आता न हो तो “ि}लश का पूरा
Xान है ऐसा नह( कह सकते उसी तरह वेदांत क@ चचाK करने से आमा का
सा$ाकार नह( होता। हमे आमा के परमसुख का आनंद ाwत करना
चा&हए।

209. गला मूलाधार का थान है । जहां से “पशFशि5त” कंु ड'लनी


पैदा होती है । Rदयाकाश-चदाकाश का थान गले मे मतलब मल
ू ाधार मE है ।
चदाकाश(Rदयाकाश) आंखो के बीच दो ‚मरो के मZय मE होता है ।
वाधMठान द!माग मE होता है । “अ^न” Yjकोणाकार होता है । जीसे राजयोग
कहा जाता है । वह गले के उपर होता है । “अ^न” ऐसा थान है जहां से
मनुMय को मिु 5त 'मलती है । यह जगत जीससे कहा जाता है वह जीवा मा
है । ईस के बाद का जगत जीसे कहा जाता है वह परमा मा है । ईन दोनो
का एक होना वह चेतना के 'लए थान है । च त वह मन क3 िथत है ।
सत एक और अLवभा\य है ।
पMट!करणः जीसे ‘राजयोग’ कहा जाता है वह गले के ऊपर है ।
कंु ड4लनी जीसे सवKशि1त कहा जाता है । सुषD
ु ना के ~वारा गले के ऊपर
जाता है तब योग का अ…यासु “राजयोग” के दे श म वेश करता है ।
कंु ड4लनी गले से नीचे क@ ओर होती है तब योग क@ ि2थत को हठयोग
कहा जाता है । हमारे शर(र म सात कमल (च‡) मूलाधार से शC कर के
होते है । मल
ू ाधार बु नयाद है । सह2Gार अंतम-च‡ हजारो पतीओवाला
कमल द(माग म है । ईसी तरह राजयोग म भी सात कमल होते है । जो सब
172 चदाकाश गीता

गले के उपर होते है । राजयोग म मूलाधार गले के 2थान म होता है ।


दस
ू सरे योगशा2G से यहां पर थोडा अलग है । ईस4लए राजयोग म कंु ड4लनी
गले म से जागत
ृ हो कर सह2Gार क@ ओर जाती है । „दयाकाश-चदाकाश-
गले म है और कंु ड4लनी तब जागत
ृ होकर जाती है । कंु ड4लनी को
„दयाकाश म ज:र पहुंचना है । „~याकाश- दो आंखो क@ Œमर के मVय म
है और उसे ŒूमVया कहा जाता है । 2वाध9ठान-शर(र का तत ृ ीय च‡
द(माग म होता है । जीसे अ}न कहा जाता है वह छŽा कमल है और वह
?Gभूजाकार है । ‘अ}न’ ऐसा 2थान है , जहां से मनु9य को मुि1त 4मलती है ।
ृ हुई कंु ड4लनी छŽे 2थान पर पहुंचती तब मनु9य समाध
मनु9य क@ जागत
का अनुभव करता है । „दयाकाश-अ}न म है ।। ‘यह जगत’ जीसे कहा जाता
है वह जीवामा है और ‘बाद का जगत’ जीसे कहा जाता है वह परमामा
है । दोनो का एकाकार होना चेतना के 3वqव म होता है , जीसे ‘चदाकाश’
कहा जाता है । चत मतलब Xान है वह मन क@ ि2थत है । ‘सत’ एक है
और अ3वभाxय है । ‘चत और सत’ दोनो को आमा म एकाकार करना
चा&हए और मुि1त 4सt होनी चा&हए।

210. ‘परू क’ अथाFत सांस को ऊपर क3 ओर खींचना। कंु भक मतलब


सांस को @टकाकर रखना। रे चक मतलब सांस को अंदर से बाहल
नकालना। चावल मE से अनेक तरह के €यंजन तैयार होते है। ईसी तरह
ाणायाम से सब 'सJ हो जाता है । ाणायाम के कायF अलग अलग होते
है । ाणायाम जीसे कहा जाता है । वह सब ‘अंदiनी कायF’ है । यह मनुMय
मE बसी 'शवशि5त है । जब यह शि5त yzमरं ‡ से े`रत होती है तब वह
ई)वर से साkा कार मE प`रवतFत होती है ।
173 चदाकाश गीता

पMट!करणः ाणायाम म सांस को ऊपर लेने क@ I‡या को ‘पूरक’


कहा जाता है । कंु बक अथाKत सांस को रोक कर रखना वह है । रे चक मतलब
सांस को अंदर से धीरे धीरे बाहर नकालना। जीस तरह चावल के आटे म
से अनेक तरह Fयंजन तैयार होते है उसी तरह ाणायाम से मतलब ाण
से सब कुछ 4सt Iकया जा सकता है । जब ाण को नयं?Gत कर के
सह2Gार क@ ओर ले जाते है तब सारा ONमांड मनु9य को खुद म
lि9टगोचर होता है । ऐसा मनु9य पूण-K पु:ष है , 1यMक@ ऐसा मनु9य पूणK है
और पूणK वह है । ाणायाम जीसे कहा जाता है वह अंद:नी वृ त है ।
4शवशि1त का 3वकास ाणायाम से मनु9य म होता है । जब 4शवशि1त
ONमरं  क@ ओर जाती है और उसका वहन सुषD
ु ना से होता है तब मनु9य
को ईqवर का सा$ाकार होता है । ऐसा मनु9य परमसुख को ाwत करता
है ।

211. 'शवशि5त एक अLवभा\य है । 'शवशि5त को पाने के 'लए


मोkािDत। 'शवशि5त मतलब सांस को उपर क3 ओर {खंचना। 'शवशि5त
अथाFत ाणवायु। वह ओमकार है , वह णव है । णव से सिृ Mट होती है ।
णव शर!र के चेतना है । ओमकार आ मा क3 चेतना है। ओमकार
ना`रयल के कोपरे जैसा है । अंत-वाला अनंत मE एक हो जाता है । नद!
समुB मE एक हो जाती है । मन क3 वृ तयां नद! जैसी है। अLवभा\य
'शवशि5त वह समुB है । जीस तरह कागज को आग मE जला @दया जाता है
तब वह अपना आकार खो दे ता है । मन अपना €यि5त व आ मा मE खो
दे ता है । 5-6 रातो के 'लए 'मलन का थान एक है । हम ईस राते पर
सडक से या े न मE जा सकते है । शर!र एक ऐसी े न है क3 जीसके Sवारा
हम आ – जा सकते है ।
174 चदाकाश गीता

पMट!करणः 4शवशि1त एक और अ3वभाxय है । 4शवशि1त मो$ का


साधन है । 4शवशि1त वह ाण को ऊपर /खंचना वह है । 4शवशि1त
ाणवायु है । 4शवशि1त ओमकार है । 4शवशि1त णव है । 4शवशि1त जीसने
उसका सा$ाकार Iकया है उसके 4लए सवK है । 4शवशि1त से ऊVवK कुछ
नह( है । सिृ 9ट का उदगम णव है । णव ओमकार क@ सI‡य शि1त है ।
ओमकार (सुीम शि1त) परम शि1त है , जो पूणK नवृ त के 2तर पर होती
है । णव शर(र क@ चेतना का नाम है । जब क@ ओमकार आमा क@ चेतना
का नाम है । ओमकार सुखे नाoरयल के कोपरे जैसा है । जो क@सी भी चीज
के साथ बंधता नह( है । ओमकार सवKFयापक है । अंतवाल( चीज अनंतवाल(
चीज के साथ एक हो जाती है । जीस तरह नद(यां सागर म 3वल(न हो
जाती है । मन क@ वृ तयो क@ नद( के साथ तुलना कर तो 4शवशि1त क@
सागर के साथ तुलना कर सकते है । आमा का सा$ाकार होता है तब
मन आमा म 3वल(न हो जाता है । मन अपना Fयि1तव-अलग अि2तव
खो दे ता है और यह एक साथ हो जाते है । आग से जला हुआ कागज आग
साथे एक:प होकर अपना अि2तव खो दे ता है । जीस तरह आमा और
मानस एक हो जाते है तब मन अपना अि2तव खो दे ता है । पांच या छः
रा2तो का 4मलन 2थान एक होता है । उस रा2ते पर हम पांव से चलकर
जा सकते है या _े न म जा सकते है । शर(र एक ऐसी _े न है जीससे मनु9य
आ – जा सकता है । मनु9य शर(र के साथ पैदा होता है , जब शर(र न9ट
होता है तब मनु9य जगत छोड दे ता है । शर(र आमा तक पहुंचने क@ _े न
है , जो क@ ईस जगत म छोट( याGा के 4लए है ।
175 चदाकाश गीता

212. योगाTयास के 'लए शर!र को अकडकर रखे तो शर!र मE


जडता आ जाती है । योगाTयास के 'लए बैठते व5त सुगम तर!के से बैठना
चा@हए। ईसे राजयोग कहते है । आसन मतलब बैठक क3 र!त है ।
पMट!करणः योगा…यास म बैठते व1त बैठने क@ र(त महवपूणK है ।
बैठने क@ र(त रे लवे 2टे शन क@ तरह अचल होनी चा&हए। रे लवे 2टे शन पर
_े न आती जाती रहती है लेIकन रे लवे 2टे शन ि2थर रहता है । राजयोग म
बैठने क@ र(त आसान होनी चा&हए। आसन मतलब बैठने क@ र(त या
बैठक।

213. समाध मतलब अपनी शि5तयv को नयंYjत करना। समाध


मतलब ाण को ऊपर क3 ओर {खंचना उपर क3 ओर सांस को {खंचना
मतलब उसे तारक yzम कहा जाता है । ऊपर क3 ओर सांस को {खंचने क3
Xrया प`रपण
ू F हो जाती है तब सारा Lव)व हमारे अंदर समा जाता हो ऐसा
लगता है । ऊपर क3 ओर सांस {खंचना सभी ाणीओ मE एकसमान होता है ।
राजयोगी वह है जीसने एक और अLवभा\य का साkा कार Xकया है । वह
ई)वर के साथ एकाकार हो जाता है । जब बोले, बैठे और सोता है । राजयोग
मतलब ऊपर क3 मं{झल पर बैठकर चारो ओर क3 सिृ Mट दे खने जैसा है ।
राजयोग को राजयोग ईस'लए कहा जाता है क3 वह सभी योग का राजा है ।
जब हमार! बLु J ई)वर के साथ एक हो जाती है तब उसे राजयोग कहा
जाता है । वह परम शांत है – वह वiपह!न है , वह गण
ु ह!न है । यह सुख
गण
ु र@हत है । ईसे जीवनमुि5त कहा जाता है ।
पMट!करणः समाध मतलब अपनी शि1तयो को नयं?Gत करना वह
है । जब मनु9य अपनी शि1तयो को पण
ू :
K प से अंकु4शत करके सह2Gार
जीसका द(माग है उसक@ ओर दौड जाता है तब समाध का पण
ू K सुख ाwत
176 चदाकाश गीता

होता है । समाध ाण को ऊपर क@ ओर /खंचने से ससमाध 4सt हो


सकती है । तारक ONम मतलब ाण को ऊपर क@ ओर /खंचना वह है , ाण
जब ऊEचतम 2तर पर पहुंचता है तब सारा 3वqव हमारे अंदर आ जाता है ।
हम हमारे अंदर ऐसी शि1त का 3वकास कर सकगे क@ जो सारे ONमांड को
नयं?Gत कर शके। ाण सभी ाणीओ म एकसमान है । फकK 4सफK 2व:पो
का है । मूलतव का नह(ं। राजयोगी वह है जीसने उEचतम 2तर ाwत
Iकया है । सोते, बैठते, बोलते व1त राजयोगी हरदम ईqवर के सांनVय मे
रहते है । राजयोग मतलब मकान के सबसे ऊपरवाले &ह2से म बैठना और
नीचे क@ चारो ओर फैल( सिृ 9ट को दे खने जैसा है । राजयोग जब 4सt होता
है तब द(माग म मन ऊपर क@ बैठक का अनुभव करता है । मन उसके बाद
सुख का महासागर बन जाता है । राजयोग को राजयोग ईस4लए कहा जाता
है क@ वह योग के 3व3वध कारो का राजा है । जब बु3t और Xान एक
जाये तब ईqवर का सा$ाकार होता है । राजयोग 4सt होता है । राजयोग
मतलब परमशांत। वह 2व:पह(न, गुणर&हत है । परमसुख तब 4सt होता है
जब राजयोग 4सt होता है । ये सुख के कोई चNन या गुण नह( है । सुख
आकारर&हत है । जीवनमुि1त तब 4सt होती है जब परम शांत और परम
सुख 4सt होता है ।

214. सिृ Mट का Lवलय अनंत कृत मE हो जाता है और आ@द


कृत मE से Xफर बाहर आना उसे सज
ृ न ककहा जाता है । ईसमे पन
ु ःवेश
को नाश कहा जाता है । जब आप 'सफF शर!र के 'लए सचेत बने और सब
भूल जाएं तो उसे सज
ृ न कहा जाता है । राजयोग के 'लए क3सी नि)चत
तरह के कमF-Xrया सूचत नह! क3 जाती। कोई 'शवभि5त भी क3 नह!
जाती। ईसके 'लए कोई नि)चत थान बताया नह! जाता। यह सब
177 चदाकाश गीता

राजयोगी के मितMक-द!माग मE होता है । उसका ारं भ द!माग से होता है ।


अगर €यि5त अपने द!माग मE यह अनुभूत करे तो उसका भाव सारे
शर!र मE होती है ।
पMट!करणः सज
ृ न कृत म अlqय हो जाता है । कृत वह ईqवर
क@ सI‡य शि1त है । ईqवर वह नवृ त ऊEचतम 2तर पर होती है ।
कृत के मूल 2व:प म से बाहर आना उसे सज
ृ न कहा जाता है और पन
ु ः
उसम 3वल(न होना उसे नाश कहा जाता है । जब Fयि1त 4सफK अपने शर(र
के बारे म सचेत हो और दस
ू र( बातो म न हो तब उसे सज
ृ न कहा जाता
है । आमा जब परमामा म 3वल(न हो जाए तब (3वनाश) लय कहा जाता
है । राजयोग म क@सी कार का भि1त का 3वशेष 2व:प नह(ं है । क@सी
कार क@ 3वशेष I‡याएं बताई नह( जाती। कोई निqचत 2थान बताया
नह( जाता। राजयोग निqचत कार के 3वध-3वधानो स मु1त है । कोई
4शवभि1त 3वशेष कार क@ नह( होती। ये सब मि2त9क म होता है ।
राजयोग म ईqवर अनुभूत द(माग म केl(त होती है । ईस अनुभूत का
भाव चारM ओर पहुंचता है । ईस कार का भाव वैिqवक (सावK?Gक)
कार का होता है ।

215. yzम व मतलब अपनेआप मE ‘एकसाथ एक व’ क3 अनुभूत।


Lपंड बाहर! ओर से दे खा जाता है । yzमानंद का अंदiनी तौर पर अनभ
ु व
Xकया जा सकता है । यह yzमनाद सिृ Mट से पर है । सिृ Mट मान'सक िथत
है । आ मा अज:मा है । मन को सवF कार के भय होते है । सभी सिृ Mट का
अनुभव अंदiनी तौर पर हौता है । यह yzमनाद सिृ Mट से पर है । सिृ Mट
मान'सक िथत है । आ मा अज:मा है । मन को सब तरह के भय है ।
सिृ Mट के अनभ
ु व 'सफF दे हधार! को होता है । जब बाzय व को आंतरत व मE
178 चदाकाश गीता

तबद!ल Xकया जाये तो तब सभी तरह के भय का नाश होता है । हमारे


शर!र पर ऐसे अलंकार नह! होते उसमE दःु ख क3 कोई वजह नह! होती। वे
लोग एक कार क3 BिMट रखते है । ईnछाएं उन लोगो क3 होती है , जीसके
पास भौतक आंख होती है । वे लोग भेदBिMट से दे खते है । ईnछाएं मनुMय
को काम करने के 'लए े`रत करती है । ईnछार@हत दशा मतलब मुि5त।
फल क3 अपेkा न रखE वह जीवनमुि5त है । यह अवधूत क3 िथत है । यह
िथत सूoम है । 8ानीओं को आंतरBिMट होती है । ऊ:होने मन को
नयंYjत Xकया होता है । वे एक BिMट रखते है । उन लोगो को कोई भेद
नह! होता। उ:हvने एक अLवभा\य का साkा कार Xकया होता है । थूल
िथत मE भेद होता है । अंदiनी सांस का Lवभाजन न हो सके वह
अLवभा\य है ।
पMट!करणः ONमतव मतलब अपनी आमा म एकव क@
अनुभूत। ONम सवKG सवK म &दखता है । सार( सिृ 9ट ONम से Fयाwत है ।
सिृ 9ट उसका 2वCप है । 3पंड (शर(र के अंश) जो बाहर( तौर पर &दखते है
वह है । भौतक आंख को जो &दखता है वह 3पंड है । ONमांड सिृ 9ट से ऊपर
है । ONमांड अजमा है । सिृ 9ट ए मान4सक भाव है । मन को न9ट Iकया
जाये मतलब मनोवेगो को अंकु4शत कर 4लया जाएं तो ईEछार&हत दशा
पैदा होती है और तब सिृ 9ट का अि2तव नह( रहे गा। आमा अजमा है ।
आमा खुद का सजKक है । मन को सभी तरह के भय होते है । जब मन का
नाश Iकया जाये तो भय का नाश हो जाता है । सार( सिृ 9ट दे हधार(ओ को
&दखती है । जब बाहर( ि2थतयां अंतरमुख हो जाएं तब सभी भय का नाश
होता है । समाध न4भK1ता क@ ि2थत है । अगर लोगो के पास ऐसे अंलकार
हो तो उसे चोर का भय रहता है लेIकन जीसके पास ऐसे अलंकार न हो
179 चदाकाश गीता

उनके 4लए दःु ख का कोई कारण नह( होता उसी तरह सिृ 9ट म सवKG
ONमदशKन करनेवाले को कोई भय क@ वजह नह( होती। एक ONम को दस
ू रे
ONम के भय म रहने क@ कोई वजह नह( है । ऐसे लोग एक lि9टवाले
होते है । ऐसे लोगो के 4लए सब ‘एक’ होता है । ईEछा उन लोगो म होती है ,
जो भौतक lि9ट से दे खते है । ईEछाएं मानवी को काम करने से ेoरत
करती है । मनु9य ईस जगत म खुद को पसंद हो उसे ाwत करने के 4लए
यास करता है लेIकन अगर मनु9य ईEछार&हत दशा पर पहुंचा है तो वह
पूण:
K प से नवृ त के 2तर पर पहुंचता है । पूण:
K प से ऊEछार&हत होने क@
ि2थत जीवनमुि1त क@ ि2थत है । कमKफल क@ अपे$ा न हो वह
जीवनमुि1त है । यह ि2थत अवधूत क@ है । यह ि2थत अत स[
ू म है । ईस
चीज का अनुभव Iकया जा सकता है लेIकन 3ववरण नह( &दया जा सकता।
Xानीओ को आंतरlि9ट होती है । Xानीओने मानस को जीता है । ईस4लए
Xानीओ सवKG एक (मन) तव के अनुभव करते है । Xानीओ सिृ 9ट के
सज
ृ नकताK के दशKन सिृ 9ट मे करते है और सार( सिृ 9ट का दशKन ईqवर म
करते है । Xानीओ म भेदबु3t नह( होती। Xानीओने एक अ3वभाxय ईqवर
का सा$ाकार Iकया होता है । 2थूल ि2थत म भेद होता है । सू[म ि2थत
म सब एक होता है । ाण एक और अ3वभाxय होता है । ाण सिृ 9ट के
सभी ाणीओ मे एकसमान होता है ।

216. थूल का Lवचार मान'सक है। सूoम िथत आिŸवक है ।


8ानी योगनBा मE मत रहते है । वे बैठते-ऊठते ईसी िथत मE रहते है।
8ानी क3 तल
ु ना कछुए के साथ कर सकते है । कछूएं अपने अंगो क3 सुरkा
जबब ज*र! हो तब अपनी पीठ से करता है उसके 'सवां वे अपने अंगो
को खुdला रखते है ।
180 चदाकाश गीता

पMट!करणः मनु9यमन दु यवी बातो म होता है वह मनु9य क@


2थूलवृ तयो का सूचक है । ईस तरह 2थूल का 3वचार मान4सक है । सू[म
ि2थत आि—वक है । आमा क@ सू[म ि2थत पर पहुंचनेवाले Fयि1त को ह(
दशKन होते है । Xानी लोग वे है जो योगनlा म म2त रहते है । योगनlा
वह समाध क@ ि2थत है मतलब पुण:
K प से नभ‰1ता क@ ि2थत है । Xानी
हरदम समाध म रहते है । Xानीलोग ऊठते-बैठते या शर(र क@ क@सी भी
I‡या करते करते समाध म रहते है । Xानी कछूए जैसे होते है । कछूआ
अपने अंगो को जब ज:रत हो तभ &दखाता है नह( तो वह अपनी पीठ के
पीछे छूपाकर रखता है । Xानी भी उसी तरह हरदम ईqवर के साथ जुडा
रहता है और ईस ि2थत म से अनवायK हो तभी बाहर आता है । बाक@ के
समय म Xानी ईqवर म ल(न रहते है ।

217. रे लवे क3 े न सामा:य गत क3 हो या गत से चलनेवाल! हो


लेXकन दोनो मE शि5त एकसमान ह! उपयोग मE ल! जाती है , लेXकन दोनो
के गंत€य थान पर पहुंचने के समय मE फकF पडता है । सं:यासी वह मेल
े न (\यादा गतवाल! े न) जैसा है । सं:यासी हरदम बाहर! Lव)व को खुद
मE दे खता है , लेXकन सांसा`रक जीवन मE रत रहनेवाले लोग (लोकल े न)
सामा:य े न जैसे होते है । े न मE वेश करना मुि)कल होता है लेXकन
एकबार वेश कर लेने के बाद कोई मुि)कल नह! होती। े न मE वेश
ककरने के बाद मनुMय अपने सामान क3 चंता नह! करता। हम े न मE
बैठकर कोई चीज खर!दते है तो भी हमारा Zयान े न क3 ओर ह! रहता है
उसी तरह सब से पहले Lववेक – बाद मE नाद – सुनना वह है । हम कमF
कुछ भी करE तो भी हमारा Zयान च त पर रहना चा@हए। दे खना, सुनना,
बातE करनी वह स याथF मE कमF नह! है लेXकन ना'सका से सांसे ‰हण
181 चदाकाश गीता

करना वह वातLवक (ए5शन) कमF है । ‘शुभकमF’ कहना वह अधोमागF का


सूचक है ।
पMट!करणः मनु9य सभी आमा का सा$ाकार करता है लेIकन
एक समय पर ह( सब का सा$ाकार नह( करता। सामाय गतवाल( _े न
और xयादा गतवाल( _े न दोनो म शि1त का उपयोग एकसमान ह( होता है
लेIकन 4सफK गंतFय 2थान पर पहुंचने के समय म ह( फकK रहता है उसी
तरह सभी लोग आज या कल ईqवर का सा$ाकार करगे। सवाल 4सफK
समय का है । ाण सभी म एकसमान होता है । संयासी मेल _े न (xयादा
गतवाल( _े न) जैसा होता है । संयासी वह है जो आजीवन काल म ह(
ईqवर का सा$ाकार करता है । संयासी के 4लए सारा 3वqव अपने „दय म
होता है । उसने अपनेआप म ऐसी शि1त का 3वकास Iकया होता है जीससे
वह सारा ONमांड नयं?Gत करता है । जो Fयि1त अपनी शि1तयM को
सांसाoरक जीवन म केl(त करता है वह लोकल _े न जैसे है । ऐसे लोग
जीवनल[य म दे र से पहुंचते है । _े न म दा/खल होना मुिqकल होता है
लेIकन बाद म कोई मुिqकल नह( होती। उसके बाद मनु9य अपने सामान
के बारे म चंतत नह( होता। उसी तरह मनु9य के 4लए आमा पर Vयान
केl(त करना मुिqकल होता है लेIकन एकबार आमा पर Vयान केl(त
हो जाता है तब सांसाoरक जीवन का कोई आकषKण नह( रहे गा हम जब _े न
मे बैठकर चीज खoरदते है तब हमारा पूरा Vयान _े न पर ह( रहता है । हम
_े न कब चलेगी ऐसा ह( सोचते रहते है , नह(ं तो हमारा कोई सौदा अधूरा
रह जायेगा उसी तरह हमारा ाथ4मक Vयान 3ववेक पर ह( होना चा&हए।
हमे उसके बाद ‘नाद’ के बारे म सोचना है । जो भी हम दे खे और सुन
उसके पर हक@कत म दे खना, सुनना, बाते करना वह कमK नह( है लेIकन
182 चदाकाश गीता

सांस अथाKत ‘ाण’ का अंदर बाहर होना उसके ऊपर ह( सभी I‡याओ का
आधार है । सांस अटक जाती है तो सभी I‡याओ का अंत आ जाता है ।
ईस4लए ना4सका से सांस ले वह( सह( I‡या है । ये सब I‡याएं बंधन है ।
अEछे और बूरे कमK दोनो बंधन है । एकमाG ाण 2थान सEचा कमK है ,
जीसमे कोई बंधन नह( होते। ाण सिृ 9ट के सभी ाणीओ म एकसमान
होता है । जीस तरह लोकल _े न और ए1सेस _े न दोनो म एकसमान
शि1त होती है ।

218. मौन जीसे कहा जाता है वह ‘मन’ के संदभF मE है िजzवा के


संदभF मE नह!ं। बLु J और 8ान जब आ|मा के साथ एकाकार हो तब Xकया
जाये वह कमF नह!ं है । मौन मन का वातLवक Lवतार है । िजzवा का
नह!। मौन से योग 'सJ होता है । वह योगी है , जीसने बLु J और 8ान दोनो
एक Xकये है । जो मनुMय मन को बLु J के अधीन करता है , बLु J मन को
अंकु'शत करे वह योगी है । जीसे मौन का €याप (मयाF@दत Lवतार) कहा
जाता है वह सुष
ु ना का दस
ू रा नाम है , जो ईडा और पींगला का
'मलनथान है । शर!र क3 तीन मह वपण
ू F नाडयां है । ईडा, Lपंगला और
सुष
ु ना कंु ड'लनी बैठक है ।
पMट!करणः मौन हक@कत म मन के संदभK म होता है और जीवन
के संदभK म नह(। 4सफK एक श]द बोले ?बना िजNवा को ताला लगाकर
रखना वह मौन नह( है । मौन सEचा होना चा&हए और वह मन से होना
चा&हए। मन परम शांत म होना चा&हए। मन यहां-वहां भटकना नह(
चा&हए। ब3ु t और Xान जब आमा के साथ एकाकार हो जाते तभी जो
Iकया जाता है वह कमK नह( है। कमK 4सफK दु यवी बातो-भौतक बातो के
4लए होता है । ब3ु t और Xान एकाकार हो जाये तब सज
ृ नकताK के साथ
183 चदाकाश गीता

एकव 2था3पत होता है । यह उEचतम ि2थत जब 4सt होती है । तब वह


दै वी होती है उसम सांसाoरक जीवन का कोई तव नह( होता। ईस4लए उसे
कमK नह( कहा जा सकता। मौन मन का 3व2तार है , िजNवा का नह(।
सEचा मौन तब 4सt हो सकता है जब मन मि2त9क म उसके सEचे 2तर
पर होता है , आम मनु9य क@ तरह नDन 2तर पर नह(। मन 3वचारो से
मु1त हो जाता है । ऐसी ि2थत म मन परम शांत का अनुभव करता है ।
ऐसी ि2थत म मन पूण:
K प से मौन का अनुभव कर सकता है । योग म
सब मौन से 4सt होता है । हम हमार( शि1त बोलते बोलते ?बगाडते है और
िजNवा को xयादा काम दे ते है । जब ईस शि1त का संवधKन करते है और
ईqवर सा$ाकार क@ &दशा मे आते है तब हमारा ल[य कुछ ह( समय म
गौरवद तर(के से 4सt कर सकते है । योगी वह है जीसने मन और बु3t
को एक म शा4मल Iकया है । जो मनु9य मन को बु3t के अधीन करे और
बु3t को मन से अंकु4शत करे वह योगी है । ऐसे मनु9य अपने कायK म
बहुत अचूक-निqचंत होते है । हम पूण:
K प से मौन तभी 4सt कर सकते है
जब हमारा मन ŒूमVया हमारे Œमरो के मVय म केl(त करगे। ŒूमVया
ईडा और 3पंगला नाडी का 4मलन 2थान है । मौन तभी 4सt हो सकता है
जब हम सुषD
ु ना म Vयान केl(त कर सकगे। सुषD
ु ना मनु9य म रहनेवाल(
कंु ड4लनी क@ बैठक है । मनु9य क@ तीन महवपूणK नाडीयां है – ईडा, 3पंगला
और सुषD
ु ना।

219. सभी त वो का मूल त व परyzम है । जब परyzम का


साkा कार होता है तब जीवनमुि5त 'सJ होती है । हमे नद! को उसके
उदगम थान मE दे खना चा@हए, सागर मE 'मल जाने के बाद नह!। हमE वk

के मुख जडv का दे खना चा@हए। जीस तरह सभी पैड एक मुख जडv
184 चदाकाश गीता

रखते है उसी तरह सभी के 'लए एक और एक ह! ई)वर होते है । जब


मनुMय को सब एकसमान अनभ
ु व होते है तब ईस िथत को जीवनमुि5त
क3 िथत कहा जाता है ।
पMट!करणः परONम सभी तवो का मूलतव है । जब 4स3t होती है
तब उसे जीवनमुि1त कहा जाता है । जीवनमुि1त अथाKत ईसी मनु9य जीवन
म बंधनो से मु1त हो जाना। हम परONम म से पैदा हुए और परONम का
सा$ाकार हमारा फझK है । परONम का सा$ाकार करना मतलब हमारे
अि2तव क@ जड दे खना वह है । हमे नद( को दे खना हो तो उसके उदगम
2थान म दे खनी चा&हए, सागर म 3वल(न हो जाने के बाद नह(। हमे पैड
क@ मुख जड दे खनी चा&हए उसी तरह हमे परONम के साथ एकव रखना
चा&हए। परONम सिृ 9ट का उ~गम 2थान है । जीस तरह ईqवर सभी के
4लए एक है उसी तरह सभी पैडो के 4लए मुख जड एक ह( होती है । हम
जब अनुभव करते है क@ जो कुछ हो रहा है वह ईqवर क@ करनी है तो हम
मुि1त 4सt क@ है ऐसा कह सकते है ।

220. नाटक के कलाकारो पMृ ठभू'म मE थम (परदे के पीछे ) नाटक


का अTयास करते है और बाद मE वे मंच पर अ'भनय करते है । ऐसा ह!
योग के अTयास मE है । थम उसका गDु त तर!के से अTयास Xकया जाता है
और जब 'सLJ ाDत होती तब वह वयंका'शत होता है । जब हम कला
का अTयास करते है तब एकसाथ ह! परू ा अनुभव नह! 'मलता। अTयास
जीतना \यादा Xकया जाता है उतना अनुभव भी बढता है ।
पMट!करणः योग के ारं भ म गwु त तर(के से अ…यास करना चा&हए
लेIकन जब योग4स3t ाwत होती है तब 2वयं लोगो के Vयान पर आती
है । नाटक के कलाकारो परदे के पीछे नाटक का पव
ू 
K योग करते है और
185 चदाकाश गीता

बाद म मंच पर वा2त3वक तौर पर 2तुत करते है । योग भी ईन आम


नयमो म अपवाद नह( है । मनु9य जब कला 4सखता है तब उसे एकह( बार
म सब अनभ
ु व नह( 4मल जाता। xयादा से xयादा अ…यास Iकया जाये तो
xयादा से xयादा अनुभव ाwत होता है उसी तरह नवद(#$त योगी जीस
तरह योग का अ…यास xयादा करता है उसी तरह उसे ईqवर के परम सुख
क@ अनुभूत होती है । फल मनु9य के यासो के &हसाब से होता है ।

221. बनाया हुआ आहार 'सफF सूंघने से €यि5त क3 भूख 'मटती


नह! है । ईसके 'लए आहार खाना पडता है और तभी भूख 'मटती है । उसी
तरह अनुभव एक 'सLJ है । आपने जीस स य का अनुभव Xकया हो उसका
कोई Lवरोध नह! कर सकता। हाथ मE श5कर रखने से श5कर क3 मीठास
का पता नह! चलता। श5कर क3 मीठास पाने के 'लए उसके टुकडे को
िजzवा पर रखना पडता है । यह अनुभूत है । प
ु तक का 8ान शंका-Lववादो
को ज:म दे ते है लेXकन वानभ
ु व को नह!ं। अपना अनुभव नाग`रको के
'लए रा\य क3 आ8ा समान होता है लेXकन प
ु तक का 8ान नाग`रको
जैसा है । जीवनमिु 5त उसे कहा जाता है जो योग का लoय और घर है ।
यह चीज 'सJ करनी है । गफ
ु ा मE रहना वह मनुMयजीवन मE 'सJ करने
जैसी बात है । बLु J एक गफ
ु ा है । जब जीवा मा बLु J मE रहना 'सखता है
तब जीवन का लoय 'सJ होता है । Rदयाकाश आ मा के रहने का थान है
और आ मा तत
ृ ीय (@द€य) आंख का थान है । Rदयाकाश एक गफ
ु ा है ।
भेद क3 वजह से पi
ु ष jी बनता है और jी पi
ु ष बनता है लेXकन
हक3कत मE 'सफF बाहर! शर!र और उसके कायF का फकF पैदा होता है लेXकन
उसमE रहनेवाल! सूoम-वतु एक ह! है । सूoम भेद Yबना का पi
ु ष वह jी
है । jी के अंदर बLु J और 8ान जब एक हो गये हो तबब वह पुiष बन
186 चदाकाश गीता

जाती है । कूएं के पंप मE से rू घूमानेवाल! jी हो या पi


ु ष पानी
एकसमान तर!के से नीकलता है। भि5त मE jी या पi
ु ष का कोई भेद नह!
होता। jी और पi
ु ष का भेद 'सफF शार!`रक होता है । 'शवशि5त पi
ु ष और
jी दोनो मE एकसमान होती है ।
पMट!करणः मनु9य को सय का 2वानुभव होना चा&हए। अनुभव
Iकताबी Xान से xयादा अEछा है । Fयि1त 4सफK आहार सूंघकर अपनी भूख
4मटा नह( सकता। उसके 4लए आहार खाना जCर( होता है । मनु9य को
श1कर का 2वाद चखने के 4लए उसके टुकडे को िज„वा पर रखना पडता है
उसी तरह परमसुख 1या है वह समझने के 4लए मनु9य को खुद को
अनुभव करना पडता है । सय का अनुभव ह( सEची 4स3t है – और कुछ
नह(। ईqवर के परमसुख का अनुभव कोई शंका क@ वजह नह( बनता।
Iकताबी Xान शंका-3ववादो क@ वजह बन सकता है । Fयि1त अपनी ईqवर
क@ चचाK म अधकृत तौर पर तभी बात कर सकता अगर उसने खुद
अनुभव Iकया हो। Fयि1त अपने अनुभव क@ वजह से राजा अपने नागoरको
को जीस अधकार से हु1म दे ता है उसी तरह अपने 2वानुभव क@ बात कर
सकता है । अनुभव राजा क@ आXा जैसा होता है तो प2 ु तक का Xान
नागoरको जैसा है । पु2तक का Xान 2वानुभव क@ तुलना म नह( आ
सकता। जीवनमुि1त Fयि1त के अपने ह( घर जैसा होता है और उसके
योग का अंत है । यह( चीज 4सt करनी होती है । बु3t एक गुफा है । जब
जीवामा बु3t म रहना 4सखता है तब जीव का Vयेय 4सt होता है । जब
बु3t आमा म 3वल(न हो जाता है तब जीवन का ल[य 4सt होता है । जब
बु3t आमा म 4मल जाती है तब ‘परम’ क@ 4स3t होती है । यह गुफा म
रहना ह( 4स3t करना है । „दयाकाश वह आमा के रहने क@ जगह है और
187 चदाकाश गीता

आमा तत
ृ ीय आंख (&दFय) का 2थान है । „दयाकाश एक गुफा है ।
जीवामा को परमामा क@ गफ
ु ा म रहना है । पु:ष और 2Gी शार(oरक
भेदभाव है । भेद क@ वजह से 2Gी पु:ष बनती है और पु:ष 2Gी बनता है ।
2Gी और पु:ष म बाहर( शर(र और कायK का फकK होता है लेIकन दोनो म
सू[म तव एकसमान रहता है । अगर 2Gी म बु3t और आमा एक हो गये
हो तो पु:ष बन जाती है । पु:ष या 2Gी बनना उनके आंतoरक 2वभाव पर
नभKर होता है , उनके 2थूल शर(र पर नह(। भि1त 2Gी-पु:ष के भेद ?बना
4सt हो सकती है । कूएं के पंप म से 2‡ू पु:ष या 2Gी कोई भी घूमाएं तो
भी पानी एकसमान ह( बाहर आता है उसी तरह भि1त जीन लोगो का मन
शुt हो उस 2Gी या पु:ष क@सी से भी 4सt हो सकता है । Xानीओ को
4लंगभेद नह( होते। उनके &हसाब से सब समान होते है । 4शवशि1त पु:ष
या 2Gी दोनो म एकसमान ह( होती है । ईqवर क@ शि1त मनु9य 2Gी या
पु:ष हो लेIकन समान ह( होती है ।

222. जो लोग ईnछार@हत है उ:हE भय नह! है । जो लोग


ईnछार@हत होते है वE सुखी होते है । जीन लोगो क3 LववेकबLु J तेज है वे
महान है । मनुMय भू'म और संपत एकYjत करने से महान नह! बनता।
थोडी संपत और पहाड अपने पास होने से मनुMय महान नह! बनता। शूB
क3 LववेकबLु J वह! हो तो वह महान है । yाzमण उसे ह! कहा जाता है
जीसके पास बLु J होती है । बडा महल, संपत, ह!रे -हार-ह!रे क3 अंगठ
ू uयां
मनुMय को महान नह! बनाते 'सफF जीनक3 LववेकबLु J होती है वह! महान
है । भौतक तौर पर संप:न €यि5त महान नह! है । सोने का भंडार
रखनेवाला मनुMय महान नह! होता।
188 चदाकाश गीता

पMट!करणः जो लोग ईEछार&हत है उह भय नह( होता। ईEछा भय


क@ वजह है । ईEछार&हत मनु9यM सुखी होते है । ऐसे लोग ईqवर के परम
सुख को ाwत करते है । महानता भौतक संपत एक?Gत करने से 4मलती
नह( है । वह महान मानवी जीसके पास 3ववेकबु3t है । 3ववेकह(न मानवी
महान नह( है । संपत रखनेवाला, भू4म-पहाडो, बडे घर-ह(रे -हार-ह(रे क@
अंगूठsयां सोने क@ अंगूठsयां मनु9य को महान नह( बनाते। शूl भले ह(
गर(ब हो लेIकन 3ववेकबु3t रखता हो तो वह महान है । OाNमण वह( है
जीसके पास 3ववेकबु3t है । सोने के भंडार रखनेवाला महान नह( है ।
महानता 4सफK आमा क@ होनी चा&हए, दे ह क@ नह(। जीसने आमा को
4सt Iकया है वह महानतम मनु9य है ।

223. सभी Lव8ानो मE yzमLव8ान &ेMठ है । यह रहय अगर


मनुMय समझे नह! तो कमF के बंधनो से मनुMय मु5त नह! होता।
पMट!करणः सभी 3वXानो म +े9ठ 3वXान ONमXान है । यह रह2य
समझ म आता है तो ह( कमK के बंधन टूटते है । फूल फल क@ वजह है ।
फल पकता तब फूल 2वयं गर जाता है उसी तरह Xान 4सt होता है तब
कमK के बंधन 2वयं तूट जाते है।

224. हे 'भखार!! योग के अि^न मE मन क3 ‚मणाओ को जला


दो। जीन लोगोने yzम 'सJ Xकया नह! है वे स य समझते नह! है । वे
लोग सnचा आनंद ाDत नह! कर सकते। अहं कार! वृ तयां नMट नह! होती।
आनंद के बंधन को मजबत
ू बनाओ। ईnछाओ को मन के भीतर रख दो।
ईnछाएं फलर@हत है , उसे आंत`रक तौर पर नMट करो।
189 चदाकाश गीता

पMट!करणः हे 4भखार( जैसे लोगो, योग के अ…यास से मन क@


Œमणाओं को योगाि}न म जला दो। योग के सतत अ…यास से मन को जा
दो। जीन लोगोने ONम का सा$ाकार नह( Iकया वे लोग सय समझते
नह( है । ONम सय है , परमसय के अनुभव के ?बना Fयि1त सEचा आनंद
ाwत नह( कर सकता। आमा के सा$ाकार के ?बना अहं भावी वृ तयां
न9ट नह( होती। हे मानवी-आनंद के बंधन मजबूत बनाओ। आनंद म रहो।
आपक@ ईEछाओ को मानस के भीतर डाल दो। ईEछाओ का कोई उपयोग
नह( है । वह फलर&हत है । ईEछाओ को आंतoरक तौर पर न9ट करो।
आंतoरक तौर पर मतलब मन को आमा म 3वल(न करके।

225. जब जीव मनुMय मE रहनेवाल! 'शवशि5त को अंदiनी तौर पर


द!माग के के:B (yzमरं ‡) क3 ओर ले जाता है और वहां वह 'शव के साथ
एक हो जाता है , अLवभा\य हो जाता है तब मुि5त 'सJ हो जाती है ।
yzमानंद वे लोगो के 'लए है , जीसने मुि5त 'सJ क3 है । हरदम 'शव पर
Zयान के:B!त करो। शुi मE 'शव थे, शुi मE 'सफF 'शवशि5त थे। शा)वत
आनंद है वह! रkक है । जो ईnछार@हत है वह Yjगण
ु र@हत है, वह! सnचा
गण
ु है । हम ह! हमारे राजा है । आप ह! मुि5त के दे व हो। सnचा वiप
मनुMय वiप है । ाणीसिृ Mट मE मनुMय सवF से आगे है । ईस सिृ Mट मE
मनुMय से आगे कुछ नह! है । मनुMय ह! सभी दे शो का सज
ृ न करता है ।
पMट!करणः मनु9य म रहनेवाल( कंु ड4लनी को सह2Gार – जो हजार
पतीओवाला कमल है उसक@ ओर मूलाधार म भी अथाKत शर(र के मूल-
कमल म ले जानी चा&हए। यह 4सt हो तब मिु 1त 4सt होती है । मनु9य
4शव के साथ एक हो जाता है । ईसी तरह ाwत हुई मिु 1त एक-अ3वभाxय
है । ONमानंद तभी ाwत होता है जब मुि1त 4सt होती है। हे मनु9य!
190 चदाकाश गीता

हरदम 4शव पर Vयान केl(त करो। 4शव शु: म एक ह( थे। शु: म 4सफK
4शवशि1त एक ह( थे। शाqवत आनंद वह ईqवर संर$क है । ईEछार&हत
ि2थत ह( शाqवत आनंद है । जो ?Gगुणर&हत है वह ईEछार&हत है । ईEछा
हक@कत म मनु9य म रहनेवाले तीन गुणो का पoरणाम है। ईEछार&हत
ि2थत का एक सEचा गुण 3वक4सत करना है । आमा शर(र का राजा है ।
आमा मुि1त का दे वता है । आमा का दशKन 2व म करो। मनु9यजम
ईqवर क@ सिृ 9ट म +े9ठ है । 3वqव म मनु9य से बडी कोई योन नह( है ।
अरे ! खुद ईqवरने भी परमामा के सा$ाकार के 4लए मनु9यजम 4लया
था। मनु9यजम सEचा जम है। मनु9य जो क@ दे श के भेद बनाता है वह
2व का +े9ठ उपयोग करे तो सवKशि1तमान है ।

226. yzमानंद का अनुभव करनेवाले को yाzमण कहा जाता है ।


हमार! माया नाशवंत है । हे ह`र! अहं को जला दो। जीसने मानस (मन) का
नाश Xकया है उसने माया का नाश Xकया है । माया ई)वर नह! है । 'शव
ई)वर है । सब लोगो को मालम
ू े है क3 मŽखन दध
ू मE छूपा है । मŽखन
ाDत कर सके ऐसे लोग बहुत कम होते है । भि5त दध ू है । Lववेक के
अि^न पर भि5तवiप दध
ू को गरम करे । बLु Jवiप बरतन मE गमF करके
ई)वरiपी मŽखन ाDत कर सकते है । Lववेक का अि^न मतलब योग का
अि^न। ईस Lववेक के अि^न से मनुMय के द)ू मनो का नाश हो सके। ये
षड`रपु मतलपब गुसा, ईnछाएं, ईMयाF, काम, लोभ। और तभी ई)व
साkा कार*पी मŽखन 'मल सकता है ।
पMट!करणः जीसने ONम का सा$ाकार Iकया हो और उसके
परमसुख ाwत Iकया हो वह( OाNमण है । माया नाशवंत है । ईqवर शाqवत
है । हे हoर! मनु9य के अहं को जलाकर न9ट करो। अहं सभी दष
ू णो क@ जड
191 चदाकाश गीता

है । जीसने मानस का नाश Iकया उसने माया का नाश Iकया है । माया


मान4सक लगाव है । मन का नाश होता है तब माया का अि2तव नह(
रहता है । माया ईqवर नह( है । 4शव ह( ईqवर है । सब लोग जानते है क@
म˜खन दध ू म फैला हुआ है। म˜खन ाwत करने के 4लए दध ू को
उबालना पडे। म˜खन ाwत करनेवाले लोग बहुत कम होते है उसी तरह
सब लोगो को ईqवर है ऐसा मालूम है लेIकन बहुत कम लोग ह( उसे ाwत
कर सकते है । भि1त एक कार का दध ू है । दध
ू को 3ववेक क@ अि}न पर
गमK करना चा&हए। जीस तरह दध
ू म से म˜खन ाwत करने के 4लए
अि}न का उपयोग करना पडता है उसी तरह 3ववेक क@ अि}न से भि1तCपी
दध
ू म से ईqवर का सा$ाका:पी अमत
ृ ाwत होता है । बु3t 3ववेक के
4लए बरतन है । 3ववेक बु3t म होता है । योगाि}न मतलब 3ववेक क@
अि}न। हमे हमारे शर(र को 3ववेक के अि}न से 4श#$त करना चा&हए।
ईस 3ववेक के अि}न से मनु9यशर(र के छः दqु मनो – ‡ोध, ईEछा, काम
ई9याK, लोभ और मोह का नाश होता है और नवाKण का नवनीत (म˜खन)
– मुि1त ाwत होती है ।

227. जैसे द!पक Yबना तैल के जल नह! सकता उसी तरह सांस
Yबना शर!र चल नह! सकता। Yबना पतवार नांव लoय तक पहुंच नह!
सकती। ट!मर भांप क3 ऊजाF से चलती है और बLु J केDटन है , नांव
ट!मर क3 तरह चल नह!ं सकती। सं:यासी ट!मर जैसे है , जो लोगो मE
सारा Lव)व हो वे ट!मर जैसे होते है । जो लोग सांसा`रक आनंदो मE ल!न
रहते है वे नांव जैसे होते है । ट!मर क3 टोच पर मागFदशFक काश (द!पक)
होता है उसी तरह yzमरं ‡ सं:यासी के मागFदशFक (द!पक) जैसा है ।
सं:यासी का मन Rदयाकाश मE ल!न हो गया होता है । सं:यासी काश है ।
192 चदाकाश गीता

गाय अ)व क3 गत से दौड नह! सकती। जीसका मन आ मा मE Lवल!न हो


गया है वह अ)व जैसा है । जीनका मन सांसा`रक जीवन मE अटका है वे
गाय जैसा होते है । सभी लोग एकसाथ राजा हो नह! सकते। सब लोग
एकसाथ €यापार! नह! बन सकते। उसके 'लए उपभो5ता होना जiर! है ।
पMट!करणः ाण शर(र क@ सबसे महवपूणK शि1त है । शर(र जीस
तरह ?बना ाण के नह( चल सकता उसी तरह द(पक ?बना तैल के जल
नह( सकता। जीस तरह नांव को Iकनारे तक ले जाने के 4लए पतवार
आवqयक है उसी तरह सांसो पर एका|ता ाwत Iकये ?बना मनु9य मन को
नयं?Gत नह( कर सकता और वे ?बना मन से आमा म ल(न नह( कर
सकता। 2ट(मर 2ट(म एनज‰ और कwतान क@ बु3t से चलती है । नाव
2ट(मर क@ तरह चल नह( सकती उसी तरह सांसाoरक जीवन म अटका
मनु9य संयासी के रा2ते और र(त समझ नह( सकता। संयासी 2ट(मर
जैसे होते है उनक@ सभी ईन ईिlया 3ववेकबु3t से नयं?Gत होती है और
आमा क@ ओर रहती है । जीस Fयि1त म सारा 3वqव हो वह 2ट(मर जैसा
होता है । ऐसे मनु9य का मन सुनयं?Gत होता है लेIकन जीस मनु9य का
मन सांसाoरक जीवन म अटका हो वह नांव जैसा होता है । सांसाoरक जीवन
म अटका मानवी ि2थर नह( होता और अपना ल[य नह( जानता।
सांसाoरक जीवन म रहनेवाले लोगो का मन ?बना अंकुश क@ नांव क@ तरह
यहां-वहां भटकता रहता है । 2ट(मर का मागKदशKक द(पक उसक@ टोच पर
होता है उसी तरह संयासी का ONमरं  है । ONमरं  वह सह2G सूयK के
काश का 2थान है । कंु ड4लनी का काश उनके मि2त9क म फैलता रहता
है । संयासी का मन „दयाकाश म ल(न होता है । संयासी हरदम ONम के
साथ एकाकार रहता है । ईस तरह संयासी 2वयं काश है । संयासी वह है
193 चदाकाश गीता

जो सवKXानी है । गाय अqव क@ तरह दौड नह( सकती। जीसका मन आमा


म ल(न है वह अqव जैसा है । सांसाoरक जीवन म अटका मनु9य गाय जैसा
है । अqव गत के तौर पर गाय से अEछा है उसी तरह संयासी सांसाoरक
जीवन म अटकते मनु9य से अEछा है । सब लोग एक समय पर राजा नह(
बन सकते उसी तरह सब लोग एक समय पर Fयापार( बन नह( सकते उसी
तरह सब लोग एकसमय पर Xानी नह( बन सकते। थोडे अXानी लोग
Xानीओ का लाभ लेने के 4लए आवqयक होते है । अंधकार के ?बना काश
नह( है । काश और अंधकार दोनो ज:र( है ।

228. अंधकार मE चलते है तब डर लगता है लेXकन रोशनी मE


क3सी तरह का भय नह! होता। अ8ान अंधकार है । 8ान काश है । गi

एक काश है । काश वह गi
ु है ।
पMट!करणः जब हम अXानता म अटकते है तब हम डर लगता है
लेIकन काश म होते है तब कोई भय नह( होता। जब आमा का
सा$ाकार हो और Xानािwत हो तब हमे भय नह( लगता। अXानत
अंधकार है । Xान वह काश है । गु: Xानदाता है । गु: द(पक जैसे है ,
जीनक@ उपि2थत से अंधकार दरू हो जाता है । गु: एक काश है और
काश गु: है ।

229. गाढ नBा मE मनुMय सब भल


ू जाता है । दस माईल चलने
के बाद थककर सो जाये तो सारे Lव)व का अित व हम भूल जाते है उसी
तरह भूखे हौ तब अपना आहार खा कर भूख संतुMट करनी चा@हए।
पMट!करणः समाध एक परम सुख क@ ि2थत है , जीसम मनु9य
ईqवर के साथ एकाकार हो जाता है । समाध म मनु9य अत जागत

194 चदाकाश गीता

अव2था म होता है और सांसाoरक जीवन को भूल जाता है । दस माईल


चलकर थका हुआ मनु9य गाढ नlा म सो जाता है तब सारे 3वqव को
भूल जाता है उसी तरह समाध2थ Fयि1त ईqवर म ल(न हो जाने से उसी
बात म सचेत रहता है । मनु9य भूखा हो तब उसे तिृ wत के 4लए 2वयं
आहार |हण करना पडता है उसी तरह समाध 4सt करने के 4लए मनु9य
को खुद यास करना चा&हए।

230. राते क3 दोनो ओर पानी को बहने के 'लए नाल! होती है


उसी तरह सांस को उपर क3 ओर ले जाना ज*र! है । प थर को उपर क3
ओर ले जाने के 'लए \यादा यास करना पडता है लेXकन उसे नीचे गराने
के 'लए \यादा महे नत नह! करनी पडती ऐसा ह! Zयान का है । ज:म लेना
सरल है लेXकन शर!र छोडना क@ठन है । हमे नद! के मूलथान को ढूंढना
चा@हए। नद! सागर मE 'मल जाये बाद मE नद! को दे खना उसका कोई
मतलब नह! है । पैडो के 'लए मात ृ मूल मह वपण
ू F है । बाक3 सब जडE गौण
जडE है । हम कुसI उठाते है तो सांस उपर क3 ओर जाता है । यह ऊZवF सांस
क3 बैठक है । हम खाना बनाते है तब चूdहे क3 \योत उपर क3 ओर जाती
है । \जव'लत चीमनी मE गमF हुई हवा हरदम उपर क3 ओर जाती है उसी
तरह Rदयाकाश मE सांस क3 गत उपर क3 ओर होती है । हमे आनंद होने
क3 वजह वायु क3 गत है । ईस हवा के अ'भसरण क3 वजह से र5तसंचार
होता है । पानी क3 नाल! मE iकावट आती है तो नाल! का अंत आ जाता
है । ईसी तरह हमारे शर!र मE यह अवरोध वात-Lप त-कफ से उ प:न होता
है , जीसे Yjदोष कहा जाता है ।
पMट!करणः ाण जो क@ मन9ु य क@ 4शवशि1त है । उसे शर(र म
ऊVवK &दशा म जाना है । रा2ते क@ दोनो ओर पानी को बहने के 4लए नाल(
195 चदाकाश गीता

होती है जीससे पानी सरलता से बह सके उसी तरह हमे ाणायाम का


अ…यास करना चा&हए और शर(र क@ नाडीओं को शुt करनी चा&हए।
जीससे द(माग म रहनेवाला सह2Gार मागK शुt रह सके। यह जब 4सt हो
तब ईqवर के परम सुख का 2वयं अनुभव होगा। पथर को 4शखर (पहाड)
क@ टोच पर ले जाने के 4लए xयादा यास करना पडता है लेIकन कोई
xयादा यास ?बना उसे नीचे फक सकते है उसी तरह मन को आमा म
केl(त करना क&ठन है ।

231. मितMक ऐसा थान है जीसमE कपरूF , कपरूF का अकF, चंदन


का लेप-कतूर! क3 खु)बू का अनुभव होता है । चींट! जहां पर चीनी हो वहां
पर ई5कƒी होती है । ओमकार का अनुभव होता है तब अ8ानता का
अनुभव नह! होता। आZयाि मक चkु से जो @दखता है वह! सnचा Rदय है ।
भौतक आंख से जो दे खा जाता है वह सnचा Rदय नह! है । मितMक अत
मह वपण
ू F है । सांस का मूल स य आनंद मE है । सnचा आनंद Rदयाकाश मे
है । ाण का घर कंु ड'लनी है और वह! 'शव का घर है । यह! हमारा
परमशांत धाम है । यह! सस व गण
ु का घर है । ईसी घर मE रहनेवाले को
मान-अपमान क3 चंता नह! होती। यह योगी का घर है , जीसने ससाब कुछ
छोड @दया है । यह ऐसे लोगो का घर है , जीनमE सूoम Lववेक है । यह
कंु ड'लनी धाम है यह घर च त-Rदय का धाम है ।
पMट!करणः जब योगा…यास से कंु ड4लनी को मि2त9क तक ले जाते
है तब सब तरह क@ खुqबू का अनुभव होता है । ईस4लए मनु9य का मन
एक ऐसा 2थान है जहां क2तरू (-चंदन लेप कपूरK -कपूरK अकK क@ खूqबू का
अनुभव होता है । चींट(यां चीनी जहां होती है वहां ई1कŽी होती है । जीन
योगीओ को ओमकार के नाद का अनुभव होता है वे ह( Xानी है और जब
196 चदाकाश गीता

ओमकार नाद का अनुभव हो तब अXानता रहती नह( है । चदाकाश ऐसा


2थान है जो आVयािमक च$ु से ह( &दखाई दे ता है , जो 2थूल आंख से
&दखता है वह सEचा चत-„दय नह( है । मनु9य का मि2त9क या मन
उEचतम है , अगर मनु9य म आनंद-कंु ड4लनी का 2थान है ाण का सEचा
मूल सय आनंद है । सEचा आनंद-कंु ड4लनी का 2थान है ाण का सEचा
मूल सय आनंद है । सEचा आनंद चदाकाश („दयाकाश) म है । चदाकाश
4शव का 2थानक है । वह परम शांत का धाम है । जो सवगुण का धाम है
वह कंु ड4लनी का सयधाम है । कंु ड4लनी जब चदाकाश म एक हो जाती है
तब मुि1त 4मलती है लेIकन मन को आमा से दरू ले जाना बहुत ह( सरल
है । जम लेना xयादा सरल है लेIकन ईqवरसा$ाकार से ईqवर का ऋण
चूकाना बहुत ह( मुिqकल है । मे नद( के मूल2थान को ढूंढना चा&हए। नद(
सागर म 4मल जाये बाद म उसे ढूंढने का कोई मतलब नह( है । उसी तरह
हमारे उ~गम का मूल2थान ढूंढना चा&हए। ईqवर का सा$ाकार हमे करना
चा&हए। यह ईqवर जो क@ सार( सिृ 9ट के उदगम क@ वजह है । ईqवर
मनु9य के 4लए मात ृ मूल क@ तरह है । ईqवर का सा$ाकार मनु9य के
4लए बहुत ह( महवपूणK है । ाण क@ बैठक मनु9य के शर(र म ऊपर क@
ओर है । हम कुस‰ उठाते है तब हमार( सांस क@ गत ऊVवK होती है । ाण
क@ ऊVवKगत वह ाण क@ सEची &दशा है । हम खाना बनाते है तब चूWह
क@ xयोत ऊपर क@ ओर जाती है । धुआं भी ऊपर जाता है उसी तरह
„दयाकाश म सांस क@ गत उपर क@ ओर होती है । जब कंु ड4लनी मनु9य
के „दयाकाश-चत म पहुंचते है तब मनु9य क@ एक ह( सांस और वह
ऊVवK सांस चलती है । मनु9य को आनंद-हवा क@ गत-&हलनेडूलने से 4मलता
है । ईस वायु का &हलनाडूलना ह( र1तसंचार क@ वजह बनता है । र1तसंचार
197 चदाकाश गीता

बंध हो जाता है तब शर(र काम करना बंध कर दे ता है । जब पानी क@


नाल( म बंध बांधा जाता है तब पानी का मागK अटक जाता है । उसी तरह
शर(र म वात-3पत-कफ जो क@ ?Gदोष है वह र1तसंचार के 4लए शर(र म
बाधा उपन करते है । वे शर(र के बांध है , ईन तीनो दोषो को ाणायाम
के नरं तर अ…यास से अंकु4शत करने चा&हए। जो लोग चदाकाश म रहते
है वे लोग मान-अपमान के 4लए चंता नह( करते। ऐसे लोग जगत के tैषो
से पर होते है । चदाकाश योगी का धाम है , जहां वे हरदम नवास करते है ।
चदाकाश ऐसे लोगो का धाम है , जीनके पास सू[म 3ववेक है । चेतना का
आकाश वे लोग 4सt करते है जो लोग आVयाम के उEच2तर पर पहुंचते
है ।

232. जो लोग ाण के ऊपर Zयान के:B!त नह! करते वे


ZयेयLव@हन होते है । वे कोई िथत के होते नह! है । कोई बLु J नह! होती।
कोई 'सLJ का संतोष नह! होता। ाण को अंदर और बाहर क3 ओर ले
जाने के 'लए Zयान के:B!त करE । अंदर क3 ओर सांस यो^यiप से लE। सांस
जो नाद उ प:न करती है उसके उपर Zयान के:B!त करE । अंतरनाद और
ाण के उपर &Jा रखE। अंदर सांस लो। गहर! और \यादा गहर! सांस
'लजीये। गहर! और \यादा गहर! सांस लेने से आंतरनाद कान को सुनाई
दे गा। दस
ू र! कोई चीजो का चंतन न करE । खाना, पीना, आना, खडा रहना
और खाते रहना ये सब आ मा का उJार नह! करते। अपना आहार अपने
'लए पकाएं। दस
ू रोने पकाया हुआ खाना खाने क3 ईnछा न रखE। हे मन!
जो कुछ करो वह परम &Jा से करो।
पMट!करणः आमा के सा$ाकार के 4लए ाण का Vयान केl(त
करना सबसे महवपण
ू K है । जो लोग ाण के ऊपर Vयान केl(त नह( करते
198 चदाकाश गीता

वे लोगो का कोई ल[य नह( होता। उनक@ कोई ि2थत नह( होती। बु3t
नह( होती और कोई सा$ाकार के 4लए संतुि9ट नह( होती। उन लोगो के
मन अंकु4शत नह( होने क@ वजह से आVयािमक बातो म कुछ खास 4सt
नह( कर सकते। ईस4लए मनु9य को मन पर Vयान केl(त करना चा&हए
और ईqवर चंतन करना चा&हए। हे मनु9य! ाण के आवागमन पर Vयान
केl(त कर! ाण को यो}य:प से अंदर लो। सांस लेते व1त नाद पर
Vयान केl(त करो। वह नाद जो क@ सांस क@ गत म से उपन होता है
उस सांस क@ गत पर Vयान केl(त करो। जो सांसे हम अंदर क@ ओर
लेते है । अंतरनाद और अंतराण पर 3वqवास रख। गहर( और xयादा गहर(
सांस लो जीससे अंतरनाद जो क@ सांस क@ गत से पैदा होता है वह कान
को सुनाई दे ता है । 4सफK और 4सफK ाण का 3वचार करो ओर कोई बात का
नह(। खाना, पीना, आना-खडा रहना ये सब आमा के उtार के 4लए
उपयोगी नह( है । शाqवत आमा का सा$ाकार Iकजीये। खाना बनाओ
लेIकन अपने 4लए। दस
ू रोने पकाया हुआ खाना खाने क@ ईEछा न रख।
अनुभव खुद करो। 2व के यासो से ह( आमा का स$ाकार कर। दसू रे
लोग आपका उtार करे उसके बारे म न सोचे। खुद ह( यास करे और
ल[य को ाwत करे । हे मन! जो करो वह +tा से करे । +tा से महान और
कुछ नह( है । +tा महानतम है ।

233. सुखे प तो Yबना के पैड के साथ वायु टकराता है तो कोई


आवाझ पैदा नह! होती। मत
ृ शर!र मE कोई ाण नह! होता, कोई नाद नह!
होता। Yबना ाण के कोई ाणी ईस जगत मE जीLवत नह! रह सकता।
पMट!करणः ाण मनु9य का जीवनआधार है । ाण के ?बना कोई
नाद उपन नह( होता। कोई शर(र का &हलना नह( होता। सख
ु े पतो के
199 चदाकाश गीता

?बना के पैड पर वायु टकराता है तो कोई आवाझ नह( उपन होता उसी
तरह मत
ृ -ाण3व&हन शर(र म से कोई तभाव 4मलता नह( है । ईस 2थूल
जगत म ?बना ाणो के कोई ाणी जी3वत नह( रह सकता। ाण ह( ाणी
के 4लए सव£सवाK है ।

234. जीस तरह रे लवे का ईि:जन Yबना भांप के न चल सके उसी


तरह शर!र ाण के Yबना नह! चल सकता। ना`रयल के पैड पर अमiद
नह! उगते। मनुMय अनुभव के Yबना कुछ भी बोले तो वह नरथFक है ।
:यायाधीश वाद! और तवाद! दोनो को सुनने के बाद ह! मामले के बारे
मE सोचते है लेXकन मामले के स य को वे जानते नह!। हाथ मE चीनी हो
उतना पयाFDत नह! है उसक3 'मठाश को ाDत करने के 'लए उसे िजzवा
के ऊपर रखकर उसका वाद लेना चा@हए। प|ृ वी के गभF मE खूब सारा
पानी है लेXकन पानी ाDत करने के 'लए कूआं खोदना पडता है । मूल चीज
वह आंत`रक अTयास है और ाण का परyzम के साथ द!माग मE एक
होना वह है । यह! ई)वर का साkा कार है और वह! योग'सLJ है । यह!
परम शांत है ।
पMट!करणः शर(र को चलाने के 4लए ाण अनवायK है । जीस तरह
2ट(म ईिजन चलाने के 4लए भांप अनवायK है । भांप ईिजन के 4लए है
वह ाण शर(र के 4लए है । नाoरयल के पैड पर अम:द नह( उगते उसी
तरह सांसाoरक जीवन म अटकता मानवी दस
ू रो को ईqवर का सा$ाकार
नह( करा सकता। ईqवर का सा$ाकार करनेवाले गु: ह( मनु9य को
ईqवरदशKन कराने के 4लए अनवायK है । 2वानुभव ?बना ईqवर क@ चचाK कोई
उपयोग क@ नह( है । प2
ु तक के Xान से ईqवर का सय हम समझ नह(
सकते। जीस तरह यायाधीश वाद(-तवाद( दोनो को सुनने के बाद ह(
200 चदाकाश गीता

मामले के बारे मे अपना अ4भाय दे सकते है उसी तरह ईqवर और ईqवर


के सुख का अनुभव करने के बाद ह( उस बारे म अ4भाय दे सकते है ।
चीनी क@ 4मठास को समझने के 4लए चीनी को हाथ म रखने से समझ
नह( आती उसे िजNवा पर रखकर उसका 2वाद लेना पडता है । पŠृ वी के
गभK म खूब सारा पानी होता है लेIकन उसे बाहर न नकालने के 4लए हमे
खुद अ…यास और अनुभूत करनी पडती है । हमे 2वयं अंद:नी तौर पर
अ…यास करते रहना चा&हए और ाण को ONमरं  मे ले जाना चा&हए और
ाण परONम के साथ एक हो जाना चा&हए। ईसे ह( ईqवर का सा$ाकार
कहते है । ईसे ह( योग4स3t कहते है । ईसे ह( परम शांत कहते है ।

235. योग के ारं 'भक अTयासु के 'लए कोई नि)चत आहार नह!
बाताया गया है । अTयासु के 'लए मन क3 शांत ह! आहार है । सभी कला
मे &ेMठ कला वह yzमLवSया है । वह कला जीसके Sवारा ई)वर क3
अनुभूत होती है । यह कला धन से नह! खर!द! जाती। यह कला मान या
अपमान से नह! खर!द! जाती तो बाहर! क3तF से भी ाDत नह! कर सकते।
वह 'सफF अचल भि5त से ह! ाDत क3 जा सकती है । भि5त के Yबना
मुि5त नह! है । मुि5त 'सफF सूoम भि5त के Sवारा ह! 'मल सकती है ।
yzमानंद 'सफF बातE नह! है लेXकन ठोस अनभ
ु व है । ईसे ह! सत-चत-आनंद
कहते है । नरं तर और \यादा से \यादा अनुभव से ह! वह 'सJ हो सकता
है । yzमानंद का जीसने साkा कार Xकया है उसके 'लए सवF है मतलब क3
ई)वर वयं है ।
पMट!करणः राजयोग म नवद(#$त साधक के 4लए कोई निqचत
आहार नह( बताया गया है ज:रत 4सफK अ…यासु के 4लए शांत ाwत करने
क@ है । सभी 3व~याओं म +े9ठ ONम3व~या है । वह कला परमONम को
201 चदाकाश गीता

4सt करने क@ है । यह कला धन से नह( खर(द( जा सकती। यह सांसाoरक


जीवन के मान-अपमान से नह( खर(दा जा सकता। वह बाNय क@तK से नह(
खर(दा जा सकता। वह गु: से ह( अचल भि1त से 4सt हो सकता है ।
भि1त के ?बना बंधनमुि1त नह( है । मुि1त 4सफK सू[म भि1त से 4सt हो
सकती है । ONमानंद 4सफK बात नह( है लेIकन ठोस अनुभव है । ONमानंद
वह सत-चत-आनंद है । ONमानंद ाणायाम के नरं तर अ…यास से 4सt
होता है । जब ईqवर का सा$ाकार 4सt हो तब ONमानंद 4सt होता है ।
सारे ONमांड म उसके बाद ईqवर के परमसुख का दशKन होगा।

236. हे मन! Jैत का Lवचार छोड दे ! सूoम Lववेक पाने के 'लए


Jैत का Lवचार छोडने के बाद 'सफF सोचो क3 सारा yzमांड 'शवमय है ।
'शव मतलब दागर@हत। कोई nछ:न बात नह!ं। सब आप ह! मE है । जो
&Jा है वह नरं तर है । हे मन! सांस का नयंjण कर। अंदiनी जीवन
जीयो। स य क3 शोध-सूoम Lववेक से करो। सूoम Lववेक के साथ जो जुडा
हुआ है वह शा)वत है । हरएक ाणी का मूल त व शा)वत आनंद है ।
शा)वत आनंद ाDत करो। शा)वत आनंद मतलब शा)वत मुि5त। मन के
अंदर होते आसन राजा क3 ग1ी है । शाशअवत बैठक मतलब शा)वत
आनंद, जब सत चत 'मल जाये तब परमानंद ाDत होता है । ईसे चैत:य
आनंद कहा जाता है ।
पMट!करणः हे मन! tैत का 3वचार छोडो। सू[म 3ववेक ाwत करो।
tैत का 3वचार छोडकर सोचो क@ सारा 3वqव 4शवमय है । जो पूण:
K प
दागर&हत है । हे मन! सब कुछ खुद म ह( अनुभव करो। सारा ONमांड आप
म ह( है वह अनुभव करो। आप उस शि1त को 3वक4सत करो जो क@
ONमांड को नयं?Gत करता है । मनु9य म +tा अचल है । +tा ि2थरता से
202 चदाकाश गीता

बढ और आमा का सा$ाकार हो। हे मन! ाण को नयं?Gत करो, जीससे


मन ईEछार&हत हो। अंद:नी जीवन सू[म 3ववेक से जीयो। सय क@ शोध
सू[म से करो। सू[म 3ववेक के साथ जूडी बात ईqवर क@ शि1त शाqवत
होती है । जगत म सभी ाणी का मूल तव शाqवत आनंद है । शाqवत
आनंद ाwत कर! शाqवत आनंद से शाqवत मुIकत 4मलती है । मन के
अंदर रहे आसन राजगीयां है । मनु9य के मि2त9क म मन के 4लए 3व3वध
तरह क@ बैठक होती है , जीसक@ अनभ
ु ूत ाण को „दयाकाश क@ ओर-
द(माग म ले जाये तब होती है। मन क@ बैठक राजा क@ गी जैसी होती
है । शाqवत आनंद तभी 4मलता है जब मन उसका 2थान सह2Gार म लेता
है । सहा2Gार मतलब सह2G पतीओवाला कमल। जब सत अथाKत अि2तव
औरचत (Xान) दोनो „दयाकाश मे 4मलते है तब परमानंद 4सt होता है ।
परमानंद और चैतय आनंद 4सt होता है । चैतय आनंद शाqवत चेतना
का परम सुख है ।

237. सिृ Mट के सभी सज


ृ न मान'सक है । शर!र 'सफF Zयेय को
ाDत करने का साधन है । शि5त आ मा क3 है । मनुMय के मितMक मE
उnचतम टोच है । यह आ मा क3 बैठक है । यह चेतना का आकाश है । यह
एक ह! सब से बडा आधार है । अ^न शर!र का छƒा कमल आधार है ।
कंु ड'लनी क3 बैठक Rदयाकाश मE है । आ मा क3 याjा का Lवचार े न क3
याjा जैसा है । े न दो तरह क3 होती है । एक मेल और दस
ू र! लोकल।
हठयोगीओ मेल े न जैसे है और राजयोगीओ लोकल े न जैसे है । शांत
'मले वह! सुख है । फकF 'सफF समय का होता है । वेग एकसमान होता है
Xफर भी समय का फकF रहता है । यह फकF भी मन क3 ‚मणा है ।
203 चदाकाश गीता

पMट!करणः सज
ृ न मन का लगाव है लेIकन मन का नाश कर द(या
जाये तब सिृ 9ट का अि2तव नह( रहता। उस व1त सब एक और
अ3t3वतय होता है । शर(र 4सफK ल[य ाwत करने का साधन है , साVय
नह(। मनु9य का ल[य ईqवर का सा$ाकार है । शि1त आमा क@ होती है ।
जगत के सबसे ऊंचा 4शखर बाहर नह( लेIकन मनु9य के द(माग म होता
है । ONमरं  जो क@ द(माग म है वह सबसे ऊंचा 4शखर है । ONमरं  आमा
क@ बैठक है । यह चेतना का आकाश है । मनु9य का सबसे बडा आधार
चदाकाश का है । कंु ड4लनी क@ बैठक चदाकाश म है । अ}न वह छŽा कमल
है , जो कंु ड4लनी का आधार है । अ}न से शु: करके कंु ड4लनी सह2Gार क@
ओर गत करती है । सह2Gार हजारो पतीओवाला द(माग म रहनेवाला
कमल है । _े न म याGा करना वह आमा का 3वचार है । _े न दो तरह क@
होती है – एक मेल और दस
ू र( लोकल _े न। मेल _े न मतलब हठयोगी और
लोकल _े न मतलब राजयोगी। हठयोगी म जुनुन होता है और गु2सा होने
क@ छोट( सी भी वजह 4मले तो वह गु2सा हो जाता है । राजयोगी लोकल
_े न क@ तरह धीमा लेIकन शांत होता है । सुख वह ओर कुछ नह(, मन क@
शांत 4मलना वह है । लोकल _े न और मेल _े न का फकK 4सफK समय का ह(
होता है । दोनो म एकसमान शि1त हो ऐसा ह( हठयोगी और राजयोगी का
है । दोनो म शि1त एकसमान होती है । फकK 4सफK उस शि1त का 3वकास
है । राजयोगी हठयोगी से भी xयादा अEछा होता है । लोकल _े न और मेल
_े न दोनो का वेग समान है लेIकन समय का ह( फकK होता है उसी तरह
राजयोगी और हठयोगी दोनो के बीच समय का फकK होता है । साधना के
ारं भ म सब हठयोगी होते है लेIकन पूणK व के 2तर पर वे राजयोगी होते
है । साधना का समय पूरा हो और नवद(#$त योगी पयाKwत अनुभव ाwत
204 चदाकाश गीता

कर ले तब पूणK व के उEचतम 2तर पर वह राजयोगी होता है । फकK 4सफK


समय का होता है । ईस समय का फकK 4सफK मन क@ Œमणा है । जब
मनु9य माया को न9ट करते है तब सब कुछ उसे एकसमान लगता है । फकK
4सफK माया क@ वजह से पैदा होता है ।

238. मनुMय का ज:म माता-Lपता से होता है । वह थम बnचा


होता है बाद मE वह पi
ु ष व ाDत करता है और बाद मE बnचो के माता-
Lपता बनते है । फकF 'सफF समय का होता है । बnचे का वभाव माता-Lपता
उनके 'मलन के व5त जो Lवचार करते है उस @हसाब से होता है । माता-
Lपता 'मलन के व5त भि5त, धमाल, ग
ु सा, वृ त, ईnछाओ का Lवचार
करE तो तब बnचे मE भी वह! Lवचार वेश करते है । माता के गभF मE वायु
के वेश से ह! सिृ Mट का सज
ृ न होता है । ईस'लए माता-Lपता 'मलन के
व5त सांसा`रक जीवन के बारे मे सोचे तो बnचे मE भी वह! Lवचार
आरोLपत होते है । अगर आZयाि मक Lवचार हो तो बnचे को काश तुरंत
'मलता है । ाथ'मक जiरत बnचे के ज:म के बाद ईnछार@हत दशा मE
रहने क3 है । ज:म-म ृ यु के बीज का नाश करने का बाद मE आता है । जब
मनुMय नरं तर दःु ख का अनभ
ु व करता है तब सूoम Lववेक से उसको अंत
मE काश का दशFन करना चा@हए। अपानवायु मतलब सज
ृ न का नाश।
अपानवायु और ाणवायु दोनो को आ मा मE एक कर दे ने चा@हए। जब ये
दोनो 'मलकर एक हो जाये तब सभी िथतओ का नाश होता है । ाण का
नाश हो उससे पहले मनुMय को मुि5त ाDत करने के 'लए यास करना
चा@हए। मुि5त 'मले ईसके 'लए वह एक अLवभा\य बन हो जाता है और
Jैत का नाश होता है ।
205 चदाकाश गीता

पMट!करणः मनु9य का जम उसके माता-3पता से होता है । वह


थम बEचा होता है बाद म पु:षव ाwत करता है और बEचM के माता-
3पता बनता है । मनु9य म फकK 4सफK समय क@ वजह से होता है । बEचे का
2वभाव उसके माता-3पता उनके 4मलन के व1त जो सोचते है उसके अनुसार
होते है । अगर माता-3पता भि1त, गु2सा, वृ त, ईEछाएं ऐसे 3वचार करे तो
बEचे म भी वह( गुण आते है। अगर उनके 4मलन के व1त माता-3पता
सांसाoरक जीवन के 3वचार करे तो बEचे के सं2कार मे वह( 3वचार 4मलते
है लेIकन अगर माता-3पता आVयािमक करे तो उसम भी वह( 3वचार वेश
करते है । जम-मृ यु के बीज का नाश ईEछार&हत दशा क@ वजह से होता
है । जब मनु9य को नरं तर दःु ख का सामना करना पडे तो तब सू[म 3ववेक
से खुद को का4शत करना चा&हए। अपानवायु मतलब सज
ृ न का नाश।
अपानवायु मनु9य क@ अंदर क@ गंदगी को बाहर नकालता है। ाण और
अपानवायु दोनो को आमा मे एकाकार करना चा&हए। जब आमा म दोनो
एकाकार हो जाये तब सभी ि2थतओ का नाश हो जाता है । ऐसा मनु9य
सवvतम होता है । मनु9य को मृ यु से पहले मुि1त ाwत करनी है । मुि1त
एक, अ3वभाxय, tैतभाव से पर है जो ईसी जीवन म ह( 4सt करनी
चा&हए।

239. उपनयन जीवन का लoय है । ‘उप’ अथाFत नजद!क रहना।


जीवा मा को परमा मा मE एकाकार हो जाना। उपनयन अंदiनी होना
चा@हए। उपनयन सूoम होना चा@हए। ‘उपध’ अथाFत तीसर! आंख। मूल
लoय ई)वर के नजद!क जाने का है । उपनयन शर!र का Lवचार नह! है । वह
आ मा का Lवचार करता है । ईस जगत मE जीसने उपध क3 है वह yाzमण
206 चदाकाश गीता

है । ‘उपध’ मतलब सुष


ु णा नाडी। ये वह yzमनाडी है , जहां दे वी-दे वता का
वास होता है ।
पMट!करणः उपनयन जीवन क ल[य है । ‘उप’ अथाKत नजद(क
रहना। उपनयन अथाKत ईqवर का सा$ाकार करके उनके नजद(क जाना।
उपनयन तीसर( आंख है । जीसके ~वारा ईqवर को य$ दे ख सकते है ।
उपनयन अंद:नी बात है , वह सू[म बात है 2थूल नह( है । ल[य ईqवर के
सा$ाकार का है और शाqवत तौर पर उसके नजद(क रहना है । उपनयन
शर(र का 2थूल 3वचार नह( है । उपनयन आमा का 3वचार है। उपध वह
तत
ृ ीय आंख है , ईस जगत म OाNमण वह( है , जीसने ‘तीसर( आंख’ क@
शि1त का 3वकास Iकया है । OाNमण वह( है जीसने ONम का सा$ाकार
Iकया है । उपध अथाKत शर(र म सुषD
ु ना नाडी। सुषD
ु ना ONमनाडी है ,
जीसम दे वी-दे वताओ का वास है । सुषD
ु ना नाडी शर(र क@ सबसे महवपूणK
नाडी है । सुषD
ु ना नाडी से ह( कंु ड4लनी द(माग म रहनेवाले सह2Gदल कमल
क@ ओर आगे बढती है । सह2Gार मतलब मूलाधार (शर(र का मूल कमल)
तक क@ कंु ड4लनी शि1त क@ याGा।

थम Lवभाग समाDत

&ी कृMणापFणम अतु

ओम ् ओम ् ओम ् ओम ् ओम ्
209 चदाकाश गीता

 नमो भगवते नयानंदाय

दस
ू रा खंड (चदाकाश गीता)

240. श"द का ज:म आकाश मE होता है । आकाश मE जो उ प:न होता


है वह जीवन ऊजाF है । जीसे आकाश कहा जाता है वह मितMक मE है ।
आकाश मतलब Rदयाकाश। जीवन ऊजाF 'सफF एक है । नद! और सागर मE
जीसतरह फकF है उसी तरह जीवा मा और परमा मा के बीच फकF है । वह
'सफF एक कkा का है और कोई कार का नह! है । €यि5त को ‘म‘’ और
‘मेरा’ का याग करना चा@हए। यह पन
ु ःज:म क3 वजह है । वह €यि5त शुJ
बLु J का है , जो ‘म‘’ और ‘मेरे’ बारे मE सोचा करता है । ऐसे Lवचारो क3
वजह से वह नीच योन मE ज:म लेता है । मनुMय मE रहनेवाल! शि5त तेज
क3 तरह @दखती है उसी तरह वह गेसलाईट के काश मE शि5त होती है ,
जीन लोगोने @दन और रात का भेद 'मटा @दया हो उनके 'लए सूयF और
गेसलाईट के Yबच कोई फकF नह! होता। दोनो के Yबच कोई फकF नह! है ,
€यि5त क3 &Jा उnचतम बात है । &Jा से उपर कोई ई)वर नह! है । ईस
Lव)व मE &Jा से ऊपर कोई नह! है । मनुMय &JाLव@हन हो तो दस
ू रो क3
चाल से मूखF नह! बनता। मनुMय को जीस Lवषय मE &Jा हो उस वतु मE
आनंद होता है । अंदiनी &Jा अपनी (सांस) ाण पर के:B!त करनी चा@हए।
जीन लोगो मE &Jा नह! होती उन लोगो को दस
ू र! चीजो के बारे मE कोई
Lवचार नह! होता। &JाLव@हन लोगो को साधु और सं:यासीओ के 'लए कोई
समान क3 संवेदना नह! होती। वे लोग ऐसे ह! गलत तर!के से सोचते है
क3 वे हजारो साधुओ से भी अnछे है ।
210 चदाकाश गीता

पMट!करणः नाद अंतoर$ म पैदा होता है । जीवन ऊजाK भी आकाश म


पैदा होती ह. जीस तरह बहृ दाकाश हमारे शर(र से बाहर आता है उसी तरह
हमारे शर(र म भी आकाश होता है । उसका 2थान मि2त9क म है , उसका
2थान „दय म है , जीवन ऊजाK एक और 4सफK एक ह( है लेIकन पशु सिृ 9ट
म 3वशाल फकK होता है । यह फकK नद( और सागर म रहता है वैसा ह(
होता है । वह गुणवता म नह( है लेIकन थोक म है । सागर और नद( म
दोनो के बीच खाड़ी क@ वजह से फकK पैदा होता है । जीवामा और परमामा
माया के पतले आवरण से अलग पडते है । Fयि1त को ‘म{’ और माया के
बारे म 3वचार नह(ं करना चा&हए। Fयि1त को अहं का पूण:
K प से याग
करना चा&हए। अ§ं क@ वजह से नये जम क@ वजह उपन होती है । जीस
Fयि1त म ‘म{’ और ‘यह मेरा’ जैसी भावना हो वह बु3t क@ कमी दशाKती
है । अहं भाव नDन योन क@ वजह बनता है । सूय
K काश और गेसलाईट
दोनो म एक शि1त है , जो दोनो म &दखती है । जो लोग सूयK और
गेसलाईट-&दन और रात दोनो के बीच का फकK भूल गये है उनके 4लए
दोनो एकसमान है । नःशंक:प से एकदस
ू रे से बडा नह( है । Fयि1त क@
+tा उसे ईिEछत ल[य क@ ओर ले जाता है । +tाह(न (नाि2तक) Fयि1त
को जगत के कपट( लोग धोखा नह(ं दे सकते। मनु9य को जीसम +tा
होगी उसीम आनंद आता है । +tा मनु9य क@ गत या अधोगत के 4लए
िजDमेवार होती है । यह +tा 1या है ? +tा कैसे पनपती है ? +tा हमसे
बाहर क@ ओर नह(ं है । +tा हमारे अंदर है । +tा बाहर( चीज नह(ं है
लेIकन अंद:नी है और उसका 3वकास ाण पर Vयान केl(त करने से हो
सकता है । +tाह(न Fयि1तओ को साधु और संयासीओ के 4लए सDमान
नह(ं होता। वे लोग गलत तर(के से सोचते है । हजारो साधुओ से वे xयादा
211 चदाकाश गीता

अEछे है । वे लोग खुद को Xानी समझते है और अहं उनम उEच 2तर पर


रहता है ।

241. अंध €यि5त के 'लए @दन और रात के बीच कोई फकF नह!
होता। उ:हE बाzय काश का कोई मzतव नह! होता। उसमE 8ान का काश
बहुत \यादा होता है । अंध €यि5त के 'लए शार!`रक वiप का कोई मह व
नह! होता। अंध €यि5त क3 भौतक आंख दे खती नह! है । ईस'लए उनके
@द€य चkु तेजोमय होते है । अंध €यि5त पागल का Lववरण उसके पशF से
अनुभव करके नह! कर सकता।
पMट!करणः अंध Fयि1त के 4लए &दन और रात के बीच कोई फकK
नह( होता उसी तरह अXानी Fयि1त मतलब शाqवत सय के Xान ?बना
का मनु9य – ईqवर के Xान ?बना का मनु9य को Xानी और सांसाoरक
जीवन म ल(न Fयि1त – के बीच कोई फकK नह( है । ऐसे मनु9य के 4लए
दोनो एकसमान है । नाशवंत और चरं जीवी दोनो के बीच कोई अंतर नह(
है । सभी चीजो को अपने lि9टकोण से दे खने क@ आदत हो जाती है और
अनत ईqवर को सDमान-मयाKदा2प:प Fयि1त समझते है । वह ईqवर और
3वqव के बीच म कोई फकK महसूस नह(ं करता। अंध Fयि1त के 4लए बाहर(
काश कोई मायने नह(ं रखता। अंध होने क@ वजह से वह बाहर( काश
का अनुभव नह( कर सकता। अXानी Fयि1त खुद को 2वनभKर Fयि1त
समझता है और बाहर( मदद क@ ज:रत नह( है ऐसा मानता है । अXान
क वजह से वह ऐसा मानने के 4लए ेoरत होता है क@ सांसाoरक जीवन से
छोट(-मोट( चीजो के Xान के आधार पर खुद ईqवर को पण
ू :
K प से समजता
है ऐसा &दखावा करता है । ईस4लए वह दस
ू रो क@ मदद नह( लेता है । अंध
Fयि1त को भौतक आंख नह( होती लेIकन उसम Xान का काश अत
212 चदाकाश गीता

तेज होता है लेIकन दे खने क@ lि9ट चल( जाती है लेIकन Xानी को आम


आदमी जैसी ह( ईl(यां होती है Iफर भी वे पूण:
K प से अंकु4शत होती है ।
वह आमा के अंकुश म होती है । Xानी क@ सभी वृ तयां न9ट हो जाती है
लेIकन Xान का तेज xयादा होता है । Xानी का Vयान हमेशां एक शाqवत
सय क@ ओर होता है और वह अय के त अंध होता है । अंध Fयि1त
क@ भौतक आंख दे ख नह( सकती Iफर भी उनक@ &दFय आंखे अत
तेजोमय होती है । अंध Fयि1त गाडी का 3ववरण उनके 2पशK से नह( कर
सकती उसी तरह अXानी Fयि1त िजह ईqवर के परम सुख का अनुभव
नह( है , वे दै वी सुख 1या है वह जानते नह( है और वे ईqवर के सुख का
Iकताब पढकर अनुभव ाwत कर सकते है । यह परम सुख का अनुभव
पुण:
K प से आवqयक है और वह उनके 4लए है जीनको दै वी सुख 1या है
वह समजना है ।

242. 5या नाद मE से yzम का सज ृ न हुआ है या yzम मE से नाद


उतप:न हुआ है ? कारण मE से प`रणाम का उदभव हुआ है या प`रणाम मE
से कारण पैदा हुआ है । yzम (जगत) नाद मE से पैदा हुआ है । नाद मE से
व*प का ज:म हुआ है और जगत जीसका वiप है उसका ज:म नाद मE
से हुआ है । कारण मE से प`रणाम है । प`रणाम आ मा मतलब ‘व’ मE से
है । ईस'लए कारण और प`रणाम दोनो एक ‘व’ के गल ु ाम है । ये दोनो व
(आ मा) मE से पैदा होते है । यह व (आ मा) कारण एवं प`रणाम दोनो को
समा लेता है और एक (अLवभा\य) बनते है । ‘व’ जो क3 माया का सज
ृ न
करता है वह ‘व’ से ह! माया का नाश होता है । अस य, अस य ह! है ।
अगर आप अस य को मानEगे तो आपको अस य बोलना पडेगा। अगर आप
स य को मानEगे तो आपको स य कहना पडेगा। जो लोग जुƒी बाते करते
213 चदाकाश गीता

है उनका अपना कोई स य नह! होता। उनसे अस य अलग नह! होता। वह


उनके साथ एक हो जाता है । वे लोग जुƒी बातो को अपने से अलग नह!ं
मानते। अगर जुƒ बरू ाई है या दोष है ऐसा वो लोग समजे तो वे जुƒ क3
ओर नह! जायEगे। ऐसी िथत मE उनको अनुभव होगा क3 एक वतंj बात
क3 जीसे स य कहा जाता है वह है । ऐसा हो तो वे सतकमV क3 ओर
मुडEगे।
पMट!करणः नाद म से ONम (3वqव) पैदा हुआ है या ONम (3वqव)
नाद म से पैदा हुआ है ? कारण पoरणाम म से पैदा होता है क@ पoरणाम
कारण म से। 3वqव नाद म से पैदा हुआ है और नाद 2व:प म से पैदा
होता है और जगत का वह( 2व:प है । कारण म से पoरणाम का उदभव
होता है । ?बना वजह कोई पoरणाम नह( होता। ईqवर सिृ 9ट के सज
ृ न क@
वजह है और सिृ 9ट वह पoरणाम है । यह कारण कहां है । यह कारण ‘2व’
मतलब आमा म है और पoरणाम ‘2व’ म से अथाKत आमा म है । ऐसे,
कारण और पoरणाम दोनो जुडव है । जो क@ आमा म से पैदा होते है और
आमा म एकाकार हो जाते है। जहां से पैदा होते है वहां वे एकाकार हो
जाते है । ईस4लए Fयि1त को कारण और पoरणाम दोनो को अंकु4शत करने
चा&हए। माया क@ िजसका जम आमा म से हुआ है उसे आमा म समा
4लया जाता है । माया का नाश करने के 4लए दस
ू रा कोई रा2ता नह(। माया
को छोडने के 4लए दस
ू रा कोई 2थान नह(ं है । ईqवर अंदर और बाहर क@
ओर रहते है । असय हरदम असय ह( रहता है । आप असय म मानते हो
तो आपको असय बोलना पडेगा और सय म मानते हो तो सय कहना
पडेगा। जो लोग जुŽ बोलते है उनम सय होता नह( है । उन लोगो के 4लए
जुŽ अलग नह( होता। वे जो दे खे, बोले और करते है वह जुŽ होता है ।
214 चदाकाश गीता

उसी तरह अXानी मानवी के 4लए जगत म कोई Xानी नह( है । सभी उसके
जैसे जीवन के सह( ल[य से अXान, जुŽेपन क@ वजह 1या होती है ? वे
जूŽ को ह( सय समजते है , 1यMक@ उनके मन को जुŽे क@ आदत हो गई
है । वे जूŽ के साथ एक:प हो गये है । रं गीन ऐनक पहननेवाले को जगत
रं गीन &दखता है , वह जैसा है वैसा नह( &दखता है । मनु9य अगर अपनी
कमजोर( को समजे तो उसमे वा3पस गलती नह( करता। ऐसा मनु9य सय
1या है वह अनुभव करने के बाद समज सकता है । सय का अि2तव
(जूŽा) असय से अलग होता है । ईसी पल से उसके &दFय च$ु खुल
जायगे। सू[म 3ववेकवाला मनु9य खुद के 4लए 1या अEछा है या 1या बूरा
है उसका अनुभव ाwत कर सकता है । ऐसा मनु9य राजमागK 1या है वह
समजेगा और सह( &दशा म आगे बढता हुआ अंततोगवा ईिEछत ल[य को
ाwत करे गा।

243. जीस तरह नद!यां सागर मE वेश करती है उसी तरह अnछu और
बरू ! दोनो चीजE आ मा मE वेश करती है । दोनो चीजE आ मा को समLपFत
होती है । अnछा और बरू ा दोनो आ मा मE से पैदा होते है । वे जहां से आये
है वह!ं वेश करते है । मन जगत मE शभ
ु -अशुभ कमF का कारण है । मन
आ मा क3 शि5त है । आ मा क3 शि5त कोई \यादा या कम नह! कर
सकता। जो होनेवाला है वह होकर ह! रहता है । शा)वत कायदे के अनुसार
वह होगा।
पMट!करणः जीस तरह सभी नद(यां समुl म वेश करती है उसी
तरह अEछा-बरू ा सब कुछ आमा म वेश करता है । जीस तरह सभी
नद(यM का ल[य सागर होता है। सागर जो क@ अपoरवतKनीय और शाqवत
है उसम 4मल जाने का ल[य है उसी तरह अEछा-बरू ा दोनो ह( आमा म
215 चदाकाश गीता

शा4मल हो जाते है । अEछे -बूरे का जम2थान आमा है और ईस4लए ह(


उह आमा के सामने याग दे ना चा&हए। शुभ और अशुभ उसी म 3वल(न
हो जाते है , जीसम से वे आये है । मन अEछे -बूरे क@ वजह है । शुभ और
अशुभ एकदस
ू रे के सापे$ म रहते है । आदमखोर शेर मनु9य के ऊपर
हमला करता है तो उसके 4लए तो वह एक खेल है लेIकन एक मनु9य
दस
ू रे को मारता है तो उसे खन
ू कहते है । आदमखोर के 4लए जो खेल है
वह मनु9य के 4लए खून है । मन का अथKघटन एक चीज का अEछा
अथKघटन करने के 4लए और दस
ू र( चीज म बूरे अथKघटन के 4लए
िजDमेवार है । मन ईqवर क@ शि1त है । उसम कोई बढोतर( या कमी नह(
ला सकता। जो होना है वह होकर ह( रहता है । कुछ निqचत तौर पर
ईqवर के अगम रा2ते या ONमांड के अगम कायदे के अनुसार होकर ह(
रहता है । मनु9य वह सिृ 9ट के उकृ9ट कायदे म कोई भू4मका नह( नभा
सकता।

244. बीज पैड मE से पैदा नह!ं होता। बीज क3 श*आत है । बीज पैड
पर से गरता है और वह बीज छोटा पौधा और बाद मE पैड बनता है । उसी
तरह सिृ Mट का है । बीज एक शi
ु आत है उसका अंत नह! है । आप जहां भी
दे खोगे वहां बीज ह! @दखEगे।
पMट!करणः बीज व$
ृ म से पैदा नह(ं होता। बीज जैसे एक शु:आत
है उसी तरह ईqवर ONमांड म से उपन नह(ं होते। ONमांड का ारं भ
ईqवर से ह( हुआ था। बीज पैड पर से गरता है और वह बीज छोटा पौधा
और बाद म बडा पैड बनता है उसी तरह मनु9य का आमा ईqवर का
सू[मातसू[म भाग है । आमा जो क@ शर(र के दे हमांस म बंधा हुआ है ।
उसे अपनी सभी कमजोर(ओं के साथ ‡मशः गत करनी है और वह तब
216 चदाकाश गीता

तक क@ वह सज
ृ नकताK म 4मल न जाये तब तक! यह सिृ 9ट क@ I‡या
है । बीज क@ श:आत है , लेIकन अंत नह(ं है । आप जहां तक दे खोगे वहां
आपको वह( बीज &दखेगा जैसे बीज पैड क@ और भ3व9य के बीज का ारं भ
है वैसे ह( मूलभूत कृत सिृ 9ट के ारं भ क@ वजह है ।

245. जो लोग शंकार@हत है उ:हE एहसास होता है क3 यह शंकार@हत


दशा मन क3 एका‰ता का राता है । आशंXकत मनुMय क3 बLु J मयाF@दत
होती है । जहां वह दे खे वहां शंका के Yबना कुछ @दखता नह! है । €यि5त
अपने वभाव के 'लए िजमेवार हौता है । जो गण
ु €यि5त मE न हो वह
ढूंढने के 'लए यास करना अयो^य है । कंपते पानी मE €यि5त अपना
तYबंब दे ख नह! सकता। शांत जल मE €यि5त अपना तYबंब ठuक से
दे ख सकता है । चंचल मन का मानवी अपना सnचा वभाव दे ख नह!
सकता। िथर मनवाला मनुMय जहां भी दे खता है वहां 'सफF एक और
अLवभा\य ऐसे ई)वर के दशFन करते है । वह उनके दशFन सभी मE करता है ।
अगर आंखो पर लाल ऐनक लगाओ तो ससब कुछ लाल ह! @दखेगा। लाल
ऐनक पहनकर हरा रं ग नह! @दखाई दे ता, हर एक €यि5त अपने Lवचार
अनुसार दे खता है ।
पMट!करणः जो लोग शंकार&हत मानस रखते है वे मन क@ एका|ता
के 4लए रा2ता उनक@ शंकार&हत मानस दशा है ऐसा महसूस करते है ।
आशंIकत Fयि1त क@ बु3t सी4मत होती है । उसका मन शंका से घरा होने
क@ वजह से उनक@ lि9ट म ईqवर और उनक@ सिृ 9ट का सय आंखो के
सामने नह(ं आता। वह जो भी दे खता है उसम शंका ह( होती है । उनका
2वभाव उसे घेर लेता है । मनु9य को अपने म न हो ऐसे गण
ु दस
ू रो म
&दखते नह( है । कंपन होते पानी म मनु9य अपनी परछाई दे ख नह( सकता
217 चदाकाश गीता

लेIकन अगर पानी ि2थर हो तो वह खुद क@ परछाई 2प9ट दे ख सकता है ।


उसी तरह चंचल मन का मानवी आशंि1त हो तो अपना 2वभाव दे क नह(ं
सकता। शंका का आवरण उसे सह( मागK से दरू रखता है । ऐसा मनु9य
अपने 2वभावगत दोषो से अXात होता है लेIकन जो मनु9य ि2थर
बु3tवाला है उसको सब म एक और अ3वभाxय के दशKन होते है वह खुद
म ऐसी शि1त का 3वकास करते है जो जगत म सवKG खुद म आंतर और
बाहर( तर(के सै दे ख सके उसका दशKन करते है । वह खुद म अय के और
अय म खुद के दशKन करता है। ि2थर द(मागवाला Fयि1त ईqवर के दशKन
सवKG करते है । जो लाल रं ग के ऐनक आंखो पर पहने तो सब कुछ लाल
ह( &दखता है । उसी तरह हमारे मन के 3वचार ईस जगत म अEछे या बूरे
के 4लए िजDमेवार होते है । हर एक Fयि1त अपनी 3वचारधारा के अनुसार
सब दे खता है ।

246. हम छाता 5यv रखते है ? हमारे ऊपर बा`रश गरे और हम भीग


न जाएं ईस'लए। बा`रश मतलब माया। च त अथाFत छाते का हे :डल।
स य सवFj €याDत है लेXकन स य क3 अनभ
ु ूत ाDत क3 हो ऐसे मनुMय
जगत मE बहुत कम होते है । माया आ मा से है लेXकन आ मा माया मE
नह!ं है । धानमंjी राजा का होता है । धानमंjी राजा नह!ं है । मन है तो
आ मा नह!ं है । मन आ मा का तYबंब है । मन आ मा से दो अंगल
ु नीचा
है । मन Lवनाश का Lवषय है मतलब नाशवंत है । आ मा अLवनाशी है । मन
ई:B!यv के LवLवध Lवषयो से े`रत होता रहता है लेXकन आ मा ‚मणा से
े`रत नह! होता। आ मा गण
ु ो क3 ‚मणाओं का Lवषय नह!ं है । मन
Yjगण
ु ा मक कृत का Lवषय है । हम जब कहते है क3 मन आ मा का
अंश है तब हमे मन जो क3 आ मा के 'लए वैसे ह! है जैसे क3 नद! समुB
218 चदाकाश गीता

के 'लए होती है । आ मा महासागर है और उसक3 जलरा'श अमाप है और


अनंत है उसी तरह आ मा का ारं भ या अंत नह! होता। आ मा का उदगम
थान नह! है और उसका अंत थान भी नह!ं है । आ मा सावFYjक है ।
आ मा चरं जीवी है । हमसे पहले और बाद मE भी सिृ Mट है । यह हक3कत
हमे मालुम नह!ं है ।
पMट!करणः हम छाता 1यM रखते है ? बाoरश से हम भीग न जाये
ईस4लए। बाoरश अथाKत माया है। सय छाता है । चत (lढ मन) छाते का
हे डल है । छाते का हे डल (हाथा) ईस4लए महवपूणK है क@ उसके ?बना
छाता खूलता नह( है । उसी तरह सय को का4शत करने के 4लए हमारा
मन म1कम होना जCर( है । मन म1कम हो तो हम सय को समज सकते
है और सय का Xान हमे माया के मार से बचाता है । सय सावK?Gक है
लेIकन सय समजनेवाले लोग बहुत ह( कम होते है । ईqवर सवKG और
सम2त सिृ 9ट म है । माया आमा म से पैदा होती है । आमा माया म से
पैदा नह( होती। अ3वनाशी आमा म से नाशवंत माया का जम होता है ।
धानमंGी क@सी भी रा9_ या दे श म राजा का नौकर होता है लेIकन वह
2वयं राजा नह(ं है । मन आमा नह( है लेIकन आमा का त?बंब है ।
आमा राजा है और मन धानमंGी है । आमा मन के ऊपर काश गराता
है । मन का 2थान आमा से नीचा है । मन नाशवंत है । आमा अ3वनाशी
है । मन को ईl(यो के 3वषय Œ4मत करते है । मन मकKट के जैसा है । मन
जगत के अनेक3वध भोग-उपभोगो का चाहता है लेIकन आमा Œमणाओं से
परे है । आमा समय, 2थान, कारण, पoरणाम से परे और सभी बातो से
अछूती है । आमा नदvष, भोला और ?Gगुण से परे है लेIकन मन ?Gगुण
से पर नह(ं है । वह दोषर&हत भी नह( है । मन का 2थान आमा के 4लए
219 चदाकाश गीता

वह है जो क@ नद( का सागर के 4लए होता है , मन आमा का अंश है । मन


क@ शि1तयां मयाK&दत है , लेIकन आमा असी4मत शि1त रखती है । आमा
का ारं भ भी नह( है और अंत भी नह( है । आमा का उदगम 2थान भी
नह( है औक गंतFय2थान भी नह( है । आमा सावK?Gक है । दस
ु रा कोई
अि2तव नह( है , 4सफK आमा का अि2तव है । जीनका वणKन या Fया˜या
न हो सके वह ONमांड और आमा के उपर राज करता है । फकK 4सफK 2तर
का है और ईस4लए ह( Xानी आमा क@ उपि2थत जगत म सावK?Gक
महसूस करता है । हमसे पहले और बाद म सम| सिृ 9ट है वह हक@कत हमे
मालुम नह( है । ईस सय का Xान तभी होता है जब हम ONमांड को
चलाने के कानुन के साथ एकाकार हो जाए।

247. जब जीवन ऊजाF बाzय @दशा क3 ओर गत करती है तब


सांसा`रक जीवन क3 चीजो के 'लए ईnछा जागत
ृ होती है । वह मन के
वiप मE @दखती है और उसका Lवभाजन दो भाग मE भी गौण Lवभाजन
दो-तीन या छः भागो मE होता है और उसे जगत ‘दु नया’ कहा जाता है ।
ईस जगत मE ह! सभी अnछे -बूरे गण
ु ो का सज
ृ न होता है । पांच कम:B!यो
प|ृ वी के साथ जुडी है । पांच मुŽय ई:B!यां ‘आकाश’ के साथ जुडी है ।
कम:B!या सतगण
ु ो क3 होती है। जो ई:B!यो को जीत ले वह मु5त मानव
है । ऐसे €यि5त को संतुिMट-व मE से मतलब आ मा मE से ाDत होती है ।
पMट!करणः जब जीवन ऊजाK बाहर( &दशा म आगे बढती है तब हमारे
शर(र म 3व3वध ईEछाएं पैदा होती है । ईEछा मन के 2व:प म अ4भFय1त
होती है । मन का 3वभाजन- गौण 3वभाजन दो-तीन या छः भागो म होता
है । ईसे “जगत” कहा जाता है । ईस जगत म से सभी अEछे -बरू े गण
ु M का
सज
ृ न होता है । मनु9य अपने मन को बाहर( &दशा म ले जाकर 3व3वध
220 चदाकाश गीता

सांसाoरक आनंद के 4लए ईEछा जागत


ृ करता है । मन को नयं?Gत करने
के बजाय वह ईEछापूतK के 4लए अनुमत दे ता है । पoरणाम2व:प वह
ईEछाओं, आनंद का जगत अपनेआप म बनाता है । ईEछाएं गौण ईEछाएं
3वभाजन गोण 3वभाजन होता रहता है । ईस जगत म से पांच मुख
Xानेl(यां अि2तव म आती है । पांच कम£l(यां पŠृ वी के साथ जुडी हुई
है । वह अि2तव म आती है । पांच Xानेl(यां आकाश के साथ जुडी हुई है ।
यह पांच Xानेl(यM के ल$ण ‘चत’ जैसे है । पांच कम£l(यां सतगुण के
साथ जुडी हुई है । जो ईl(यो को जीत लेता है वह मु1त मानवी है । ऐसे
मनु9य के संतोष 2व म से मतलब आमा म से ाwत होता है। पूणK Xानी
होने के 4लए पुण:
K प से वैरा}य आवqयक है । पूण:
K प वैरा}य मतलब ओर
कुछ नह( 4सफK ईl(यो का 3वजय। ईEछार&हत मनु9यो ह( मुि1त 4सt कर
सकते है ।

248. yzम और 'सफF yzम के बारे मE सोचए। मन दे खने मE अलग


@दखता है Xफर भी 'सफF एक और एक ह! है । मन जब एका‰ हो तब
महानता क3 चरमसीमा पर होता है । यह मन शा)वत मन है । यह शा)वत
मन परमानंद है । यह शा)वत मन को चदाकाश कहा जाता है । शुJ मन,
शुJ आकाश, शJ
ु चदाकास वह! 'सLJ है । वnछ चदाकाश मतलब योग-
मतलब ई)वर के साथ सं'मलन! जब शुJ चदाकाश मE वेश करे तब एक
संतोष 'सLJ ाDत होती है । जब ईस शुJ आकाश मE वेश करते है तब
मेरा और तुहारा ऐसा फकF खो जाता है । ईस वnछ चदाकाश मE ह!
मुि5त, भि5त, शि5त और अनुकूल मागF है । चदाकाश बLु J मE है । जब
जीव शुJ चदाकाश मE रहता है तब सांसा`रक जीवन के बंधन नMट हो
जाते है । ई:B!यां एवं उसके संबंधत भोग जल जाते है । यह वnछ
221 चदाकाश गीता

चदाकाश yzमरं ‡ है । yzमरं ‡ मतलब ऐसी गफ


ु ा िजसमE yzम रहता है ।
राजयोग जीसे कहा जाता है । वह गले के उपर के भाग मE होता है , जीसे
‘रं ग गफ
ु ा’ कहा जाता है वह गले के उपर होता है ।
पMट!करणः अपने चत म हरदम ONम के बारे म चंतन करो।
अलबता, मानवी के मन अलग &दखते है लेIकन हक@कत म वह एक और
एक ह( होते है । जो भेद &दखता है वह Œमणा है । एक अनुभूत करना
मतलब आमा को सब म दे खना। जब ईEछाएं न9ट हो जाएं तब सभी मन
एकसमान हो जाते है । मन का कोई आकार नह( है । मन वायु 2व:प हे ,
लेIकन मन जब एका| होता है तब महानता क@ चरमसीमा पर होता है ।
एका| मन शाqवत मन है । शाqवत मन ओर कुछ नह( लेIकन परम आनंद
का 2व:प है । शाqवत मन को चदाकाश कहा जाता है । शुt मन हरदम
शुt चदाकाश म होता है । चदाकाश क@ अनभ
ु ूत मनु9य के जीवनल[य
क@ 4स3t है । चदाकाश अथाKत योग अथाKत वह 2थान जहां जीव 4शव का
सा$ाकार करता है । जीसे चदाकाश कहा जाता है वह „दयाकाश है ।
चदाकाश-„दय पर Vयान केl(त करने से मनु9य मुि1त 4सt सकता है ।
„दयाकाश पर Vयान केl(त करने से मनु9य अपना अहं कार छोड सकता
है ऐसा भाव िजसमे यह आप हो, यह म{ हुं। यह जीव जब „दयाकाश म
4शव के साथ एक हो जायेगा तब अlqय हो जायेगा। यह 2व2थ 2थान म
मुि1त मतलब बंधनो म से मुि1त, भि1त, शि1त और अनुकूल पथ है ।
शुt 2थान! आकाश बु3t म है । जब जीव चदाकाश के शुt 2थान म रहता
है तब सांसाoरक जीवन के साधनो का आकषKण-लगाव नीकल जायेगा। यह
शुt 2थान मतलब ONमरं  (करोडरxजू क@ सुषD
ु ना नाडी के अंत भाग म
रहती जगह) जीसे राजयोग कहा जाता है । वह गले के ऊपर के भाग म है ।
222 चदाकाश गीता

जब जागतृ हुई कंु ड4लनी शि1त सुषD


ु ना नाडी से गले के उपर जाती है तब
मनु9य राजयोग के महाराxय म वेश करता है लेIकन कंु ड4लनी गल के
ऊपर न जाये और नीचे क@ ओर सी4मत रहे तब उसे हठयोग कहा जाता
है । जीसे योग क@ पoरभाषा म ‘वणKरं’ कहा जाता है । साद( भाषा म ‘रं ग
गुफा’ कहा जाता है वह भी गले के उपर है । जब कंु ड4लनी वणKलं म
पंहुचती है तब मि2त9क म 3व3वध रं ग &दखाई दे ते है ।

249. yzमरं ‡ मतलब ‘मंj’। मंj मतलब ाण का धानमंjी है । ाण


का धानमंjी आ माYबंद ु है । आ मा का वह Yबंद ु समयातीत, कालातीत,
कारणर@हत है । ईस सब के मZय मE शा)वत मंj है और उसके मZय मE
यह चदाकाश है । यह चदाकाश मतलब ‘च त’। यह परमानंद क3 कkा है ।
यह रामबाण (परम ईलाज) दवा अथाFत परम गi
ु है , जीसका मंj है ‘तत
वन अ'स’ मतलब आप हो और आप ह! वह! हो।
पMट!करणः मंG अथाKत ‘ONमरं ’। मंG का मूल उेश और अंत
ईqवरसा$ाकार है । जब कंु ड4लनी ONमरं  म पहुंचती है तब ईqवर का
सा$ाकार पूण:
K प से होता है । ईस4लए ONमरं  मंG है । मंG वह ाण का
मंGी (धान) है । जीस तरह धान राxय के कायK म राजा को मदद करते
है उसी तरह ईqवरसा$ाकार के 3वषय म ाण को मंG मदद करता है ।
ाण का धानमंGी ‘आम?बंद’ु है । आम?बंद ु एक ऐसा 2थान है , जो
अवकाशर&हत, समयर&हत कारणर&हत है । ईसके मVय म शाqवत मंG है ।
हरदम अ…यास से आम?बंद ु &दFय च$ु को &दखता है । नाद नरं तर सुनाई
दे ता है । ‘नाद’ एक शाqवत मंG है । ईस मंG के मVय म चदाकाश है ।
चदाकाश अथाKत चत, चेतना-चदाकाश अथाKत परमानंद। चदाकाश
मतलब आमसा$ाकार का आनंद। जीवनमृ यु के च‡ को भेदने का
223 चदाकाश गीता

रामबाण ऊपाय है । हमार( तमाम वासनाएं जब परमानंद का सा$ाकार


होता है तब अlqय हो जाते है । ईस4लए ह( परमानंद ह( रामबाण ईलाज है ।
दवाओ क@ तरह गु: भी 4श$ण क@ $तयां दरू करते है । गु: का मंG है -
‘तत वम अ4स’ मतलब आप ह( वह( हो और वह( आप 2वयं गु: भी वह(
है जो अनुयायी को ईqवरसा$ाकार क@ ओर ले जाते है ।

250. मानवी को मानव 5यv कहा जाता है । सह! मानव वह है क3 जो


हरदम मनन करता रहता है । अगर yzम8ान का राता हमे मालूम ह! न
हो तो बार बार हमE ज:म लेना पडता है । अगर yzम8ान का सह! राता
खराब न हो तो हमE संतुिMट ाDत नह! होती। यह संतोष अपना फझF-
प`रणाम क3 एपेkा रखE Yबना नभाया जाये तो 'मलता है और वह भी
उसके लगाव के Yबना। ईन प`रणामो क3 अपेkा के बगैर कमF Xकया जाये
उसे ह! मुि5त कहा जाता है । ईसे ह! परम आनंद कहा जाता है । ईnछाएं
नकF है । ईnछार@हत दशा परम आनंद क3 िथत है । उnच तम थान
'शवशि5त क3 िथत है । 'शवशि5त B)य और अB)य दोनो के 8ाता है ।
पMट!करणः मनु9य को मानव 1यM कहा जाता है । मनु9य को मानव
ईस4लए कहा जाता है क@ वह मनन करता रहता है । सह( मानव वह( है ,
जो हरदम मनन करता रहता है । मनु9य को मानव बनने के 4लए
ईqवरचंतन करते रहना चा&हए। अगर वह ऐसा न करे तो वह पशु से
3वशेष नह( है । अगर हम ONमXान का मागK न 4मले तो बार बार जम
लेना पडता है । ONमXान का रा2ता िजसे पता नह( है उसे संतुि9ट 4मलती
नह( है । अगर हम ONमXान का रा2ता पता है तो मन क@ शांत 4मलती
है । संतुि9ट मायार&हत होने म है । मन माया क@ वजह से असं˜य चीजो म
बंधा रहता है और ईस4लए मन क@ शांत रहती नह( है लेIकन वह( मन
224 चदाकाश गीता

अगर क@सी चीज म लगाव नह( रखता तो परम शांत ाwत होती है ।
ईस4लए ह( संतलोग बार बार कहते है क@ शांत न9ठा म है अथात आनंद
याग म है । मायार&हत-लगावर&हत (नोन-अटे चमेट) दशा म ह( मुि1त है ।
मायार&हत-लगावर&हत दशा म परम आनंद है । ईEछाओं से बडा कोई नकK
नह( है । ईEछाएं ह( ईस जगत के दःु ख क@ वजह है । ईEछाएं अनंत है ।
ईEछाओं म बढौतर( होती रहती है और असंतु9ट रहनेवाल( ईEछाओं क@
वजह से मन हरदम दःु खी रहता है । ईस4लए ह( ईEछार&हत दशा परम
आनंद क@ वजह बनता है । परम आनंद 4शवशि1त म है । 4शवशि1त वह
lqय और अlqय दोनो के Xाता है । 4शवशि1त सवKशि1तमान और
सावK?Gक है ।

251. आ मा का चंतन ई:B!यv से नह! हो सकता। आ मा ई:B!यv से


पण
ु i
F प से अलग है । उसे 8ान से समजा जा सकता है । शर!र Lवचार से
वह एकदम अलग है । योगी वह है जो क3 ई:B!यv के सह! वiप को
समजते है और वह 8ान अनस
ु ार बताFव करते है । ऐसे लोगो को महा मा
कहा जाता है और वे जो बोलते है वE ‘वेद वा5य’ बन जाते है । वह ईमल!
के बीज जैसे होते है । ईमल! के गभF का पशF करते है तो चीकना लगतै है
लेXकन उसके बीज शुJ होते है । महा मा का Rदय ईमल! के बीज जैसा
होता है । जो एकदम शुJ होता है । ऐसे महा मा सदाकाल युवान रहते है । वE
8ानी है और 8ानी चरं जीव होता है ।
पMट!करणः आमा ईl(यM से नह( समजी जा सकती। आमा
ईl(यM से पर है । आमा 4सफK Xान से समजी जा सकती है । आमा शर(र
3वचार से परे है । जो लोग ईl(यो के सह( 2व:प को समजते है और वह
Xान के &हसाब से बताKव करते है वे योगी है । ऐसे लोग ईl(यM के आनंद
225 चदाकाश गीता

का 4शकार नह( होते। ऐसे लोग महामा होते है । वे लोग जो बोलते है वे


वेदवा1य होते है । य लोग &दFयता के ऐसे 2तर पर होते है क@ वे परम
सय के 4सवां कुछ बोल ह( नह( सकते। ऐसे महामा ईमल( के बीज क@
तरह होते है । ईमल( का गभK 2पशK से चीकना लगता है लेIकन उसके बीज
ईमल( शुt रहते है । Xानीलोग ईस जगत म रहते हुए भी और सांसाoरक
जीवन के अतआवqयक हो वैसे ह( आनंद ाwत करते है Iफर भी वे
नः2पहृ होते है । महामा का „दय ईमल( के बीज जैसा होता है -एकदम
शुt। ऐसे महामा सदाकाल युवा रहते है । Xान के 4लए कोई आयु नह(
होती। ईqवर के 4लए Xान जो सय है वह समय, 2थान और कारण से परे
हो जाता है 1यMक@ ईqवर ‘समयर&हत’ कालातीत, कारणर&हत और
2थानर&हत है ।

252. द!पक को तैल से भरE और \योत जलाओ। जैसे जैसे तैल घटता
जायेगा वैसे वैसे द!पक क3 बाती छोट! होती जाती है और काश rमशः
कम होने लगता है लेXकन Xफर से द!पक मE तैल भरा जाये और \योत
जलाई जाये तो द!पक का तेज पव
ू व
F त ् हो जाता है । ऐसा 8ानी के अंदiनी
जीवन का है । योगी का मान'सक जीवन पानी मE रहे मŽखन क3 तरह है ।
मŽखन पानी मE डूबता नह! है और पानी के ऊपर तैरता रहता है । शर!र
पानी के जैसा है और आ मा मŽखन जैसा है । सूoम बLु J को मितMक मE
के:B!त करनी चा@हए। बLु J को सुष
ु ना के 'सर पर के:B!त करनी चा@हए।
मन और बLु J दोनो मितMक मE होने चा@हए। मन बLु J मे होना चा@हए
और बLु J मन मE होनी चा@हए। Lववेक 'सफF बLु J से ह! पैदा होता है और
यह Lववेक ह! जीवा मा और परमा मा क3 एका म5ता को भाLवत करता
है ।
226 चदाकाश गीता

पMट!करणः द(पक मे तैल भर और उसक@ बाती जलाओ। जैसे जैसे


द(पक म तैल कम होता जायेगा वैसे वैसे बाती ‡मशः छोट( होती जायेगी
और काश ‡मशः कम होगा लेIकन अगर द(पक म Iफर से तैल भरा
जाये तो और बाती को जलाई जाय तो द(पक पन
ु ःका4शत हो जायेगा।
ऐसा ह( Xानी के अंद:नी जीवन का है । +tा वह xयोत है और भि1त
(ईqवर के 4लए नः2वाथK ेम) द(पक का तैल है । जीस तरह भि1त ‡मशः
बढती जाती है उसी तरह Xान का काश ‡मशः बढता जाता है । ईससे
उलटा भी होता है । Xानीओ का „दय पानी म रखे म˜खन जैसा है । वह
पानी म डूबता नह( है लेIकन तैरता रहता है । Xानीलोग जगत म रहते है
Iफर भी अ2पqृ य (बंधनर&हत) रहते है । शर(र पानी जैसा है और „दय
म˜खन जैसा है । सू[म बु3t मि2त9क म होती है । बु3t सुषD
ु ना नाडी के
ऊEचतम ?बंद ु पर होती है । मन और बु3t मि2त9क म होने चा&हए। यह(
Xानी का सह( ल$ण है । मन मि2त9क म होता है । बु3t मन म होती है
और मन बु3t म होता है । मन और बु3t एक होने चा&हए और तभी
&दFयता क@ ऊEचतम ि2थत का अनुभव हो सकता है । 3ववेक बु3t म से
पैदा होता है और 3ववेक क@ वजह से ह( जीवामा और परमामा क@
एकाम1ता 4सt होती है ।

253. एक ना`रयल मE से असंŽय ना`रयल पैदा होते है । अगर


ना`रयल क3 जडे काटो तो ना`रयल पैदा होना बंध हो जाता है । वासना
ना`रयल क3 जडv जैसी है । उसे Lववेक क3 कुdहाडी से जड से काटना
चा@हए और तभी शांत ाDत होती है । साधुगण
ु , स वगण
ु , शांत और ऐसे
सदगण
ु मायार@हत दशा मE से ाDत होते है । बLु J जब िथर होती तब उसे
227 चदाकाश गीता

स वगण
ु कहा जाता है । स य-प थर मE 'लखे अkरो जैसा है । सांसा`रक
जीवन क3 बातE लेट पर चाक से 'लखे गये अkरो क3 तरह होती है ।
पMट!करणः एक नाoरयल म से अनेक नाoरयल पैदा होते है । एक
Xानी म से अनेक Xानी पैदा होते है । नाoरयल क@ जड काट( जाये तो
नाoरयल का पैदा होना बंध हो जाता है । वासना नाoरयल क@ जड क@ तरह
होती है । उसे जड से काटनी चा&हए और उसके 4लए 3ववेक का ऊपयोग
करना चा&हए। वासना जब पूण:
K प से न9ट न क@ जाये तब तक पूण:
K प से
शांत ाwत होती है । मनु9य साधुगुण, सवगुण, शांत और सभी गुणो तबी
ाwत कर सकते है जब नः2प&ृ हता (नोन-अटे चमेट) के 2तर पर पहुंचता
है । जब बु3t ि2थर हो तब सवगुण कहा जाता है । सय पथर पर 4लखे
अ$रो जैसा है । सांसाoरक जीवन क@ बात पथरपाची पर 4लखे चाक के
ल$णो जैसी है । सय हरदम सामाय रहता है लेIकन सांसाoरक बात तुरंत
ह( भूला द( जाती है ।

254. कुएं को एक बार उसके पानी से पण


ु i
F प से खाल! कर दे ना
चा@हए। परू ा Xकचड नकाल दे ना चा@हे ए। बाद मE कुएं मE से आनेवाला पानी
शुJ होता है । 8ान ईस शJ
ु पानी जैसा है । एक बार म‘ और मेरे Lवचारो
को जला दे ने से ई:B!यv के Lवषय पर उदासीनता वयंभू कट होगी।
पMट!करणः कुएं को शुt करने के 4लए उसम पानी पूण:
K प से नकाल
दे ना चा&हए। क@चड़ नकाल दे ना चा&हए। उसके बाद कुएं म जो पानी आता
है वह शुt होता है । मनु9य ारं भ म शुt नह(ं होता लेIकन सतत साधना
से अपनी गंदक@, अ2वEछताएं जल जायगी उसके मन को वासनाओं से
शुt करना चा&हए। उसके बाद पैदा होनेवाला Xान बहुत ह( शुt होता है ।
उसी तरह जीस तरह कुएं म से क@चड़-परु ाना बासी पानी दरू करने से शt

228 चदाकाश गीता

पानी 4मलता है । सदा के 4लए म{ और मेरा क@ संवेदनाएं जला दे नी चा&हए।


जब ऐसा होता है तब परम सय का Xान अपनेआप ह( पैदा होता है ।
साधुगुणो, सतगुणो, शांत और अय गुणो कोई भी यास के ?बना पैदा
होगे। ईqवर का दशKन हर एक चीज म होगा। ईस ि2थत को 4सt करने
के 4लए सांसाoरक जीवन के आनंदो का पूण:
K प से याग जCर( है ।

255. मनुMय कागज पे 'लखना 'सख जाता है बाद मE रे त मE अkर


'लखने क3 जiरत नह! रहती और भू'म पर 'लखने क3 भी आव)य5ता नह!
रहती। उसी तरह मनुMय एक बार yzम दशFन करे – जो yzम गण
ु ातीत है
बाद मE उसे पंख जैसे हलके yzम के साथ उतरने क3 आव)य5ता नह! है ।
दध
ू एक बार छांछ बन जाये बाद मE छांछ को दध
ू मE प`रवतFत कर सकते
है ?
पMट!करणः एक बार मनु9य कागज पे 4लखना 4सख जाता है बाद म
उसे रे त म अ$र 4लखने क@ ज:रत नह( है । उसी तरह जो मनु9य एक बार
गुणातीत ONम को 4सt करे बाद म उसे गुणोवाले ONम क@ ओर जाने क@
ज:रत नह( है । एक बार ऊEच 2तर पहुंचने के बाद वा3पस नीचले 2तर पर
जाने क@ आवqय1ता नह(ं है । एक बार दध
ू छाँछ बन जाता है बाद म छांछ
को दध
ू म पoरवतKत नह(ं कर सकते।

256. जो लोग दध
ू खर!दने जाते है उ:हE गाय क3 Xकं मत नह! पछ
ू नी
चा@हए उसी तरह जो लोग आ मा क3 खोज मE होते है उ:हE शर!र के चीजv
क3 चंता नह!ं करनी चा@हए। जीसने आ मा को 'सJ Xकया है वह ना`रयल
के सुखे कोपरे जैसा है मतलब उसे शर!र से लगाव नह! होता। अगर रसी
को जला @दया जाये तो वह खाक हो जाती है बाद मE उसक3 रसी नह!ं
229 चदाकाश गीता

बना सकते। कोई €यि5त दस


ू रे का बरू ा नह! कर सकता। मनुMय अnछा या
बरू ा अपने Lवचारो से होता है । हम Xकसी €यि5त को क3सी बात के 'लए
वजह माने तो उसका सूoम अथF है नांव को चलाने के 'लए हाथ से ध5का
मारना पडे उसी तरह कोई ऐसा €यि5त होना चा@हए जो आ म8ान के 'लए
गi
ु बन सके। जब नांव दस ू रे Xकनारे पर पहुंचती है तब नाLवक क3 जiरत
नह!ं होती। पानी मE नांव Xकस तरह होती है । जीस तरह आ मा शर!र मE
होती है । हमारे पांव Xकचड़ से गंदे हुए है तो वह साफ करने के 'लए जहां
पानी होता है वहां जाना पडता है । जब हम दो हाथ से ताल! बजाते है तब
हमे एक शि5त का अनुभव होता है और आवाझ आती रहती है । सभी
ऊंग'लयां एकसमान नह! होती Xफर भी जब हम खाने के 'लए हाथ मुंह क3
ओर ले जाते है तब सभी ऊंग'लयां एक हो जाती है उसी तरह जैसे अनुभव
बढता जाता है वैसे अLवभा\य के दशFन होते है । गi
ु पर क3 &Jा लोमडी
क3 आवाझ जैसी होती है । जीस तरह सब लोमडीयv क3 आवाझ एकसमान
होती है उसी तरह सभी संतो के Rदय एकसमान होते है । कुएं मे जल हर
सतह पर एकसमान होता है । एक कुएं मE दो तरह के जल नह!ं होते। उसी
तरह जीवन ऊजाF गतमान और असल दोनो चीजv मE एक समान ह! होती
है । उसी तरह सूयF चंB क3 शि5त एक समान होगी। आ मा अवकाश मE
और अवकाश आ मा मE है । जीन लोगv ने यह अनुभूत क3 होगी वE आनंद
से गायEगे। ‘आनंद क3 कंु ड'लनी’ 5या है उसका 8ान उ:हE मालुन होता है ।
आनंद कंु ड'लनी मतलब मनुMय मE आनंद करनेवाल! सपाFकार गत से आगे
बढती शि5त। ऐसे मनुMय कंु ड'लनी कहां है वह ढूंढने के 'लए यास करE गे।
कंु ड'लनी ढूंढने के बाद उसे ाणायाम से जोडा जायेगा और उन लोगो को
Xफर से ाणायाम के साथ जोडने का यास करना चा@हए। उन लोगो को
230 चदाकाश गीता

भि5त का अनुभव करना चा@हए। उन लोगो को मुि5त का साkा कार


ककरना चा@हए। उन लोगो को ज:म और म ृ यु पर Lवजय ाDत करना
चा@हए और सब भूल जाना चा@हए। €यि5त को मौत और उसके साथ जुडी
हुई बाते के 'लए Lवजय ाDत करना चा@हए। €यि5त को माया के स य
व*प को समझना चा@हए। हे मन! शा)वत आनंद के साथ एकाकार हो
जाओ। ऐसी मनःिथत का अनुभव करE क3 जो शा)वत आनंद से भरा हो।
परमा मा महाराजा के साथ एकाकार हो जाओ। हे मन! बाहर! जगत Lपघल
जाओ और परम आ मा महाराज के साथ एकाकार हो जाओ। िजसने
परमा मा के साथ एका म5ता ाDत क3 है उसने अपना जीवन लoय ाDत
कर 'लया है । €यि5त को परमा मा के साथ एकाकार हो जाना चा@हए।
जागृ त, वDनअवथा सब परमा मा मE ल!न हो जाना चा@हए और
एकाकार हो जाना चा@हए। आ म8ान के 'लए ऐसी LववेकबLु J है । यह चाबी
हरदम हाथ मE रहनी चा@हए। खजाना रखनेवाले को अपने खजाने क3 चाबी
के 'लए सतकF रहना चा@हए उसी तरह बLु J को द!माग मE के:B!त करनी
चा@हए। पानी जब तक अि^न पर हो तब तक ह! गमF रहता है लेXकन
पानी का बरतन जैसे ह! भ'ू म पर रखा जाता है तो वह ठं डा होने लगता है ।
हमार! बLु J अि^न पर रखे गमF पानी जैसी होनी चा@हए उसी तरह &Jा
अचल होनी चा@हए। जीव कमरे मE बंधे बछडे जैसा होता है । बछडा हर दम
कमरे मE से बाहर नकलने के 'लए त पर रहता है उसी तरह जीव 8ान का
अमत
ृ पीने के 'लए हर दम त पर रहता है ।
पMट!करणः गाय के दध
ू खर(दने के 4लए जानेवाले मनु9य को गाय
क@ Iकं मत नह(ं पुछनी चा&हए उसी तरह आमा क@ खोज म नीकले मनु9य
को शर(र के बारे म चंता करने क@ कोई आवqयकता नह(ं है । उसके 4लए
231 चदाकाश गीता

शर(र के बारे सोचने के 4लए धमK ह( नह( है । सा$ाकार करनेवाला मानवी


नाoरयल के कोपरे जैसा कठोर है मतलब उसे शर(र से लगाव नह( होता।
एक बार र2सी जलाकर खाक कर दे ते है तो उसक Iफर से उपयोग नह(
कर सकते। एक बार ईEछाओं को जला &दया जाये तो व Iफर से हमे
परे शान नह( करती। एक बार मनु9य पूण:
K प से Xानी बन जाता है तो वह
वा3पस भौतकवाद म नह( जायेगा। हक@कत यह है क@ कोई भी मनु9य
क@सी का बूरा नह( कर सकता। वा2तव म अEछा-बूरा हमारे खुद के सज
ृ न
होते है । दस
ू रो को दोष दे ना वह बहुत ह( नाजुक बात है । नांव को गत दे ने
के 4लए शु: म ध1का &दया जाता है । आVयािमक मागK पर आगे बढने क@
ईEछा रखनेवाले मनु9य को शु: म गु: क@ आवqय1ता रहती है । जब नांव
नद( के दस
ू रे Iकनारे पर पहुंचती है तब पतवार चलानेवाले को ना3वक क@
ज:रत नह(ं होती। एक बार ईqवर का सा$ाकार हो बाद म ग: ु क@ ज:रत
नह( रहती। नांव पानी म कैसे तैरती है ? उसी तरह आमा शर(र म होती
है । नांव पानी म होती है Iफर भी पानी से अलग है उसी तरह आमा शर(र
म रहती है Iफर भी वह शर(र से अलग है । आमा को शर(र का ललगाव
नह(ं होता। हमारा शर(र Iकचड़ से गंदा हुआ हो तो उसे कादवर&हत करने
के 4लए हमे जहां पानी हो वहां जाना पडता है । हम पानी के पास जाते है
और डरते है तो Iकचड़ क@स तरह धो सकते है ? उसी तरह मनु9य का मन
अशुt है । वह अशु3tयां दरू करने के 4लए हमे क@सी भी कार क@ साधना
करनी चा&हए। अगर मनु9य को योगा…यास करने से डर लगता हो तो मन
क@ शु3t क@स तरह हो सकती है । ऐसा मनु9य ईqवर का सा$ाकार कैसे
कर सकता है ? ताल( बजाने के 4लए दो हाथM क@ आवqय़1ता रहती है । एक
हाथ से ताल( क@ आवाझ नह( आती। दोनो हाथ साथ 4मले तो ह( ताल( क@
232 चदाकाश गीता

आवाझ होती है । जीव और 4शव दोनो अलग है मन और बु3t अलग हो तो


मनु9य सा$ाकार नह( कर सकता और ईqवर के परम सुख क@ ािwत नह(
होती। ईqवर का जीव और 4शव जब एक हो तब मनु9य उसके चारो ओर
ONमांड को अंकु4शत करनेवाले सवKशि1तमान क@ उपि2थत का अनुभव
करता है । वैसे तो हाथM क@ सभी ऊंग4लयां एकसमान नह(ं होती पर जब
मनु9य अन का नवाला मुंह तक लाता है तब एकदस
ू रे के साथ 4मलकर
ह( एकसमान हो जाती है । उसी तरह हमार( ईl(यां शु: म अलग होती है
लेIकन व जीव और 4शव का सा$ाकार होता है तब एक हो जाती है ।
ईl(यां उस ि2थत म आमा म 3वल(न हो जाती है । गु: म +tा एक
लोमडी क@ आवाझ जैसी है । एक लोमडी रोती है तब सभी लोमडीयां रोना
शु: करती है । एक 4श9य जब अपने गु: म अतूट 3वqवास &दखाता है तब
दस
ू रे 4श9य उसका अनुकरण करते है । सभी लोमडीयM क@ आवाझ
एकसमान होती है । उसी तरह सभी साधु अंद:नी तौर पर एकसमान होता
है । कुएं म पानी का 2तर एकसमान होता है । एक ह( कुएं म दो तरह का
पानी नह( होता। ईसी तरह जीवन ऊजाK च4लत और अचल चीजM म
एकसमान होती है । सूयK और चंl क@ शि1तयM म कोई फकK नह( होता।
सभी फकK 4सफK मान4सक Œमणा है । अवकाश आमा म है और आमा
अवकाश म है अथाKत आमा और अवकाश एक है । जो लोग आमा और
अवकाश को एक समजते है वे &दFय आनंद का अनुभव करते है । ऐसे
मनु9य आनंद कंु ड4लनी का ऊEचतम आनंद ाwत करते है । ऐसे लोग
आनंद कंु ड4लनी का Xान रखते है , व हरदम यासो से भि1त और मुि1त
4सt करते है । भि1त मतलब ईqवर के 4लए नमKल ेम। ऐसे लोग
जीवनमृ यु के च‡ से मु1त हो जाते है । जीवन मृ यु को जीतने के बाद
233 चदाकाश गीता

उह ईqवर 4स3t भूल जानी चा&हए। उह माया के सय 2व:प को
समजना चा&हए। उन लोगो को नयानंद क@ अनुभूत करनी चा&हए। हे
मन! यह शाqवत आनंद को पचा लो! यह शाqवत आनंद को ाwत करो!
तारक ONम के आनंद को पीओ! मि2त9क म तारक होने से ाwत हो रहा
कंु ड4लनी का सुख! हे मन! सम| बाहर( 3वqव को तारक म रखो! तारक को
ONमांड म Fयाwत शि1तओं से भर दो! ‘तारक’ म जीन लोगोन यह सुख
ाwत Iकया है वे जममृ यु के बंधनो से दरू हो जाते है । उहMने जीवन का
ल[य 4सt कर 4लया है , ईस4लए ह( हम हमारे मन को तारक पर केl(त
करना चा&हए। जाग:कता, 2वwन और सुषुिwत। 3ववेक क@ शि1त
आमXानी क@ चाबी है । आमXान के 4लए बु3t बहुत ह( महवपूणK है ।
तीœ बु3t के ?बना मनु9य ‘2व’ का मतलब आमा का Xान ाwत नह( कर
सकता। तीœ बु3t ताले क@ चाबी जैसी है और हमे अपने उकृ9ट लाभ के
4लए उसका उपयोग करना चा&हए। िजस तरह खजाने क@ चाबी के 4लए
मनु9य को सतकK रहना चा&हए उसी तरह मनु9य को अपने मि2त9क म
रह( बु3t के 4लए सतकK रहना चा&हए। मनु9य को बु3t पर हरदम Vयान
केl(त करना चा&हए। पानी तब तक ह( गमK रहता है जब तक वह अि}न
पर होता है , जैसे ह( उसे भू4म पर रखा जाता है , वह धीरे धीरे ठं डा हो
जाता है , उसी तरह जब तक बु3t पर Vयान केl(त Iकया जायेगा तब
तक ह( वह तीœ और अचूक रहे गी। जैसे ह( हम हमारा Vयान बु3t पर से
हटा लगे तो बु3t 4शथल होने लगेगी। मन म रह( बु3t अि}न पर रखे
गए गमK पानी क@ तरह जैसी है । बु3t हरदम सतकK और दोषर&हत होनी
चा&हए उसी तरह +tा क@ अEछs तरह परवा करनी चा&हए। जीव कमरे म
बंधे हुए बछडे जैसा है । बछडे को हरदम कमरे से बाहर जाने क@ आतुरता
234 चदाकाश गीता

रहती है उसी तरह जीव हरदम Xानामत


ृ पीने के 4लए तपर होता है । जीव
को 4शव के साथ एक होने क@ तपरता होती है ।

257. धारणा एक ऐसा साधन है , जीसके Sवारा बLु J क3 Lववेक शि5त


बढती है । धारणा मुि5त का मागF है । धारणा परमे)वर क3 ािDत का मागF
है । ाण मतलब जीवन शि5त िथर हो उसके 'लए धारणा एक साधना है ।
जब जीवन ऊजाF िथर होती है तब मन िथर होता है । जब ाण को ऊZवF
@दशा मE ले जाते है तब 8ान हरएक नाडी मE वेश करता है और
प`रणामवiप शांत 'सJ होती है । कृत और सूoम Lववेक दोनो अलग
होते है । योग-मन क3 शांत से पैदा होती शि5तयां kमा-धैयF जैसे गण
ु ो का
बLु J मE अनुभव होता है । जो लोग हरदम धारणा का अTयास करते है उ:हे
सारा Lव)व उनके अित व मE समाया हुआ हो ऐसा अनुभव होता है ।
आ मा सभी तरह के कमF और Lवध Lवधानो से परे है । कमF वह! है जो
प`रणामो के लगाव (अटे चमे:ट) के Yबना Xकया जाता है । €यि5त पापर@हत
तो ह! हो सकता है अगरे नःपहृ भाव से कमF करे । कमF आ मा के 8ान से
Xकया जाता है । आ मा जो क3 नMकमF और नवाFसनीक है ।
पMट!करणः धारणा (मन क@ संपूणK एका|ता) बु3t क@ 3ववेक शि1त
बढाने का साधन है । मनु9य क@ बु3t अपना मूलभूत तव खो दे ती है ,
1यMक@ उसका कमKयोग 3व2ततृ और फैला हुआ होता है , लेIकन अगर बु3t
केl(त हो तो बु3t उसके ाकृतक तेज से का4शत होती है । धारणा
मुि1त का मागK है । मन को ईqवर पर केl(त करो। मुि1त निqचंत तौर
पर 4मलेगी। धारणा परमेqवर ािwत का मागK है । धारणा जीवन ऊजाK ि2थर
करने का साधन है । जब जीवन ऊजाK ि2थर हो जाती है तब मन ि2थर
और एककेl( हो जाती है । जब ाण मतलब जीवन ऊजाK ऊVवKगामी हो
235 चदाकाश गीता

तब Xान म पoरवतKत होती है। यह Xानमत


ृ जैसे जैसे 3वक4सत होता है
वैसे वैसे वह शर(र क@ हरएक नाडी म वेश करता है और Fयि1त पूण:
K प
से शांत ाwत होती है । ऐसी ि2थत म मनु9य का सामाय 2वभाव और
सू[म खुद ह( अलग हो जाता है। जो लोग हरदम धारणा का अ…यास करते
है उह खुद म ONमांड को ाwत करनेवाले क@ शि1त का 3वकास कर
सकता है । अगर मनु9य का मन एक केl(त हो तो नय मुि1त का
आनंद ाwत कर सकता है । आमा सभी कमv और 3वघ3वधानो से परे है ।
कमK वह है जो नः2पहृ तौर पर Iकया जाता है । हम जो कमK करते वह
भूल जाये तो वह पाप नह(ं है । कमK वह है जो क@ आमा के Xान के साथ
Iकया जाता है । आमा वह है जो कमKर&हत और नवाKसनीक (वासनार&हत)
है ।

258. आ मा को ई:B!यो से नह! समज सकते है । उसे बLु J से समज


सकते है । आ मा आकार और गण
ु ोवाल! चीज क3 तरह समज नह! सकते।
जीन लोगो का Zयान शर!र पर के:B!त हुआ है उन लोगो के 'लए शांत
'सJ करना मुि)कल है । ऐसे लोगो के 'लए आ मा का दशFन करना भी
मुि)कल है । B)य-चीजो पर Zयान करना चा@हए। अB)य के त ेम
बढाना चा@हए। जब तक Zयान B)य बातv मE रहे गा तब तक दःु ख-आनंद के
Jैत का अनुभव होगा लेXकन जब Zयान अB)य क3 ओर जायेगा तब गण
ु ो
क3 अनुभू त अB)य हो जायEगे।
पMट!करणः आमा को ईl(यM से नह( समज सकते। आमा को बु3t
से ह( समज सकते है । आमा को आकार या गण
ु ोवाल( चीज के तौर पर
नह( समज सकते है । हमे हमारा Vयान lqय बातM पर कम करना चा&हए।
हमे अlqय बातM पर Vयान केl(त करना चा&हए। जगत lqय है और हमे
236 चदाकाश गीता

सांसाoरक बातो पर का ेम घटाना चा&हए। हमार( ईqवरािwत के 4लए


ईEछा बढानी चा&हए। जो बात lqय के साथ जुडी हुई हो वह दःु ख और
आनंद के साथ जुडी होती है । अlqय बात दःु ख और आनंद से पर होता है ।
ईqवर जगत के tंtो (tैत) से परे होता है । जब ईqवर का सा$ाकार होता
है तब tैत भाव भूतकाल क@ बात बनकर हमारा जीवन ल[य ईqवर के
साथ एक-उसका सा$ाकार करके हो जाना ह( है ।
दस
ू रा Lवभाग समाDत

&ीकृMणापFणम ् अतु

ॐ, ॐ, ॐ, ॐ, ॐ
239 चदाकाश गीता

तत
ृ ीय 3वभाग

259. पLवj एकाkर “ओम ्” आकाश मE रहनेवाले तुफान क3 तरह है ।


ओम का आरं भ नह!ं है और अंत नह!ं है । ‘ओमकार’ नाटक के ‘मंच
बंधक’ जैसा है । वह मनुMय के शर!र से काम करता है । वह शर!र क3
िजसमे ओमकार €याDत है । यह एकाkर हमारे अंदर, हमारे बाहर और
सवFj है । वह जगत मE जो भी अित व रखता है उसक3 वजह है । हमे उसे
कह!ं सचेत करने क3 जiरत नह!ं होती। यह नाद सब मE वतFमान है । हमे
मृ त मE अलग तौर पर रखने क3 आव)यकता नह! रहती। यह शि5त
Lवभा\य नह! लेXकन अLवभा\य है । यह नाद सवF ाणीओं मे होता है ।
ाणीओ के Sवारा पैदा होनेवाले क3सी भी तरह क3 आवाझो मE ‘ओमकार’
होता है , जीसे णव कहा जाता है जो और कुछ नह! लेXकन ‘ओमकार’ का
दस
ू रा नाम है । जब उसे ाण के साथ एक Xकया जाता है और वह शर!र मE
वतFमान हो तब उसे णव कहा जाता है , जब कृत और सूoम (अथाFत
भौतक और आ@द भौतक) (थूल और सूoम) अलग हो तब वह ‘णव’ है
लेXकन हम जब दोनो को एक तरह से अनभ
ु व करते है तब ‘एक व’ क3
संवेदना कहते है । यह ‘ओमकार’ समान है । ईस व5त €यि5त ‘एक’ का
सवFj दशFन करता है , जीसे हम &Jा से भजते है वह ‘समत’ बन जाता
है ।
पMट!करणः ‘ओम’ आकाश म रहनेवाले तुफान जैसा है । ‘ओम’ सारे
आकाश म Fयाwत है । ‘ओम’ का आरं भ नह(ं है और अंत भी नह( है । ‘ओम’
शाqवत है । ‘ओम’ नाटक के मंच बंधक जैसा है । ओम सिृ 9ट क@ वजह है
लेIकन Iफर भी सिृ 9ट से परे है । ‘ओम’ सिृ 9ट से बंधा नह(ं है । ओम मनु9य
शर(र के माVयम से काम करता है – शर(र जीसम ओम Fयाwत है । ओम
240 चदाकाश गीता

हमारे अंदर है , हमारे बाहर है और हमारे आसपास सवKG Fयाwत है । ओम


जगत म जो भी अि2तव रखता है उसक@ वजह है । ‘ओम’ को हरदम याद
रखने क@ आवqयकता नह(ं है । जब योग के नवअ…यासु अVयाम के कोई
2तर पर पहुंचता है तब ओम 2वयं खुद उसक@ 2मृ त म आ जाता है ।
‘ओम’ सवKG Fयाwत है , सवK म Fयाwत है । ओम का 3वभाजन नह( हो
सकता। वह अ3वभाxय है । ‘ओम’ का हरएक ाणी म अि2तव है । ाणी
क@सी भी तरह क@ आवाझ नकाले तो वह और कुछ नह( लेIकन ओमकार
है , जीसे ‘णव’ कहा जाता है वह और कुछ नह( ‘ओमकार’ है। ‘ओम’ को
जब कृत के साथ एकाकार Iकया जाता है तब और जब वह सारे शर(र
म Fयाwत हो तब उसे णव कहा जाता है । जब कृत और सू[म को
‘अलग’ तौर पर माना जाये तो तब उसे पणKव कहा जाता है , जब 2थूल
और सू[म को एक तौर पर अनुभव करे तब ‘एकव’ क@ अनुभूत कहा
जाता है । ईसे ओमकार कहते है । जब ‘एकव’ का भाव मनु9य ाwत करता
है तब वह सवKG ‘एक’ के दशKन करते है । ऐसे मनु9य को जगत म सवKG म
ईqवर &दखाई दे ते है । ONमांड म भी ईqवर Fयाwत है , जीसक@ +tा से
भि1त करते हौ वह आपका ‘सवK’ बन जाता है ।

260. वह शि5त क3 जीसे ‘ओमकार’ कहा जाता है और वह सम‰


yzमांड मE €याDत है और जो आकारह!न है वह सवF मE काश है और सवF
का काश है । अ8ानता और 8ान 'सफF अTयास अथाFत वातLव5ता नह!ं
है । सुख और दःु ख ऐसे मनुMय को कभी पशF नह! करते जीन लोगोने
‘ए5ता’ क3 भावना का अनुभव Xकया है ।
पMट!करणः ‘ओम’ सारे ONमांड म Fयाwत है । वह आकारर&हत है ।
ओम सभी म शा4मल काश है और सभी का काश है । अXान और Xान
241 चदाकाश गीता

4सरअफ अेहसास है वह वा2त3व1ता नह( है । मनु9य जब पूणK व को ाwत


करता है तब दोनो (Xान और अXान) उसे समान लगते है । ऐसा मनु9य
जगत के गण
ु ो से परे हो जाता है । दःु ख और सुख ऐसे मनु9य को कभी
2पशK नह( करते, जीसने परमामा का परमसुख ाwत Iकया है ।

261. हमारे ‘मन’ मE कुछ हो तो हमे सभी क3 जiरत रहती है । हम


अगर मन को मार दे ते है तो हमे क3सी भी चीज क3 जiरत नह! रहती।
हमारे ‘मन’ मE कुछ हो तो ई)वर हमारे 'लए अलग रहते है लेXकन मन
और बLु J को एक कर दे तो ई)वर हमसे अलग नह! रहता। सब ‘एक’ ह!
@दखता है लेXकन ईnछाएं हो तो अलग ई)वर ज*र! बनता है 5यvक3 ई)वर
क3 सहाय और कृपा ईnछआ प`रपण
ू F करने के 'लए जiर! बनती है । ऐसी
िथत मE मन ई:B!य तिृ Dत क3 LवLवध चीजv के पीछे दोडता है और
LवLवध बातो मE आशंकाएं खडी करता है । ऐसी िथत मE एक ‘मूतF’ क3
आव)यकता रहती है , वजह और प`रणाम दोनो अलग कkा मE हो जाते है ।
चjपज
ू ा या मूतFपज
ू ा ‘माया’ या अ8ान क3 वजह से है ।
पMट!करणः मन और ईEछाएं सभी क@ मूल वजह है । जब दोनो का
नाश Iकया जाता है तब सब एक बन जाता है । ऐसी ि2थत म ‘अलग’
ईqवर क@ ज:रत नह(ं रहती। चGो या ‘मूतK’ हमार( ईEछाएं संतुषअट करने
के 4लए जCर( है लेIकन अगर ईEछाओं का नाश हो जाए तो सभी
आशंकाएं दरू हो जाती है । वजह और पoरणाम अलग होने क@ वजह कम
है । मनु9य जब माया से परे हो तब वजह और पoरणाम दोनो एकसमान
&दखाई दगे। ऐसी ि2थत म सब ‘एक’ हो जाता है , जीसका कोई पयाKय
नह( है ।
242 चदाकाश गीता

262. ‘आकाश’ जीसे कहा जाता है वह ऊपर क3 @दशा मE है , जीसे


पi
ु ष कहा जाता है वह ‘सूoम’ िथत है , जीसे ‘नार!’ कहा जाता है वह
कृत है ।
पMट!करणः उपर जो ‘आकाश’ श]द का उWलेख है वह ‘चदाकाश’ के
संदभK म है । वह मनु9य के मि2त9क म है । चेतना का आकाश मनु9य के
मि2त9क म उपर क@ &दशा म है । जब ‘मनु9य’ सू[म ि2थत म वेश
करता है तब ¨थात समाध म हो तब उसे ‘नर’ पु:ष कहा जाता है लेIकन
जब मनु9य 2थूल म रत होता है तब ‘2Gी’ कहा जाता है । वह मनु9य के
द(माग क@ आंतoरक ि2थत है । वह मनु9य को पु:ष या 2Gी बनाती है ।
बाहर( 2व:प को मनु9य क@ आंतoरक ि2थत के साथ कुछ लेनादे ना नह(ं
है ।

263. मनुMय जीसे ईnछा नह!ं है उसे वतंj ई)वर क3 जiरत नह!ं है ।
उन लोगो को कुछ भी यास करने क3 आव)य5ता नह! है । जब मन
ईि:Bयो के पदाथV के पीछे दौडता है तब एक के:B! करने के 'लए अTयास
ज*र! है । मनुMय को सांस चल रह! हो तब तक बLु J पर Zयान के:B!त
करना चा@हए। जीतने समय मE सांस-नाडी धबकती रहे तब उतना समय
Zयान के:B!त करना चा@हए। मनुMय पानी मE बह न जाए उसके 'लए
तैरना 'सख लेना चा@हए। माया को महामाया से जीतना चा@हए। माया 5या
है ? जब मन ईि:Bयv के Lवषयो के पीछे दौडता है तब LवLवध कार क3
ईnछाएं उ प:न होती है । हक3कत मE हम ना`रयल के वk
ृ को चीपकते है ।
243 चदाकाश गीता

ना`रयल का वk
ृ हमे चीपकता नह!ं है उसी तरह माया को हाथ-पग नह!ं
होते क3 वह हमे पकड कर रखे?
पMट!करणः जो मनु9य को ईEछाएं नह( होती उसे अलग ईqवर क@
ज:रत नह(ं है । उन लोगो को कुछ 4सt करने के 4लए यास नह(ं करना
है । अ…यास तब तक जCर( है जब तक मन ईिlयो के 3वषय के पीछे
दौडता है । मन को एका| करने के 4लए अ…यास आवqयक है । जब तक
शर(र म सांसे चल रह( हो तब तक मनु9य को बु3t पर Vयान केl(त
करना चाह(ए। मन को ईिlयो से अलग करना चा&हए। हम जो भी कमK
कर तो मन उसम आस1त रहना चा&हए। मनु9य जब पानी म हो तब बह
न जाए उसके 4लए तैरना 4सख लेना चा&हए उसी तरह सांसाoरक बातो म
रहनेवाले मनु9य को मान4सक तौर पर दु यवी बातो से अलग कैसे रहना है
वह 4सखना चा&हए। ऐसा होगा तभी मनु9य जगत के tैत म से मु1त हो
स1ता है और अनास1त रह सकता है और तभी माया से पर हो सकता है ।
माया को महामाया से जीतना चा&हए। ईसका 1या मतलब है ? ईस जगत
म माया के दो कार है-एक माया जो जगत म है वह जगत के tैत को
अधीन है । दस
ू र( माया ईस tैतभाव से अलग है । महामाया वह परONम के
साथ क@ एकाम1ता है और Xान 2वC3पणी है । महामाया क@ मदद से
मनु9य को जगत क@ माया को जीतना है । महामाया वह Xान का काश है
और माया वह और कुछ नह(ं है लेIकन सांसाoरक जीवन क@ आसि1त है
ईस4लए बहKम को पहचान कर मनु9य को जगत को भूल जाना चा&हए और
माया से अगल होना चा&हए। जब मनु9य नाoरयल के पैड को चीपकता है
तब मनु9य नाoरयल के पैड को चीपकता है , पैड मनु9य को नह( चीपकता।
उसी तरह मनु9य माया के साथ चीपकता है । माया मनु9य के साथ
244 चदाकाश गीता

चीपकती नह( है । मनु9य मन है वह सांसाoरक बातो के पीछे दौडता रहता


है । ईस4लए मनु9य माया के अधीन रहता है । अगर मन जगत क@ क@सी
चीज म आस1त न हो तो जगत के दःु ख और आनंद मनु9य को कुचल
नह( सकते। माया के पास मनु9य को पकडने के 4लए हाथ-पग नह( है ।

264. उदे शह!नता का 'सफF सूoम के तर पर अनुभव ाDत होता है ।


Lववेक अथाFत मन और बLु J का एक होना। समाध मतलब एक का दशFन
समिMट (सभी) मE करना। अTयास से मनुMय को शीरर मE अपने आ मा के
छः द)ु मनो को जीतने चा@हए अथाFत ईnछा, rोध, काम, मोह, म सर,
लोभ. साधक मतलब ई)वर साkा कार के मागF पर आगे बढने के 'लए
ईnछुक अTयासु को दस
ू रो के 'लए बरू ा नह!ं बोलना चा@हए। अगर वह ऐसा
करता है तो उसक3 गत अवiJ होती है अथाFत जीस तरह अंकुर पर
भार! प थर रख @दया जाये उस तरह। साधक को खुद का अTयास एक
घ@टका (24 'मनट) के 'लए भी नह! छोडना चा@हए। मन नरंतर अTयास
मE रत रहना होना चा@हए।
पMट!करणः न3वKकWप क@ ि2थत (उेशह(नता) का अनुभव 4सफK
सू[म के 2तर पर होता है – लेIकन 2थूल के 2तर पर नह( होता।
3ववेकबु3t अथKआत मन और बु3t का एकाकार हो जाना। समाध अथाKत
एक को सवKG दे खना। मनु9य को अ…यास से ईEछआ, ‡ोध, मसर, काम,
लोभ, मोह जैसे शर(र म रहनेवाले षडoरपओ
ु (छः दqू मनो) को जीतना
चा&हए। योग के अ…यासु को दस
ू रो क@ नंदा नह(ं करनी चा&हए। वह अगर
ऐसा करता है तो नवपWल3वत अंकुर पर पथर गरने से जैसे उनका
3वकास अव:t होता है उसी तरह अ…यास का 3वकास अव:t होता है ।
245 चदाकाश गीता

अ…यासु को अपनी एक पल के 4लए अ…यास म ढ(लापन नह( रखना


चा&हए। मन हरदम अ…यास म :का हुआ रहना चा&हए।

265. बहुत ह! &Jा से ाण को ऊZवF @दशा मE िथर करना चा@हए।


वह! मुि5त का मागF है । यह शर!र आ मा क3 गफ
ु ा है और ईस गफु ा मE
शा)वत आ मा रहती है । योग मतलब एक होना। जब दो 'मटकर एक हो
तब योग कहा जाता है । मन और बLु J जब एक हो तब योग कहा जाता
है । जब जीव बLु JमागF से आगे बढकर yzमरं ‡ मE वेश करते है तब उसे
योग कहते है । भि5त, तकFबLु J और शि5त तीनो जब एक हो तब ओमकार
बनता है । जीस तरह कपरूF अि^न मE भम हो जाये तो उसी तरह मन और
बLु J एक हो जाती है । बnचv को झल
ु े मE झुलाकर सुला @दया जाता है उसी
तरह च तने बLु J मE रखकर ‘मै’ 5या है उसका खयाल आता है ।
पMट!करणः ाण हरदम +tापूवक
K ऊपर क@ &दशा म ि2थर करने
चा&हए और हरदम शाqवत ONम का चंतन करते रहना चा&हए। ईस बंधन
म से मुि1त का मागK है । यह शर(र एक गुफा है , जीसम आमा रहती है ।
शर(र नाशवंत है । आमा अ3वनाशी है । जब मृ यु का ‡ूर पंजा पडता है तो
शर(र न9ट हो जाता है । आमा नये 4सरे से नया शर(र ाwत करता है ।
योग अथाKत एक होना। जब दो 4मटकर एक हो जाये तब उसे योग कहते
है । जब जीव बु3t के मागK पर आगे बढती है और ONमरं  (द(माग म
रहनेवाला खाल(पन) म वेश करता है । उसे भी योग कहा जाता है । योग
अथाKत 2थूल और सू[म का एक होना, lqय और अlqय का एक होना,
नाशवंत और अ3वनाशी का एक होना। भि1त, तकKब3ु t और शि1त एक हो
तब उसे ओमकार कहा जाता है। ओमकार जब 4सt हो तब अहं ओमकार
म एकाकार हो जाता है । कपूरK िजस तरह अि}न म भ2म हो जाता है उसी
246 चदाकाश गीता

तरह अहं ओमकार म 4मल जाता है । जब बु3t और द(माग एक हो जाए


तो अहं भूतकाल क@ बात बन जाती है । मनु9य को ‘म{’ 1या है वह
समजना चा&हए और उसके 4लए बु3t को चत म अंकु4शत करना चा&हए।
छोटे बEचो को झुले म सुला &दया जाता है वैसे मन को भी समाध म
सुला दे ना चा&हए और उसके 4लए मन को वासानाओं से मु1त करना
चा&हए।

266. हे मन! आनंद के घर मE वेश करो! जब सारे दे श मE पानी


भर गया हो तब दे श के कूएं-तालाब को अलग नह!ं कर सकते। जहां
अंधकार हो वहां काश क3 उपिथत मान लेनी चा@हए! जब मीठा खाते है
तो कडवी चीजो क3 तैयार! रखनी चा@हए। जीव का थान 5या है ! अगर
जीव को मालूम हो के आ मा को शर!र नह!ं है । ऐसी आ माओं को अपनी
गौरवाि:वत िथत ाDत होती है । म‘ और मेरा B)य चkुओ से @दखाई
नह!ं दे ता। म‘ और मेरा ना'सका के अ‰भाग से आगे नह! है । उसके उपर
जो भी है उसे अंत और आरं भ नह! है । आ मा भौतक आंख से @दखता
नह! है ईस'लए आ मा का आरं भ और अंत नह! होता। आ मा क3 शि5त
कम करना संभव नह! है , 5यvक3 आ मा अचल है । जीस तरह अंत`रk हर
जगह पर एकसमान होता है वैसे आ मा भी सावFYjक iप से समान होता
है । मनुMय का मितMक सहj सूयF के काश का घर है । आंख बडी या
सूय?
F अगर आंख खराब हो तो सूयF को दे खना संभव हो सकता है ?
ईस'लए आंख मह वपण
ू F है । सव
ु णFमूतFओ का आकार मन का सज
ृ न है ।
जब मनुMय क3 तसवीर ल! जाती है तब तसवीर बैठे हुए €यि5त के
अनुसार होती है । तसवीरकार के गण
ु अवगण
ु चj मE @दखते नह!ं है ।
247 चदाकाश गीता

पMट!करणः हे मन! शाqवत आनंद का अनुभव कर! जब सारे दे श


म बाढ क@ ि2थत हो तब हम उस दे श के कूएं-तालाबो को अलग नह(
कर सकते उसी तरह ईqवर सारे ONमांड म Fयाwत हो तो हम उसे निqचत
2थान म ढूंढ नह( सकता। आमा यहां है । वहां है और सवKG है मतलब
उसे कोई चीज नह( मान सकते। वह सभी म है और वह( सब कुछ है ।
अंधकार है ईस4लए काश है ऐसा अ4भेत है । हम जब मीठा खाते है तो
कडवी चीजो को खाने क@ तैयार( भी रखनी चा&हए। उसी तरह जगत
नाशवंत और मयाK&दत है ईस4लए परमामा के अि2तव – परमामा जो
क@ मयाKदार&हत-अ3वनाशी है उसक@ उपि2थत 2वीकार करनी पडेगी। जगत
म सवKG दःु ख है । ईस4लए हमे यह चीज समजनी है क@ एक ऐसा अि2तव
है जो क@ परम आनंद दे ता है । अंध Fयि1त को सहायक क@ जीस तरह
ज:रत होती है उसी तरह सुख को दःु ख क@ ज:रत रहती है । वे आमाएं
जो अपनी भFय ि2थत म है जो आमा और शर(र अलग बात है । म{ और
मेरा ईिlयो को lqयमान नह( होते, अहं का पूण:
K प से नाश कंु ड4लनी
ना4सका के अ|भाग से आगे बढे तब एक हो जाते है । ईससे उपर है उनका
आरं भ और अंत भी नह( है । वह एक अ3वभाxय है , जो चीजे lqय है वह
नाशवंत है । जो अlqय चीजे है वे अ3वनाशी है । आमा भौतक च$ुओ को
&दखता नह( है और आमा आ&द अंत ?बना का है । आमा क@ शि1त कम
करनी संभव नह( है 1यMक@ आमा अ3वचल है । जीस तरह अवकाश हर
जगह पर समान होता है उसी तरह आमा भी हर जगह पर एकसमान
होता है । मनु9य का मि2त9क सह2G सूयK के काश का घर है ईस4लए
परम Xान का 2थान है । आंख बडी या सूय?
K हम सूयK को अEछs आंखो से
दे ख सकते है । खराब आंखो से नह( दे ख सकते। ऐसे, आंखो का महव सूयK
248 चदाकाश गीता

से भी xयादा बढ जाता है । ईसी तरह आमा के ?बना ईqवर का सा$ाकार


नह( होता और ईस4लए जो आमा अत महवपूणK है । सुवणK क@ मूतKयM
क@ छवीं एक मन का सज
ृ न है । ईqवर आकारर&हत है । ईqवर उसके भ1त
जैसा चाहे ऐसा 2व:प ाwत करते है । मनु9य क@ परछाई ल( जाए तो वह
परछाई बैठे हुए Fयि1त क@ तरह होता है । उसी तरह भि1त के फल हम
जैसी +tा होती है ऐसा 4मलता है उससे ईqवर क@ कृपा या ईqवर क@
सवKXता &दखा नह( सकते। हम जैसा बोते है वैसा पाते है ।

267. मनुMय क3 आंत`रक &Jा अनुसार फल 'मलता है । अnछा-बरू ा


आ मा क3 वजह से नह!ं है । आ मा चीज के तYबंब जैसी है , जो मनुMय
का मन जीस तरह से चाहे उसी तरह का आकार लेती है । जीव पींजरे मE
रहनेवाले पkी जैसा है । घvसला खराब हो तो पkी भाLवत नह! होता।
पkी घvसला छोडकर चला जाता है । पkी नया घvसला बनाकर उसमE छः
म@हने मE , एक साल मE पांच 'मनट मE वेश करता है । ईस बात मE गत
का आधार पkी के यास कैसे है उसके उपर रहते है । ईस थान से रे लवे
टे शन जाना हो तो एक घ@टका अथाFत 24 'मनट भी लगते है और एक
म@हना भी लग सकता है ।
पMट!करणः मनु9य को पoरणाम उसके यासो के अनुसार 4मलता है ।
ईqवर पुण:
K प से तट2थ है । ईqवर क@सी का प$ नह( लेते या याग नह(
करते। हमे हमार( +tा जीतने ह( फल 4मलते है । शुभ और अशुभ के 4लए
आमा वजह नह(ं है । आमा दोनो से 3वभ1त है । आमा l9टा है , कताK
नह( है । आमा का 2व:प नह( है और गण
ु भी नह(ं है । आमा एक चीज
के त?बंब क@ तरह मनु9य के मन जैसा है , वह चाहे ऐसा 2व:प ाwत
कर सकता है । जीव पींजरे म कैद प$ी जैसा है । मनु9य का शर(र पींजर
249 चदाकाश गीता

है । जीस तरह घMसला खराब हो जाए तो प$ी नया घMसला एक &दन म,


एक म&हने म या थोडे &दनो म बना लेता है लेIकन प$ी घMसला खराब
होने से भा3वत नह( होता। नया घMसला बनाने म प$ी के यास कैसे है
उसके ऊपर सब नभKर रहता है । ईसी तरह आमा जब शर(र छोडे तब नया
शर(र ाwत करती है । कब और कहां वह वह( जानती है । मनु9य परमसुख
क@ ािwत थोडी 4मनट या म&हने म करता है । अलबत, उसका आधार
उसके यास पर नभKर है । ईस 2थान से रे लवे 2टे शन जाने म मनु9य को
एक घ&टका भी लग सकती है और एक मास लेIकन आनेवाले के यास
कैसे है उसके ऊपर सब नभKर करता है ।

268. साधना बैराग के 'लए और बैराग मE िथर होने के 'लए ज*र!


है । वैरा^य Bढ करने के 'लए हमे साधना करनी चा@हए। बैराग को शर!र के
साथ संबंध नह! है । मन जब आंतरबाहर! बातv मE अचल हो-सवF कारण
ओर प`रणाम मE अचल होते है तब आ मा का दशFन हो सकता है । जब
8ान और Lव8ान का Lवचार अB)य हो जाए तब €यि5त आ मा का दशFन
कर सकते है । जब €यि5त को मालुम नह! है लेXकन उसे पता है क3 वह
भी उस €यि5त को मालूम नह! हो तब आ मा के दशFन होते है। आ मा का
साkा कार करनेवाला €यि5त अंध €यि5त जैसा होता है । वे बहे रे लोगो क3
तरह होते है । यह अलग बात है क3 वे सुन सकते है । जब ई:B!या कायFरत
हो तब आ मा के साथ उसका जुडना नह! होता। ईस'लए ई:B!यv के कायF
उसके 'लए अकमF है । उसके अंदर सज
ृ न का Lवचार नह! होता लेXकन
नाितक \यादा होता है । उनक3 भूल जाने क3 शि5त \यादा होने क3 वजह
से अथाFत याग करने क3 शि5त \यादा होने क3 वजह से उनके कमF
अकमF जैसे होते है । उनका Zयान ना`रयल क3 खाल क3 ओर नह! लेXकन
250 चदाकाश गीता

कोपरे पर रहता है (अथाFत आ मा पर रहता है , शर!र पर नह!ं) वे पाप और


गण
ु ो से परे होते है । वे पानी मE रहनेवाल! नांव जैसे होते है । जीस तरह
पानी और नांव दोनो अलग होते है उसी तरह वे थूल और सूoम दोनो को
अलग समजते है । वे शर!र के कायF क3 ओर सचेत होते है लेXकन उनका
Zयान 'सफF 8ान पर के:B!त होता है । वे ग:ने का रसपान करके उसके
कूडे को फEक दे ते है । ग:ने के रस मE से एकबार चीनी बनने के बाद Xफर
से उसमE से ग:ना नह!ं बनता उसी तरह साधना से आ मा का साkा कार
करने के बाद शर!रभाव कभी वाLपस नह! आता। परु ाना बरतन ज*र!
मरमत के बाद नये बरतन क3 तरह का'शत होता है उसी तरह बLु J,
वासनाएं नMट होने के बाद स यगण
ु मE प`रवतFत क3 जा सकती है और
तभी आ मसंतोष ाDत होगा। उनका Zयान सांसा`रक जीवन क3 बातो पर
नह! होता लेXकन शा)वत परमानंद पर होता है , नाशवंत सांसा`रक आनंद
पर नह!ं। ऐसे लोग पाप और गण
ु ो से परे होते है । ऐसे लोग शर!र के
अित व से अ8ात होते है और सांसा`रक जीवन के कायदे उनको लागु
नह! होते। वे पानी मे रहनेवाल! नांव जैसे होते है । वे दु नया मE रहकर
दु नया के :यायक आनंद ाDत करते है । उ:हE उनसे लगाव नह! होता।
जीस तरह नांव और पानी दोनो अलग होते है उसी तरह आ मा को शर!र
से वे पण
ू i
F प से अलग समजते है । वे उनके दै @हक कायF क3 ओर उदासीन
होते है । वे ई)वर के परमसुख का आनंद ाDत करते है और सांसा`रक
जीवन के नाशवंत आनंद का याग करते है । वे ग:ने का 'सफF रस पीते है
और कूडे को फEक दे ते है अथाFत @द€य अमत
ृ को पीते है और सांसा`रक
जीवन के कूडे को फEक दे ते है । एकबार मनुMय आ मा का साkा कार करता
है बाद मE वह शर!र है ऐसा Lवचार वाLपस नह! आता। परु ाना बरतन ज*र!
251 चदाकाश गीता

मरमत के बाद Xफर से नये क3 तरह चमकता है उसी तरह बLु J जब


वासनाएं नMट हो जाए बाद मE शुJ स व गण
ु मE प`रवतFत होती है । बLु J
को उसमE स य वiप से वंचत रखी जाती है । 5यvक3 बLु J वासना मE डूबी
हुई है । जब बLु J पर क3 वासना क3 का'लख दरू क3 जाये तब वह अपने
मूल गण ु ो को Xफर से ाDत करती है तभी €यि5त को पण ू F आ मसंतोष
ाDत होता है ।
पMट!करणः बैराग को ि2थर और lढ करने के 4लए साधना जCर( है ।
हरदम साधना से हम नरं तर बैराग कायम रख सकते है । बैराग 1या है ?
वैरा}य शर(र का 3वषय नह(ं है । हम शर(र पर राख लगाए तो उसे बैराग
नह( कहा जाता। सEचे बैरागी के 4लए सांसाoरक चीजो का पण
ू C
K प से याग
और पूणC
K प से उसमे से अलग हो जाना ये दोनो बात जCर( है । जब मन
बाNय और अंद:नी वजहो और पoरणामो से अ3वचल रहता है तब मनु9य
आमा का दशKन कर सकता है । मनु9य आमा का सा$ाकार 4सफK
आंतरदशKन से कर सकता है । Fयि1त को 4सफK सांसाoरक बातो पर से
Vयान कम करना चा&हए। आमा के सा$ाकार के 4लए Fयि1त को Xान-
3वXान दोनो भूल जाने चा&हए। जब Fयि1त जानता हो तो ह( Fयि1त
आमा का दशKन कर सकता है। सा$ाकार के उEच2तर पर पहुंचे साधक
अंध मनु9य जैसे होते है । भले ह( आंख होती है , बहे रे को कान भी होता है ।
सुनने के 4लए कान होते है । उह सुनने और दे खने के 4लए अंग तो होते
है लेक@न वे अंग काम नह(ं करते। सब Fयवहाoरक lि9ट से वे सांसाoरक
चीजो के 4लए वे मत
ृ है । उनका Vयान 4सफK एक ि2थर जीव पर केिlत
करना चा&हए। ऐसे साधु खुद 1या कर रहे है उससे अXात होते है । जब
उनक@ ईिlया काम करती है तब वे ईिlयो से अ2पqृ य रहते है । उनके
252 चदाकाश गीता

कायK वा2तव म उनके 4लए न9कमK होते है । उनम सज


ृ न-सिृ 9ट के 3वचार
कम और नाि2त1ता xयादा होती है । उनम भूल जाने क@ शि1त xयादा
होती है । उनका Vयान नाoरयल क@ खाल पर नह( होता लेक@न नाoरयल के
गभK म होता है । वे अपना Vयान अlqय पर केिlत करते है लेक@न lqय
पर केl(त नह( करते।

269. बLु J क3 शुJता के बीना आ मसंतोष नह! 'मलता। बLु J शुJ न


हो तो च त िथर नह! होता। च त शुJ न हो तो मनुMय ‚मणाओ से
मु5त नह! हो सकता। बफF को पानी मE रखी जाये तो दोनो एक हो जाते है
उसी तरह आ मा का साkा कार 'सJ करनेवाला €यि5त आ मा मE एक*प
हो जाता है । जीस तरह नद!यां समुB मE 'मल जाती है उसी तरह आ मा मE
वासनाएं 'मल जाती है । आ मा कोई वतु नह! है , कमF एक वतु है ।
जहाज सागर मE होता है । तट पर खडे जहाज को दे खनेवाले €यि5त को
लगता है क3 जहाज सागर के पानी को छूता है लेक3न वातव मE जहाज
सागर के जल से अलग होता है । दोनो के बीच कोई संबंध नह! होता। ईसी
तरह मनुMय को सांसा`रक बातो मE भी खयाल रखना है । उसे सांसा`रक
चीजो मE लगाव नह!ं होना चा@हए। जीस तरह yािzमनो खाना परोसा जाये
उसक3 राह दे खते है उसी तरह मनुMय को मन क3 शुLJ और बंधनो मE से
मुि5त के 'लए राह दे खनी चा@हए।
पMट!करणः बु3t शुt हो जानी चा&हए जीससे क@ हम आमसंतोष
ाwत हो सके। बु3t शुt न हो तो चत ि2थर नह( होता और मनु9य
शाि]दक Œमणा म से मु ्कत नह( हो सकता। मनु9य को पण
ू C
K प से मौन
4सt करने के 4लए चत का शु3tककरण आवqयक है । आमा का
सा$ाकार 4सt करनेवाले योगी आमा म बफK पानी म 3पघलती है उसी
253 चदाकाश गीता

तरह 3पघल जाते है और उसी क@ तरह एक हो जाते है । सब नद(यां सागर


म 4मलती उसी तरह सभी वासनाएं आमा म एकाकार हो जाती है ।
वासनाए आमा से पैदा होती है और आमा म वेश करती है। आमा वह
व2तु नह( है । कमK व2तु है । आमा अlqय है , कमK अlqय नह( है । मनु9य
को सांसाoरक जीवन का लगाव नह( होना चा&हए। जहाज को तट पर से
दे खनेवाले Fयि1त को जहाज सागर के पानी को छूता है ऐसा लगता है
लेक@न वा2तव म वह जहाज पानी को छूता नह( है । उसी तरह क@ जीस
तरह जहाज पानी म रहने पर भी अ4लwत रहता है उसीतरह मनु9य को
जगत म रहने पर भी जगत से अ4लwत रहना चा&हए। OािNमनो खाना
परोसे जाने क@ राह दे खते है उसी तरह मनु9य को मन के शु3tकरण और
बंधनो से मुि1त क@ राह दे खनी चा&हए। हम अVयाम के उEचतम 2तर
को 4सt करने के 4लए ईमानदार( और न9ठा से यास न कर तो हम
ईिEछत ल[य क@ ािwत नह( कर सकते। ईqवर सामने से आकर उनके
परम सुख का आनंद दे ते नह(ं है । हमे 2वयं उनको ढूंढने जाना पडता है
और सा$ाकार करना पडता है ।

270. Yबना फल का पैड कोई दे खना नह! चाहता। मनुMय को मनुMय


5यv कहा जाता है , 5यvक3 उसके पास मन है मतलब क3 Lवचारशि5त है ।
ईस'लए उसे मन कहा जाता है और शांत के साथ एका म5ता ाDत करनी
होती है और ओमकार के साथ एक होना चा@हए। जो मुि5त चाहे उसे ‘म‘
शर!र हूं’ ऐसा Lवचार याग दे ना चा@हए। ऐसे लोग ह! आ मा का
साkा कार 'सJ कर सकते है । जो लोग ‘म‘ शर!र हूं’ ऐसा भाव याग नह!
सकते उनके 'लए आ मा के दशFन करना संभव नह!ं है । जो लोग ‘म‘ और
मेरे’ Lवचारो के साथ जूडे रहते है वे अगर हजारो वषV तक अTयास करे तो
254 चदाकाश गीता

भी शांत का एक अंश भी ाDत नह! कर सकते। नद! मE नान करनेवाला


yािzमन हो या शूB हौ लेक3न नद! मE नान करने से उसका शर!र शJ
ु हो
जाता है उसीतरह सब मनुMय का आंत`रक तर एकसमान होता है । भले
ह! उसका बाzय रं ग*प अलग हो। 'मचI और कल!ंगर दोनो एक ह! खेत मE
उगते है Xफर भी दोनो का वभाव एकदस
ु रे से अलग होता है। अि^न क3
गमI का अनुभव अि^न के पास बैठे €यि5त ह! ाDत कर सकता है लेक3न
पानी मE बैठा €यि5त नह!। शांत ठं डे पानी मE है । भूख लगने से पहले
खाना बनाकर तैयार करना पडता है । उसी तरह गहृ थ बनने से पहले
गहृ थ के आंत`रक और बाहर! वiप एकदम शुJ होने चा@हए। उसे वजह
और प`रणाम दोनो मE पकF करना आना चा@हए।
पMट!करणः क@सी भी Fयि1त ?बना फल का पैड दे खना अEछा नह(
लगता उसी तरह Xान3वह(न मनु9य को कोई सDमान नह( दे ता। कोई
Fयि1त ऐसे लोगो पर Vयान नह( दे ता जो सांसाoरक जीवन के आनंदो म
म}न हो। मनु9य को मनु9य ईस4लए कहा जाता है 1यMक@ उसके पास मन
अथाKत सोचने क@ शि1त है । हमे हमार( 3वचारशि1त का +े9ठ उपयोग
करना चा&हए, जीससे क@ हम शांत ाwत कर सके। हमे ओमकार के साथ
एक होने का यास करना चा&हए। जो मिु 1त चाहता है उसे अपना
शर(रभाव छोड दे ना चा&हए। उसे सोचना चा&हए क@ वह आमा है ।
शर(रभाव का पूण:
K प से नाश करना चा&हए। ऐसे लोग ह( आमा के
सा$ाकार कर सकते है । जो लोग ऐसे सोचते है क@ म{ शर(र हूं उनके 4लए
आमा का दशKन करना कठsन है । जो लोग ‘म{ और मेरा’ का भाव याग
नह( सकते वे हजारो वषv तक अ…यास करे तो भी शांत का एक अंश
ाwत नह( कर सकते है । अगर मनु9य नद( म 2नान करे तो उसका शर(र
255 चदाकाश गीता

शुt हो जाता है भले ह( वह मनु9य OािNमन हो या शुl हो अगर मनु9य


साधना करता रहता है तो वह शूl हो, OािNमन हो या बEचा हो लेक@न वह
ईqवरािwत के 4लए यास करके अVयाम के उEचतम 2तर पर पहूंचता
है । ईqवर का सा$ाकार वह कौनसी जातपात का है उससे ?बलकुल 2वतंG
होता है । उसका आधार वह क@तनी हद तक और कौनसे 2व:प भु को
चाहता है उसके पर होता है । मनु9य का बाहर( 2वCप शायद अलग हो
सकता है लेक@न अंदCनी 2वCप तो एकसमान ह( होता है । आमा, बु3t,
चत, मन और दस
ू रे गुण मनु9यो म एकसमान होता है लेक@न ईन गुणो
का बाहर( 2वCप अलग हो सकता है । बाहर( फoरक क@ वजह ईन गुणो को
वासना वासनामय होने क@ वजह से पैदा होता है । आमा, बु3t, मन और
चत शुt हो तो वे सब मनु9य म एकसमान होते है । 4मच‰, खरबूजा एक
ह( भू4म पर पैदा होते है Iफर भी दोनो का 2वभाव पर2पर से अलग होते
है उसी तरह गु: के असं˜य 4श9यो हो लेक@न एक 4श9य दस
ू रे 4श9य से
गुण और कार से अलग होता है । चाहे सभी 4श9योम गुणो का आरोपण
एक ह( गु: करे तो भी उनके 2वभाव अलग होते है । ईस4लए ह( एक
4श9य आVयाम के उEच 2तर पर पहुंच जाते है जब दस
ू रा उससे ?बलकुल
उलटे कार का होता है । ईस फकK क@ वजह उनके अंद:नी 2वभाव क@
वजह से होता है । अि}न क@ गम‰ अि}न के पास म बैठते है तब पता
चलती है । महामा क@ महानता जो लोग महामा को 3य है और नज&दक
हो उनके ~वारा ह( अनुभव क@ जाती है । उनक@ अनुभूत ऐसे लोगो को
नह(ं होती जो उनसे जुडे हुए नह(ं है या तो 3व:t म है । शांत वह पानी
जैसी शीतलता दे ती है । शांत से मन पानी क@ तरह शांत होता है । पानी
िजस तरह गमK चीजो को शीतल करता है उसी तरह शांत भी मन को ठं डा
256 चदाकाश गीता

करता है । मनु9य को शर(र का याग करने से पहले ये जान लेना


आवqयक है क@ मै कोन हुं? हम शर(र से अ2व2थ होते है तब आमा के
सा$ाकार के 4लए यास करना चा&हए। जब वtृ और नबKल होते है तब
कुछ नह( हो सकता। हम गहृ 2थ होते है उससे पहले गहृ 2थ का फझK
समजना चा&हए। अगर गहृ 2थी का धमK पता न हो तो वह मनु9य सह(
मागK ाwत नह( कर सकता। गहृ 2थ का बाहर( और आंतoरक 2वCप 2वEछ
होना चा&हए। वह वजह और पoरणाम का फकK मालूम कर सके ऐसा होना
चा&हए। उसमे 1या सह( है और गलत 1या है वह जानने का 3ववेक होना
चा&हए। 3ववेकबु3t गहृ 2थ म xयादा से xयादा और उEचतम 2तर क@
होनी चा&हए।

271. मनुMय अ)व के पीछे क3तने भी समय तक नरथFक दोडता रहे ,


उसे घुडसवार! सकरने दो। ईसी तरह सांसा`रक मनुMय को अपने मन को
ईि:Bयो के Lवषय से मु5त रखना चा@हए। जीस तरह पानी पैड के प तो
पर से Xफसल जाता है उसी तरह मनुMय को “मै कताF हूं’ उस भाव का
याग करना चा@हए। गहृ थ मं@दर मE ब'ल के पशु समान होना चा@हए।
सब कुछ yzम को अपFण करना चा@हए Xफर भी ऐसा नह!ं कहा जा सकता
क3 मनुMय सब कुछ yzम को अपFण करे तो वह ई)वर से नज@दक है और
अगर वह ऐसा न करे तो वह ई)वर से दरू है । हम अगर हजारो लोगो के
सामने रोशनी के 'लए द!पक रखते है तो वह सब तक पहुंच जाता है । जहां
रोशनी है वहां अंधकार नह!ं है । उसे कोई भी ले सकता है । ईस'लए दोनो मE
से कोई एक ह! हो सकता है मतलब या तो रोशनी होती है या तो अंधकार
होता है । दोनो एक साथ नह!ं हो सकते। हमारा वभाव सूयF के समान होना
चा@हए। हमारा मन (च त) चंB के समान शीतल होना चा@हए।
257 चदाकाश गीता

पMट!करणः मनु9य अपनी ईिlयो को संतु9ट करने के 4लए xयादा


से xयादा यास करे गा लेक@न उसे संतुि9ट दे ना असंभव है । ईिlयो के
3वषयो के 4लए ईEछा उसे संतुि9ट दे ने के 4लए बढती ह( जाती है । ईसका
एक ह( ईलाज आमचंतन करके ईिlयो को अंकु4शत करना है । ईिlयो
के पीछे दौडते रहना नरथKक है । हम जीस तरह अqव के पैरो को बांधकर
उसके उपर सवार होते है उसी तरह ईिlयो के उपर भी सवार हो जाना
चा&हए। ताडी के पैड के पतो म से बनाये गये छाते पर से पानी Iफसल
जाता है उसी तरह मनु9य को कताKभाव का याग करना चा&हए अथाKत
“यह मैने Iकया” वह भाव याग दे ना चा&हए। मनु9य को हमेशां सोचना
चा&हए क@ करनेवाला कताK ईqवर है । वह 4सफK उनके हाथो का एक साधन
ह( है । एक गहृ 2थ को मं&दर के ब4ल के 4लए पशु समान बनना होगा।
मं&दर को पेश Iकया गया पशु अपने अि2तव के 4लए पूण:
K प से ईqवर पर
ह( नभKर होता है , उसी तरह मनु9य को अपने अि2तव के 4लए ईqवर पर
आधार रखना चा&हए। सब कुछ ONम को अपKण करना चा&हए साथ ह( हमे
ये भी याद रखना है क@ सब कुछ ONम को अपKण न करनेवाला Fयि1त
ईqवर से नज&दक होता है और सब कुछ ONम को अपKण न करनेवाला
Fयि1त ईqवर से दरू हो ऐसा नह( होता है । कुछ लोग खुद के 2वभाव से
ह( खुद को और अपने यासो के फल को ई2वर को अपKण करते है । हम
यह नह( कह सकते क@ ऐसे लोगोने आqवर का सा$ाकार Iकया हुआ है ।
ईqवर एक सकारामक अि2तव है और उसके परमसुख का अनभ ु व
2वयन से करना होता है । जो Fयि1त ईqवरािwत के 4लए न9ठा और
उसाह से यास करते है वे अवqय ईqवरसा$ाकार कर सकते है । ईqवर
पूण:
K प से तट2थ है और मनु9यो को उनके यासो के अनुसार फल दे ता
258 चदाकाश गीता

है । ईqवर एक ऐसा द(पक के समान है जो हजारो मनु9यो के सामने रखे


गये है । द(पक का काश सभी Fयि1तओ को एकसमान :प से 4मलता है ।
वह कोई जात-पात का फकK नह( करता। कोई भी Fयि1त रोशनी का फायदा
उठा सकता है । जहां Xान है वहां अXान नह(ं है । जहां अXान है वहां Xान
नह(ं है । जहां रोशनी है वहां अंधकार नह( हो सकता और अंधकार जहां
होता है वहां रोशनी नह( हो सकती। ईqवर सा$ाकार के 4लए ईEछा
रखनेवाला Fयि1त जगत क@ Iफ‡ नह(ं करता उसी तरह सांसाoरक जीवन
के 4लए दौडनेवाला मनु9य आम-सा$ाकार क@ ईEछा नह( रखता। दोनो
3वरोधाभास रखनेवाल( चीजे एक 2थान और एक ह( समय पर साथ नह(
रह सकती। हमारा 2वभाव सूयK के जैसा होना चा&हए अथाKत Fयि1त का
2वभाव सूयK क@ Iकरनो क@ तरह सारे ONमांड पर का4शत हो ऐसा होना
चा&हए। Fयि1त के 2वभाव को “अपनी” अथाKत “आमा” क@ सभी हद पार
करनी चा&हए। जीस तरह सूय
K काश करता है । हमारा चत चंl के समान
शीतल होना चा&हए अथाKत चत हरदम पूण:
K प से शांतमय होना चा&हए।
पूणK शांत क@ 4स3t जम का ल[य और ईत+ी (अंत) है ।

272. बैराग कपडे को जलाने जैसा होना चा@हए। जब बैराग \यादा


Lवक'सत हो तब आ मवैभव @दखेगा। शर!र अचल न हो लेक3न मन अचल
होना चा@हए। जीन लोगो के मन शुJ नह! हुए है उनमे समBिMट नह!
होती। जीन लोगो मE अTयास नह! होता उनके 'लए स वगण
ु ाDत करना
बहुत ह! क@ठन होता है । सूoम बLु J का Lवकास अTयास से होता है । जब
तक अTयास न Xकया जाये तब तक सांसा`रक जीवन के 'लए ईnछा नMट
नह! होती। थावर संपत, धन, jी, सुवणF के पीछे दौडना वह छोडना
बहुत ह! मुि)कल है । मनुMय को 5या 'सJ करना है ? जब मनुMय का
259 चदाकाश गीता

च त स व, रजस और तमस से मु5त हो जाता है उसे पi


ु षाथF कहा जाता
है । जीस तरह गंदा वj साबन के पानी से धोने से शJ
ु हो जाता है उसी
तरह च त को बLु Jवiप साबन
ु के पानी से धोकर शJ
ु कर दे ना चा@हए
और उसे “आकाश” जीतना शुJ कर दे ना चा@हए। जब सीलाई के मशीन पर
सीवणकायF को शीखते है तब शi
ु मE Zयान हाथ पर रहना चा@हए, पांव पर
नह!ं। उसी तरह हम जब बLु J पर Zयान केि:Bत करते है तब मन को
Rदयाकाश मE एकाकार कर दे ना चा@हए और तभी हम चरं तन शांत 'सJ
कर सकते है , जीसे “न यनंद” कहा जाता है ।
पMट!करणः बैराग हरदम बढते रहना चा&हए और कभी घटने क@ ओर
उसका झुकाव नह(ं होना चा&हए। वह कपडे के जलाने जैसा है । बैराग जैसे
बढता है उसी तरह आमवैभव क@ रोशनी का अनुभव होता है । मनु9य का
मन ि2थर होना चा&हए, शर(र नह(ं। शर(र ईqवरसा$ाकार क@ I‡या म
गौण है । समाध (समlि9ट) 4सt करने के 4लए मन शुt होना चा&हए।
मन क@ शु3t बगैर समाध 4सt नह( होती। सव गुण का 3वकास हमारे
अंदर करने के 4लए अ…यास आवqयक है । हम अ…यास न करे तो
सांसाoरक जीवन क@ ईEछाएं न9ट नह( होती। 2थावर संपत, 2Gी, सुवणK के
पीछे दौडना बंध करना बहुत ह( क&ठन है वह अ…यास से ह( हो सकता है ।
मनु9य को जीवन म 1या 4सt करना है । मनु9य को उसका चत तीन
घटक – सव, रजस, तमस से शुt करना है । चतशु3t अथाKत ह(
पु:षाथK। चत क@ शु3t बु3t के साबन
ु -जल से करनी है । चत आकाश
जैसा शुt होना चा&हए। यह मनु9य का परम प3वG फजK है । यह ऐसी बात
है जैसे क@ नौशीखीये दरजी जब सीलाई सीखते है तब सीलाईमशीन पर
काम करते व1त वह अपने हाथ पर Vयान केिlत करता है , पांव पर
260 चदाकाश गीता

नह(ं। उसी तरह हमे हमारा ल[य बु3t पर केिlत करना चा&हए और मन
को „दयाकाश म एकाकार कर दे ना चा&हए। यह जब 4सt होता है तब हम
शाqवत शांत ाwत कर सकते है , जीसे “नयानंद” कहते है ।

273. जीन लोगो के मन शुJ है वे ई)वर को क3सी भी नाम से पक


ु ार
सकते है । कृत रे लवे के ड"बे जैसी है । उसके अंदर बैठे हुए लोग 8ान
जैसे है । “चrो” रे लवे टे शन जैसे है । ईन चrो मE सूoम बLु J है । “सूoम”
वह ¡युब (नल!) मE है । ईस सo
ू म नल! मE कंु ड'लनी शि5त है । कंु ड'लनी
ओमकार वiप मE है ओर वह सूoम न'लकाओ मE है । ईस बात का पता
सूoम क3 अनुभूत से ह! चलता है ।
पMट!करणः शुt मनवाले मनु9य ईqवर को क@सी भी नाम से पुकार
सकते है । नाम नह( लेक@न भ1त का ईqवर के 4लए भाव महवपूणK है ।
रे लवे के ƒड]बे और उसके साथ जुडी हुई चीजो का उदाहरण यहां शर(र के
3व3वध आVयािमक 4सtांतो को समजाने के 4लए Iकया गया है । कृत
क@ तुलना रे लवे के ƒड]बे के साथ क@ गई है । जो लोग उस ƒड]बे मे सफर
करते है उसे ‘Xान’ कहा जाता है । रे लवे 2टे शन मतलब शर(र के 3व3वध
च‡ो है । कंु ड4लनी सह2Gार तक पहुंचे तब तक उसे ईन च‡2व:प रे लवे
2टे शनो पार करने है । कंु ड4लनी क@ सू[मशि1त जो क@ ओमकार 2व:प है
उसक@ रे लवे एिजन क@ नल(ओ म रह( भांप के साथ तुलना क@ गई है ।
एिजन क@ ©यु]स अथाKत शर(र क@ नाƒडयां। ईन नाडीयो म कंु ड4लनी
शि1त सफर करके उपर क@ &दशा म &दमाग म रहने के 4लए सह2Gार क@
ओर गत करती है । मनु9य का सबसे महवपण
ू K ाथ4मक अ|ता रखता
फझK अनुभव से कंु ड4लनी शि1त को 4सt करना है ।
261 चदाकाश गीता

274. कुछ लोग करोडो *पयो के वामी है । सब लोग एक ह! समय


पर करोडपत हो ऐसा नह! हो सकता। वह उनके अतीत के कमV का फल
होता है । हर एक €यि5त को उसके अधकार से 'मल जाता है । सागर मE
ढे र सारा पानी होता है लेक3न €यि5त को जीतना जल ाDत होता है वह
€यि5त अपने साथ मE जीतने आकार का बरतन ले जाता है उसके मुताYबक
ह! होता है । कमFफल का आधार €यि5त के कमF क3 वासना पर नभFर है ।
पव
ू ज
F :म क3 वासनाओ क3 वजह से €यि5त संतो के वचन सुनने दौडता
है । ईन वासनाओ क3 वजह से मनुMय को सांसा`रक जीवन मE आनंद ाDत
नह!ं करता है । जो लोग पव
ू ज
F :म क3 वासनाओ से े`रत होते है उ:हE नई
अलग वासनाओ क3 आव)यकता नह! होती है । मनुMय का बैराग भी उनक3
पव
ू ज
F :म क3 वासनाओ का प`रणाम है । ऐसे लोगो के 'लए अब मुि5त के
'लए यास करने का समय है ।
पMट!करणः जैसै सभी लोग ईqवर का स$ाकार एक ह( समय पर
नह( कर सकते उसी तरह सभी लोग एक ह( समय पर करोडपत नह( बन
सकते। ईस जगत म सब लोग ईqवरसा$ाकार आज या कल 4सt करगे।
फकK 4सफK समय का होता है । हम ईqवर का सा$ाकार हो सके उसका
आधार पूवज
K म के कमv पर है । ईqवर हमारे कमv के अनुसार फल दे ते है ।
ईqवर पूण:
K प से न9प$ है । सागर म ढे र सारा पानी है लेक@न हम हमारे
पाG के आकार अनुसार उस म से पानी ले सकते है । ईqवर महान और
दयालु है । उनक@ महानता और दयाभावना का अनुभव हम हमार( शि1त के
अनुसार कर सकते है । ईqवर काल, कारण और 2थान से परे है । वे
समयमयाKदा से परे है लेक@न मनु9य का शर(र ईन सभी बातो पर नभKर
होता है । हम ईqवर का सा$ाकार हमार( ‘ताकत’ (शि1त) के अनुसार कर
262 चदाकाश गीता

सकते है । ईqवर के 4लए भाव मनु9य के पूवक


K मK क@ वजह से होता है और
पूवज
K म के कमv क@ वजह से मनु9य को संतो के वचन सुनने क@ ईEछा
होती है । ऐसे संतो के वचन और ससंग क@ वजह से Fयि1त को
सांसाoरक जीवन म कुछ भी आनंद ाwत नह( होता है । बैराग अतीत के
कमv का फल है । जो लोग पव
ू ज
K म के कमv क@ वजह से ेoरत होते है
उह अपनेआप ह( बैराग तीत होता है । ऐसे लोगो के 4लए अलग बैराग
क@ जCरत नह(ं है । ईन लोगो के 4लए मुि1त मागK पर आगे बढने का
समय हो गया है ।

275. 8ान और मिु 5त क3 'सLJ के 'लए आयु कोई समया नह! है ।


ईसी पल मE ह! 8ान और मुि5त के 'लए यास करने का समय है । मनुMय
को भूख लगे तभी खाने का समय होता है । जीन लोगो को भख
ू न लगी हो
उन लोगो को भूख न लगे तब तक Œतजार करना चा@हए। मनुMय को
भि5त के 'लए तीœ भूख होनी चा@हए। अि^न क3 गमI जीतनी \यादा
उतना पानी \यादा उबलता है । &Jा गमI है और शांत @दमाग मE
रहनेवाल! बफF है । ईसी वजह से आंतरमन भर जाता है और वह प`रतिृ Dत
बाहर @दखती है । ऐसा मनुMय सभी बातो मE संतुMट होते है और उनका मन
शुJ होता है । दानधमF क3 तरह मनुMय के मन क3 शांत के 'लए एक भी
पैसा खचF नह! करना पडता है , जीसका मन शांत है उसक3 शांत का भाव
उसके आसपास के लोगो पर भी पडता है । एक €यि5त शांत हो उतना ह!
पयाFDत है । हजारो मE एक €यि5त को मन मE शांत होती है और उसक3
शांत का अंश उनके आसपास के हजारो लोगो को 'मलता है । संत जब भी
सांसा`रक लोगो क3 टोल! मे जाता है तब उसके पास 'शकार! शेर के पास
जाता है ऐसी शांत होती है ऐसी शांत होनी चा@हए। साधु को दु नया मE
263 चदाकाश गीता

रहना हो तो उसके पास अगाध शांत और धैयF होना चा@हए। शांत हजारो
सांसा`रक लोगो के साथ रहने के 'लए आव)यक है ।
पMट!करणः मनु9य को Xान और भि1त के 4लए आज और आज ह(
यास करना चा&हए। हमे मृ यु कब आयेगी उसका पता नह( है । Xान और
भि1त ाwत करके हमे मृ यु के समुख रहना चा&हए। Xान ाwत करने के
4लए कोई वt
ृ या युवा नह( होता। Xान कोई भी समय और 2थान को
ल$ म रखे बगैर ाwत Iकया जा सकता है । जब हमार( Xान3पपासा
जाग:क हो तब वह समय मुि1त 4सt करने का है । जब हमे बूख लगती
है तब वह( समय भोजन |हण करने के 4लए है । जीन लोगो को Xान के
4लए भूख नह( है उह मुि1त के 4लए “तजार करना पडेगा। तब तक क@
जब तक उह मुि1त के 4लए भूख जगे। ईसी तरह जीह भूख लगती नह(
है उह भोजन के 4लए राह दे खनी चा&हए। हम सब म भि1त के 4लए तीœ
ईEछा होनी चा&हए। +tा जीतनी बलवान उतनी भि1त lढ और xयादा
होती है । अि}न जीतना xयादा उतना ह( पानी xयादा उबलता है । +tा गम‰
है और 3वqवास उबलता पानी है । शांत वह &दमाग म बफK जैसी होती है ।
शांत हम हर कार क@ संतुि9ट दान करती है और बफK क@ तरह हमारे
&दमाग को ठं डा रखती है । शांत से पूणK संतोष ाwत होता है और मन को
बफK क@ तरह ठं डा करती है । शांत थम आमसंतोष दान करती है और
वह बाNय Cप से कट होता है । जीसने पूण:
K प से शांत ाwत क@ है वह
पूण:
K प से संतु9ट होता है और उसका मन शुt हो जाता है । ईस जगत म
शांत से xयादा कुछ नह(ं है । जीसने शांत ाwत क@ है वह ईEछाओ से परे
होता है । मन क@ शांत के 4लए एक :पया भी खचK नह( करना पडता।
दानधमK के 4लए मनु9य को खचK करना पडता है , जो क@ आवqयक है । वह
264 चदाकाश गीता

शांत के 4लए तीœ ईEछा रखनेवाला मन। जब मनु9य खुद शांत से भरपुर
हो तब उसके आसपास के लोग भी शांत का अनभ
ु व करते है । शांत क@
लहरे चुंबक@य लहे रो क@ तरह सभी &दशाओं म शांत फैलाते है । एक ह(
Fयि1त शांत से भरा हो वह पयाKwत है । उस Fयि1त के आसपास के हजारो
लोग शांत का अनभ
ु व करते है। हजारो लोगो क@ भीड म वेश करनेवाले
साधु म ऐसी शांत होती होती है जैसे क@ शेर के पास जानेवाले 4शकार( म
होती है । सांसाoरक लोग Xानी को उनके दःु खो क@ बाते कहकर दःु ख क@
अनुभूत कराते है लेक@न संत को सांसाoरक बातो से ?बलकुल 3वपoरत ऐसे
लोगो के साथ रहने के 4लए धीरज ाwत करनी पडती है । संतने जीसका
याग Iकया है वह भुगतना पडता है । खास तौर पर अXानीओ के जीवन
क@ बात। एक साधु को ईस जगत म जीने के 4लए बहुत ह( शांत और
धैयK क@ आवqयकता होती है । सांसाoरक लोगो म रहनेवाले साधु के 4लए
शांत और धैयK बहुत ह( उपयोगी है ।

276. मेले मE LवLवध कार क3 चीजE लाई जाती है उसी तरह शांत
का अनुभव LवLवध कार से करना चा@हए। हम हजारो लोगो क3 भीड मE
होते है तब हमे Bढ नधाFर रखना चा@हए। जब हम गलत तर!के से सोचे
क3 हम हजारो लोगो के बीच मE है तब (Jैत) JंJ का भाव हमारे अंदर पैदा
होता है । जीस तरह एरोDलेन धरती क3 मदद के Yबना उडता है उसी तरह
हमे शर!र क3 मदद के Yबना कायF करना सीखना चा@हए। हमार! Bढ
मा:यता का बीज – म‘ यह शर!र नह! ऐसा हमारे Rदय मE थआLपत कर
दे ना चा@हए। थका हुआ मुसाXफर सूरज के धूप मE \यादा समय रहने के
बाद आ&य पाने के 'लए पहाड क3 ओर जाता है और पैड के नीचे आराम
करता है तब वह थकान भूल जाता है उसी तरह जीनके मन ई)वर क3
265 चदाकाश गीता

शोध मE ल!न होते है वै सांसा`रक जीवन क3 चंताओ को भूल जाते है ,


जीसर तरह सूयF क3 गमI पैड क3 छाया मE दरू होती है उसी तरह “मेरेपन”
का भाव ई)वर मE समाने से दरू हो जाता है जब हम घर मE होते है तब हमे
छाते क3 ज*रत नह! होती उसी तरह ई)वरवiप महल मE वेश करने के
बाद मनुMय के घर मE 'मलनेवाले आनंद क3 आव)यकता नह! रहती है । जब
मनुMय घर मE हो और घर के दरवाजे बंध हो तो उसे 'सफF घर क3 चीजE ह!
@दखती है । घर के दरवाजे खोलकर उसे बाहर आने दो और तभी बाहर 5या
चल रहा है वह उसे @दखाई दे गा। ईसी तरह हमे ईि:Bयो के पांच दरवाजे
कब खोलने चा@हए और कब बंध करने चा@हए वह जान लेना चा@हे ए। जब
गोदाम के दरवाजे बंध हो तब खर!दने-बेचने क3 वृ त नह! हो सकती। जब
ईि:Bयो के दरवाजे बंध Xकये हो तब बाहर! जगत और “म‘” (मेरेपन) का
भेद अB)य हो जाता है । हमे ईि:Bयो के बारे मE सभान रहना चा@हए। अ)व
को जीस तरह लगाम से अंकु'शत Xकया जाता है उसी तरह ईि:Bयो को
LववेकबLु J से अंकु'शत करनी चा@हए। हमारा Zयान द!वाल मE लगी क3ल
क3 तरह केि:Bत होना चा@हए। बLु J को मितMक मE केि:Bत करनी
चा@हए। हमारा Zयान हरदम गले पर रहना चा@हए, गले के नीचे नह!ं।
पMट!करणः हमे जगत क@ 3व3वध चीजो करने के 4लए शांत और
धैयK होना चा&हए। हम शांत 3व3वध कार से ाwत कर सकते है । मेले म
3व3वध कार क@ चीज होती है उसी तरह शांत ाwत कर सके उसके 4लए
अनेक मागK होते है । हमारा नqचय lढ और &हंमत अतीम होनी चा&हए।
जीससे हम हजारो लोगो क@ भीड म आसानी से घम
ू सकते है । हमारे अंदर
नैतक &हंमत ईतनी होनी चा&हे ए क@ वासनाओ के जंगल म हम सफल
तर(के से अ2पqृ य रह सके। जब हम हजारो मनु9यो क@ भीड म होने का
266 चदाकाश गीता

गलत 3वचार करते है तो 3वचार हमारे अंदर वेश कर जाता है। हम अगर
ऐसे मान ले क@ हम भीड से अलग है तो हम और भीड अलग है वनाK भीड
और हम एक हो जाते है । हमे लगता है क@ हम और भीड दोनो ईqवर का
ह( एक &ह2सा है तो tैत का 3वचार हमे आता नह( है उसी तरह हमे
लगता है क@ 3व3वध ईEछाएं और वासनाएं और आमा परमामा म से
उपन होते है तो ईEछाओ और वासनाओ का भय नह(ं रहे गा। ऐसा हो तो
ईEछाएं और वासनाएं अपना सांसाoरक मागK बदलकर ईqवरसा$ाकार के
मागK म सहायक होगा। ईqवरने हम ईEछाएं ईस4लए द( है हम उनक@
ईEछा कर और सांसाoरक जीवन म फंसे नह(ं। हमे शर(र से 2वतंG होने का
यास करना चा&हए और 2वतंG होना चा&हए। जीस तरह एरोwलेन पŠृ वी से
अलग रहता है । शर(र का अि2तव हमे भूल जाना चा&हए। शर(र परछांई
जैसा होना चा&हए। मायता का बीज क@ म{ शर(र नह(ं हूं वह हमारे „दय
म lढ हो जाना चा&हए। जीस मनु9य का मन ईqवर म ल(न है वह सभी
चंताओ को भूल जाता है उसी तरह एक मुसाIफर धूप म xयादा चलने के
बाद पहाड क@ गोद म पैडो क@ छाया म सार( थकान भूल जाता है । जब
मनु9य का मन पूण:
K प से ईqवर म समा जाता है तब मेरेपन का भाव
न9ट होता है ऐसे क@ जीस तरह सूरज क@ गम‰ पैड क@ छाया म बैठते है
तब भूल जाते है । जब हम घर म होते है तब छाते क@ आवqयकता नह(
होती। जब हम घर से बाहर नीकलते है तभी छाते क@ जCरत होती है । जब
हम ईqवर के महल म होते है तब सांसाoरक जीवन म आनंद क@
आवqय1ता नह( होती। ईqवर का परमसुख सांसाoरक जीवन के आनंद से
भी कह(ं xयादा अEछा है । सांसाoरक जीवन का आनंद हमारे 4लए ईस4लए
जCर( है क@ जीससे ईqवर का परमसुख जो अनंत तौर पर xयादा अEछा है
267 चदाकाश गीता

वह ाwत हो सकता है । हम ईqवर का दशKन ईस4लए नह(ं कर सकते है क@


हम सांसाoरक जीवन क@ बातो म हमारा Vयान 3वकेिlत करते है । हमार(
ईिlयो के दरवाजे बंध करगे तो आमा के दशKन कर पाते है । हमे ईिlयो
के दरवाजे बंध करना और खौलने का काम हमार( ईEछा और आनंद के
&हसाब से सीखना चा&हए। हमारा ईिlयो पर पूण:
K प से अंकुश होना
चा&हए। जब गोदाम के दरवाजे पर ताला लगा हो तब खर(दने-बेचने क@
वृ त :क जाती है उसी तरह ईिlयो के दरवाजे बंध हो तब सभी वृ त
:क जाती है और फकK शाqवत जगत और म{ के बीच से अlqय हो जाता
है । हम हमार( ईिlयो के बारे म सतकK रहना चा&हए। अqव को जीस तरह
लगाम से अंकु4शत Iकया जाता है उसी तरह हमार( ईिlयो को 3ववेक क@
लगाम से नयं?Gत करनी चा&हए। द(वार पे लगी हुई Iकल क@ तरह हमारा
Vयान ईिlयो पे lढता से केिlत होना चा&हए। बु3t मि2त9क म केिlत
रहनी चा&हए। हमारा Vयान हरदम गले से उपर होना चा&हए। मि2त9क
मनुष ् के शर(र का महवपूणK &ह2सा है । वह बु3t, मन और सह2G
पतीओवाले कमल-मि2त9क (सह2Gार) म होता है वह( उसका 2थान है ।
हमारा Vयान हरदम मि2त9क पर रहना चा&हए।

277. जीस तरह सुवणF बारबार अि^न मE पीघलकर शुJ होता है उसी
तरह Lववेक का बारबार अTयास से सूoमबLु J का'शत होती है। हमे हमारे
अंदर रहे जगत को दे खना चा@हए। हमार! बLु J ह! हमारे मोk का साधन
है । जीसे “धारणा” कहा जाता है और वह ओर कुछ नह!ं लेक3न Lवषय क3
पMट समज है । ईस समज से हम आ मा के \यादा पास आते है । हमे
प
ु तक से अनुभव नह! 'मलता। थम अनुभव और बाद मE उस अनुभव के
आधार पर XकताबE 'लखी जाती है । पैड बीज मE है । बीज पैड मE नह!ं है।
268 चदाकाश गीता

मनुMय जगत मE नह!ं है लेक3न जगत मनुMय मE है । जगत मनुMय के


अधीन है । हमारे मन मE हम जो सोचते है वह श"दो मE अ'भ€य5त करते
है । Rदय दं भर@हत होना चा@हए। Rदय पण
ू i
F प से शुJ रहना चा@हए। Rदय
जो सोचता है वह! िजzवा को बोलना चा@हए। मनुMय जो सोचता है वह!
उसे बोलना चा@हए। क3सी के साथ धोखा नह!ं करना चा@हए। क3सी का
तरकार नह!ं करना चा@हए। लोगो के साथ \यादा 'मलना नह! चा@हए।
हमारा मन एकके:B! होना चा@हए। जब हमारा Rदय धोखेबाज हो तो वह
गमI दोपहर क3 धूप जैसी है । 'सतारा बादल मE बाहर नीकलता है और
भ€यता से का'शत होता है । थोडी पलो मE बादल से ढक जाता है ऐला ह!
मनुMय के मन का है । कभी वह एकदम शुJ होता है तो पांच 'मनट मE
वासनाओ से घर जाता है । गLवFMठ द!माग आ मा मE Lपघल जाता है जीस
तरह 'सतारा आकाश से गरता है । आकाश भौतक आंखो से @दखता नह!
है । आकाश वह है जो @द€य चkु से @दखाई दे ता है । Lववेक से Lववेक का
अनुभव हो सकता है । नाद-नाद Sवारा पहचाना जाता है । मन क3 समज
मन ह! ाDत कर सकता है ।
पMट!करणः सू[म 3ववेक-मनु9य म रहती सुषुwत शि1त क@ जीसे
कंु ड4लनी कहा जाता है वह 3ववेक के बारबार अ…यास से का4शत होती है ।
सुवणK को बारबार अि}न म 3पघलता है तो शुt होता है । उसी तरह 3ववेक
के बारबार अ…यास से हम हमार( सू[म शि1तओ को का4शत कर सकते
है , जीसे 2वंय का4शत कंु ड4लनी कहते है । 3ववेक मतलब सEचे-जूŽे को
अलग करने क@ शि1त। आमा के सा$ाकार के 4लए ारं 4भक महवपूणK
है । हमे हमारे अंदर ऐसी परम शि1त का 3वकास करना है जो ONमांड को
नयं?Gत करती है , जीसे ईqवर(य शि1त कहा जाता है । हमे हमारे अंदर
269 चदाकाश गीता

समाए 3वqव को दे खना है । हमे आमा का सा$ाकार से ONमांड को


नयं?Gत करनेवाल( परम शि1त का अनुभव करना है । मो$ 4स3t के 4लए
बु3t ह( एक मागK है । बु3t ह( 4सफK मागK &दखानेवाला मागKदशKक है । हमे
यह रा2ता हमारे यासो से काटना है । जीसे धारणा कहा जाता है वह ओर
कुछ नह(ं लेक@न 3वषय क@ 2प9ट समज है । हमारा ल[य हम 2प9ट तौर
पर समज सक तो आमा के नज&दक आ सकते है । धारणा वह आमा का
Xान ाwत करने के 4लए साधन है । आमा भौतक आंखो से &दखाई नह(
पडता। ईस4लए आमा कैसा हो सकता है वह समज सकते है । धारणा से
हम आमा के नज&दक आ सकते है । पैड बीज म होता है । बीज पैड म
नह( होता। उसी तरह Iकताब अनुभव से पैदा होती है , अनभ
ु व Iकताबो से
नह( 4मलता। थम अनभ
ु व करना चा&हए और बाद म उसम से Iकताब
4लखनी चा&हए। मनु9य जगत म नह(ं है लेक@न जगत मनु9य म है । सू[म
शि1त जो मनु9य म है वह जगत म है अथाKत ईqवर मनु9य म है । मनु9य
उस ईqवर का सू[मातसू[म अंश है । मनु9य सिृ 9ट म सबसे xयादा
महवपूणK ाणी है । मनु9य म रहनेवाल( सू[म शि1त उस ईqवर क@ अlqय
शि1त है जो उसम समाई हुई है । ईस सू[म शि1त से सिृ 9ट भा3वत होती
है । ईसी4लए ह( जगत मनु9य म है । मनु9य जगत म नह(ं है । मनु9य जो
2व को अंकु4शत कर सकता है तो जगत को नयं?Gत कर सकता है ।
मनु9य का मन एककेl( न होने से मनु9य माया के अधीन रहता है ।
मनु9य अपने मन को पूण:
K प से नयं?Gत करे तो वह अपने ONमांड को
नयं?Gत करनेवाल( शIकत का 3वकास कर सकता है । मनु9य का „दय
पूण:
K प से शुt होना चा&हए। „दय सोचता है वह( िजNवा को बोलना
चा&हए। मनु9य खुद जो सोचे वह( उसे सोचना चा&हए। „दय दं भर&हत होना
270 चदाकाश गीता

चा&हए। मनु9य को दं भर&हत रखना चा&हए। हमे क@सी को धोखा नह(ं दे ना


चा&हए और हमे क@सी का तर2कार नह( करना चा&हए। हमे लोगो से
xयादा 4मलनाजुलना नह( चा&हए। हमारा मन एककेl( होना चा&हए और
नरं तर ईqवर का चंतन करना चा&हए। हमारा चहे रा हम जो सोचते है
उसका त?बंब है । हमारा „दय धोखेबाज हो तो हमारा चहेरा बार(श क@
मोसम म सूरज या चंl जैसा होता है बादलो से घरा हुआ। ईस ि2थत म
Fयि1त के चहे रे पर नैसगKक नदvषता और तेज नह(ं होते। चहे रे पर का
दःु ख जो सामाय तौर पर बाहर से दे खनेवाले Fयि1त को &दखाई दे ता है ।
जब हमारा „दय शुt हो तब दोपहर के सूरज क@ तरह का4शत होता है
और चहे रा चारM ओर रोशनी दे ता हुआ झगमगाता है । हर एक मनु9य के
जीवन म थोडे पल ऐसे होते है जब उसका „दय पूण: K प से शुt होता है ।
बादल म से नीकला 4सतारा जीस तरह उसके भFय तेज से का4शत होता
है उसी तरह हमारा „दय सामाय समय म उसक@ मूलतः ऐतहा4सक
भFयता से का4शत होता है लेक@न थोडे पलो म „दय वा3पस वासनाओ से
भर जाता है । आकाश म से गरा हुआ 4सतारा क@सी भी आकाश म खो
जाता है उसी तरह हमारे मन को पूण:
K प से आमा म एकाकार करना है ।
जीसे आकाश कहा जाता है वह भौतक lि9ट से &दखता नह( है । चदाकाश
(चेतना का आकाश) मि2त9क म रहनेवाले &दFय च$ुओ से &दखाई दे ता है ।
3ववेक से ह( हम 3ववेक क@ अनुभूत कर सकते है । आवाझ क@ पहचान
आवाझ से होती है और मन क@ गत3वधयां मन को समझ आती है । उसी
तरह ईqवर का सा$ाकार उनक@ कृपा हो तभी हो सकता है । मनु9य के
यास उनके सा$ाकार के 4लए बहुत ह( कम है ।
271 चदाकाश गीता

278. जीवा मा मE है वह परमा मा है । परमा मा आ मा के गण


ु ो का
साkी है । जब जीव को अनुभूत होती है क3 वह परमा मा से अलग नह! है
तब उसे न या मा कहा जाता है । न या मा मतलब शा)वत चैत:य। जब
कोमल आम पैड पर हो तब वह पैड के साथ एक हो जाता है । उसी तरह
जीवन और परमा मा एक है जब सत (अित व), चत (सभानता-चेतना)
और आनंद (सुख) तीनो एक हो और तीनो गण
ु जब सत-चत-आनंद
एक*प हो जाये तभी हम उसे योग (जुड जाना) कहते है ।
पMट!करणः जीवामा और परमामा एक ह( है । परमामा जो क@
मनु9य के शर(र म Fयाwत है वह जीवामा है । परमामा सब से उपर है
परमामा कताK नह(ं है । परमामा परमशि1त है । जो पूण:
K प से अकायKरत
है । परमामा जीवामा के गुणो का सा$ी है । जब जीव को अनुभूत होती
है क@ वह परमामा से अलग नह( है तब उसे नयामा कहा जाता है ।
नयामा अथाKत शाqवत चेतना। ऐसी आमा 2थान, काल और अवकाश
से परे होता है । ऐसी आमा शाqवत होता है , जीवामा और परमामा दोनो
पर2पर एक होते है । ईसक@ कोमल आम जीस तरह पैड के साथ एकाकार
होता है उसके साथ तुलना कर सकते है । यह एकामकता (युनयन) तभी
संभव होती जब सत चत (चेतना-सभानता) और आनंद (सुख) एक होते है ।
यह एकता तभी संभव होती है जब तीनो गुण – सव, रजस, तमस सत
चत-आनंद म एक:प होते है । ईसे योग (जुडना) कहते है । ईस ि2थत म
जीवामा परमामा जुडे हुए होते है ।

279. कंु ड'लनी शि5त को ाणायाम से जागत


ृ करनी चा@हए।
कंु ड'लनी जागरण से मनुMय को मुि5त ाDत करनी चा@हए। &Jा एक
रसी जैसी है । वायु एक रसा है । हमे वायुiपी रसे को मजबत
ू ी से
272 चदाकाश गीता

पकडकर रखना चा@हए। &Jा वह ओर कुछ नह!ं लेक3न धारणा है । हमारा


Zयान हरदम धारणा पर केि:Bत होना चा@हए। यह Zयान &Jा के साथ
होना चा@हए। &Jा शर!र क3 हर एक नाडी मE €याDत होनी चा@हए। ऐसे
लोगो मE माया एक अलग ह! अित व नह!ं होता। मन ह! माया है ।
वातव मE मन Lवचार तरं ग पैदा करता है । सभी तरह के `र)ते, सभी तरह
के सज
ृ न, कारण और प`रणाम, काश और yzमांड, yzम काश और
परम तेज ये सभी भेद वातव मE माया अथाFत अ8ान से होते है । जब यह
स य समज मE आता है तब माया का भय नह!ं रहता। ये सभी व*प
वातव मE मेरे वiप है ऐसा 8पुiष को सोचना चा@हए। जब मन Zयान
मE एका‰ हो जाता है और चेतना के आकाश मE जब परम ऐ5य का
अनुभव होता है तब उसे मोk कहा जाता है । मोk का मागF अपने से
अलग नह!ं है । आंख और कान के बीच का भेद-पाप और पŸ
ु य का फकF
बहुत ह! पतला है । यह बLु J से पर नह!ं है । आनंद और दःु ख दोनो ऐसी
चीजE है जीसे बLु J मE एकाकार कर दे ना है । बLु J क3 मदद से मोk को
'सJ करना है । जब मन आ मा को व मE एकाकार कर द!या जाता है और
जब ऐ5य 'सJ हो तब उसे मोk कहा जाता है । 8ान आंत`रक है । शुi मE
8ान को समज सकते हो लेक3न जैसे जैसे ऐ5य 'सJ होता है वैसे वैसे यह
8ान भी भला द!या जाता है । ईसके बाद कुछ भी सुनने या कहने के 'लए
बाक3 नह!ं रहता। सब लोग yzम है और &म ह! सवFव है । ईस िथत को
‘शुभावथा’ क3 िथत कहा जाता है । ाण एक रसा है । जब सांसे अंदर
बाहर होती है तब वह संवा@दता से गत करता है । ाण अLवभा\य है । उसे
समय का कोई भेद नह!ं है । ाण ईस फकF का तब अनुभव करता है जब
वह थुल के साथ होता है । जीव जगत के गण
ु ो मE अटका है ईस'लए
273 चदाकाश गीता

अपने ‘स य’ को भूल गया है और ननतर पर पहुंच गया है । उसे बLु J


क3 मदद से उपर क3 ओर आगे बढने दो। ाण को &Jा क3 रसी से बाँध
के रखो। ाण क3 उZवFगत से ाण को ‘मोk’ 'सJ होने दो। घआस के
बंधनो से मिु 5त अथाFत मोk। उसके बाद शांत आती है । हे ाण!
शांतधाम मE वेश करो! ईस जगत और बाद के Lव)व दोनो को नयंjण
मE रखो। ऐसी आ मा सत, च त, आनंद 'सJ करती है । सत अथाFत
अित व-च त-8ान और आनंद अथाFत परम सुख। ऐसे लोगो को कमF के
प`रणामो के 'लए लगाव नह! होता। वे लोग नरं तर तौर पर एका‰
मनवाले होते है । ऐसे लोगो को जीव के गण
ु ो पर Lवजय ाDत Xकया होता
है । जब तक शर!रभाव के बारे मE जागiकता होती है तब तक मुि5त 'सJ
करना संभव नह!ं है । जब तक Jैतभाव नMट नह! होता तब तक योग नह!ं
है और मिु 5त भी नह!ं 'मलती। ईस तरह से दे खE तो हर एक €यि5त योगी
है लेक3न योग के हर एक कार मE कुछ ना कुछ नि)चत हे तु होती है
लेक3न जब मूल त व मE एक हो जाये और जीवन के JंJ भल
ू ा द!ये जाते
है तब एका मभाव दे ख सकते है । सnचा योग वह है क3 €यि5त हर एक
चीजो मE से मु5त रहता है । वह योग है क3 जीससे मनुMय ईnछाओ मE से
मु5त हो जाये वह मोk का मागF है । शंकाओ का नरसन तब तक नह!ं
होगा जब तक जीव 'शव के साथ 'मलकर एक न हो जाये। जब €यि5त
ऐसा कमF करे क3 जो दस
ू रे को पसंद न आये तो वह €यि5त ऐसे कमF
करनेवाले को पागल मानता है लेक3न दोनो एकदस
ू रे को पागल नह!ं
समझते। जब दोनो को एक समान कमF करने मE लगाव न हो तब उ:हE
उसमE कुछ भी बरू ा महसूस नह! होता। मनुMय का मन पवन मE रखी *ई
जैसा है और ई)वर क3 भि5त iऊ पर डाले गये पानी जैसा है । ऐसा ह!
274 चदाकाश गीता

मन के नाश का है । मनुMय का मन जो *ई जैसा है उसे 8ान के पानी से


भीगौना चा@हए और च त को ईnछाओ से मु5त करना चा@हए। ईसे मोk
कहा जाता है । *ई क3 तरह मनुMय को मुि5त ाDत करने द!जीए। मनुMय
आ मा का चंतन करता है लेक3न LवLवध कमF मE वह फंसा हुआ रहता है ।
ईि:Bयो के Lवषय हमार! बाहर! ओर है । अंदर क3 ओर नह!ं है । ईसी'लए
हम जब LवLवध कमF करते है तब बLु J क3 मदद से हमे अपनेआप को
अलग रखना चा@हए। जब मोटर का चालक वाहन के ट!य`रंग पर से
अपना हाथ उठा लेता है तो वाहन क3सी भी @दशा मE चला जाता है और
भयजनक बनता है । मन बLु J मE रहना चा@हए। हमे मन को भटकने नह!ं
दे ना चा@हए। मन को आंत`रक Zयान पर केि:Bत करना चा@हए।
आ मचंतन से मन का Lवकास करना चा@हए। हे मन! चेतना के आकाश
मE सूoम बLु J के Lवकास से वेश करE और शर!र क3 हर एक नाडी को ईस
बLु J से भर दो ! हे मन! हरदम संतुMट रहो! हे मन! छायाYबंबो क3 ‚मणा
से ेर!त न हो!
पMट!करणः ाणायाम हमारे 4लए कंु ड4लनी जागरण का एक साधन
है । कंु ड4लनी जागरण और उसे सह2G पतीओवाले कमल-सह2Gार क@ ओऱ
मि2त9क म ेर(त करके मुि1त ाwत करनी चा&हए। ऐसा होगा तभी
हमार( ईEछाएं शांत होगी। जीव 4शव के साथ एक हो जायेगा। हमारे अंदर
lढ +tा होनी चा&हए और र2सी जैसे चीपके रहते है उसी तरह +tा को
चपककर रहना चा&हए। यह lढ +tा धारणा से अथाKत सांस पर Vयान
केिlत करने से ाwत Iकया जा सकता है । यह र2सा मतलब वायु (हवा)
है । ईस वायु को हम चपककर रहकर ईqवर म जीवंत +tा ाwत कर
सकते है । +tा अथाKत और कुछ नह(ं लेक@न धारणा है 1यMक@ +tा ह(
275 चदाकाश गीता

धारणा का पoरणाम है । हमारा Vयान 4सफK धारणा पर केिlत होना


चा&हए। यह Vयान हरदम +tा के साथ होना चा&हए। आVयािम1ता म
गत हमार( +tा के अनु:प होती है । ईqवरािwत हमार( +tा से ह( हो
सकती है । +tा से बडा कोई ईqवर नह( होता। +tा जगत म सबसे महान
चीज है । +tा हमारे शर(र क@ येक नाडी म होनी चा&हए। हमारा येक
अणु +tा से भरपुर होना चा&हए। ऐसे लोग को जीनक@ +tा उEचतम 2तर
क@ होती है उनके 4लए माया का अलग अि2तव नह( होता। उनके 4लए
सारा ONमांड माया का सज
ृ न है। उनके 4लए उनके मन ह( माया है । वे जो
भी अनुभव करते है उनका मन ह( हर कार के मानचG और 3वचारो का
कारण होते है । उन लोगो का अनुभव होता है क@ सारे संबंध, सभी सज
ृ न,
कारण और पoरणाम काश, ONमांड, बाहर( काश, परम तेज यह सब मन
के घाट (सज
ृ न) है और अXान क@ वजह से पैदा होता है । यह रह2य
समज म आ जाये तो माया का भय नह(ं रहता। एक Xावान Fयि1त को
समजना चा&हए क@ जगत क@ 3व3वध बात अपनी आमा का 2व:प है ।
ईस तरह सार( बात को दे खगे तो 3व3वध सांसाoरक बातो का लगाव उसे
भा3वत नह(ं करगे। वह मायार&हत हो जायेगा। हमारा थम और सब से
जCर( फझK है क@ जीव अपने मूल 2वभाव और 2वCप ाwत करे और
उसके 4लए बु3t क@ मदद से ऊVवK&दशा म गत करे । +tा ाण को
ऊVवK&दशा म ले जाने के 4लए बहुत ह( महवपूणK है । मो$ अथाKत ईिlयो
के बंधनो म से मु1त होना। जब मो$ 4सt होती है तब शांत ाwत होती
है । हे ाण! शांतधाम म वेश करो! आपके आज और कल दोनो 3वqव पर
भूव ाwत कर। ऐसे आमा सत-चत-आनंद 4सt करता है । ऐसी
आमाओ के कमK के पoरणामो का बंधन होता नह(। वे शाqवत कार से
276 चदाकाश गीता

बंधन म से मु1त होते है । ऐसी आमाएं शाqवत कार से एकचत होती


है । ऐसे आमाएं ?Gगुण पर 3वजय ाwत Iकया होता है । जब तक म{ शर(र
हुं वह भाव पूणC
K प से खतम न हो जाये तब तक मुि1त दरू क@ बात है ।
मुि1त 4सt करने के 4लए शर(रभाव पूण: K प से अlqय हो जाना चा&हए।
शर(र एक परछाई जैसा होना चा&हए। tैत का भाव जब तक न9ट नह(ं
होता तब तक कोई योग नह(ं है और मुि1त नह(ं है । योग का अथK जीव-
4शव म 4मलकर एक हो जाये वह( है । ईस4लए योग 4सt करने के 4लए
जीव और 4शव का फकK अथाKत tैतभाव दरू हो जाना चा&हए। ईस अथK म
सब लोग योगी है । दु नया के लोग अपने ईिEछत Vयेय 4सt करने के 4लए
अथाक यास करते है और ऐसा करने म उनका योग भी है लेक@न ये
सभी योग ह( निqचत उेश से होता है लेक@न हे तुर&हत-उेशर&हत योग
सब से उEचतम कार का होता है । जब तव मूलतव के साथ एक हो
जाये तब जीव का tेतभाव खतम हो जाता है तब उसे ‘एकव’ या योग
कहा जाता है । यह 4सt हो तब एकव 4सt होता है । सारा 3वqव ईqवर के
दशKन जैसा लगेगा। सEचा योग वह है जो और सब से बंधनमु1त हो जाता
है । ऐसा योग क@ जब Fयि1त ईEछा से मु1त हो जाये तब वह मो$ का
रा2ता बनता है । शंका का नरसन न हो तब जब जीव न3वKकWप समाध
ाwत करे गा। न3वKकWप समाध अVयाम अ…यास क@ उEचतम ि2थत है ।
जब आमा ईqवर के साथ एक हो जाता है जब एक Fयि1त दस
ू रे Fयि1त
कोई भी बात कहे तो Fयि1त ऐसे Fयि1त को पागल मानती है । लेक@न
अगर दोनो एकसमान :च वाल( बात हो तो वे एकदस
ू रे को पागल नह(ं
मानते। ऐसा करने म दोनो कुछ बूरा नह(ं लगेगा उसी तरह सांसाoरक
जीवन म ल(न मनु9य को संसार का पूणC
K प से याग करनेवाला योगी
277 चदाकाश गीता

पागल लगेगा। दस
ू र( ओर योगी जीससे नाशवंत दु नया के पाश3वक भोग
भोगनेवाला मनु9य पागल लगता है । कभी सांसाoरक जीवन के मनु9य का
मन ईqवर क@ ओर ेर(त होता है । ईस4लए जो योगी भी करता है वह बात
उसे भी सEची लगती है । मन पवन म रखी Cई क@ तरह कांपता है ।
मनु9य को मन को lढ और ि2थर करने के 4लए ईqवर के 4लए भावना
ाwत करनी चा&हए। भि1त Cई पर डाले हुए पानी जैसी होती है । जीसे
वायु उडा नह( सकता। जीस तरह Cई पर पानी डालने से उसका उडना बंध
Iकया जा सकता है वैसे मन क@ चंचलता को ईqवर पर Vयान केिlत
करने से पूण:
K प से न9ट Iकया जा सकता है । मन को Xान के जप से
गला करना चा&हए जीससे मन और चत ईEछाओ से मु1त हो जाये।
Xान वह मन क@ ईEछाओ के 3व:t दवा है । ईस जगत म बंधनर&हत
रहना वह मो$ है । ईस4लए हर एक मनु9य मो$ ाwत करे वह जCर( है ।
मनु9य को सांसाoरक जगत के सभी कमK करते करते आमा का चंतन
करना संभव होता है । यह नरं तर Vय़ान सह( Vयान है । अगर मोटर का
चालक वाहन के गतच‡ को छोड दे ता है तो मोटर Iकसी भी &दशा म
चल( जाती है और खतरे का :प ाwत करती है । मोटर के †ाईवर क@ तरह
जैसे हमारा Vयान हरदम वाहन के गतच‡ पर रहता है अथाKत बु3t पर
Vयान केिlत करना चा&हए। जीससे बु3t ईधरउधर न हो जाये। बु3t को
हरदम आमा का 3वचार करते रहना चा&हए और ि2थर और एक केl(
होना चा&हए। मन आंतoरक Vयान करना चा&हए। आंतरlि9ट से सू[म बु3t
का 3वकास होना चा&हए। हे मन! बु3t क@ मदद से चेतना के 3वqव म
वेश करे ! हे मन! सदाय संतु9ट रहो! परछाई से कभी Œ4मत न हो!
उसम एकाकार हो जाओ जीसका कोई पयाKय नह(ं है ।
278 चदाकाश गीता

280. जीन लोगो के मन समाध मE एकाकार हो गये है उनको बाहर


का जादईु भाव नह!ं होता। वे Yबलकुल नभFय होते है । 'सJो को दु नया
का भय नह!ं लगता। बाघ या Lवषैला नाग ऐसे €यि5त को दे खE तो शांत हो
जाते है और उनका जुनुन उतर जाता है । ऐसे लोगो के दशFन हो तो सभी
ाणी शांत हो जाते है । द)ु मन द)ु मनी भूल जाते है और 'मjतापण
ू F बन
जाते है । जब वे ऐसे संत को दे खे तब वे प थर जैसे िथर हो जाते है ।
ईसक3 वजह 5या है ? ईसक3 वजह उनका शंकाशील वभाव है । संत के
दशFन से अंधकार दरू होता है । मन वयं शुJ हो जाते है और स वगण
ु क3
अनुभूत होती है ।
पMट!करणः lढ मन को आसानी से Œ4मत नह(ं Iकया जा सकता।
मन क@ चंचलता ह( जादग
ु र( से मन को Œ4मत होने क@ वजह है । जो
मनु9य का मन समाध म एकाकार हो गया हो उसे बाहर( जादग
ु र( से
Œ4मत नह(ं Iकया जा सकता। ऐसे मनु9य का मन पहाड क@ तरह शाqवत
आमा पर ?बराजमान होता है। ऐसे मनु9य का मन को परम सुख क@
उEचतम ि2थत म से सांसाoरक जादग
ु र( से डगा नह( सकते। ऐसी
उEचतम दशा को ाwत करनेवाले मनु9य ?बलकुल नभKय होते है । समाध
2वयं नभKयता क@ ि2थत है । जहां सब लोग एक &दखते है और भय tंt
के भाव क@ वजह से पैदा होता है । जब tैत का भाव न9ट हो जाता है , भय
रहता नह(ं है और भय &दखानेवाल( चीजे रहती नह(ं है । हर एक चीज सय
का एक भाग है । भय और भय &दखानेवाल( चीजे एक हो जाती है । 4सtो
जगत से गभराते नह(ं है । 1यM उह गभराना चा&हए। उन लोगो को ईस
जगत का उेश पार करना बाक@ है ? ?बलकुल नह(ं! जगत क@ नयंGक
ताकात उनम पूण:
K प से 3वकसीत होती है । सारा 3वqव उनम है लेक@न वे
279 चदाकाश गीता

जगत म नह(ं है । ऐसे संत को जब शेर, 3वषैला नाग दे खे तो शांत हो जाते


है और अपना जुनन
ु भूल जाते है । ईसी तरह सभी ाणी ऐसे 4सt (संत)
को दे खकर शांत हो जाते है । 4सt लोग अपनी चारो ओर शांत फैलाते है ।
4सtो के आसपास का सारा वातावरण शांतमय होता है , ईस4लए ाणी भी
उनके तामसी गुण भूलकर शांत हो जाते है । उसी तरह दqु मनी भी भूल
जाते है और मैGीपूणK बन जाते है । ऐसे लोग साधु (संत) को दे खते ह( तुरंत
ह( पथर जैसे अचल हो जाते है । ईसक@ 1या वजह हो सकती है । ईसक@
वजह उनका शंकाशील 2वभाव है । साधु क@ उपि2थत म उनक@ शंकाओ का
नरसन हो जाता है और सय सम$ का4शत हो जाता है । उनको उनके
सारे दोष &दखाई दे ते है और उसीक शमK महसूस करते है । ईसक@ वजह से
वे साधु क@ उपि2थत म पथर क@ तरह अचल हो जाते है । साधु का दशKन
होते है तब अंधकार नह(ं रहता। माया उसक@ सभी चG-3वचGताओं के
साथ हमे &दखाई दे ती है । शाqवत य जो मनु9य के जीवन का ल[य है
और अंत है वह हमारे सामने उसक@ ाकृतक भFयता के साथ का4शत हो
जायेगा। Xानी क@ उपि2थत म मन 2वयं शांत हो जाता है और अनुभव
करता है क@ सव गुण 1या है ।

281. सभी लोगो को एक ह! समय पर और एकसमान भूख नह!ं


लगती। उसी तरह सभी लोगो को एकसमान मुि5त ाDत नह!ं होती। फकF
'सफF समय का ह! रहता है । मनुMय भाषा के फकF क3 वजह से आपस मE
Lववाद करते रहते है । @ह:द
ु तानी भाषा मE लोग चीनी को ‘मीठा’ कहते है ।
दस
ू र! भाषाओ मE उसे साकर कहते है लेक3न चीनी क3 उपयोग सभी के
'लए एकसमान है । अलब त, चीनी का अलग अलग उपयोग हो लेक3न
जीस थान वहा जाये वह थान वह! है । मनुMय ईशअवर के LवLवध
280 चदाकाश गीता

वiपो मE मानने के बजाय एक ह! वiप को माने तो वह सह! सुख है


वह समज मE आयेगा। मनुMय को तभी संतोष 'मलता है । जो लोग हजारो
ई)वर के व*पो मE माने तो उ:हE संतोष 'मलता नह!ं है । जब तक आप
‘दो’ का Lवचार करE तब तक सख
ु नह!ं 'मलता। ईस'लए ‘एक’ मE ह! संतोष
मानो! ई)वर एक है कभी दो नह!ं होते। जीन लोगो क3 &Jा ईस कार क3
है वे वयं मE ई)वर मE दे ख सकते है । वे सभी को आ मा क3 तरह दे ख
सकते है । यह! मोkमागF है । ऐसे लोगो के कोई दश
ु अमन नह! होते। सभी
लोग उनके 'मj होते है । मनुMय को अपनेआप मE मानकर गंदगी करनी
नह!ं चा@हए। उसे आ मा का साkा कार एक मE मानकर करना है । मनुMय
जहां से आया है वह!ं परत जाना है । कारण और प`रणाम क3 समज ाDत
करके शा)वत बातो मE घूमकर जीस थान से ारं भ Xकया वह!ं पर पहुंचना
है । ईसे मोk (नवाFण) कहा जाता है । मोk हमे ढूंढते हुए नह!ं आयेगा। हमE
मोk को ढूंढना है और उसमE वेश करना है । मोk 5या है ? मोk अथाFत
मन के कमF मE से मुि5त और आंत`रक िथत से नःपहृ रहना वह है ।
मोk अलग कार के बाहर! राते से 'सJ करना नह! है । मोk 5या है ?
मोk को अपनेआप से अलग नह!ं होना है । हमने मोk के 'लए यास नह!ं
Xकया है । ईस'लए हम मानते है क3 मोk हमसे दरू क3 िथत है । मोk
वह यहांवहां भटककर 'सJ करने क3 बात नह!ं है । ईसके 'लए अपने Rदय
मE ह! खोज करनी पडती है । मन को बLु J मE एकाकार कर दे ना है और
Lववेक क3 शि5त से मुि5त मE वेश करना है । ई)वर अLव\या है । मनुMय
को LवLवध कार क3 शंकाओ से ई)वर का चj-तमाएं बनाई है । जो
अ8ानता (माया) से उसे ई)वर कहते है । यह जो शंका है वह LववेकबLु J के
मागF पर तचलकर दरू होनी चा@हए। ऐसा करके ह! हम जीवनमुि5त ाDत
281 चदाकाश गीता

कर सकते है । जीवनमुि5त अथाFत अपने जीवनकाल मE ह! बंधनो से


मुि5त। भि5त-भावना वह और कुछ नह!ं लेक3न मनुMय एक चीज के 'लए
ेम द'शFत करता है वह है । मनुMय को मानना चा@हए क3 वह चीज
जीतनी भी महान हो उसक3 वजह से उसे लाभ हुआ है । यह मा:यता कभी
भी कमजोर नह! करनी चा@हए। दु नया मE भि5त के अलावा कोई चीज या
बात नह!ं है । सभी ाणीओ मE भि5त होती है । जीस तरह पानी अलग
अलग @दशा मE फैलता है उसी तरह भि5त के अनेक कार है । सभ
ाणीओ को भि5त का अधकार है । भि5त सभी Lवषयो मE है । भि5त
पण
ू *
F प से शुJ होनी चा@हे ए। भि5त का साkा कार चेतना के आकाश मE
होना चा@हए। भि5त आंत`रक होनी चा@हे ए और वह सूoम के साkा कार मE
प`रवतFत होनी चा@हए तभी मनुMय ईnछार@हत बनती है औऱ दःु खर@हत
बनती है । यह! शा)वत मु5त है । मुि5त का वेश सुष
ु ना के मागF पर हो!
पMट!करणः सभी लोग मुि1त एक ह( समय पर ाwत नह( कर सकते
और सभी लोगो को मुि1त क@ एकसमान ईEछा नह(ं होती। फकK 4सफK
समय का होता है । मनु9य को जम अVयाम के मागK पर हरदम यास
करके गत करने के 4लए 4मला है । कुछ जमो के बाद निqचत तौर पर
सभी मनु9य ईqवरव ाwत करगे। जीस तरह सभी लोगो को एक समय
पर और उतनी ह(भूख नह(ं लगती उसी तरह सभी मनु9य मुि1त एक ह(
समय पर ाwत नह( कर सकते और उसी तरह सभी मनु9यो को मुि1त
ाwत करने क@ उतनी तीœ ईEछा भी नह( होती। मनु9यो आपस म ईqवर
के 3व3वध 2वCपो के 4लए 3ववाद करते है और कोई 2वCप कोई 2व:प से
महान है ऐसा मानते है । ईqवरािwत का कोई रा2ता दस
ू रे रा2तो से xयादा
आसान और पoरणाम दे नेवाला है । ये सब झगडे-मतमतांतर या 3ववाद का
282 चदाकाश गीता

कोई मतलब नह(ं है । जCर( वह है क@ मनु9य आमशु3t करे और


परमामा के परमसुख का आनंद ाwत करे । यह( मनो-परमचेतना का
2व:प है । जो मनु9य हरदम अ…यास से ाwत करता है और वह( महवपूणK
है । उसे ाwत करने के